आत्मबोध | Aatmabodh

आत्मबोध | Aatmabodh

आत्मबोध
(दोहा)
परम जोति बन्दों सकल, दर्पण तुल्य त्रिकाल।
युगपत प्रतिबिम्बत जहाँ, सकल पदारथ-माल ॥
(चौपाई)
जो निजरूप न जाने सही, परमातम सो जाने नहीं।
तातें प्रथम स्वरूपहि जान, जातें जानें पुरुष प्रधान ॥ १ ॥
जो निज तत्त्वहि जाने नाहिं, तसु थिरता नहिं आतम माहिं ।
सो तन चेतन भिन्न पिछान, कर न सके मोहित अज्ञान ॥ २ ॥
निज पर भेद लखे नहिँ’ जोय, आत्मलाभ ताको नहिं होय।
ता बिन निज प्रबोध अंकूर, प्रापति स्वप्न माहिं अति दूर ॥ ३ ॥
तातें शिव अभिलाषी जेह, आतम निश्चय प्रथम करेह।
जो पर पर्यय रूप विकल्प, वर्जित चितगुण सहित अनल्प ॥ ४ ॥
सोहे त्रिविध आतमाराम, सर्व भूतथित निज गुणधाम।
बहिरातम अन्तर आतमा, परमातम जानो अनुपमा ॥ ५ ॥
जाकी देहादिक पर माँहि, आतमबुद्धि भरम निज छाँह।
सो जानो बहिरातम कूर, मोह नींद सोवे भरपूर ॥ ६ ॥
परभावन तें होय उदास, आप आप में रुचि है जास।
सो अन्तर आतम बुध कहे, जे भ्रम तम हर निजगुण लहे ॥ ७ ॥
निर्मल निकल शुद्ध निष्पन्न, सर्वकल्प वर्जित चैतन्य ।
शुद्धातम परमातम सोय, ज्ञानमूर्ति भाषै मुनिलोय ॥ ८ ॥
(प्रश्न)
लख के देहादिकतें भिन्न, शुद्ध अतीन्द्रिय चेतनचिह्न ।
आतम तत्त्व अमूरत तास, कैसे करें ध्यान अभ्यास ? ॥ ९ ॥
(उत्तर)
तजके बहिरातमता मित्त, अन्तरातमा होय सुचित ।
ध्यावहु परमातम अति शुद्ध, अव्यय शुद्ध बुद्ध अविरुद्ध ॥ १० ॥
तन चेतन को जाने एक, बहिरातम शठ रहित विवेक ।
ज्ञानी जीव अनुभवे भिन्न, देहादिकतें निज चित चिन्न ॥ ११ ॥
आतम तत्त्व विमुख अत्यन्त, करण विषय चल परिणतिवंत ।
बहिरातम अज्ञानी जीव, तन को आतम लखै सदीव ॥ १२ ॥
सुर नर पशु नारक पर्याय, नामकर्म के उदय लहाय।
निज को सुन नर पशु नारकी, जाने मूढ़ अविद्या थकी ॥ १३ ॥
स्वसंवेद्य निजरूप चिदंक, जो भाषों जिनवर निकलंक।
सो नहिं जानें अक्षातीत, सदा अमूरत देव पुनीत ॥ १४ ॥
च्युत चेतन निज तन में जेम, माने सठ आपो कर प्रेम।
त्यों ही देख परायी देह, पर आतम मानें भ्रम गेह ॥ १५ ॥
इन निजतन में निज जिय जान, परतन में पर जीव पिछान।
या ही बुद्धि ठगो संसार, जड़ में चेतन तत्त्व निहार ॥ १६ ॥
ताही में निज भिन्न अत्यन्त, पर सुत दारादिक बहु भन्त।
मानत मूढ़ तिनहि आपने, मोह-ज्वर व्याकुल मति घने ॥ १७ ॥
चेतन और अचेतन द्रव्य, तिन मानी के अपने सर्व।
विनसन उपजनादि पर रूप, निज ही के जानें भ्रम कूप ॥ १८ ॥
यह अज्ञान विषम ग्रह क्रूर, लगो अनादि जीव के भूर।
जातें देहादिक को मूढ़, आप रूप जानें अतिरूढ़ ॥ १९ ॥
जो तन में आतम बुधि अन्ध, सो ही रचैं देह सम्बन्ध ।
चिद्गुण में आतम बुधि जोय, करत सो भिन्न देहतें सोय ॥ २० ॥
तन में अहं बुद्धि ही जानें, बन्धु धनादि विकल्प सु घनें।
