योग साधना — जैन स्वाध्याय सामग्री | Yog Sadhna

योग साधना

सीमा भाग १

भारत वर्ष की प्रसिद्ध किसी नगरी में धन और धर्म से परिपूर्ण एक सेठ रहता था। उन का नाम धनपाल था। उनकी पत्नी का नाम धनवती था। उन के दो पुत्र थे। जिनका नाम सोमा था। सोमा एक सुन्दर, सुशील, गुणवती, धार्मिक, संस्कारा से युक्त कन्या थी।

एक बार की बात है। सोमा के माता पिता कन्या में बैठे हैं। उनकी नजर अचानक सोमा पर पड़ती है और आपस में विचारते हैं कि सोमा यौवन अवस्था में प्रवेश कर चुकी है। और इस चिंता में कि अब सोमा का विवाह किया जाये। [पृष्ठ क्रम भंग]

सेठ → सुनो प्रिये! हमारी पुत्री यौवन अवस्था में प्रवेश कर चुकी है। तुम्हें नहीं लगता कि हमें अब उसका विवाह कर देना चाहिए।

सेठानी → हाँ आप सही कह रहे हैं। हमें सोमा के लिए योग्य वर तलाशना चाहिए।

सेठ → परन्तु हम चाहते हैं कि जैसे हमारी पुत्री संस्कारों से युक्त, धार्मिक, शीलवती कन्या है। वैसा ही वर उसे मिले।

सेठानी → सुनिये प्रियवर! मुझे किसी ने बताया कि आर्य खण्ड के मध्य देश में अवन्ती देश है। वहां का राजा महाप्रतापी है और धर्म परायण भी है। उसका नाम अवन्तिपाल है। उस नगरी में सुन्दर जिनालय भी हैं। वहां की पूरी प्रजा ही धर्मकेन्द्रित वाली है। उस नगर में एक श्रेष्ठि परिवार धनपाल नामक श्रेष्ठि रहता है। आप कहें तो उससे बात चलायें।

सेठ → जब राजा धर्मवन्त वाला है और पूरी प्रजा भी है तो यह धनपाल भी धार्मिक गुणों से अलंकृत होगा? तुम बात तो चलाओ।

सेठानी → ठीक है। मैं बात आगे बढ़ाती हूँ।

Narrator- एक ओर जहाँ सोमा अपने पूर्वापार्जित पुण्य से संस्कार को देख भाग्य गुरु की अनन्य उपासक थी। *[अडिग अडोलुख व पवित्रता की धाक थी। दूसरी ओर धनपाल जिनधर्म का विरोधी था जिन बात से सोमा अनभिज्ञ थी।]
*
विवाह पश्चात सोमा अपना जीवन व्यवहार चला रही थी। वह रत्नत्रय की आराधना में अपना जीवन आनन्द पूर्वक व्यतीत कर रही थी। एक दिन सोमा मन्दिर में तत्व चिन्तन कर रही थी। उतने में

धनपाल का प्रवेश होता है। जो घर में सोमा का इन्तजार कर रहा होता है।

द्वितीय दृश्य

धनपाल[तेज स्वर में] अरे सोमा! कब तक तुम मन्दिर में बैठी रहोगी। तुम्हारा इन्तजार कर रहा हूँ।

सोमा → जी मैं आ ही रही हूँ। भगवान की भक्ति करते हुए समय का पता ही नहीं चला।

धनपाल → तुम्हें इतना भी ध्यान नहीं रहा कि मैं कितने बजे आता हूँ। दो घण्टे से इन्तजार कर रहा हूँ। [मन्दिर में सहेलियों के साथ गप्पे मार रही होगी]

सोमा → कहा न भग भगवान की भक्ति में समय का पता ही नहीं चला।

धनपाल → भक्ति, भक्ति, भक्ति मैं तो तंग आ गई हूँ। तुम्हारी भक्ति से। यदि तुम्हें इस घर में रहना है तो भक्ति बन्द करनी होगी और जैसा मैं कह जैसा करना होगा। गृहस्थों को गृहस्थों की तरह ही रहना चाहिए।

