6 mahine, 8samay me 608 jeev nitya nigod se nikalte hain, aur itne hi jeev moksha jate hain, kya ye sabhi jeev (608) bhavya hue,
yadi abhavya bhi hue, to vyavhar jeev rashi me keval abhavya jeev hi reh jayenge, kyuki 608 jeev jo add ho rahe hain, wo bhavya aur abhavya dono hain, kintu jo moksha ja rahe hain, ve keval bhavya, to is prakar bhavya jeev, sansaar rashi me se anant kal baad khatam ho jaenge, aur kevel jo bhavya nigod se a rahe hain, ve hi moksha ko prapt honge, kintu ye possible nahi hai, to hum isse 2 baatein sidha kar sakte hain
1- vyavhar rashi me bhavya jeev ki sankhya fixed rahegi
2- nitya nigod se nikalne vale jeev keval bhavya hi honge
Probably there are a few more ways to answer this question, but here are a couple of thoughts on a simplified version of the question, which could be: संसार में से भव्य जीव मोक्ष चले जाएंगे तो क्या सिर्फ अभव्य जीव बचेंगे?
यदि भविष्य अनंत (endless) है, तो भूत काल भी अनादि (beginningless) है। आज तक तो ऐसा हुआ नहीं।
कुछ विषय तर्क / युक्ति से नहीं समझे जा सकते। भव्य / अभव्य का विषय ऐसा ही है। आप्तमीमांसा, श्लोक 100 में इस विषय में लिखा है: “स्वभावोऽतर्कगोचरः” अर्थात् स्वभाव में तर्क नहीं लग सकते।
I hope someone else could respond to the two questions raised in the first post as I don’t know much about it.
इस लोक में कुछ विषय ऐसे जो हमारे ज्ञान गोचर नहीं है इसे मात्र केवली भगवान के ज्ञान गोचर है इसे ऐसा ही वस्तु का स्वरूप समझकर इसे स्वीकार करना चाहिए।
जैसे भूगोल का विषय,सूक्ष्म कर्म का विषय, एकेंद्रीय जीवो का स्वरूप आदि…
भव्य अभव्य का स्वरूप :- जिसके सम्यग्दर्शन आदि भाव प्रकट होने की योग्यता है वह भव्य कलहाता है। अभव्य इसका उलटा है।
तीन प्रकार के भव्य जीव है।
१) आसन्न भव्य:- जो कुछ थोड़े काल में मोक्ष जायेंगे।
२) दूर भव्य:- जो बहुत काल बाद मोक्ष जायेंगे
३) दुरानुदुर भव्य :- जो भव्य तो है परंतु कभी भी सम्यक्त्व प्राप्त नहीं करेंगे।
जो अभव्य है या अभव्यों के समान नित्य निगोद को प्राप्त हुए भव्य हैं।
अतीत भव्य :- जो न भव्य हैं और न अभव्य हैं, किंतु जिन्होंने मुक्ति को प्राप्त कर लिया है, और अतीत संसार हैं। उन जीवों को ना भव्य ना अभव्य जानना चाहिए।
जी हाँ सभी।
जीव राशि उतनी है कि अतीत काल के जितने भी सिद्ध हुए है उनकी संख्या अनंत है उससे भी ज्यादा जीव कोई भी अनंत कायिक कंदमूल आदि के एक कण में भी उससे कई गुना अधिक इसीलिए हम इसका अनुमान भी नहीं लगा सकते ऐसे कितने कंदमूल,पत्ते(जो कि अनंत कायिक होते है) कितने पेड़ जंगल आदि ,मूल में ये हमारे ज्ञान गोचर ही नहीं है।
जी हाँ।प्रत्येक द्रव्य अनादि अनंत है।कोई भी उत्पन्न नहीं होता नाहिं नाश होता है।
नहीं दोनों हो सकते है।अभव्य भी मुनि दीक्षा धारण करता है,यहाँ तक चार लब्धि भव्य अभव्य दोनों को हो सकती है ऐसा आगम में आया है।