तिन को लख अपने सउ जीव, आप ठगाने सकल सदीव ॥ २१ ॥
आतम भाव देह में जोय, स्थिति भववृक्ष वर्धक सोय।
तातें ध्यावहु अन्तर इष्ट, तज इन्द्रिय रज वाहिज दिष्ट ॥ २२ ॥
तातें इन्द्रिय वश निज त्याग, मैं विषयन में कीनो राग।
सो मैं इन ही के परसङ्ग, जानों नहिं निज रूप अभङ्ग ॥ २३ ॥
तज बाहिज दृग विषय अनिष्ट, अन्तरात्मा होय सुद्रिष्ट।
यो ही योग करे परकास, परम जोग निर्मल गुण राश ॥ २४ ॥
जो कछु रूप देखवे योग, सो मोतें पर बिन उपयोग।
ज्ञान रूप दीसत नहिं नैन, तो कासों में भाखों बैन ॥ २५ ॥
जो मैं पर की शिक्षा लेउँ, वा मैं पर को शिक्षा देंउँ।
सो है यह भ्रम बुद्धि असार, मैं तो स्वयं बुद्धि अविकार ॥ २६ ॥
जो निज चिदगुण ही को ग्रहे, निज तैं भिन्न न परगुण बहें।
सो मैं विज्ञानी अविकल्प, स्वसंवेद्य कैवल्य अनल्प ॥ २७ ॥
जो सौकल को सर्प पिछान, करे क्रिया भ्रम कोय अज्ञान।
तैसे मेरी पूरव क्रिया, देहादिक में निज भ्रम धिया ॥ २८ ॥
ज्यों सांकल में अहि बुधि नशै, भ्रमबिन क्रिया सकल तब लसैं।
त्यों देहादिक माहीं अबै, अहं बुद्धि विनशी मम सबै ॥ २९ ॥
लिंग पुरुष नारी पुन क्लीव, एक दोय बहु वचनन जीव।
जातें मैं अवाच गुन धाम, ज्ञाता निजकर निज में राम ॥ ३० ॥
मैं सोयो जाके बिन ज्ञान, जग्यो ततक्षण जाहि पिछान।
मो स्वरूप मम अक्षातीत, स्वसंवेद्य चैतन्य पुनीत ॥ ३१ ॥
परम ज्योति निज तत्त्व रसाल, जाहि विलोकत ही ततकाल ।
विनशैं रागादिक अति घोर, तातैं अरि प्रिय कोऊ न मोर ॥ ३२ ॥
मो स्वरूप देखो नहिं जोय, सो जन मम अरि प्रिय नहिं होय ।
जिहि स्वरूप देखो मम सही, सो भी शत्रु मित्र मो नहीं ॥ ३३ ॥
पूर्व अज्ञान क्रिया जे सबै, नानाविध सो भासत अबैं।
इन्द्रजालवत मिथ्यारूप, जानो हम जिय चिह्न चिद्रूप ॥ ३४ ॥
शुद्ध प्रसिद्ध आत्मा जोय, ज्योति स्वरूप सनातन सोय।
सो ही मैं तातैं निज धाम, अवलोकों अच्युत निज राम ॥ ३५ ॥
बहिरातमता तज के वीर, अन्तर दृगतें ध्यावें धीर।
रहित कल्पना जाल विशुद्ध, परमातम ज्ञानी अविरुद्ध ॥ ३६ ॥
बन्ध मोक्ष ये दोई तत्त्व, है भ्रम अभ्रण कारण तत्त्व।
बन्ध जान पर सङ्गति दोष, भेद-ज्ञान तें उपजे मोक्ष ॥ ३७ ॥
चरन अलौकिक ज्ञानी तनों, अद्भुत कायै जात सुभनों।
अज्ञानी जिहि बाँधे कर्म, तहँ ज्ञानी साधे शिव शर्म ॥ ३८ ॥
जो भव-वन में भ्रमत अत्यन्त, मैं पूरब दुःख लहो अनन्त ।
सो निज पर को भेद-विज्ञान, पाये बिन यह निश्चय जान ॥ ३९ ॥
जो मैं ज्ञान प्रदीपक सार, लोकालोक प्रकाशन हार।
तो क्यों जगवासी जन दीन, डूबे भव कदमि में हीन ॥ ४० ॥
निज में निजकर आप स्वरूप, अनुभव करिये सदा अनूप।
तातें निज को जानन हेत, परमें विफल प्रयास समेत ॥ ४१ ॥
सो ही मैं, मैं सो ही शुद्ध, इम अभ्यासत सदा सुबुद्ध ।
कर विकल्प वासना तास, पावे आप आप में वास ॥ ४२ ॥
