प्रभुजी अष्ट द्रव्यजु ल्याओ भावसों ।
प्रभु थांका हर्ष हर्ष गुण गाऊँ महाराज ।।
यो मन हरख्यो प्रभु थांकी पूजाजी रे कारणे ।
प्रभुजी थांकी तो पूजा भविजन नित करै ।।
जाका अशुभ कर्म कट जाय महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी थांकी तो पूजा भवि जीव जो करै ।
सो तो सुरग मुकतिपद पावै महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी इन्द्र धरणेन्द्रजी सब मिल गाया ।
प्रभु का गुणां को पार न पाईया ।।
प्रभुजी थे छो जी अनन्ताजी गुणवान ।
थाने तो सुमर्यां संकट परिहरे ।।
प्रभुजी थे छो जी साहिब तीनों लोक का ।
जिनराय मैं छूँ जी निपट अज्ञानी महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी थांका तो रूपजु निरखन कारणे ।
सुरपति रचिया छै नयन हजार महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी नरक निगोद में भव भव में रुल्यो ।
जिनराज सहिया छै दुख अपार महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी अब तो शरणोजी थारों में लियो ।
किस विधि कर पार लगावो महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी म्हारौ तो मनड़ो थामें घुल रह्यो ।
ज्यों चकरी बिच रेशम डोरी महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी तीन लोक में है जिन बिम्ब ।
कृत्रिम अकृत्रिम चैत्यालय पूजस्यां महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी जल चन्दन अक्षत् पुष्प नैवेद्य ।
दीप धूप फल अर्घ चढ़ाऊँ महाराज ।।
जिन चैत्यालय महाराज, सब चैत्यालय महाराज ।।यो मन०।।
प्रभुजी अष्ट द्रव्य जु ल्याओ बनाय ।
पूजा रचाऊँ श्री भगवान की महाराज ।।यो मन०।।
ॐ ह्रीं श्री भावपूजा भाव-वन्दना त्रिकालपूजा त्रिकाललन्दना करे करावै भावना भावे श्री अरहन्तजी सिद्धजी आचार्यजी उपाध्यायजी सर्वसाधुजी पंचपरमेष्ठिभ्यो नमः । प्रथमानुयोगकरणानुयोग चरणानुयोग द्रव्यानुयोगेभ्यो नमः । दर्शन विशुद्धयादिषोड़श कारणेभ्यो नमः । उत्तम क्षमादि दश लाक्षणिक धर्मेभ्यो नमः । सम्यग्दर्शन. सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्रेभ्यो नमः । जलके विषै थलके विषै आकाशके विषै गुफाके विषै पहाड़के विषै नगर-नगरी विषै ऊर्ध्वलोक मध्यलोक पाताललोक विषै विराजमान कृत्रिम अकृत्रिम जिन चैत्यालयस्य जिनबिम्बेभ्यो नमः । विदेहक्षेत्र विद्यमान बीस तीर्थंकरेभ्यो नमः । पाँच भरत पाँच ऐरावत दश क्षेत्र सम्बन्धी तीस चौबीस के सात सौ बीस तीर्थंकरेभ्यो नमः । नन्दीश्वरदीप सम्बन्धी बावन जिन चैत्यालयेभ्यो नमः । पंचमेरु सम्बन्धी अस्सी जिन चैत्यालयेभ्यो नमः । सम्मेदशिखर कैलाश चम्पापुर पावापुर गिरनार सिद्धवरकूट ऊन बड़वानी-बावनगजा आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो नमः । जैनबद्री मूलबद्री राजगृही शत्रुंजय तारंगा चमत्कार महावीर स्वामी पद्मप्रभु स्वामी, तिजारा मक्सी बनेड़िया आदि अतिशय क्षेत्रेभ्यो नमः । गोम्मट्गिरी बाहुबली चौबीस तीर्थंकरेभ्यो नमः । श्री चारण ऋद्धिधारी सप्त परमऋर्षिभ्यो नमः ।
ॐ ह्रीं श्रीमंतं भगवन्त कृपालसन्तं श्रीवृषभादि महावीर पर्यंत चतुर्विंशति तीर्थंकर परमदेवं आद्यानां आद्ये जम्बूद्वीपे भरत क्षेत्रे आर्यखण्डे… नाम्नि नगरे मासानामुत्तमें मासे… शुभो… पक्षे शुभ.. तिथि… वासरे मुनि आर्यिकानां श्रावक श्राविकानां क्षुल्लक क्षुल्लिकानां सकल कर्म क्षयार्थं जलधारा अनर्घ्यपद प्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
भाव पूजा वन्दनास्तव समेतं श्री पंचमहागुरु भक्ति कायोत्सर्ग करोम्यहं ।
यहाँ पर कायोत्सर्गपूर्वक नौ-बार णमोकार मंत्र जपना चाहिये ।
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ३९३ से ३९७