47 शक्तियाँ | 47 Shaktiyan

Source: samyakdarshan.org

समयसार ग्रन्थ की आत्पख्याति टीका के परिशिष्ट में वर्णित 47 शक्तियाँ -

1. आत्मद्रव्यके कारणभूत ऐसे चैतन्यमात्र भावका धारण जिसका लक्षण अर्थात् स्वरूप है ऐसी जीवत्वशक्ति

2. अजड़त्वस्वरूप चितिशक्ति

3. अनाकार उपयोगमयी दृशिशक्ति

4. साकार उपयोगमयी ज्ञानशक्ति

5. अनाकुलता जिसका लक्षण अर्थात् स्वरूप है ऐसी सुखशक्ति

6. स्वरूपकी रचनाकी सामर्थ्यरूप वीर्यशक्ति

7. जिसका प्रताप अखण्डित है अर्थात् किसीसे खण्डित की नहीं जा सकती ऐसे स्वातंत्र्यसे शोभायमानपना जिसका लक्षण है ऐसी प्रभुत्वशक्ति

8. सर्व भावोंमें व्यापक ऐसे एक भावरूप विभुत्वशक्ति

9. समस्त विश्वके सामान्य भावको देखनेरूपसे परिणमित ऐसे आत्मदर्शनमयी सर्वदर्शित्वशक्ति

10. समस्त विश्वके विशेष भावोंको जाननेरूपसे परिणमित ऐसे आत्मज्ञानमयी सर्वज्ञत्वशक्ति

11. अमूर्तिक आत्मप्रदेशोंमें प्रकाशमान लोकालोकके आकारोंसे मेचक (अर्थात् अनेक-आकाररूप) ऐसा उपयोग जिसका लक्षण है ऐसी स्वच्छत्वशक्ति

12. स्वयं प्रकाशमान विशद (स्पष्ट) ऐसी स्वसंवेदनमयी प्रकाशशक्ति

13. क्षेत्र और कालसे अमर्यादित ऐसी चिद्विलासस्वरूप (चैतन्यके विलासस्वरूप) असंकुचितविकासत्वशक्ति

14. जो अन्यसे नहीं किया जाता और अन्यको नहीं करता ऐसे एक द्रव्यस्वरूप अकार्यकारणत्वशक्ति

15. पर और स्व जिनके निमित्त हैं ऐसे ज्ञेयाकारों तथा ज्ञानाकारोंको ग्रहण करनेके और ग्रहण करानेके स्वभावरूप परिणम्यपरिणामकत्व शक्ति

16. जो कमबढ़ नहीं होता ऐसे स्वरूपमें नियतत्वरूप (निश्चित्तया यथावत् रहनेरूप) त्यागोपादानशून्यत्वशक्ति

17. षट्स्थानपतित वृद्धिहानिरूपसे परिणमित, स्वरूप-प्रतिष्ठत्वके कारणरूप (वस्तुके स्वरूपमें रहनेके कारणरूप) ऐसा जो विशिष्ट (खास) गुण है उस-स्वरूप अगुरुलघुत्व शक्ति

18. क्रमप्रवृत्तिरूप और अक्रमप्रवृत्तिरूप वर्त्तन जिसका लक्षण है ऐसी उत्पादव्ययध्रुवशक्ति

19. द्रव्यके स्वभावभूत ध्रौव्य-व्यय-उत्पादसे आलिंगित (स्पर्शित), सदृश और विसदृश जिसका रूप है ऐसे एक अस्तित्वमात्रमयी परिणामशक्ति

20. कर्मबन्धके अभावसे व्यक्त किये गये, सहज, स्पर्शादि-शून्य ऐसे आत्मप्रदेशस्वरूप अमूर्तत्त्वशक्ति

21. समस्त, कर्मों के द्वारा किये गये, ज्ञातृत्वमात्रसे भिन्न जो परिणाम उन परिणामोंके करणके उपरमस्वरूप (निवृत्तिरूप, अभावरूप) अकर्तृत्वशक्ति

22. समस्त, कर्मोंसे किये गये, ज्ञातृत्वमात्रसे भिन्न परिणामोंके अनुभवके (भोक्तृत्वके) उपरमस्वरूप अभोक्तृत्वशक्ति