करत अज्ञानी जहँ प्रीत, सो सो आपद-धाम समीत।
जा पद ते पुनि यह डर खाय, निजानन्द मन्दिर सो आय ॥ ४३ ॥
इन्द्रिय चपल चित्त को रोक, होय प्रसन्न अनुभवी लोक ।
तत्क्षण स्वसंवेद्य चिद्रूप, भासैं सो परमेष्ठि स्वरूप ॥ ४४ ॥
जो सिद्धातम मैं हूँ सोय, जो मैं सो परमेश्वर होय।
मों को पर न उपासन जोग, पर कर मैं न उपासन जोग ॥ ४५ ॥
करण विषय हरि मुखतें खेंच, निज को निजकर बिन भ्रम पेंच।
मैं निज में थिर भयो अटल्ल, चिन्दानन्दमय विर्षे असल्ल ॥ ४६ ॥
या प्रकार तनतें जो भिन्न, लखें न भ्रम बिन चेतन चिह्न ।
सो अति तीव्र कोटि तप करें, तो भी तसु विधि बंध न झरें ॥ ४७ ॥
जो आप पर भेद-विज्ञान, सुधा-पान आनन्दित वान।
देहजनित क्लेशनते सोय, तप में खेद खिन्न नहिं होय ॥ ४८ ॥
रागादिक कलंक को धोय, जाको चित अति निर्मल होय ।
सो ही लखें आपकों आप, अन्य हेतु है नाहिं कदापि ॥ ४९ ॥
तत्त्वरूप निर्विकल्प चित्त, सहित विकल्प अतत्त्व सुमित्त ।
तातें तत्त्वसिद्धि के अर्थ, निर्विकल्प चित करहु समर्थ ॥ ५० ॥
जो निज चित्त अज्ञान समेत, सो नहिं निज अनुभव हेत ।
सो ही जान वासना लीन, लखै परमपद आप प्रवीन ॥ ५१ ॥
जो मन होय मोह में मग्न, चंचल रागादिकतें भग्न।
मुनि सो मन निज में थाप, तत्क्षण हनें राग संताप ॥ ५२ ॥
मूरख प्रीति धाम तन जोय, तातें भिन्न सुबुद्धि ते होय ।
चिदानन्द सागर में मग्न, करे राग संतति सब भग्न ॥ ५३ ॥
निज भ्रम ते उपजो दुःख जोय, सो सुज्ञान ही ते क्षय होय।
जो निज का रहित जन दीन, ते तपहू तें करे न छीन ॥ ५४ ॥
बल रूपायु धनादिक तनी, प्राप्ती चहें अज्ञानी पनी।
ज्ञानी तिनके विरकत दशा, चाहत प्रगट आप में बसा ॥ ५५ ॥
पर में अहं बुद्धि कर रूढ़, निज को बाँधे निजच्युत मूढ़।
आप माहिं आप बुधि धार, ज्ञानी करहि बन्ध विध क्षार ॥ ५६ ॥
सहित त्रिलिंग देह मूर्तीक, ताहि अजान माने आत्मीक।
ज्ञानी पुनि माने निज रूप, लिंग सङ्ग वर्जित चिद्रूप ॥ ५७ ॥
अभ्यासे जानो पुन ठीक, निर्णय कियो तत्त्व आत्मीक।
सो अनादि भ्रमकारण पाय, मुनिहू के जु खलित हो जाय ॥ ५८ ॥
जो दिखाय सो चेतन नाहिं, चेतन नहिं आवे द्रग माहिं।
तातें विफल अन्य रागादि, ध्याऊँ मैं स्वरूप आल्हादि ॥ ५९ ॥
त्यजन ग्रहण बाहिज सठ करें, ज्ञानी अन्तर तें अनुसरें।
त्यजन ग्रहण बहिरन्तर दोय, शुद्धातम न करें कछु सोय ॥ ६० ॥
वचन काय तें न्यारा जान, मन से करें आत्म का ध्यान।
वचन देह से कारज और, करें नहीं पुनि मन से दौर ॥ ६१ ॥
अज्ञानी जन को संसार, भासै सुख प्रतीत भण्डार।
तिनहि कहाँ सुख कहाँ विश्वास, भासे जिन पायौ निज बास ॥ ६२ ॥
निज विवेक बिन अन्य विचार, ज्ञानी करें न छिन मन मार।
जो विवेकि कछु कारज करै, सो वच तन तें बिन आदरै ॥ ६३ ॥