सोमा → आप कैसी बातें कर रहे हैं, भक्ति से तो भगवान मिल जाते हैं। भगवान की भक्ति करने से अनन्त शांति की प्राप्ति होती है। और अब भक्ति से ही टालना करते हो।

धनपाल → चुप हो जाओ। मुझे उपदेश मत दो।

सोमा → क्षमा कीजिये स्वामी! मैं तो बस आपसे निवेदन कर कर रही थी।

धनपाल → कैसे गिरगिट की तरह रंग बदलती हो। देखा के लगी रहती भक्ति करने हैं जिनके पास कुछ काम नहीं होता जो फालतू होते हैं।

सोमा → स्वामी भक्ति से ही आत्मा प्रकाशित होती है।

धनपाल → कैसी शक्ति, आत्मा में कोई शक्ति वक्ति नहीं होती। यह बाप ने देवी हो कही। [अक्षपानी]

सोमा → भौतिक सुख के आगे यह सब शाश्वत सुख की महिमानही। लेकिन जनों को विषय भोग संबंधी सुख में ही आनन्द आता है।

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रहीले में कह रहा हूँ, भक्ति से निष्काम। होती है। जो निष्काम सात है वही भक्ति कार्य। भक्ति में अंतर नहीं भक्त तो संसार में है।

दृश्य/प्रसंग

माँ → माँ मेरे दुख है।

ससुर[गुस्से में सोमा की सास का ससुरजी के लदेर आपस में सोमा का लेकर बात कर रहे हैं।]

सास → उरे ये कैसी बहू मिली है? मेरी तो नाक ही कट गई। [भगाकर बोली] ऐसी बहू लेकर आये हो तुम। इस बहू को पाकर मेरी जीभ ही जलता है। मेरी से भूल से ही ऐसी बहू को ब्याह करके ले आये।

ससुर → जाने कैसी निर्लज्ज बहू मिली है। जब देखो मंदिर, मंदिर, मंदिर। भगवान का भक्ति सेवा में लगी रहती है। हमारी सेवा का तो ख्याल ही नहीं।

सास → मैं तो सोमा जी की जब ससुराल आई थी तो रात बारह बजे सोती थी और भोर में उठ जाती थी। घर के सारे काम करती थी। और ये महारानी उससे साथ ही मंदिर चली जाती है। घर के काम से ही मतलब ही नहीं।

ससुर → बीसों की माँ बार समझा दिया इसको पर इसको तो समझ ही नहीं आता। धंधे बस मंदिर में ही बिताती है। फिर घर पर भी भगवान के गुण गाती है। ढीठ है ये ढीठ।

सास → अब आप चिन्ता न करें मैं तो ठीक मैं ही करूंगी। कुछ न कुछ उपाय सोचती हूँ मैं।

[उतने में बेटे का प्रवेश होता है]

माँ → आ गये मेरे बेटे, क्या बात है। आज तुम बड़े थके थके से नजर आ रहे हो।

बेटा धनपाल → माँ, सोमा की भक्ति संख्या सरल है, मेरी सुख शांति के बाधक है। माँ, जैसा तुम चाहते, वैसा तो नहीं करती बस उसे तो एक ही सूझते है, आत्मा व परमात्मा की।

संवाद

सोमा - तेरा तप सही कर रहे हो। मैं भी तुम्हारे पिताजी से बात कर रही थी। अब तो मैं भी तप में जाऊँगी।

माँ - मुझमें तपस्या एवं सेवा नहीं तथा मैं सोमा के तुम्हारे पश्चात् करूँगी। मैं आपको मुझमें से कोई कसर नहीं छोडूंगी।

सोमा - लेकिन यह कैसी सेवा है।

माँ - माँ, पर यह कैसे संभव है। सोमा के रहते हुए यह कैसे हो सकता है।

सोमा - मैं सोमा को हम हमेशा के लिए गिरा देंगे। अब के लिए हम मिलकर कोई उपाय सोचते हैं। क्यों न इसे उसने पीहर छोड़ कर आ जाएँ।

