आत्मा का हित निहारे, निज पद को जा सम्भारें ।
संसार में फँसे हैं क्यों, अब शान्ति से विचारें ।। 1 ।।
है शुद्ध रूप मेरा, अविनाशी सुख का घर है।
उसको तो भूलने में, रखी नहीं कसर है।। 2।।
मिथ्यात्व का गहलपन, हम सब पै आज छाया।
पूजे कुदेव-कुगुरु-कुधर्म, हमको भाया।। ३।।
आदर सदा किया है, इन ही के सेवकों का।
और नशा हम पै छाया, धन ज्ञान औ पदों का।। 4।।
सम्यक्त्व नाहिं भाया, पर रूप में लुभाया।
इस ही से भव में भ्रमता, सुख को नहीं है पाया।। 5।।
तिर्यञ्च-सुर-नरक से, नरगति में दुख उठाया।
आया था निगोद से मैं, उसमें ही पुनः जाया।। 6।।
इस तरह काल खोया, आतम का हित न कीना।
पर भाव ही को निजकर, निज सम्पदा गही ना।। 7।।
अब आया हूँ ठिकाने, सुन सद्गुरु की वाणी।
श्रद्धान में हैं आये, जिनदेव-गुरु औ वाणी।। ८।।
सत् ज्ञान अभ्यास द्वारा, आत्मानुभव करेंगे।
आत्मा में लीन रहकर, संसार परिहरेंगे ।। ९।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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