अब लगा ले लगन, हो जा निज में मगन।
तुझको आतम नगीना नज़र आएगा।।
देख अंतर का धन, तज दे विषयों का संग।
तेरा सुख-सिंधु, अंतर में ही पाएगा ।।टेक।।
भूल भारी हुई, निज को ध्याया नहीं।
अब तक विषयों से मन को हटाया नहीं।।
तू ही ज्ञायक, चिदानंद, चित्-धाम है।
निज में रहना ही तेरा तो बस काम है।।
छोड़ पर में गमन, हो जा निज में मगन।
तुझको चेतन चिदानंद नज़र आएगा ।।1।।
तूने पर को ही चाहा, न निज साथ को।
तू अनादि से भूला है निज नाथ को।।
गर तू निज में रहे और कुछ न चहे,
तो तेरा भव-सिंधु बेड़ा उतर जाएगा ।।
अब लगा ले लगन, हो जा निज में मगन।
तुझको आतम नगीना नज़र आएगा।। 2।।
रचनाकार: महावीर प्रसाद जैन, अकाझिरी, शिवपुरी
Instagram: @harshit_Jainn03
YouTube: https://www.youtube.com/watch?v=z3i1ieMXV_c&list=PLXcBKWNnm5zU&index=49