पाठ छठवाँ : द्रव्य-गुण-पर्याय
छात्र - गुरूजी, आज अखबार में देखा था कि अब ऐसे अणुबम बन गये हैं कि यदि लड़ाई छिड़ गई तो विश्व का नाश हो जायगा।
अध्यापक - क्या विश्व का भी कभी नाश हो सकता है ? विश्व तो छह द्रव्यों के समुदाय को कहते हैं और द्रव्यों का कभी नाश नहीं होता है, मात्र पर्याय पलटती हैं।
छात्र - विश्व तो द्रव्यों के समूह को कहते हैं और द्रव्य ?
अध्यापक - गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं।
छात्र - मन्दिरजी में सूत्रजी के प्रवचन में तो सुना था कि द्रव्य , गुण और पर्यायवान होता है (गुण पर्ययवद् द्रव्यम् ) |
अध्यापक - ठीक तो है, गुणों में होने वाले प्रति समय के परिवर्तन को ही तो पर्याय कहते है। अतः द्रव्य को गुणों का समुदाय कहने में पर्यायें आ ही जाती हैं।
छात्र - गुणों के परिणमन को पर्याय कहते हैं, यह तो समझा, पर गुण किसे कहते हैं ?
अध्यापक - जो द्रव्य के सम्पूर्ण भागों (प्रदेशों) में और उसकी सम्पूर्ण अवस्थाओं (पर्यायों) में रहता है, उसको गुण कहते हैं। जैसे ज्ञान आत्मा का गुण है, वह आत्मा के समस्त प्रदेशों में तथा निगोद से लेकर मोक्ष तक की समस्त हालतों में पाया जाता है। अतः आत्मा को ज्ञानमय कहा जाता है।
छात्र - आत्मा में ऐसे कितने गुण हैं ?
अध्यापक - आत्मा में ज्ञान जैसे अनंत गुण हैं, आत्मा में ही क्या समस्त द्रव्यो में, प्रत्येक में, अपने-अपने अलग-अलग अनंत-अनंत गुण हैं।
छात्र - तो हमारी आत्मा अनंत गुणों का भंडार हैं ?
अध्यापक - भंडार क्या ? ऐसा थोड़े ही है कि आत्मा अलग हो और गुण उसमे भरे हो, जो उसे गुणों का भंडार कहें, वह तो गुणमय ही है, वह तो गुणो का अखण्ड पिण्ड है।
छात्र - वे अनंत गुण कौन-कौन से हैं ?
अध्यापक - क्या बात करते हो, क्या अनंत भी गिनाये या बताए जा सकते हैं ?
छात्र - कुछ तो बताइये?
अध्यापक - गुण दो प्रकार के होते हैं, सामान्य और विशेष। जो गुण सब द्रव्यों में रहते हैं, उनको सामान्य गुण कहते हैं और जो सब द्रव्यों में न रहकर अपने-अपने द्रव्य में हों, उन्हें विशेष गुण कहते है। जैसे अस्तित्व गुण सब द्रव्यों में पाया जाता है, अतः वह सामान्य गुण हुआ और ज्ञान गुण सिर्फ आत्मा में ही पाया जाता हैं, अतः जीव द्रव्य का विशेष गुण हुआ।
छात्र - सामान्य गुण कितने होते हैं ?
अध्यापक - अनेक, पर उनमें छ: मुख्य हैं - अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व और प्रदेशत्व। जिस शक्ति के कारण द्रव्य का कभी भी अभाव (नाश) न हो उसे अस्तित्व गुण कहते हैं। प्रत्येक द्रव्य में अस्तित्व गुण हैं, अतः प्रत्येक द्रव्य की सत्ता स्वयं से है, उसे किसी ने बनाया नहीं है और न उसे कोई मिटा ही सकता है क्योंकि वह अनादि अनंत है।
इसी अस्तित्व गुण की अपेक्षा तो द्रव्य का लक्षण “सत्” किया जाता है, “सत् द्रव्यलक्षणम्” और सत् का कभी विनाश नहीं होता, तथा असत् का कभी उत्पाद् नहीं होता। मात्र पर्याय पलटती है |
छात्र - और वस्तुत्व… ?
अध्यापक - जिस शक्ति के कारण द्रव्य में अर्थ क्रिया (प्रयोजनभूत क्रिया) हो उसे वस्तुत्व गुण कहते हैं। वस्तुत्व गुण की मुख्यता से ही द्रव्य को वस्तु कहते हैं। कोई भी वस्तु लोक में पर के प्रयोजन की नहीं हैं, पर प्रत्येक वस्तु अपने-अपने प्रयोजन से युक्त हैं, क्योंकि उसमें वस्तुत्व गुण है |
छात्र - द्रव्यत्व गुण किसे कहते हैं ?
