आत्म प्रश्न ? | Aatm Prashn

आत्म-प्रश्न ?

मैं हूँ कौन, कहाँ से आया,
महाशोक है, मानव कहलाकर भी इतना जान न पाया ।। टेक ।।

स्वर्ण छोड़ पीतल पर रीझा,
सुधा त्याग कर चखा हलाहल ।
चला वासनाओं के पथ पर,
मेरा भरमाया अन्तस्तल ।।
सच्चे सुख का स्वप्न न देखा, दुःख पर रहा सदा ललचाया ।। 1 ।।

अपने भले बुरे की मैंने,
समालोचना भी कब की है।
आत्मिक निर्बलता भी मुझको,
नहीं कभी मन में अखरी है।।
जीवन भूला रहा, मृत्यु को अविवेकी होकर अपनाया ।। 2 ।।

काश टूट जाता भीतर से,
मोह और माया का नाता।
मैं तो अपने सुख-दु:ख का था,
उत्तरदाता, भाग्य विधाता ।।
किन्तु गुलामी ने है मुझको ऐसा गहरा नशा पिलाया ।।3।।

एक-एक कर चले जा रहे-दिन,
जीवन को हँसा रुलाकर।
विषय-बादलों में लिपटा है,
इधर मृतक-सा ज्ञान दिवाकर ।।
सूझ न पड़ता अन्धकार में, क्या अपना है, कौन पराया ।। 4।।

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