आत्म-चिंतवन | Aatm Chintavan - Br. Shree Ravindraji 'Aatman'

आत्म-चिंतवन
(तर्ज - मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूं)

मैं एक रूप अविनाशी हूँ ।
सुख ज्ञान ज्योति गुण राशि हूं ॥टेक॥

मुझमें न स्पर्श रस गन्ध नहीं,
मुझमें वर्ण और शब्द नहीं ।
इन्द्रियातीत मैं हूँ अलिंग,
निज से ही स्व-पर प्रकाशी हूँ ॥

हूँ शाश्वत प्रभु मुझ अन्तर में,
मुझ हेतु परम रस झरता है।
उसको पीते-पीते तत्क्षण,
कर्तृत्व का बोझ उतरता है ॥

आशा तृष्णा का नाश होय,
सब लौकिक वैभव खलता है।
कहाँ शाश्वत प्रभु ? कहाँ क्षणिक रूप ?
दोनों का मेल न दिखता है ।।

पर्याय निजपना भूल रही,
मैं एक रूप अविनाशी हूँ ।
ऐसे विकल्प में जुड़ा हुआ,
बाहर की सुधि-बुधि विसराता ।।

आनन्दामृत में डूबा रहूँ,
फिर चिन्तन में भी नहिं आता
रागादि भाव से भिन्न होय,
होता शिवपुर का वासी हूँ ॥

रचयिता : बाल ब्रह्मचारी श्री रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
Source: स्वरूप स्मरण (Page - 66)

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