अरे आत्मन्! जरा विचारो, क्यों ये मूर्खता करते हो।
दुख से जब तुम डरते हो, क्यों दुख का साधन करते हो।। 1।।
बार-बार ये देख चुके हो, कोई नहीं संग निभाता है।
फिर भी पर में अपनत्व मान, क्यों दर-दर ठोकर खाते हो।। 2।।
मिथ्या मान्यता से दुःख पावे, कोई सुख-दुःख देय नहीं।
छोड़ो-छोड़ो अब तो कुटेव, भव सिन्धु क्यों अब पड़ते हो।। 3।।
क्यों कुगुरु-कुदेव-कुधर्मों में फँस, दुःखों को न्योता देते हो।
तत्त्वों का निर्णय नहीं करते, नहीं आत्म स्वभाव समझते हो।। 4।।
विषयों में सुख की भ्रान्ति से, तुम मग्न उन्हीं में रहते हो।
पर भविष्य के जीवन की, किंचित् परवाह न करते हो।। 5।।
अरे! विचारो सुखाभास, ये सच्चे सुख के घातक हैं।
ये तो प्रत्यक्ष महा दुःखमय, क्यों नहीं अब इनसे हटते हो।। 6।।
चिरकाल से आत्म स्वरूप भुला, तुम पर में मग्न रहे निशदिन।
भव-भव में धोखा खाकर भी, क्यों अब भी नहीं संभलते हो।। 7।।
ये तो सौभाग्य तुम्हारा है, श्रावक कुल जिनवृष पाया है।
अब भेदज्ञान द्वारा ‘आत्मन्’, क्यों नहीं आतम हित करते हो।। 8।।
यह अवसर बड़ा अमूल्य, हाथ से जाने पर नहीं आयेगा।
अतः समझ सुन चेत सयाने, क्यों गाफिल हो यों रहते हो।। 9।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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