23. समस्त कर्मोंके उपरमसे प्रवृत्त आत्मप्रदेशोंकी निष्पन्दतास्वरूप (अकम्पतास्वरूप) निष्क्रियत्वशक्ति

24. जो अनादि संसारसे लेकर संकोचविस्तारसे लक्षित है और जो चरम शरीरके परिमाणसे कुछ न्यून परिमाणसे अवस्थित होता है ऐसा लोकाकाशके माप जितना मापवाला आत्म-अवयवत्व जिसका लक्षण है ऐसी नियतप्रदेशत्वशक्ति

25. सर्व शरीरोंमें एकस्वरूपात्मक ऐसी स्वधर्मव्यापकत्वशक्ति

26. स्व-परके समान, असमान और समानासमान ऐसे तीन प्रकारके भावोंके धारणस्वरूप साधारण-असाधारण-साधारणासाधारणधर्मत्वशक्ति

27. विलक्षण अनन्त स्वभावोंसे भावित ऐसा एक भाव जिसका लक्षण है ऐसी अनन्तधर्मत्वशक्ति

28. तद्रूपमयता और अतद्रूपमयता जिसका लक्षण है ऐसी विरुद्धधर्मत्वशक्ति

29. तद्रूप भवनरूप ऐसी तत्त्वशक्ति

30. अतद्रूप भवनरूप ऐसी अतत्त्वशक्ति

31. अनेक पर्यायोंमें व्यापक ऐसी एकद्रव्यमयतारूप एकत्वशक्ति

32. एक द्रव्यसे व्याप्य जो अनेक पर्याये उस-मयपनेरूप अनेकत्वशक्ति

33. विद्यमान-अवस्थायुक्ततारूप भावशक्ति

34. शून्य (अविद्यमान) अवस्थायुक्ततारूप अभावशक्ति

35. भवते हुए (प्रवर्त्तमान) पर्यायके व्ययरूप भावाभावशक्ति

36. नहीं भवते हुए (अप्रवर्त्तमान) पर्यायके उदयरूप अभावभावशक्ति

37. भवते हुए (प्रवर्तमान) पर्यायके भवनरूप भावभावशक्ति

38. नहीं भवते हुये (अप्रवर्तमान) पर्यायके अभवनरूप अभावाभाव शक्ति

39. (कर्त्ता, कर्म आदि) कारकोंके अनुसार जो क्रिया उससे रहित भवनमात्रमयी (होनेमात्रमयी)
भाव-शक्ति

40. कारकोंके अनुसार परिणमित होनेरूप भावमयी क्रियाशक्ति

41. प्राप्त किया जाता जो सिद्धरूप भाव उसमयी कर्मशक्ति

42. होनेपनरूप और सिद्धरूप भावके भावकत्वमयी कर्तृशक्ति

43. भवते हुये (प्रवर्तमान) भावके भवनके (होनेके) साधकतमपने-मयी (उत्कृष्ट साधकत्वमयी, उग्र
साधनत्वमयी) करणशक्ति

44. अपने द्वारा दिया जाता जो भाव उसके उपेयत्वमय (उसे प्राप्त करनेके योग्यपनामय, उसे
लेनेके पात्रपनामय) सम्प्रदानशक्ति

45. उत्पादव्ययसे आलिंगित भावका अपाय (हानि, नाश) होनेसे हानिको प्राप्त न होनेवाले ध्रुवत्वमयी अपादानशक्ति

46. भाव्यमान (अर्थात् भावनेमें आते हुये) भावके आधारत्वमयी अधिकरणशक्ति

47. स्वभावमात्र स्व-स्वामित्वमयी सम्बन्धशक्ति (अपना भाव अपना स्व है और स्वयं उसका स्वामी है - ऐसे सम्बन्धमयी सम्बन्ध-शक्ति)।

