शान्ति पाठ-2 (संक्षिप्त) | Shanti Path 2 (Sankshipt)

शान्ति पाठ-2 (संक्षिप्त)

(संक्षिप्त)

(हरिगीतिका)
शास्त्रोक्त विधि पूजा महोत्सव, सुरपति चक्री करैं ।
हम सारिखे लघु पुरुष कैसे, यथाविधि पूजा करें ।।
धन-क्रिया-ज्ञान रहित न जाने, रीत पूजन नाथजी ।
हम भक्तिवश तुम चरण आगैं, जोड़ लीने हाथजी ।।

दुख-हरन मंगलकरन, आशा-भरन जिन पूजा सही ।
यह चित्त में श्रद्धान मेरे, शक्ति है स्वयमेव ही ।।
तुम सारिखे दातार पाये, काज लघु जाचूँ कहाँ ।
मुझ आप सम कर लेहु स्वामी, यही इक वाँछा महा ।।

संसार भीषण विपिन में, वसु कर्म मिल आतापियो ।
तिस दाहतैं आकुलित चिरतैं, शान्तिथल कहुँ ना लियो ।।
तुम मिले शान्ति स्वरूप, शान्ति सुकरन समरथ जगपती ।
वसुकर्म मेरे शान्ति करदो, शान्तिमय पंचमगती ।।

जबलों नहीं शिव लहूँ, तबलों देह यह नर पावना ।
सत्संग शुद्धाचरण श्रुत अभ्यास आतम भावना ।।
तुम बिन अनंतानंत काल गयो रुलत जग जाल में ।
अब शरण आयो नाथ युग कर जोर नावत भाल मैं ।।

(दोहा)
कर प्रमाण के मान तैं, गगन नपै किहि भंत ।
त्यों तुम गुण वर्णन करत, कवि पावे नहिं अन्त ।।


स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ४०० से ४०४
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ९५