माँ - नहीं माँ, ऐसा कैसे कर सकते हैं। वह तो पतिव्रता है। साध्वी है। वह वीर जाने को कैसे तैयार होगी।

सोमा - कुछ और सोचकर तुम ठीक कर रहे हो। ऐसा करते हैं कि मैं उसे कहूँगी कि कटोरी पानी भरके लाओ। जैसे ही वह पानी भरेगी मैं उसे धक्का दूँगी।

माँ - नहीं माँ नहीं। किसी ने देख लिया तो हम बदनाम हो जाएँगे। और जेल जाना पड़ेगा।

दृश्य - 4

सोमा अकेली कमरे में बैठी है।

सोमा - मैं अत्याचार हूँ। मुझ अबला नारी पर। मैं बेबस निर्भय रहती हूँ।

तभी मैं ही सोमा की सहेली का आगमन होता है।

सोमा - सोमा किस चिंता में हो और इतनी बेबस क्यों दिखाई दे रही हो।

सखी - देखो न मैं जिनेंद्र भगवान की भक्ति भी नहीं कर सकती। कोई भी यह कोई भी जिनेंद्र भक्त नहीं है। मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है।

सहेली - सुनो सखी जरूर ही ये तुम्हारे तुम्हारे पूर्व जन्म के पाप उदय का फल हो। पूर्व प्रयोग से हुए जिनेंद्र भक्ति करने का संकल्प भी जिनेंद्र के फल स्वरूप तुम्हें यह अत्याचार सहना पड़ रहा है।

सोमा - हाँ सखी। शायद तुम सही कह रही हो। मुझे तो जिनेंद्र भगवान और मेरी आत्मा की ही शरण है।

सखी - हे सोमा! हे सीलवती! तुम्हारी तो सभी रक्षा करेंगे। जीव वेत धर्मात्माओं के तो भयंकर आपदाओं में भी वे भी मित्र बन जाते हैं। शीघ्र ही तुम भी इस परेशानी से पार हो जाओगी।

सोमा - हे सखी! तुम जैसी सखी जाकर मैं धन्य हो गई।

दृश्य - 5

जहाँ माँ और बेटे में वार्तालाप हो रहा था।
वहाँ अचानक ही सपेरे का आगमन होता है।

सपेरा - नाग को दूध पिलाओ।

माँ - अरे सपेरा, इधर आओ।

सपेरा - आज नाग पंचमी है, इस दिन जो नाग को दूध पिलाता है उसकी मनोकामना पूर्ण होती है, लौकिक वाही पूर्ण होती है।

माँ - तुम ठीक कर रहे हो। क्या हमारी बाधा सचमुच पूर्ण हो जाएगी।

सपेरा - अरे माताजी। आपको शंका हो रही है, मेरे पास हजारों उदाहरण हैं, जिन्होंने नाग को दूध पिलाया और हजारों इच्छाएँ पूर्ण हो गई।

माँ - (सोचती है और बेटे से) बेटा दूध लाओ, अरे हाँ हमारी बाधा भी तो पूर्ण करनी है।

बेटा - कैसे।

माँ - फिर आगे की बात बाद में। (सपेरे से) क्यों भाई तुम इस नाग को ले लो।

सपेरा - क्यों नहीं यह तो हमारा व्यापार है, पर यह नाग बहुत भयंकर है। जितना एक बार इस ले उसका बचना मुश्किल है।

बेटा - अच्छा! तो यह बताओ तुम इसका कितना मूल्य दोगे।

दृश्य - 6

(सुखी व दुखी) दुखी

पत्नी - सोमा सो सोमा कहाँ है।

पत्नी - जी स्वामी, मैं यहाँ रसोई के घर में हूँ।

पत्नी - अच्छा तो तुम यहीं हो। पर क्या कर रही हो। सारा दिन काम में ही लगी रहती हो, देखा मैं सही में तुम्हें किस क्या ला रहा है।