9 Likes
शक्ति का नाम :light_bulb: सरल अर्थ व्याख्या (Explanation) उदाहरण/संक्षेप
1. जीवत्व शक्ति जीने का सामर्थ्य वह शक्ति जो आत्मा को चेतन (Conscious) और अजड़ (Non-inert) सिद्ध करती है। यह द्रव्य का मूलभूत लक्षण है। संक्षेप: यह ‘होने’ और ‘जानने’ का स्वभाव है।
2. चिति शक्ति चेतना रूपता वह शक्ति जिसके कारण आत्मा जानने-देखने की क्रिया (उपयोग) में परिणमित होती है। ‘चित्’ का अर्थ है चेतना। संक्षेप: आत्मा हमेशा ‘उपयोग’ (ज्ञान/दर्शन) रूप ही रहती है।
3. दृशि शक्ति सामान्य देखने की शक्ति वह सामर्थ्य जिससे आत्मा पदार्थों का सामान्य स्वरूप (जैसे, ‘यह कुछ है’) बिना किसी भेद के देखती है। (अनाकार उपयोग)। संक्षेप: किसी चीज को केवल ‘महसूस’ या ‘ध्यान’ में लेना।
4. ज्ञान शक्ति विशेष जानने की शक्ति वह सामर्थ्य जिससे आत्मा पदार्थों को उनके विशेष भेद (जैसे, ‘यह कमल है’, ‘यह लाल है’) सहित जानती है। (साकार उपयोग)। संक्षेप: वस्तु का नाम, गुण, आकार आदि सहित जानना।
5. सुख शक्ति सच्चे आनंद की शक्ति आत्मा का वह सहज स्वभाव जो आकुलता (परेशानी) से रहित और शांत है। यही वास्तविक, इंद्रिय-रहित सुख है। संक्षेप: आत्मा का आंतरिक, परमानंदमय स्वभाव।
6. वीर्य शक्ति अनंत बल और सामर्थ्य आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह बिना थके ज्ञान-दर्शन आदि गुणों में निरंतर परिणमित होती रहती है। इसे आत्म-बल भी कहते हैं। संक्षेप: कार्य करने की आंतरिक, अक्षय क्षमता।
7. प्रभुत्व शक्ति अखंड स्वतंत्रता आत्मा का वह सामर्थ्य जिसके कारण वह स्वयं की स्वामी है और अपने क्षेत्र में अन्य द्रव्यों पर निर्भर नहीं है। संक्षेप: आत्मा का स्वयं पर पूर्ण आधिपत्य।
8. विभुत्व शक्ति विस्तार/व्यापकता आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह अपने पूरे शरीर में व्याप्त है (व्यवहार से), और निश्चय से अपने सभी गुणों और पर्यायों में एकरूप से व्याप्त है। संक्षेप: आत्मा का अपने स्वरूप में सर्वत्र भरा होना।

