आत्मख्याति टीका महिमा कथा
आतम ज्योति उजागरकारी। आत्मख्याति भवभ्रमण अमृत रस धारी ॥
हे भव्य जीवो ।
अनादिकाल से जीव अपने स्वरूप को भूलकर परद्रव्यों में सुख खोज रहा है। कभी शरीर को अपना मानता है, कभी परिवार को, कभी धन को। एक जिज्ञासु श्रावक भी ऐसी ही खोज में था। उसके मन में एक ही प्रश्न था “मैं कौन हूँ?” फिर उसे एक दिन सच्चे देव, शास्त्र, गुरु का सान्निध्य मिलता है और समयसार की आत्मख्याति टीका उसके हाथ आई ।
बस ! यहीं से उस श्रावक के जीवन में सत्पथ का मंगलाचरण हुआ। आत्मख्याति टीका में प्रत्येक गाथा - मानो उसका हाथ पकड़कर कहती है "पर में मत भटक, ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भ्रम छोड़। स्व समय में ठहरना ही आत्मा की ओर लौटना है
ज्ञायक एक, जगत सब ज्ञेया। यही आत्म का अमृत मेवा ॥
ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ा, गाथा १० और १४ ने उसकी दृष्टि को ज्ञेय से हटाकर ज्ञायक में स्थिर किया। गाथा २२ और २३ ने भेद-विज्ञान का ऐसा प्रकाश किया कि उसे अनुभव होने लगा। 'मैं शुद्ध ज्ञायक आत्मा हूँ, शेष सब ज्ञेय है।
पढ़ते-पढ़ते एक वचन उसके हृदय में उतर गया-
“मैं परभाव नहीं। परिणमन का विषय नहीं।”
वह खुशी से झूम उठा उसने अनुभव किया कि जिस सुख को बाहर खोज रहा था, वह तो भीतर ही विद्यमान है।
अब उसकी यात्रा समझने की नहीं, अनुभव की बन गई। गाथा ६२ ने स्वभाव में दृष्टि टिकाई, गाथा १४५ ने आत्मा में रमण कराना सिखाया, और गाथा १८५ ने उस निर्मल आत्मानंद की झलक करा दी, जहाँ केवल शुद्ध ज्ञायक ही शेष रहता है। हे भव्य जीवो ।।
आत्मख्याति टीका - यह तो आत्मा तक पहुँचने वाला सेतु है।
आतम ज्योति उजागरकारी। आत्मख्याति भवभ्रमण निवारी ॥ सद्गुरु चरण कृपा सुखकारी। हो निज स्वरूप में स्थिति हमारी ॥
आचार्य कुंदकुंद की जय, बोलो समयसार की जय ।
आचार्य अमृतचंद की जय, बोलो आत्म ख्याति की जय ।।
Artist: Reshu ji mumbai