आराधक-आज हम जिनराज तुम्हारे द्वारे आये।
हाँ जी हाँ हम आए-आए, आज हम… ।। 1।।
आराध्य- आज तुम जीवराज निज के सन्मुख आओ।
हाँ जी हाँ तुम आओ-आओ, आज तुम… ।। 2 ।।
आराधक- देखे देव जगत के सारे, तुमसा और न पाये।
पुण्य उदय से आज तुम्हारे दर्शन कर हर्षाये ।। 3।।
आराध्य- पुण्योदय से दर्शन पाये, यहीं अटक मत जाओ।
प्रभु दर्शन से ‘मैं भी प्रभु हूँ’ सम्यक् श्रद्धा लाओ।। 4।।
आराधक-चार गति में भटकत-भटकत, मैं चिरकाल गँवाए।
अब तो स्वामी जनम-मरण का, दुखड़ा सहा न जाए।। 5 ।।
आराध्य- निज स्वभाव पहिचान बिना तुम, भव-भव में भटकाओ।
भव से रहित भाव निज लखकर, जनम अरु मरण नशाओ ।। 6 ।।
आराधक-भव सागर में नाव हमारी, कब से गोता खाए।
तुम ही स्वामी हाथ बढ़ाकर, तारो तो तिर जाए।। 7।।
आराध्य- विषय-कषायों के वश हो, भव सिन्धु में गोते खाओ।
छोड़ उन्हें निज में ही थिर हो, स्वयं पार हो जाओ। ४।।
आराधक- अनुकम्पा हो जाए प्रभु की, आकुलता मिट जाए।
हम सबकी प्रभु यही वीनती, चरण-शरण मिल जाए।। 9।।
आराध्य- आकुलता को देख-देख तुम, चेतन क्यों अकुलाओ।
पूर्ण निराकुल ध्रुव आश्रय से, स्वयं पूर्ण बन जाओ। 10।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह