आत्मार्थी-जिनवाणी संवाद | Aatmarthi-Jinvani Samvad

आत्मार्थी-
हे मात करुणाकर मुझे, अब गोद में ले प्यार दे।
कह सकूँ मैं माँ तुझे, ऐसा मुझे अधिकार दे।।
रुदन मेरा बन्द हो, ऐसा सुभग उपहार दे।
मग्न हो गाया करूँ, ऐसी मधुर मल्हार दे।।
अब मुझे पुचकार ले, माता कहाने के लिए।
मैं कर रहा हूँ वन्दना, निज बोधि पाने के लिए।।
जिनवाणी-
हे भव्य! निर्मल दृष्टि से, अब दीन भाव विडार दे।
झाँक अन्तर में तनिक, प्रभुता स्वयं स्वीकार ले।।
रुदन की ना है जरूरत, छोड़ पर अपने में आ।
झूल समता के हिंडोले, परम भाव मल्हार गा।।
आज खुद में लीन हो जा, प्रभु कहाने के लिए।
निज भाव ही है एक शरणा, बोधि पाने के लिए।।
आत्मार्थी-
जानता नहीं आत्मा मैं, माँ बता दे अब मुझे।
आत्म-वैभव का सहज, परिचय करा दे माँ मुझे।।
रुल रहा हूँ चार गति में, सुख न पाया है जरा।
हर्ष सा कुछ हो रहा यह, जान सुख निज में भरा।।
हो रहा मैं आज आतुर, दुःख मिटाने के लिए।
मैं कर रहा हूँ वन्दना, निज बोधि पाने के लिए।।
जिनवाणी-
आत्मा तू है स्वयं ही, पूछता है क्यों अरे ?
आत्मा का ही नजारा, विश्व में जाहिर खरे।।
मौजूदगी से आत्मा की, कद्र तन की सब करें।
निकल जावे आत्मा तो, चिता में इसको धरें।।
उपयोग लक्षण है कहा, पहिचान करने के लिए।
दृष्टि अन्तर में करो,सब दुःख मिटाने के लिए।।
आत्मार्थी-
आँख जब मैं बन्द करता, बस अंधेरा सा दिखे।
ध्यान करने बैठता, उपयोग नहिं किंचित् टिके ।।
अति चपल मन भटकता है, मात ! बाहर ही अरे।
आलस्य आकर घेरता है, नहिं समझ कुछ भी परे ।।
माँ सुना दे आत्म-वैभव, रुचि जगाने के लिए।
मैं कर रहा हूँ वंदना, निज बोधि पाने के लिए।।
जिनवाणी-
विश्व का सिरताज चेतन, गुण अनंत सु हैं भरे।
कर्मादि अरु रागादि भी, रहते सदा जिससे परे ।।
शैवाल तो ऊपर ही है, लहरें भी ऊपर ही अहा।
खान रत्नों की अपरिमित, निस्तरंग सागर यथा ।।
पर्याय अरु गुणभेद से भी, भिन्न त्यों प्रभुता लिए।
चैतन्य रत्नाकर लखो, निज, रुचि जगाने के लिए।।
अनुपम मनोरम रूप निज दिखते ही मन भा जायेगा।
अंधकार नहीं रहे, अद्भुत प्रकाश दिखाएगा।।
निज का सहज आनंद पा, आलस्य फिर नहीं आयेगा।
अस्थिरता होने पर भी, चित्त पुनि-पुनि वहीं ललचायेगा ।।
पुरुषार्थ खुद ही प्रकट हो, थिरता चढ़ाने के लिए।
बस भव्य अन्तर्दृष्टि कर, निज रुचि जगाने के लिए।।
आत्मार्थी-
माँ आवरण है कर्म का, पुरुषार्थ कुछ चलता नहीं।
बीच भवदधि में पड़ा हूँ, तीर भी दिखता नहीं।।
शास्त्र भी पढ़ता, नियम-संयम का पालन भी करूँ।
शांत चित्त फिर भी न हो, तू ही बता माँ क्या करूँ।।
आज आया हूँ शरण मैं मार्ग पाने के लिए।
मैं कर रहा हूँ वन्दना, निज बोधि पाने के लिए।।
जिनवाणी-
श्रम आवरण का छोड़, तू तो निरावरण त्रिकाल है।
कर्मादि जड़ अति भिन्न, इनसे भिन्न तेरी चाल है।।
मूल है चारित्र सुख का, आत्म-दर्शन ही अहो।
शुद्धात्म का आश्रय किये, सुख से भवोदधि पार हो ।।
निज भाव परम प्रकाशमय, मारग सुझाने के लिए।
निश्चिंत हो निज में समा जा, तृप्ति पाने के लिए।।
आत्मार्थी-
माँ अब मुझे विश्वास जागा, सिद्ध सम मम रूप है।
दृग-ज्ञान-सुख-बल मय सदा, चैतन्य भाव अनूप है ।।
पर से नहीं किंचित् कभी, मम सुख का सम्बंध है।
स्वाधीन आनंदखान, मेरा भाव तो निर्बन्ध है ।।
निज भाव ही है एक आश्रय, मुक्ति पाने के लिए।
चरणों में नत हूँ माँ सहज, निर्वाछक निज दृष्टि लिए ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

खोज: Atmarthi-Jinvani Samvad