1 Like
शक्ति का नाम :light_bulb: सरल अर्थ व्याख्या (Explanation) उदाहरण/संक्षेप
9. सर्वदर्शित्व शक्ति सबका सामान्य देखना शुद्ध अवस्था में, आत्मा की वह क्षमता जिससे वह तीन काल और तीन लोक के सभी द्रव्यों के सामान्य अस्तित्व को एक साथ जानती है। संक्षेप: केवल ‘द्रव्य’ मात्र का सामान्य बोध।
10. सर्वज्ञत्व शक्ति सबका विशेष जानना शुद्ध अवस्था में, आत्मा की वह क्षमता जिससे वह तीन काल और तीन लोक के सभी द्रव्यों की सभी पर्यायों को स्पष्ट रूप से जानती है। संक्षेप: वस्तु के प्रत्येक गुण और पर्याय का ज्ञान।
11. स्वच्छत्व शक्ति निर्मलता/दर्पणपना आत्मा का वह अद्भुत स्वभाव जो स्वयं को और अन्य पदार्थों को बिना किसी रुकावट के जानने/झलकाने की निर्मल क्षमता रखता है। संक्षेप: दर्पण जैसा स्वभाव, जिसमें सब झलकते हैं।
12. प्रकाश शक्ति स्वयं और पर को जानना वह शक्ति जो आत्मा को एक साथ स्वयं को भी जानने (स्व) और अन्य पदार्थों को भी जानने (पर) का सामर्थ्य देती है। संक्षेप: ‘स्व-पर प्रकाशक’ होना।
13. सच्चत्व शक्ति सत्य अस्तित्व आत्मा का वह सामर्थ्य जिसके कारण उसका अस्तित्व (होना) अबाधित (खंडित न होने वाला) है। यानी आत्मा हमेशा ‘है’। संक्षेप: त्रैकालिक सत्ता (Existence) का होना।
1 Like
शक्ति का नाम :light_bulb: सरल अर्थ व्याख्या (Explanation) उदाहरण/संक्षेप
14. असंकुचित विकास शक्ति असीमित विस्तार की क्षमता आत्मा का वह सामर्थ्य जिसके कारण वह अपने अनंत ज्ञान, दर्शन और सुख गुणों का बिना किसी रुकावट के पूर्ण विकास कर सकती है। संक्षेप: अनंत गुणों की अपरिमेय क्षमता।
15. अकार्य-कारण शक्ति स्वयं से भिन्न का कारण न होना आत्मा की वह स्वतंत्रता कि वह किसी अन्य द्रव्य (जैसे पुद्गल या धर्म द्रव्य) के कार्य को करने का कारण नहीं बनती। संक्षेप: आत्मा केवल अपने परिणामों की कर्ता है, पर की नहीं।
16. परिणाम-परिणामी शक्ति बदलने और आधार बने रहने की शक्ति यह सामर्थ्य दर्शाती है कि आत्मा परिणामी (वह द्रव्य जिसमें बदलाव हो रहा है) होकर भी निरंतर परिणाम (बदलाव या पर्याय) करती रहती है। संक्षेप: ‘द्रव्य’ (परिणामी) और ‘पर्याय’ (परिणाम) का एक साथ होना।
17. त्याग शक्ति भावों को छोड़ने का सामर्थ्य वह शक्ति जिससे आत्मा पूर्व पर्याय या अशुद्ध भावों को स्वयं ही छोड़ देती है। यह पुरानी अवस्था को छोड़कर नई अवस्था ग्रहण करने का आधार है। संक्षेप: पुरानी अवस्था से विरक्ति।
18. ग्रहण शक्ति नए भावों को स्वीकारना वह शक्ति जिससे आत्मा नई पर्याय या शुद्ध भावों को स्वयं ही स्वीकार (धारण) करती है। यह निरंतर परिणमन (बदलाव) का दूसरा हिस्सा है। संक्षेप: नई अवस्था को धारण करना।
19. अविकार शक्ति विकारों से रहित रहने का स्वभाव आत्मा का वह नित्य स्वभाव जो कर्मों के निमित्त होने पर भी राग-द्वेष आदि विकारों से सर्वथा अछूता (pure) रहता है। संक्षेप: शुद्ध स्वरूप का कभी न बदलना।
20. स्वभाव शक्ति अपने स्वरूप में स्थित रहना आत्मा का वह सामर्थ्य जिसके कारण वह विकारी कारणों (कर्मों) के अभाव में केवल अपने ज्ञान-आनंद स्वरूप में ही स्थित रहती है। संक्षेप: शुद्धता को बनाए रखने का बल।
21. विभाव शक्ति विकारी रूप परिणमन की शक्ति वह सामर्थ्य जिसके कारण आत्मा कर्मों के निमित्त से क्रोध, मान, राग आदि विकारी (अशुद्ध) भावों में परिणमित हो सकती है। संक्षेप: अशुद्ध रूप में बदलने की क्षमता।