अक्ष विषय मय जो मूर्तीक, सो स्वरूपते पर यह ठीक।
निजानन्द निर्भय चैतन्य, जोतिमई मम रूप न अन्य ॥ ६४ ॥
अन्तर दुःख बाहिज सुख तिन्हें, योगाभ्यास उद्यमी जने।
इनते उल्टी तिनकी चाल, जिन पायो निज योग रसाल ॥ ६५ ॥
सो जाने सोई उच्चरे, सोई सुने ध्यान तसु धरै।
जातें होय भरम तम नाश, पावे आप आप में वास ॥ ६६ ॥
विषयन में कछु नाहीं सोय, जाते स्वहित जीव के होय।
तो पुनि प्रीति करें तिन माहिं, अज्ञानी उर समता नाहिं ॥ ६७ ॥
भाख्यो श्री जिन भाखो जेम, मूरख तत्त्व न जाने केम।
तातैं पर समझावन काज, उद्यम वृथा हमारे साज ॥ ६८ ॥
जो उपदेश नहीं मैं सोय, मो स्वरूप पर ग्राह्य न होय।
ताते पर संबोधन तनों, आग्रह वृथा हमारो भनो ॥ ६९ ॥
अज्ञानी अन्तर द्रग बिना, पर में पुष्ट होत निशदिना।
रहित बाह्य भ्रम ज्ञानी जीव, तुष्ट आप में आप सदीव ॥ ७० ॥
पावत मन-वच-तन में धार, आत्मबुद्धि तावत संसार।
इनतें भेदज्ञान जब करै, तब ही संसारार्णव तरै ॥ ७१ ॥
जीरन रक्त पुष्ट सुच जोय, वस्त्र होत जिमि पुरुष न होय।
त्यों जीर्णादि होत वपु रूप, नहिं पुन आतम चिद् गुन भूप ॥ ७२ ॥
चल भी अचल तुल्य भासंत, जाके ज्ञान माहिं अत्यन्त।
ज्ञान योग चलत बिन सोय, शिवपद पावैं निश्चल होय ॥ ७३ ॥
औदारिक तैजस कार्माण, इन त्रय लखें रूप निज ज्ञान।
जोलों भिन्न न जानो सोय, तोलों बन्ध अभाव न होय ॥ ७४ ॥
पूरन गलन स्वभावी अणू, तिन बहु स्कंध रचित सब तनू।
ताहि अनादि भरम ते मूढ़, जाने तत्त्व न आगम गूढ़ ॥ ७५ ॥
नियत लहे मुनि सो शिव धाम, जाकी थिति ध्रुव आतमराम।
ताको मुक्ति न कबहूँ होय, जाको आतम थिति नहिं जोय ॥ ७६ ॥
मृदु कठोर थिर दीरघ थूल, जीरण शीरण लघु गुरु थूल
इम तन रूप लखें सठ आप, लखत न आतम ज्ञानकलाप ॥ ७७ ॥
लौकिकजन सङ्ग ते बच कहे, चपल चित्र तहँ मनभ्रम वहे।
ताते ज्ञानीजन सर्वङ्ग, त्यागो लौकिकजन परसङ्ग ॥ ७८ ॥
नग्र कन्दर पुर मन्दिर बीच, निज-निज राज होय जन दीच।
ज्ञानी सर्व अवस्था विषै, निज निवास निज ही में दीखें ॥ ७९ ॥
देह माँहि जो आतम आन, तन सन्तति को कारण जान।
जो चिद्गुण में निजबुध सोय, तन संतति नाशन मल धोय ॥ ८० ॥
निज कर निज को बंधन करै, निज ही निज को शिव सुख भरै।
तातैं आप आप को होय, रिपु गुरु अन्य नहीं पुन कोय ॥ ८१ ॥
जान आप ते न्यारी काय, तन ते भिन्न लखै चिदराय।
तब निसंक हो त्यागे अङ्ग, जैसे वस्त्र घिनावन रङ्गः ॥ ८२ ॥
अन्तरङ्ग निज रूप निहार, पुन शरीर को बाह्य विचार।
तिनके भेद-ज्ञान में मग्न, चिगैं सो निज निश्चय निज लग्न ॥ ८३ ॥
जिनने निकट लखो निज तत्त्व, प्रथम लखें ते जग के मित्त।
तातें जब शांतामृत चखै, लोष्ठ समान भाखै तब सबै ॥ ८४ ॥
तनते भिन्नहि आतमराम, जो यै सुनत कहत वसु जाम।
तो पैं तन ममत्व नहि तजें, यावत भेद-ज्ञान नहि भजैं ॥ ८५ ॥
