आरती का मायाजाल | Aarti Ka Mayajaal

लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

[आजकल यह एक नया फैशन वैदिक-कर्मकांडी-मान्यता के प्रभाव से जैनसमाज में वायरस की तरह फैल रहा है। वह है हर धार्मिक कार्य में दीपक जलाकर आरती करने का प्रचलन और इसके महिमामंडन का। मैं प्रारम्भ में ही स्पष्टरूप से कह देना चाहता हूँ कि अहिंसक वीतरागी-जिनशासन में दीपक जलाकर आरती करने जैसी कोई विधि कभी भी न तो स्वीकृत थी, न है और न ही कभी होगी; क्योंकि वीतरागी-जिनशासन में कभी भी हिंसा का समर्थन कदापि संभव नहीं है। - इस कथन का साधार-स्पष्टीकरण मैं यहाँ करूँगा।]

इस विषय में पहले तो यह जान लेना आवश्यक है कि जैन-परम्परा में क्या आरती करने का प्रावधान है? दीपक जलाकर आरती करना क्या कभी जिनाम्नाय में स्वीकृत हो सका है? इसकी तथ्यात्मक-जानकारी और विवेकपूर्ण-विवेचन आज के सन्दर्भ में बेहद अनिवार्य प्रतीत होने लगा है; क्योंकि आज बात-बात में धर्मविधि के नाम पर दीपक जलाना और आरती करने की परिपाटी एक फैशन बनती जा रही है। कोई भी मौका हो, तो ‘‘दीपक जलाओ और आरती करो’’ - ऐसे फरमान जारी होने लगे हैं। इस कार्य में तथाकथित संयमी भी पुरजोर से जुड़ रहे हैं, जो अपने आपको शुद्ध-आम्नायवाले और धर्मविधि में हिंसा एवं आडम्बर का विरोधी बताते हैं।

अत: बहुत से जिज्ञासुजनों ने मुझसे फोन पर व संदेश द्वारा निवेदन किया कि ‘‘मैं इसी विषय पर जिनाम्नाय का पक्ष स्पष्टरूप से प्रस्तुत करूँ, ताकि समाज को सत्य की तथ्यात्मक-जानकारी मिल सके और जो जिनाम्नाय के विरुद्ध है, उसे रोकने के लिये समाज में जनजागृति की जा सके।’’

सबसे पहले तो यह जानना जरूरी है कि जिनाम्नाय में ‘आरती’ शब्द का किस रूप में प्रयोग हुआ है ? और क्या दीपक जलाकर उनसे आरती करना/करवाना - यह जिनाम्नाय से सम्मत-कार्य है?

जिनाम्नाय में पूजन-साहित्य में ‘आरती’ शब्द द्रव्यों की मुख्यता के बिना आराध्य-जिनेन्द्रदेव आदि के गुणगान के लिये प्रयुक्त हुआ है, जिसे आजकल ‘जयमाला’ कहते हैं।

‘‘विजय - ‘आरती’ तिन कहूँ, परमारथ गुण गाय।’’

  • (कवि संतलालजी कृत सिद्धचक्रविधान की पहली जयमाला)

‘‘कहूँ ‘आरती’ भारती, हम पर होहु सहाय।’’

  • (दसलक्षण पूजन, जयमाला)

‘‘पंचमेरु की ‘आरती’, पढ़े सुने जो कोय।’’

  • (पंचमेरु पूजन, जयमाला)

‘‘भिन्न-भिन्न कहूँ ‘आरती’, अल्प सुगुण-विस्तार।’’

  • (द्यानतराय जी कृत देव-शास्त्र-गुरु पूजन, जयमाला)

ये तो मात्र कुछ निदर्शन हैं। प्रयोग तो अनेक हैं; किन्तु उक्त-अभिप्राय की पुष्टि के लिये इतने उल्लेख पर्याप्त मानता हूँ।

अस्तु, उक्त विवरण से स्पष्ट है कि जिनाम्नाय में ‘आरती’ शब्द पूज्य देव-शास्त्र-गुरु आदि के ऐसे गुणगान के लिये प्रयुक्त हुआ है, जिसमें भावों की विनम्रता एवं गुण-ग्राहकता के अलावा कोई बाह्य-संसाधन अपेक्षित ही नहीं है। अतः इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि जिनाम्नाय में ‘आरती’ में दीपक जलाकर कोई विधि कभी नहीं की जाती है।

तो प्रश्न उठता है कि ‘‘दीपक/दीपकों को सजाकर उन्हें आराध्य-जिनेन्द्रदेव आदि के समक्ष दक्षिणावर्त रूप में घुमाया जाता है, वह क्या ‘आरती’ नहीं है?’’