22. संयोग शक्ति अन्य द्रव्यों से जुड़ने का सामर्थ्य आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह पुद्गल कर्मों या शरीर से क्षेत्र-संयोग (एक ही क्षेत्र में रहना) के रूप में जुड़ सकती है। संक्षेप: शरीर और कर्म के साथ अनादि काल से जुड़ाव।
23. वियोग शक्ति अन्य द्रव्यों से अलग होने का सामर्थ्य आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह कर्मों और शरीर से पूरी तरह से मुक्त (अलग) होकर शुद्ध स्वरूप को प्राप्त कर सकती है। संक्षेप: मोक्ष प्राप्त करने की क्षमता।
24. अनादित्व शक्ति कभी उत्पन्न न होने का स्वभाव यह शक्ति दर्शाती है कि आत्मा का कभी निर्माण नहीं हुआ, वह अनादि काल से है और रहेगी (अर्थात उत्पाद-व्यय का आधार)। संक्षेप: शाश्वत, Eternal Existence।
25. सान्तत्व शक्ति पर्यायों का अंत होने का स्वभाव आत्मा की प्रत्येक अवस्था (पर्याय) का उत्पाद और व्यय (पैदा होना और नष्ट होना) होता है, यानी प्रत्येक पर्याय का अंत होता है। संक्षेप: क्षणभंगुर (temporary) अवस्थाएं।
26. बहुत्व शक्ति असंख्य प्रदेशी होना आत्मा का आकार असंख्य प्रदेशों (सूक्ष्म कणों) से मिलकर बना है, जिसके कारण वह छोटा-बड़ा रूप धारण कर सकती है। संक्षेप: प्रदेशों की बहुलता।
27. एकत्व शक्ति अखंड एक पिंड होना इतने असंख्य प्रदेश होने पर भी, आत्मा एक अखंडित द्रव्य के रूप में ही रहती है; वह टुकड़ों में नहीं बँटती। संक्षेप: सभी प्रदेशों का एक पिंड के रूप में रहना।
28. शब्द शक्ति शब्दों द्वारा व्यक्त होना आत्मा का वह सामर्थ्य जिसके कारण उसे ‘जीव’, ‘आत्मा’, ‘चेतन’ आदि शब्दों से समझा और वर्णन किया जा सकता है। संक्षेप: भाषायी वर्णन की क्षमता।
29. अशब्द शक्ति शब्दों से परे होना आत्मा का वह गूढ़ और अनुभव गम्य स्वरूप जो किसी भी शब्द या भाषा के माध्यम से पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता है। संक्षेप: अनुभवगम्य और अवर्णनीय स्वरूप।
30. नित्यत्व शक्ति द्रव्य रूप से हमेशा रहना आत्मा का द्रव्य (Substance) रूप तीनों काल में कभी नष्ट नहीं होता; यह उसका स्थायी, अपरिवर्तनशील स्वभाव है। संक्षेप: द्रव्य की स्थिरता (Static aspect)।
31. अनित्यत्व शक्ति पर्याय रूप से बदलते रहना आत्मा की पर्याय (अवस्थाएँ) हर समय बदलती रहती हैं (जैसे क्रोध से शांत होना)। यह उसका परिवर्तनशील स्वभाव है। संक्षेप: पर्यायों का बदलना (Dynamic aspect)।
32. निश्चितत्व शक्ति स्वयं में निश्चित होना आत्मा का वह स्वभाव जो अन्य द्रव्यों के परिणामों से प्रभावित हुए बिना अपने स्वरूप में निश्चित और अटल रहता है। संक्षेप: आत्म-निर्भरता।
33. अनिश्चितत्व शक्ति पर्यायों में परिवर्तनशील पर्यायों की दृष्टि से, आत्मा विभिन्न अवस्थाओं (जैसे: नरक, मनुष्य, देव, तिर्यंच) में बदलती रहती है, इसलिए वह पर्याय रूप से अनिश्चित है। संक्षेप: पर्याय की परिवर्तनशीलता।
34. भाव शक्ति होने मात्र का सामर्थ्य आत्मा का वह स्वरूप जो कर्ता, कर्म, करण आदि कारकों की अपेक्षा से रहित होकर केवल अस्तित्व (being) मात्र है। संक्षेप: किसी क्रिया के बिना केवल सत्ता रूप होना।
35. अभाव शक्ति पर के भावों का अभाव आत्मा में अन्य द्रव्यों (जैसे पुद्गल) के गुणों और भावों का पूरी तरह से अभाव होना। आत्मा अपने से भिन्न नहीं है। संक्षेप: पर-द्रव्य से पूर्ण भिन्नता।
