आत्मा का लक्षण | Aatma Ka Lakshan

आत्मा का लक्षण

(एक तात्त्विक संवाद)

भोगीलाल: भाई! कई दिनों से पीठ में बहुत दर्द हो रहा है। लगता है, अब से व्यायाम करना पड़ेगा।

अमृतलाल: अरे भाई! व्यायाम करो, योग करो, जो करना हो वह करो; परन्तु “मैं शरीर नहीं, आत्मा हूँ”—इस भेद-विज्ञान का निरन्तर अभ्यास अवश्य करते रहना।


भोगीलाल: पंडितजी साहब! ज़माना तो चाँद पर पहुँच गया। हम भी गाँव से शहर में आ गए और आप अभी भी आत्मा-फातमा की बातें लेकर बैठे हैं!

अमृतलाल: “मैं आत्मा हूँ”—इस सत्य का गाँव, शहर या चाँद से क्या संबंध? यह तो सनातन सत्य है, जिसका प्रत्यक्ष अनुभव प्रत्येक जीव को हो रहा है।


भोगीलाल: अच्छा! तो कोई ऐसा प्रमाण दीजिए जिससे आत्मा की सत्ता सिद्ध हो जाए।

अमृतलाल: आचार्यों ने कहा है—

“उपयोगोलक्षणं ।”

अर्थात् उपयोग (ज्ञान-दर्शनरूप चैतन्य) ही जीव का लक्षण है।


भोगीलाल: उपयोग अर्थात् किसी वस्तु का प्रयोग करना?

अमृतलाल: नहीं। यहाँ “उपयोग” का अर्थ है—चेतना, अर्थात् जानने और देखने की शक्ति। जो निरंतर जानना-देखना हो रहा है, वही जीव का लक्षण है।


भोगीलाल: लेकिन खाना-पीना, उठना-बैठना, चलना-फिरना, हँसना-रोना, जीना-मरना—ये सब भी तो मेरे ही लक्षण हुए?

अमृतलाल: नहीं भाई। लक्षण वही कहलाता है जो वस्तु की सभी अवस्थाओं में विद्यमान रहे।

पेड़-पौधे चलते-फिरते नहीं हैं। रोगी कई दिनों तक भोजन नहीं कर पाता। कोमा में पड़ा व्यक्ति न हँसता है, न रोता है। फिर भी वह जीवित होता है। इन सभी अवस्थाओं में चेतना का अस्तित्व बना रहता है। इसलिए ये क्रियाएँ जीव का लक्षण नहीं हैं।


भोगीलाल: तो क्या शरीर ही मैं हूँ?

अमृतलाल: पहले यह बताइए—कौन-सा शरीर? बचपन का, युवावस्था का या वृद्धावस्था का?

नाखून और बाल निरन्तर बढ़ते और झड़ते रहते हैं। यदि हाथ या पैर कट जाए, तो क्या उसे भी “मैं” कहोगे? यदि वह अलग होकर “मैं” नहीं रहता, तो शरीर भी “मैं” कैसे हो सकता है?

जीवन और मृत्यु—दोनों अवस्थाओं में शरीर रहता है; अंतर केवल चेतना का होता है। शरीर के किसी भी अंग में ज्ञान नहीं है और न ही वह हमारे आदेशानुसार परिणमन करता है। अतः शरीर आत्मा नहीं है।


भोगीलाल: तो फिर विचार, कल्पना और योजनाएँ—यही मेरा स्वरूप होंगे। अर्थात् मैं मन हूँ।

अमृतलाल: मन भी शरीर का ही एक सूक्ष्म उपकरण है। जब जीव पहली बार माता के गर्भ में आता है, तब मन विकसित नहीं हुआ होता; फिर भी वह जीवित होता है।

और यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मन केवल संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों में होता है। असंख्य एकेन्द्रिय तथा असंज्ञी जीव बिना मन के भी चेतन हैं। इसलिए मन भी आत्मा का लक्षण नहीं हो सकता।

पाश्चात्य संस्कृति में आत्मतत्त्व का समुचित ज्ञान न होने से गर्भस्थ जीव को जीव नहीं माना जाता और गर्भपात जैसी हिंसा कर दी जाती है। वास्तव में—

“तत्त्वज्ञान के अभाव में जीव महापाप करता है।”


भोगीलाल: ठीक है। लेकिन सुख-दुःख, क्रोध, मान, माया, लोभ, भय आदि भाव तो मेरे ही हैं। क्या इन्हें मेरा लक्षण नहीं कहा जा सकता?

