इन्द्र नरेन्द्र सुरों से पूजित वृषभादिक श्री वीर महान् ।
साधु मुनिश्वर ऋषियों द्वारा वन्दित तीर्थंकर विभुवान ।।
गणधर भी स्तुति कर हारे जिनवर महिमा महामहान् ।
अष्ट प्रातिहार्यों से शोभित समवसरण में विराजमान ।।
चौतीसों अतिशय से शोभित छयालीस गुण के धारी ।
दोष अठारह रहित जिनेश्वर श्री अरहंत देव भारी ।।
तरु अशोक सिंहासन भामण्डल सुर पुष्पवृष्टि त्रयछत्र ।
चौसठ चमर दिव्य ध्वनि पावन दुन्दुभि देवोपम सर्वत्र ।।
मति श्रुति अवधिज्ञान के धारी जन्म समय से हे तीर्थेश ।
निज स्वभाव साधन के द्वारा आप हुए सर्वज्ञ जिनेश ।।
केवलज्ञान लब्धि के धारी परम पूज्य सुख के सागर ।
महा पंच कल्याण विभूषित गुण अनन्त के हो आगर ।।
सकल जगत् में पूर्ण शान्ति हो, शासन हो धार्मिक बलवान ।
देश राष्ट्रपुर ग्राम लोक में शतत शान्ति हो हे भगवान् ।।
उचित समय पर वर्षा हो दुर्भिक्ष न चोरी मारी हो ।
सर्व जगत् के जीव सुखी हो सभी धर्म के धारी हो ।।
रोग शोक भय व्याधि न होवे ईति भीति का नाम नहीं ।
परम अहिंसा सत्य धर्म हो लेश पाप का काम नहीं ।।
आत्मज्ञान की महाशक्ति से परम शान्ति सुखकारी हो ।
ज्ञानी ध्यानी महा तपस्वी स्वामी मंगलकारी हो ।।
धर्म ध्यान में लीन रहूँ मैं प्रभु के पावन चरण गहूँ ।
जब तक सिद्ध स्वपद ना पाऊँ सदा आपकी शरण लहूँ ।।
श्री जिनेन्द्र के धर्म चक्र से प्राणी मात्र का हो कल्याण ।
परम शान्ति हो, परम शान्ति हो, परम शान्ति हो हे भगवान् ।।
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ४०० से ४०४