आतम रूप परम आनंदमय, ज्ञानमयी अविकारी।
आत्मन्! अन्तर माँहि विराजे, परम प्रभु हितकारी।। टेक।।
अर्हत् प्रभु की दिव्यध्वनि में, दिव्य रूप दर्शाया।
स्वयं सिद्ध प्रभु रूप निरामय, सिद्ध समान सु गाया।।
परभावों से शून्य तदपि है, गुण अनंत का धारी।। 1।।
अन्तर्मुख हो ज्ञानी जानें, सहज भावना भावें।
धन्य परम निर्ग्रन्थ मुनीश्वर, जिसको निशदिन ध्यावें।।
वही अहो दृष्टि में आया, ज्ञायक मंगलकारी।। 2।।
समझो-समझो चेतो! चेतन, बाहर सुख नहीं है।
मिथ्या पर की आशा छोड़ो, जग में सार यही है।।
निर्विकल्प हो, ध्याओ-ध्याओ, महातत्त्व सुखकारी।। 3।।
अन्य न कोई आश्रय जग में, क्षण-भंगुर पर्यायें।
दुर्विकल्प छोड़ो दुखदायी, दृष्टिवंत शिव पायें।।
द्रव्यदृष्टि प्रगटाओ अब तो, हो चैतन्य विहारी।। 4।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Atm-Chintan