आत्महित की भावना | Aatm-Hit ki Bhavana

तर्ज : शांत चित्त हो निर्विकल्प हो…

पुण्य-पाप का खेल समझकर, समता भाव धरो।

पर द्रव्यों में व्यर्थ आत्मन्, राग अरु द्वेष तजो।। टेक।।

कण-कण है स्वाधीन जगत् का, तुम निश्चय मानो।
पर में इष्ट-अनिष्ट कल्पना, मिथ्या सब जानो।। 1।।

पापोदय में जो-जो परिणति, तुमको लगती है प्रतिकूल।
पुण्योदय में उनकी परिणति, सहज भासती है अनुकूल।। 2।।

देखो-देखो द्रव्यदृष्टि से, निज में तृप्त रहो।
सहज भाव से सब उपसर्ग, परीषह भव्य सहो।। 3।।

पर-निरपेक्ष सहज स्वाश्रय का, मार्ग जिनागम में गाया।
पर-सापेक्ष कभी कोई नहिं, आत्माराधन कर पाया।। 4।।

व्यर्थ नहीं उपयोग भ्रमाओ, धैर्य धरो अभ्यास करो।
अंतर में पुरुषार्थ बढ़ाओ, मिथ्या पर की आस तजो।। 5।।

इच्छाओं की पूर्ति न होगी, झूठे सपने मत देखो।
जो कुछ जैसा हो होने दो, तुम तो आतमहित देखो।। 6।।

होनहार का कर विचार,निर्द्वन्द्व-निराकुल नित्य रहो।
साधो ! निज परमारथ साधो, चाह-दाह में नहीं दहो।। 7।।

अति दुर्लभ जिनशासन पाया, सर्व सुयोग मिले हैं आय।
ऐसा अवसर नहीं चूकना, नातर भव में ही भरमाय।। 8।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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