अमृतलाल: अभी हमने सिद्ध किया कि तुम शरीर और मन नहीं हो। अब सोचो—ये भाव स्थायी हैं या बदलते रहते हैं?

किसी को अधिक क्रोध आता है, किसी को कम और किसी को बिल्कुल नहीं। अरिहंत और सिद्ध परमेष्ठी पूर्णतः कषायरहित हैं।

इसलिए क्रोधादि कषाय जीव के परिणाम तो हैं, परन्तु जीव का लक्षण नहीं हैं।

जीव का वास्तविक लक्षण चैतन्य ही है।


भोगीलाल: मैंने सुना है कि बौद्ध दर्शन आत्मा को प्रत्येक क्षण उत्पन्न और नष्ट होने वाला मानता है, जबकि सांख्य दर्शन उसे सदा ध्रुव मानता है। इनमें से कौन-सा मत सही है?

अमृतलाल: आत्मा पर्याय की अपेक्षा से क्षणिक है और द्रव्य की अपेक्षा से ध्रुव है। उसका वास्तविक स्वरूप उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक है।

यदि केवल क्षणिकता को लक्षण कहेंगे, तो ध्रुवता छूट जाएगी; और यदि केवल ध्रुवता को लक्षण कहेंगे, तो परिवर्तन छूट जाएगा। इसलिए दोनों में से कोई भी आत्मा का लक्षण नहीं है।


भोगीलाल: तो फिर आत्मा का लक्षण उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य हुआ?

अमृतलाल: नहीं। यह आत्मा का स्वरूप तो है, पर लक्षण नहीं। क्योंकि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य—ये तीनों सभी द्रव्यों में पाए जाते हैं।

लक्षण वही है जो विवक्षित वस्तु की सभी अवस्थाओं में रहे और अन्य वस्तुओं में न पाया जाए।

अतः उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य को जीव का विशिष्ट लक्षण नहीं कहा जा सकता; अन्यथा उसमें अतिव्याप्ति दोष लगेगा।


भोगीलाल: भाई साहब! मैंने पूज्य कानजी स्वामी के प्रवचन में सुना था—“मैं ही परमात्मा हूँ।” क्या परमात्मापना जीव का लक्षण है?

अमृतलाल: यह अत्यन्त गंभीर प्रश्न है।

यदि पर्याय की दृष्टि से देखें, तो प्रत्येक जीव वर्तमान में परमात्मा नहीं है। इसलिए उस अपेक्षा से परमात्मापना लक्षण नहीं कहा जा सकता।

किन्तु यदि द्रव्यस्वभाव की अपेक्षा देखें, तो प्रत्येक जीव में परमात्मा बनने की पूर्ण शक्ति विद्यमान है। निगोद से लेकर अरिहंत तक प्रत्येक जीव में अनन्त गुणों की पूर्ण अभिव्यक्ति की सामर्थ्य है।

इस दृष्टि से परमात्मस्वभाव को जीव का नित्य धर्म कहा जा सकता है।

वास्तव में ज्ञान-दर्शनमय चैतन्य ही जीव का वास्तविक लक्षण है। वही प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। उसी ज्ञायक आत्मा को लक्ष्य बनाकर उसका प्रत्यक्ष निश्चय करना ही सम्यग्दर्शन है और वही मोक्षमार्ग की प्रथम सीढ़ी है।


भोगीलाल: अहो! स्व-पर भेद-विज्ञान की यह चर्चा अत्यन्त आनन्ददायक है। यदि चर्चा ही इतनी सुंदर है, तो वह ज्ञायक आत्मा कितनी सुंदर होगी!

भाई! आज आपने मेरी आँखें खोल दीं।


सर्वज्ञ शासन सदा जयवंत वर्ते।
निर्ग्रन्थ शासन सदा जयवंत वर्ते।


रचनाकार

सोहम शाह, अहमदाबाद (@Soham_Shah)

संपादकीय

  • पं० ऋषभ जैन शास्त्री, उस्मानपुर
  • पं० तन्मय शास्त्री, कुरावली ( @JainTanmay )
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