मिल गया मार्ग है अब, बस लक्ष्य को ही पाना है,
छोड़ इस संसार को, बस आत्मा को ध्याना है।
संसार भीषण प्रवाह में,
मिल गया है अब जिनागम,
इसके ही पठन, मनन, चिंतन से
मुक्ति को पा लेंगे हम।
तुम्हें भव्यों इक बात बतलाऊँ,
इसको भवितव्य मानना।
महाभाग्य हैं जो पढ़ रहे हैं,
सुन रहे उपदेश को,
निश्चित हैं कि वे, एक दिन धारेंगे
वीतरागी वेश को।
उन सभी में हमारा नाम भी है आएगा,
जो कि हमको इस संसार से
मुक्ति में ले जाएगा।
अपनी यात्रा का आरंभ कर,
पूर्णता का संकल्प ले,
“शुद्ध होकर” सिद्ध बनकर,
भव को हम सार्थक करें।।
रचनाकार: प्रियांश जैन (Priyansh Jain), शाहगढ़
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