6 महीने में 608 जीव को ही मोक्ष - True?

सुदृस्टितरंगणी (pg 579) में यह बात contradict हो रही है -

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6 महीने 8 समय में 608 जीव मोक्ष जाते हैं।
अन्य तीर्थंकरों के साथ जो अन्य मुनाराजादि मोक्ष गये वे एक ही साथ एक ही तिथि को गये हों, ऐसा नहीं है।
उन तीर्थांकर के पहले और बाद में भी मोक्ष गए हैं, ऐसा अर्थ समझना चाहिए।
6 महीने 8 समय में भी ऐसा संभव है कि 6 महीने और 7 समय तक एक भी मोक्ष न जाएँ, किन्तु नियम से आठवे समय में एक साथ 608 जीव मोक्ष जाते ही जाते हैं।

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जो हिस्सा Bold में लिखा है, उससे क्या समझे ?

Lord
Rishabhdev then passed 1 lakh Purvas – 1,000 years as an Omniscient (Kevali) while
benefitting all living beings with His divine sound (Divya Dhvani). He had 84
disciples (Gandhars) whose chief disciple was His son Rishabhsen. 84,000 men
accepted monkhood in the Omniscient Lord’s presence. Of these, 4,750 knew the
Purvas (ancestral scriptures), 4,150 were teachers (Shikshaks), 9,000 attained
clairvoyance (Avadhigyan), 12,750 attained telepathy (Manahparyaygyan), 20,600
gained the ability to transform their body (Vikriya Riddhi), 12,750 were orators and
20,000 attained Omniscience (Kevalgyan).

When 14 days were left in His lifespan, Lord Rishabhdev began to
diminish all bodily vibrations. 14 days later, 4.5 hours after sunrise on Magh Krishna
14 under the Uttarashada Nakshatra, Lord Rishabhdev destroyed all His Karms and
attained liberation on Mount Kailas along with 10,000 other Kevalis. His Moksh
Kalyanak was celebrated joyously on that day. At this time, 3 years and 8.5 months
were left in the third era Sushma Dushma.

Source: page 59 of http://arnavk.me.ht/wp-content/uploads/2016/08/Jain-History.pdf

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इसमें एक तीर्थंकर के शासन काल के सभी मोक्षगामी जीवो की संख्या समझनी चाहिए।

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ऊपर फोटो में जो संख्या दी है वह इस कालचक्र की है या फिर अनादि काल की है । अगर हम अनादि काल की लेते हैं तो असंख्यात होनी चाहिए थी क्योंकि शिखरजी शाश्वत मोक्ष भूमि है 24 तीर्थंकर प्रत्येक कालचक्र में वहीं से मोक्ष जाते हैं।

सही कहा आपने, ये इसी काल की अपेक्षा से है, अनादि की अपेक्षा से देखने पर ये संख्या अनंत होगी। अनादि की अपेक्षा से ४५ लाख योजन की ढाई द्वीप के प्रत्येक प्रदेश से अनंत अनंत सिद्ध हुए है।

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How (10,000 * 24) + - something add upto figure mentioned in photo ? 984 arab …

I think there is no rule of 10,000(please correct me if I am wrong).
The counting mentioned here covers the whole 4th kaal which was of 1 kodakodi (crore*crore) sagar less 42000 years. So it is a very very long duration and in this such a long time frame, the given figure of 984,12,80,84,595 siddhas from one tonk stands accepted.
Note: the duration of one Sagar can be learnt from karnanuyog granths.

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10,000 muni went moksh from Kailash parvat during Adinath ji शासन‌काल . This 10,000 does not include muni who went moksh during his शासन‌काल from other places like शिखर जी।

Also, above

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What might be reason behind this rigid figure of 6 months 8 samay for maximum of 608 jeev ?

Because in Bharat and Aeravat kshetra, when 4th kaal comes, videh kshetra has to reduce its Arihant and Siddha both. And increase in other kaal.

So, as we see, 984 Arab went moksh from one tonk in Shikhar ji in one 4th kaal, similarly all other tonk, all other moksh places and similarly in aeravat kshetra also, so this compensation is born by Videh kshetra by reducing its population excessively. How does this all happen without a central authority / God ??

बहुत अच्छा प्रश्न है।
जैन दर्शन के प्रत्येक सिद्धांत से वस्तु स्वतंत्रता का ही ज्ञान होता है।
और आपके इस प्रश्न का भी यही समाधान है कि विश्व व्यवस्था में इस प्रकार का ही परिणमन अनादि काल से हो रहा है और आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। सर्वज्ञ भगवान के ज्ञान में वह झलकता है, आगम के द्वारा उसका ज्ञान हम सभी को होता है।

विश्व स्वाधीन अकृत्रिम है, इसका कोई कर्ता धर्ता नहीं है, इस विश्व में निवास करने वाले सभी अनंत द्रव्यों का भी सहज योग्यता रूप परिणमन होता है। (6 सामान्य गुणों का स्वरूप जरूर देखें)
ऐसा स्वीकार करने पर इस प्रश्न का निराकरण हो जाता है। परंतु किसी ईश्वरीय शक्ति को कर्ता धर्ता स्वीकार करने पर होने वाले प्रश्नों का निराकरण नहीं हो पाता है।

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