हाँ, जिनाम्नाय में इस क्रिया की ‘आरती’ संज्ञा नहीं है। यह तो पहले जब गर्भगृह में प्रकाश का समुचित-साधन नहीं रह जाता था, और उस स्थिति में भी भक्तगण जिनेन्द्रदेव के दर्शन करना चाहते थे; तब अन्य कोई प्रकाश का विकल्प नहीं होने से दीपक/दीपकों को सजाकर उनके प्रकाश में जिनबिम्ब के दर्शन कराये जाते थे और यदि जिनबिम्ब विशाल-आकार के होते थे तथा दीपक का प्रकाश सीमित होता था, तो हाथों में दीपक लेकर उन्हें दक्षिणावर्त रूप से घुमाते हुये जिनबिम्ब के दर्शन कराये जाते थे। यह मात्र प्रकाश की कमी को दूर करने का तात्कालिक-उपाय था, न कि आरती की विधि।

मैं जिनागम के आलोक में मूल-आम्नाय की शपथपूर्वक स्पष्ट-शब्दों में घोषित करना चाहता हूँ कि जिनाम्नाय में दीपक जलाकर जिनेन्द्रदेव के दर्शन करना ‘आरती’ नहीं माना गया है। यह उस समय की मजबूरी थी, जब जिनमंदिरों में प्रकाश के पर्याप्त-साधन किन्हीं परिस्थितियों में नहीं रह जाते थे, तब दीपक या दीपकों के प्रकाश में जिनबिम्ब के दर्शन कराये जाते थे। यह मजबूरी आज लाइट/विद्युत् के संसाधनों में समाप्त हो चुकी है। अतः आज की परिस्थितियों में न तो जिनमंदिरों में दीपक जलाने का कोई औचित्य है और न ही इसकी कोई आवश्यकता है।

वस्तुस्थिति तो यह है कि दीपक जलाने से विद्युत् के प्रकाश की तुलना में प्रत्यक्ष जीवहिंसा होती है और जिनमंदिरों में कालिख बढ़ती है, सो अलग। अत: आज की परिस्थितियों में जिनमन्दिरजी में आरती के लिए दीपक जलाना ही अनौचित्यपूर्ण-कार्य की श्रेणी में गिना जाने योग्य कार्य है। स्पष्टरूप से पाप है।

किसी भी बहाने से वीतरागी-देव के जिनमंदिर में हिंसा को समर्थन देना संभव नहीं है। जो भी आरती के बहाने या किसी कल्याणक के बहाने घर या मंदिर में दीप जलाकर धर्मविधि करने की बात करता है, वह स्पष्टरूप से पाप का समर्थन करता है। वह वीतरागी-जिनशासन का विरोधी है; क्योंकि वीतरागी-जिनशासन में हिंसा को कहीं कोई स्थान नहीं है।

आजकल तो अंधेरे की स्थिति तो दूर रहे, दिन के प्रकाश में भी दीपक जलाकर आरती करने की प्रेरणायें दी जा रहीं हैं। कभी कहा जाता है कि ‘‘जिनेन्द्रदेव की रथयात्रा आपसे दरवाजे से निकले, तो वहाँ उसकी दीपक जलाकर आरती करना।’’ तो कभी कहा जाता है कि ‘‘जिनेन्द्रदेव का जन्म-कल्याणक या निर्वाणकल्याणक हो, तो घरों में दीपक जलाना।’’ कभी कहा जाता है कि ‘‘पूजा करते समय दीपक जलाकर अर्घ्य चढ़ाना।’’ तो कभी कहा जाता है कि ‘‘मंदिर जी में संध्या के समय दीपक जलाकर आरती करना।’’ और भी न जाने किन-किन रूपों में धर्मविधि के नाम पर जीवहिंसा के कृत्य दीपक जलाकर ‘आरती’ करने की प्रेरणायें हिंसाप्रेमी-लोग धर्मानुयायियों की कोमल-धर्मभावनाओं का ब्लैकमेल करके करते हैं।

मैं खुला चेलैंज देता हूँ कि ‘‘कोई मूल-जिनागम का प्रमाण बताकर सिद्ध करे कि जिनाम्नाय में पूजाविधि में हिंसा और अनावश्यक-परिग्रह की कहीं कोई छूट दी गयी है? और कहीं दीपक जलाकर आरती करने की निर्देश दिया गया है।’’

हमारे यहाँ कई पंडित, प्रतिष्ठाचार्य और यहाँ तक कि आज के कुछ मुनिपद-धारक भी विशुद्धरूप से जैन नहीं हैं। वे मूलत: वैदिक-धर्मानुयायी रहे हैं। मुख्यत: जैनों के पास धन-संसाधन की प्रचुरता देखकर जैन बने हैं। उनके घरों में वैदिकों की तरह दीपक जलाकर आरती करने की परम्परा रही है और वे शुद्धाम्नायवाले दिगम्बर-जैनों को कहीं पांडित्य के नाम पर, कभी प्रतिष्ठाचार्यत्व के नाम पर, तो कहीं मुनिधर्म के प्रभाव का उपयोग करते हुये दीपक जलाकर आरती करने आदि की वैदिक-परम्पराओं की घुसपैठ करा रहे हैं; क्योंकि उनके वैदिक-धर्म में कहा गया है कि ‘‘वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति’’ अर्थात् वैदिक-परम्पराओं के निर्वाह में होने वाली हिंसा को हिंसा नहीं मानना चाहिये। इसीकारण वे दीपक जलाकर आरती करने में होने वाली हिंसा को धर्मविधि के नाम पर हिंसा मानने को ही तैयार नहीं होते हैं और अनेकतरह के कुतर्क करते हैं।

जबकि भारतीय संस्कृति में यह माना जाता है कि:

‘‘अन्यक्षेत्रे कृतं पापं धर्मक्षेत्रे विमुच्यते।
धर्मक्षेत्रे कृतं पापं, वज्रलेखो भविष्यति।।’’

अभिप्राय यह है कि अन्य किसी जगह आप यदि अज्ञान व प्रमादवश पापाचरण करते भी हों, तो धर्मक्षेत्र में आकर विवेकपूर्ण सदाचरण करने से उस पापकर्म के स्थिति-अनुभाग आदि क्षीण हो जाते हैं; किन्तु जो लोग धर्मक्षेत्र अर्थात् जिनमन्दिर, जैनतीर्थ, देव-शास्त्र-गुरु आदि की सन्निधि में आकर भी हिंसा एवं परिग्रहमूलक पापाचरण करते हैं, तो उनसे बंधनेवाले कर्म तीव्रकषाय व अहिंसा एवं अपरिग्रही-वृत्ति के विरोधी होने से अवश्यंभावी दुष्परिणाम के हेतु बनते हैं।

अर्थात् अन्य सांसारिक कार्यों में जो पाप हो जाये, तो धर्मविधि अपनाने पर उस पाप के स्थिति-अनुभाग ही नहीं प्रकृति-प्रदेशबंध भी कदाचित् बदल जाते हैं। किंतु धर्मविधि के नाम पर यदि हिंसा आदि पाप किये जायें, तो वे वज्रलेखों के समान अमिट और अवश्यंभावी-फल वाले हो जाते हैं। अत: जिनाम्नाय में धर्मविधि में हिंसा आदि पाप करने और इनके महिमामंडन की कहीं अनुमति नहीं है।

बिडम्बना तो यहाँ तक जा पहुँची है कि कई जैनसाधु-पदधारी नियमितरूप से गृहस्थों से दीपकों से अपनी आरती कराने लगे हैं। पहले कहीं-कहीं गृहस्थ अज्ञानवश इनके दीक्षादिवस पर या विशिष्ट-प्रसंगों पर इनकी आरती करने लगे थे। किंतु अब तो से मुनिपद-धारक ही स्वयं अपने परिग्रहरूप में संग्रहीत ‘भैया जी’ आदि संज्ञाओं से संज्ञित लोगों के द्वारा गृहस्थों को बलात् प्रेरित करके उनसे दीपक जलवाकर अपनी आरती कराने लगे हैं। यह सब इस वीतरागी-जिनशासन को कलंकित करने वाले और हिंसा का पोषण करनेवाले निंदनीय-कार्य हैं, जो झूठे अहंकार के पोषण के लिये किये जा रहे हैं। कोई भी विवेकी जैन-गृहस्थ इन हिंसक-कार्यों को न तो स्वयं कर सकता है और न ही इनकी समर्थन कर सकता है। किन्तु आजकल तो अर्थलोभी-पंडितगण अपनी कमाई को प्रमुखता देते हुये गृहस्थों को इन कार्यों की प्रेरणायें देकर इनमें मानो आग में घी डालने का काम करने लगे हैं और कल्पित-प्रमाण बताकर इन कार्यों का पोषण कर रहे हैं, जो जिनाज्ञा का स्पष्टरूप से उल्लंघन है।

उनके कुप्रभाव से शोचनीय-स्थिति तो यहाँ तक पहुँच गयी है कि इन कुत्सित-परम्पराओं के प्रभाव में आकर जो शुद्ध-जैनाम्नाय में जन्मे हैं, ऐसे जैन-पंडित, जो विद्वानों की विभिन्न-परिषदों आदि के प्रमुख रह चुके हैं, मात्र मानकषाय की पुष्टि के लिये अपने जन्मदिन पर अपनी दीपक जलाकर परिवारजनों से अपनी आरती करवाते हैं। अपने घर आने पर दरवाजे पर परिजनों को अपनी आरती करने के लिए विवश करते हैं। यदि विद्वान् भी ऐसे जिनाम्नाय से विपरीत-कर्म करेंगे; तो जिनाम्नाय की रक्षा की आशा किससे की जाये?

इतना ही नहीं, जिनाम्नाय में दीपक जलाकर आरती करने के समय गाये जाने वाले कोई गीत ही नहीं थे, तो अब कवित्व-शक्ति का दुरुपयोग करके कुछ पंडितगण वैदिक-परम्पराओं के आरती के गीतों की ‘पैरोडी’ पर जैन-आरती गीत बनाने लगे हैं। इन बिकाऊ-पंडितगणों ने तो वीतरागी-जिनशासन को कलंकित करने में हर मर्यादा का उल्लंघन करने का नित-नया रिकार्ड बनाने की मानो प्रतिज्ञा ही कर ली है।

मैं इस परम-अहिंसक वीतरागी-दिगम्बर-जैन-परम्परा के पदवीधारक मुनिराजों से भी निवेदन करना चाहता हूँ कि यदि आपकी देह में ममत्वबुद्धि नहीं छूटी है और इन पदों से ही आप अपनी पहिचान मानते हो, तो आप बहुत बड़े भ्रम में हो। कृपया इस मिथ्याडम्बर से बाहर आइये और जिस वीतरागी-जिनशासन का गौरवमयी पद आपने अंगीकार किया है, उसकी गरिमा को पहिचानिये। “अहिंसा ही सर्वोत्कृष्ट-धर्म है” - यह बात नारे लगाने मात्र के लिये नहीं है; बल्कि अपने जीवन में अपने सदाचरण से इसे प्रमाणित कीजिये और इसके निमित्त पहला-संकल्प लीजिये कि आप इस जीवन में कभी भी अपनी या अन्य किसी की दीपक जलाकर आरती करने या कराने का स्वयं भी नियमतः त्याग करेंगे तथा कभी किसी को भी किसी भी रूप में, किसी भी बहाने से ऐसा करने की अनुमति व अनुमोदना नहीं करेंगे। जो भी दीपक जलाकर आरती करने का कार्य करता हो, उससे आप स्वयं को पूरी तरह अलग रखकर इस कार्य का विरोध करेंगे तथा अपने उपदेशों में भी इन कार्यों का निषेध करेंगे।

मैं जैन-समाज के सभी प्रतिष्ठाचार्यों, विधानाचार्यों, गृहस्थाचार्यों, प्रवचनकारों और समाज के नेताओं से भी यह अनुरोध करता हूँ कि सारे व्यामोह एवं पूर्वाग्रह छोड़कर आप सभी अहिंसाधर्म के अनुपालन का संकल्प लीजिये और इसकी पूर्ति-हेतु पहला कदम दीपक जलाकर आरती करने/करवाने का त्याग कर दीजिये। सभी प्रतिज्ञा करें कि जिनेन्द्रदेव की रथयात्रा, मुनिराजों के मंगलप्रवेश, उनके दीक्षा-दिवस, अन्य किसी भी विशेष प्रसंग पर, प्रतिदिन संध्याकाल में मुनिराजों, जिनबिम्बों आदि की दीपक जलाकर आरती नहीं करेंगे और न ही ऐसे किसी भी कार्य की अनुमोदना करेंगे। यहाँ तक कि गृहस्थ-जीवन के गृहप्रवेश, बच्चों के विदेशगमन, तीर्थयात्रा पर जाते समय या अन्य किसी भी मंगल-प्रसंग पर दीपक जलाकर आरती करने जैसे हिंसाप्रधान कार्य कदापि नहीं करेंगे। और जिनके यहाँ किसी कार्यक्रम में ऐसा कार्य होता हो, उस कार्यक्रम से अपने को अलग रखेंगे।

आजकल जो यह धर्मविधि के नाम पर घोर-अविवेकपूर्ण-कृत्य प्रचलित हो रहे हैं, यह सभी मोह की महिमा है। यह वीतरागी-जिनशासन की अहिंसक-धर्मविधि नहीं है। कहा भी है -

“सर्वैरहो विजयते महिमा परोऽस्य” अर्थात् धर्मविधि के नाम पर ऐसे कर्मकांडों व हिंसक-कार्यों तथाकथित संयमियों एवं धर्मात्माओं के द्वारा किया जाना या कराया जाना - यह सब धर्मविधि तो नहीं है। परन्तु यह आत्महित के परम-विरोधी मोहनीयकर्म की विजयपताका फहरा रही है - ऐसा इस पंक्ति में हमारे आचार्यवर्य स्पष्टरूप से कह रहे हैं।

आइये, हम “बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध लेहु” की नीति के अनुसार अज्ञान और प्रमाद के कारण हुई पुरानी बातों को भुलाकर आगे अपने जीवन में सदा के लिये दीपक जलाकर आरती करने का कार्य नहीं करने का संकल्प लें और जीवदया के साथ अपने आप को भी कुटिल-कर्मबंध से बचायें।

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‘आ-रति’ या ‘आरती’

‘आ’ समन्तात् ‘रति’ अर्थात् तल्लीनता ही ‘आ-रति’ शब्द को परिव्यक्ति प्रदान करती है। उसके लिये अन्तस् में व्याप्त अज्ञान और मोह रूपी तमस् का निवारण अपेक्षित है, जो कि ज्ञानरूपी दीपक में ‘तप’ (इच्छानिरोधस्तपः) रूपी तैल का अक्षय-संकल्प बनाकर चलता है। तब ज्ञानचक्षुओं को उन्मीलित कर वह अपने आराध्य-स्वरूप की आराधना कर पाता है।

किन्तु जिसके अन्तस् में अज्ञान और मोह रूपी तमस् व्याप्त है, वह बाह्य-आलंबनों को लक्ष्य मानकर उनके स्वरूपावलोकन के लिये भौतिक-प्रकाश के संसाधनों को जुटाकर विविध प्रकार के क्रियाकलापों में उलझकर मृगतृष्णा से तृषा की तृप्ति का अशक्य-अनुष्ठान करता है और उसे ‘आरती’ कहता है।

स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 66-71

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