देखीं-देखीं अनन्तों शक्तियाँ उछलती देखी।
स्व-सन्मुख हो अनुभव में प्रत्यक्ष मैंने देखी ।।
मेरे आनन्द उर न समाय, सु मैंने देखी ।। टेक ।।
शाश्वत जीवत्व, चिति, दृशि, ज्ञान।
सुख, वीर्य शक्तियाँ सु देखी, अहो मैंने देखी ।। 1 ।।
प्रभुत्व, विभुत्व सर्वदर्शित्व ।
सर्वज्ञत्व, स्वच्छत्व देखी, अहो मैंने देखी ।। 2 ।।
शक्ति प्रकाश, असंकुचित विकासत्व ।
अकार्य कारणत्व देखी, अहो मैंने देखी ।। 3 ।।
परिणम्य-परिणामकत्व सु शक्ति ।
त्यागोपादन शून्यत्व देखी, अहो मैंने देखी ।। 4 ।।
अगुरुलघुत्व, उत्पाद-व्यय-ध्रुवत्व ।
परिणाम, अमूर्तत्व, देखी अहो मैंने देखी ।। 5 ।।
अकर्तृत्व, अभोक्तृत्त्व शक्ति।
नियत प्रदेशत्व देखी, अहो मैंने देखी ।। 6।।
स्वधर्म व्यापकत्व, साधारण-असाधारण,
साधारणासाधारण देखी, अहो मैंने देखी ।। 7 ।।
अनन्त धर्मत्व, विरूद्ध धर्मत्व,
तत्त्व, अतत्त्व मैंने देखी, अहो मैंने देखी ।। 8 ।।
एकत्व, अनेकत्व, भाव, अभाव,
भावाभाव, अभावभाव देखी, अहो मैंने देखी ।। 9 ।।
भाव, क्रिया, कर्म देखी, अहो मैंने देखी ।। 10 ।।
कर्तृत्व, करण, सम्प्रदान, अपादान,
अधिकरण, सम्बन्ध देखी, अहो मैंने देखी ।। 11 ।।
इत्यादि अनंत शक्तियाँ मैंने देखी,
ओर न छोर दिखाय, अहो मैंने देखी ।। 12 ।।
निज आतम में ही रम जाऊँ,
सिद्धि सहज प्रगटाय, अहो मैंने देखी ।। 13 ।।
अब न विस्मरण होय कदापि,
अविचल ध्यान रहाय ‘आत्मन्’ देखी, अहो मैंने देखी ।। 14 ।।
ज्ञानमात्र फिर भी शुद्धातम,
महिमा अपरम्पार, अहो मैंने देखी ।। 15 ।।
जगी प्रतीति सम्यक्,
आतम ही शाश्वत परमातम मैंने देखी, अहो मैंने देखी ।। 16 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Atma ki Saintalis Shaktiyan