आत्महितकारी-भावना | Aatm-Hitkari-Bhavana

उठो भव्य जीवों भजो आत्मा को,
यही है शरण हाँ यही है शरण।
स्वाधीन वस्तु व्यवस्था को समझो,

बाहर है केवल जन्म अरु मरण।। टेक।।

संयोग जिसका वियोग भी निश्चित,
व्यर्थ हैं तेरे विकल्प सभी।
पर से निरपेक्ष भिन्न सदा ही रहें,
प्राप्त एकत्व को हों नहीं दो कभी।।
नहीं कुछ भी बदलाव संभव कदा,
क्रमबद्ध होवे सभी परिणमन।। 1।।

तेरा मोह ही तुझको दुखी कर रहा है,
अरे घटना या ज्ञान दें दुख नहीं।
ज्ञान हो दूसरों को भी घटना का पर,
एक सा उनको होता है क्यों दुख नहीं।।
अनुपात में राग के दुख हो,
ये परम सत्य समझो अहो जिन वचन।। 2।।

द्रव्यदृष्टि से देखो सभी ध्रुव सदा,
और पर्याय से थिर रहे कौन है?
छोड़ पर्यायदृष्टि करो साधना,
आत्महितकारी तो भवि सदा मौन है।
शोक छोड़ो करो चिन्तवन ज्ञानमय,
जीव को धर्म ही जग में तारण-तरण।। 3।।

वस्तुएँ जितनी हैं उतने हैं वस्तुत्व गुण,
व्यर्थ चिंता तजो कैसे होवेगा क्या?
भाग्य से हो व्यवस्था सभी की यहाँ,
बाँट सकता कभी कर्म जन्मों के क्या।।
धैर्य धारण करो योग्य उद्यम करो,
आत्म कल्याण का तुम करो शुभ यतन।। 4।।

पंच-परमेष्ठी तो हैं सदा ही शरण,
उनकी श्रद्धा करो, सहज भक्ति करो।
तत्त्व निर्णय करो, तत्त्व चिंतन करो,
अपना सुख अपने में सहज अनुभव करो।।
भेद-विज्ञान बिन नहीं समाधान हो,
व्यर्थ होता रहे क्लेशमय ही मरण।। 5।।

धैर्य धारण करो ज्ञान अभ्यास से,
कटते कर्मों के बन्धन जो भव-भव हुए।
मोह टूटे सहज शांति अंतर में हो,
बढ़ती आराधना प्रभु का आश्रय किए।।
स्वाँग को स्वाँग समझो स्वरूप लखो,
ज्ञान आनंदमय है अनादि निधन।। 6।।

पहले समय से अधिक भाग्य से,
मिलता कुछ भी नहीं रे किसी को कभी।
छोड़ो आकुलता से व्यर्थ ही पाप हो,
पाप से शांत परिणमन होना कभी।।
तुम परीक्षा की घड़ियाँ समझकर इन्हें,
धारो समता जो भव्यों को मात्र शरण।। 7।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह