जीवन की ये सन्ध्या बेला, चलो तैयारी कर लें हम ।
रीता रीता ये जीवन बीता, चारित्र के हीरे जड़ लें हम ॥
सोच रहा हूँ नादानी में क्या-क्या करते आये हैं ।
जीने के नाम पे अब तक “जीके” बस मरते ही तो आये है ॥
बहुत पढ़ा जग को हमने सारी पोथी पढ़ डाली ।
न जाने कैसे हमने क्या-क्या करनी गढ़ डाली ॥
मान पत्र और डिग्री क्या मिली बस हम तो कुछ यूँ फूल गए ।
जो पढ़ना था हमको उसको ही हम बस पढ़ना भूल गए ॥
छोड़ के अब इन सिद्धांतों को, निज को ही बस पढ़ लें हम ।
जीवन की ये सन्ध्या बेला, चलो तैयारी कर लें हम ॥
इस भव की चिंता में ही इस भव को हमने व्यर्थ किया ।
इसके आगे होगा क्या इसका न कभी मनन किया ॥
अनादि से भटक रहे थे हम, क्या अब भी हमें भटकना है ?
क्या आगे भी हमको यारो विकल्पों में ही अटकना है ॥
धिक्कार अरे ये जीवन है जो खो दूँ यूँ ही इसको भोगों में ।
इस दुर्लभ भव को पाकर इसे गंवा दूँ अनादि के रोगों में ॥
अरे छोड़ के अब ये पराधीनता, कुछ तो स्वयं को गढ़ लें हम ।
जीवन की ये सन्ध्या बेला चलो तैयारी कर लें हम ॥
जीवन की ये सन्ध्या बेला, चलो तैयारी कर लें हम ।
रीता रीता ये जीवन बीता, चारित्र के हीरे जड़ ले हम ॥
(उपरोक्त रचना मेरी मौलिक रचना है और ये मेरी प्रकाशित पुस्तक जीके अन्तर्भाव में प्रकाशित भी हो चुकी है)
रचनाकार: ज्ञानेंद्र कुमार जैन (Gyanendra Kumar Jain), कानपुर नगर
Instagram: @gkantardasha