अध्यापक - जिस शक्ति के कारण द्रव्य की अवस्था निरन्तर बदलती रहे उसे द्रव्यत्व गुण कहते हैं। द्रव्यत्व गुण की मुख्यता से वस्तु को द्रव्य कहते है। एक द्रव्य में परिवर्तन का कारण कोई दुसरा द्रव्य नहीं है क्योंकि उसमें द्रव्यत्व गुण है, अतः उसे परिणमन करने में पर की अपेक्षा नहीं है।
छात्र - उन तीनों गुणों में अन्तर क्या हुआ ?
अध्यापक - अस्तित्व गुण तो मात्र “है" यह बतलाता है, वस्तुत्व गुण “निरर्थक नहीं है" यह बताता है और द्रव्यत्व गुण “निरंतर परिणमनशील है" यह बताता है।
छात्र - प्रमेयत्व गुण किसे कहते हैं ?
अध्यापक - जिस शक्ति के कारण द्रव्य किसी न किसी ज्ञान का विषय हो उसे प्रमेयत्व गुण कहते हैं।
छात्र - बहुत सी वस्तुएँ बहुत सूक्ष्म होती हैं, अतः वे समझ में नही पा सकती क्योंकि वे दिखाई ही नहीं देती हैं। जैसे हमारी आत्मा ही है, उसे कैसे जानें, वह तो दिखाई देती ही नहीं है ?
अध्यापक - भाई! प्रत्येक द्रव्य में ऐसी शक्ति है कि वह अवश्य ही जाना जा सकता है, यह बात अलग है कि वह इन्द्रियज्ञान द्वारा पकड़ में न आवे। यह तो हमारे ज्ञान की कमी के कारण है। जिनका ज्ञान पूरा विकसित हुआ है उनके ज्ञान ( केवलज्ञान) में सब कुछ आ जाता है और अन्य ज्ञानों में अपनी-अपनी योग्यतानुसार आता है। अतः जगत् का कोई भी पदार्थ अज्ञात रहे ऐसा नहीं बन सकता है।
छात्र - अगुरुलघुत्व गुण किसे कहते हैं ?
अध्यापक - जिस शक्ति के कारण द्रव्य में द्रव्यपन कायम रहता है, अर्थात् एक द्रव्य दूसरे द्रव्य रूप नहीं हो जाता, एक गुण दूसरे गुण रूप नहीं होता और द्रव्य में रहने वाले अनंत गुण बिखर कर अलग-अलग नही हो जाते , उसे अगुरुलघुत्व गुण कहते हैं।
छात्र - और प्रदेशत्व … ?
अध्यापक - जिस शक्ति के कारण द्रव्य का कोई न कोई आकार अवश्य रहता है उसको प्रदेशत्व गुण कहते हैं।
छात्र - सामान्य गुण तो समझ गया पर विशेष गुण और समझाइये।
अध्यापक - बताया था न, कि जो सब द्रव्यों में न रहकर अपने-अपने द्रव्यों में ही रहते हैं वे विशेष गुण हैं। जैसे जीव के ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख आदि। पुद्गल में स्पर्श, रस, गंध, वर्ण आदि।
छात्र - द्रव्य, गुण, पर्याय के जानने से लाभ क्या है ?
अध्यापक - हम तुम भी तो जीव द्रव्य हैं, और द्रव्य गुणों का पिण्ड होता है, अतः हम भी गुणों के पिण्ड हैं। ऐसा ज्ञान होने पर “हम दीन गुणहीन हैं"- ऐसी भावना निकल जाती हैं; तथा मेरे में अस्तित्व गुण है अतः मेरा कोई नाश नहीं कर सकता है, ऐसा ज्ञान होने पर अनंत निर्भयता आ जाती है।
ज्ञान हमारा गुण है, उसका कभी नाश नहीं होता। अज्ञान और राग-द्वेष आदि स्वभाव से विपरीत भाव (विकारी पर्याय ) हैं, इसलिए आत्मा के आश्रय से उनका प्रभाव हो जाता है।
प्रश्न -
- द्रव्य किसे कहते हैं ?
- गुण किसे कहते हैं ? वे कितने प्रकार के होते हैं ?
- सामान्य गुण किसे कहते हैं ? वे कितने हैं ? प्रत्येक की परिभाषा लिखिए।
- विशेष गुण किसे कहते हैं ? जीव और पुद्गल के विशेष गुण बताइए।
- पर्याय किसे कहते हैं ?
- द्रव्य , गुण , पर्याय समझने से क्या लाभ है ?