पर की चिंता त्याग आत्मन् ! आतम हित में लाग।
तोड़ सकल जग द्वन्द्व-फन्द, तू निज स्वभाव में पाग ।। टेक ।।
पर से कुछ सम्बन्ध नहीं है, स्व-स्वामित्व अभाव।
नहीं कर्तृत्त्व सु दो द्रव्यों में, है अत्यन्ताभाव।। १।।
कार्य विकल्पों से नहीं होवे, है स्वाधीन स्वभाव।
होने योग्य सु होय परिणमन, आराधो निज-भाव।। २ ।।
निज-निज कर्मों के फल से ही, बने अनादि बनाव।
कर्म न कोई देवे लेवे, तू क्यों करे विभाव।। ३।।
सभी जीव दुःख सुख को वेदें, जैसे होवें भाव।
अज्ञानी नित रहे आकुलित, भले करे सुख चाव।। ४।।
ज्ञानी भेदज्ञान के बल से, धारें समता भाव।
पूर्व कर्म तब झड़ते जावें, ये ही सत्य उपाव।। ५।।
अखिल विश्व में कुछ भी करने का, न दिखे अवकाश।
दृष्टा-ज्ञाता रहो सहज ही, सुख है अपने पास।। ६।।
भूल स्वयं को जो दुःख पावे, सुखी करे फिर कौन।
निजानंद रस निज में वेदे, दुःखी करे फिर कौन।। ७।।
रहो सहज निर्भार ‘आत्मन्’ झूठे अध्यवसान।
ये संसार चलेगा यों ही साधो साध्य महान्।। ८।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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