36. क्रिया शक्ति परिणमन (बदलने) की क्रिया वह सामर्थ्य जिससे आत्मा निरंतर अपने गुणों और पर्यायों में परिणामन (Movement/Change) करती रहती है। यह ‘चलने’ (Movement) की क्रिया नहीं है, बल्कि बदलने की क्रिया है। संक्षेप: आंतरिक परिवर्तनशीलता।
37. अक्रिया शक्ति दूसरे की क्रिया न करना आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह पुद्गल (शरीर) की क्रिया (चलना, बोलना) नहीं करती। वह केवल अपनी चेतन क्रिया ही करती है। संक्षेप: पर-द्रव्य की क्रिया से मुक्ति।
38. साधर्म्य शक्ति अन्य द्रव्यों से समानता वह सामर्थ्य जिसके कारण आत्मा अन्य द्रव्यों (जैसे पुद्गल, काल) के साथ द्रव्यत्व, प्रमेयत्व (जानने योग्य होना), वस्तुत्व जैसे सामान्य धर्मों में समानता रखती है। संक्षेप: सामान्य गुणों में समानता।
39. वैधर्म्य शक्ति अन्य द्रव्यों से भिन्नता वह सामर्थ्य जिसके कारण आत्मा अन्य द्रव्यों (पुद्गल आदि) से चेतनत्व, उपयोग आदि विशिष्ट धर्मों के कारण भिन्न है। संक्षेप: विशेष गुणों में भिन्नता।
1 Like
शक्ति का नाम :light_bulb: सरल अर्थ व्याख्या (Explanation) उदाहरण/संक्षेप
40. कर्ता शक्ति अपने भावों को करने वाला आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह स्वयं अपने शुद्ध या अशुद्ध परिणामों (जैसे: ज्ञान या क्रोध) को उत्पन्न करती है। संक्षेप: अपने परिणाम का जनक (Doer)।
41. कर्म शक्ति अपने भावों पर क्रिया होना आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण उसके अपने परिणाम ही कर्म (जिस पर क्रिया हो) बन जाते हैं। जैसे, आत्मा ज्ञान रूप कर्म को करती है। संक्षेप: क्रिया का लक्ष्य (Object)।
42. करण शक्ति साधन बनने का सामर्थ्य आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह अपने परिणामों को करने में स्वयं ही साधन (Instrument) बनती है (जैसे, ज्ञान को करने में आत्मा ही साधन है)। संक्षेप: कार्य सिद्ध करने का माध्यम (Means)।
43. संप्रदान शक्ति लक्ष्य या दान का सामर्थ्य आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह शुद्धि या अशुद्धि के रूप में स्वयं के लिए ही अपने परिणामों को समर्पित करती है। संक्षेप: जिसके लिए कार्य हो (Recipient)।
44. अपादान शक्ति अलग होने का सामर्थ्य आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह अपने पूर्व विकारी/अशुद्ध भावों (जैसे राग-द्वेष) से अलग (Detached) होकर शुद्धि प्राप्त करती है। संक्षेप: जिससे वियोग/विच्छेद हो (Source of separation)।
45. अधिकरण शक्ति आधार बनने का सामर्थ्य आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह स्वयं ही अपने गुणों और पर्यायों का आधार (Location) बनती है। संक्षेप: क्रिया का स्थान (Location/Substratum)।
46. काल शक्ति परिणामों में निमित्त बनना आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण वह अपने परिणामों में निमित्त (समय) के रूप में कार्य करती है। यह केवल अपने परिणामों में ही निमित्त बनती है, पर-द्रव्य में नहीं संक्षेप: परिवर्तन में सहायक समय (Time factor)।
47. संबंध शक्ति गुण-पर्याय से संबंध आत्मा की वह शक्ति जिसके कारण उसके गुणों (ज्ञान, दर्शन) और पर्यायों (अवस्थाओं) के बीच अभिन्न संबंध बना रहता है। संक्षेप: गुण-पर्याय का नित्य सह-अस्तित्व।
1 Like