तन सो भिन्न जान निज रूप, ऐसे अनुभव करहू अनूप।
जैसे फेरहु स्वप्नमाहिं, तन में निजमति उपजे नाहिं ॥ ८६ ॥
क्रिया शुभाशुभ दोई अन्ध, कारण पुण्य-पाप विधि बन्ध।
तिन बिन निज परिणति शिव हेत, ताते त्यागो क्रिया सुचेत ॥ ८७ ॥
प्रथम असंयम त्याग हु बुद्ध, संयम चरण होय तब शुद्ध।
फिर स्वरूप कों पाय अनल्प, त्यागे संयम चरण विकल्प ॥ ८८ ॥
जात लिंग मुनि श्रावकद्वन्द, देहाश्रित वरते भ्रम इन्द।
तनु संतति भव ताते मुनी, द्रव्यलिंग में ममता धुनि ॥ ८९ ॥
पङ्गु अन्ध कन्ध आरूढ़, सनयन ताहि लखै जिमि मूढ़।
त्यों सठ आतम के संयोग, अङ्ग माहि जाने उपयोग ॥ ९० ॥
पुंगल नेत्र अन्ध के माहिं, लखे भेद ज्ञानी जिमि नाहिं।
त्यों ज्ञानी तन में निज ज्ञान, जाने नाहिं भिन्न पहिचान ॥ ९१ ॥
बहिरातम जन मोक्ष न लहै, जो पै जगें पाठ श्रुत कहै।
ज्ञानी सुप्त तथा उन्मत्त, शिव पावे जाने जो तत्त्व ॥ ९२ ॥
मत्तोन्मत्त अवस्था बीच, भूले निज स्वरूप जिमि नीच।
त्यों ज्ञानी कहुँ भूलें नाहिं, आपा सकल अवस्था माहिं ॥ ९३ ॥
आप आप को सिद्ध स्वरूप, आराधै हुव सिद्ध अनूप।
बाती ज्यों दीपक को पाय, आपहि दीपरूप हो जाय ॥ ९४ ॥
आप आप ही को आराधि, होय परम आतम निरुपाधि।
घिसत बाँस आप को जेम, अग्निस्वरूप होय यह नेम ॥ ९५ ॥
ऐसे वचन अगोचर रूप, जो अनुभवैं परम गुण भूप।
पावैं अचल सिद्धपद सोय, जहँ ते फेर खलित नहिं होय ॥ ९६ ॥
जो यह आतम आपा माहिं, चाहे ज्ञान मात्र पर नाहिं।
तो बिन जतन परम पद धनी, ज्ञानी होय नियत हम मनी ॥ ९७ ॥
स्वप्ने में निज मरनो वृथा, माने मूढ़ भरमतें यथा।
त्यों जाग्रत निज माने नाश, निश्चय आप परम गुण राश ॥ ९८ ॥
अक्षातीत अगोचर बैन, मूरत बिन कल्पना न एन।
चिदानन्दमय जान सुजान, निज में कर निज सो गुणवान ॥ ९९ ॥
आगमज्ञानी शिव नहिं लहै, जो तन में आतम बुधि वहै।
आतम में आतम बुधि जास, तो श्रुत शून्य लहै शिव वास ॥ १०० ॥
पराधीन सुख स्वाद विरक्त, जो तू होय स्वरूपासक्त ।
तो तू ही अखण्ड सुखरूप, आप अनुभवैं चेतन भूप ॥ १०१ ॥
जो अभ्यासैं सुख तें ज्ञान, दुःखकर सो नश जाय निदान ।
दुःख कारण में तत्पर होय, तातें मुनि स्वरूप निज लोय ॥ १०२ ॥
(गीता छन्द)
अखिल भुवन पदार्थ अब प्रकाशनैक प्रदीप है।
आनन्द सीमारूढ़ आप उपाधि के न समीप है ॥
परम साधु-सुबुद्धि लखवे जोग्य का पर्यन्त है।
इम शुद्ध निजकर निज विलोकहु जो सदा जयवंत है ॥ १०३ ॥
यह ध्येय साधारण कहो, धर्म शुक्ल सुध्यान कों।
तिन शुद्ध स्वामि विशेष जानों देख सूत्र बखान कों ॥
अधिकार शुद्धोपयोगरूप विचार यह निज हित भनों।
कछु ‘भागचन्द’ विचार के अनुसार ज्ञानार्णव तनों ॥ १०४ ॥


स्रोत — बृहद् आध्यात्मिक पाठ संग्रह · रचनाकार: कविवर भागचन्द जी

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