पत्नी - बस थोड़ा सा काम शेष है। अभी निप्पल कर अभी हूँ। नहीं तो माताजी माताजी नाराज होंगी। लो जी जल पीजिए (हाथ धोकर हुए) नाथ आज आप बहुत प्रसन्न हैं। अच्छा कोई विशेष कारण है।

पत्नी - मैं तो बहुत प्रसन्न हूँ। दरवाजा तुम्हारे लिए एक शोभा है, तनिक पहन कर तो दिखाओ।

पत्नी - क्या लाए हो स्वामी।

पत्नी - खुद ही देख लो। तुम मुझे में खुशी आता हूँ।

पत्नी - (दरवाजे के पीछे से झाँकता है)

पत्नी - (मौन मन ही मन बोलती है)

पत्नी - अरे! तुमने अभी तक नहीं बदला।

पत्नी - पत्नी घर में ही डालती है और हार पहन लेती है और बोलती है। वाह! कितना सुंदर हार है, अब भी पहनकर देखा।

पत्नी - (पति की प्रशंसा है) वह लोप बनकर इस जैसा है और वह ही हो जाता है।

पत्नी - हाय यह कैसे हुआ। हार का सर्प कैसे हो गया। माँ जी माँ जी।

(मन में आँसू) सूकर माँ का क्रोध में प्रवेश

पत्नी - क्या हुआ मेरे लाल को। क्या हुआ (बेटे का निर्जीव मस्तक अपनी गोद में रखकर) तू अब देर मिलाप करती है फिर सीमा की ओर देखती है और बोलती है।

पत्नी - अरे हायन, चांडालनी यह तूने क्या किया, क्या बिगाड़ा था, मेरे लूत में तेरा। जी तू विश्वास घात से उसे डसकर मार डाली यह तूने क्या किया। (सोमा का मन में बैठकर नागेश्वर मंत्र का स्मरण करने लगती है।)

नाटक-संवाद

इतने में पति अचानक जीवित होकर बैठ जाता है और जिनवाणी माता की जय बुलाते हैं, सोमा के चरणों में बैठकर उससे क्षमा मांगते हैं।
पति: हे भुज माफ कर दो। वास्तव में तुम्हारी जिनेंद्र भक्ति में मुझे नया जीवन दिया है, एक नई हातर प्रदान की है। आज मुझे जैन धर्म की महिमा समझ में आ गई है। मुझसे जो पाप हुए हैं मैं उन सबका सच्चे हृदय से प्रायश्चित करता हूं। अब से मैं जिनेंद्र भगवान की प्रति भक्ति में अपना सारा जीवन समर्पित करता हूं।
सोमा की सास: हां, बेटी मुझे क्षमा करो। मैंने अनजाने में तुम्हें जाने कितने दुख दिए हैं, जैन धर्म की विराधना की है। ओह मेरे इन पापों का जाने क्या फल होगा। मुझे कौनसी गति मिलेगी।
सोमा: माता जी जो भी कुछ हुआ इसमें सब जिनेंद्र भगवान की भक्ति की वजह से हुआ।
मां और बेटा: चलो हम सब मंदिर चल कर जिनेंद्र भगवान की भक्ति करते हैं। और अपनी आत्मा की आराधना करके मुक्ति पथ पर चलें।

भक्ति सरोवर

भजन: आज और जिन राज तुम्हारे सारे आप्त, हा जी हा जी हम आए दुसड़ा सह

नाटक-संवाद

स्वामी: आपके पुण्य प्रताप से हुआ है आप का आयु कर्य बलवान है मैंने कुछ नहीं कीया है।
सोमा: जेलों की तंग कोठरी सम घर के कोने में रहती हूं अत्याचारी दल की पीड़ा मैं बक्स निर्मम सहती हूं।

स्रोत: Gyata संग्रह।

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