ये शक्तियाँ विभिन्न दृष्टिकोणों (नयों) से आत्मा के एक ही स्वरूप को दर्शाती हैं, इसलिए कुछ शक्तियाँ दोहराव (Redundancy) वाली लग सकती हैं।

जैसे, ‘जीवत्व’ और ‘चिति’ दोनों चेतना से संबंधित हैं, लेकिन दोनों का जोर अलग-अलग है। अब यहाँ एक सी लगने वाली शक्तियों को combine कर देते हैं -

शक्ति का नाम विशिष्टता का आयाम सरल भेद और स्पष्टीकरण
1. चिति शक्ति (चेतना) अजड़ता (Non-inertness) यह शक्ति आत्मा के चेतन होने का मूलभूत अस्तित्व बताती है। यह बताती है कि आत्मा जड़ (पुद्गल) नहीं है।
2. दृशि/ज्ञान शक्ति (दर्शन/ज्ञान) जानने का तरीका ये दोनों मिलकर जानने-देखने की प्रक्रिया बताते हैं: दृशि = सामान्य (अनाकार) अवलोकन। ज्ञान = विशेष (साकार) विश्लेषण।
3. स्वच्छत्व शक्ति (निर्मलता) दर्पण जैसा स्वभाव यह सबसे विशिष्ट है। यह क्षमता बताती है कि आत्मा स्वयं के साथ-साथ अन्य पदार्थों को भी जानने की निर्मल योग्यता रखती है (स्व-पर प्रकाशक)।
4. सर्वज्ञत्व शक्ति जानने की सीमा यह क्षमता बताती है कि आत्मा असीमित ज्ञान (तीन लोक, तीन काल) का केंद्र है। यह ज्ञान की पूर्णता पर ज़ोर देती है।
5. प्रकाश शक्ति प्रकाश का कार्य यह शक्ति बताती है कि आत्मा स्वयं को भी जानती है और अन्य को भी जानने का कार्य करती है। यह जानने की क्रिया को परिभाषित करती है।
6. असंकुचित विकास शक्ति क्षमता की अमर्यादितता यह बताती है कि ज्ञान, सुख आदि गुणों का विकास अनंत है। कोई बाहरी सीमा आत्मा के विकास को रोक नहीं सकती।
12. प्रभुत्व शक्ति स्वयं पर नियंत्रण यह आत्मा की अखंड स्वतंत्रता और आत्म-शासन पर ज़ोर देती है। आत्मा किसी बाहरी शक्ति के अधीन नहीं।
13. वीर्य शक्ति कार्य करने का बल यह शक्ति ज्ञान-दर्शन आदि कार्यों को निरंतर और सफलतापूर्वक करने के लिए आवश्यक आंतरिक बल को परिभाषित करती है।
14. विभुत्व शक्ति व्यापकता का स्वरूप यह शक्ति बताती है कि आत्मा अपने गुणों, पर्यायों और क्षेत्र में पूरी तरह से व्याप्त है।
15. सुख शक्ति स्व-निर्भर आनंद यह आत्मा के अनाकुल (परेशानी रहित) स्वभाव को परिभाषित करती है, जो इंद्रियों पर नहीं, बल्कि स्वयं पर निर्भर है।
16. संयोग/वियोग शक्ति जुड़ाव/अलगाव की क्षमता संयोग = कर्म और शरीर से जुड़ने की क्षमता। वियोग = उनसे मुक्त होने (मोक्ष) की क्षमता।
17. अविकार/स्वभाव/विभाव शक्ति शुद्धि/अशुद्धि की अवस्थाएँ अविकार = शुद्ध स्वरूप कभी नहीं बदलता। स्वभाव = शुद्ध रूप में रहने की क्षमता। विभाव = अशुद्ध रूप में बदलने की क्षमता।
18. कर्ता/कर्म/करण शक्ति षट्कारक के आधार कर्ता = अपने परिणामों को करने वाला। कर्म = अपने ही परिणाम जिस पर क्रिया हुई। करण = अपने परिणामों को करने का साधन।
19. संप्रदान/अपादान/अधिकरण शक्ति षट्कारक के लक्ष्य संप्रदान = अपने ही परिणामों को समर्पित करना। अपादान = पुराने भावों से अलग होना। अधिकरण = अपने भावों का आधार बनना।
20. संबंध शक्ति गुण-पर्याय का संबंध यह शक्ति बताती है कि आत्मा के गुण (ज्ञान) और पर्याय (ज्ञान की अवस्था) हमेशा साथ-साथ और एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
21. त्याग/ग्रहण शक्ति परिणामन का चक्र त्याग = पिछली पर्याय को छोड़ना। ग्रहण = अगली पर्याय को धारण करना। यह निरंतर बदलाव को दर्शाता है।
22. साधर्म्य/वैधर्म्य शक्ति समानता/भिन्नता साधर्म्य = अन्य द्रव्यों से सामान्य गुणों में समानता। वैधर्म्य = चैतन्य जैसे विशेष गुणों में भिन्नता।
23. अकार्य-कारण शक्ति पर-द्रव्य से अलगाव यह शक्ति दृढ़ता से स्थापित करती है कि आत्मा अन्य द्रव्यों के कार्य का कभी कारण नहीं बनती।
1 Like