ऊपर दिए हुए screenshot मे एक ही गाथा (आचार्य मायिल्ल धवल रचित नय चक्र की गाथा न. २६४) के अनुवाद दिए हुए हैं। द्रव्यस्वभाव प्रकाशक नयचक्र (आचार्य मायिल्ल धवल रचित नय चक्र का प. कैलाश चंद्र जी द्वारा सम्पादन और अनुवाद) और परम भाव प्रकाशक नय चक्र (डॉ. हुकमचंद जी भारिल्ल द्वारा) में इस व्यवहार नय के सामान्य लक्षण को बताने वाली गाथा के अनुवाद में ‘भेद’ और ‘उपचार’ को दो अलग अलग अव्यवों ( ‘का’ और ‘व’ ) से जोड़ा गया है।
दोनो ही अर्थों का (‘भेद का उपचार’ और ‘भेद व उपचार’) अध्यात्म ग्रंथो में बहुलता से उपयोग किया जाता है, परंतु दोनो ही अर्थों को सूक्ष्मता से देखने पर परिभाषा में एक बड़ा अंतर स्थापित हो जाता है।
प्रश्न यह है कि भाषा व्याकरण और भाव, दोनो की दृष्टि में किस अर्थ को मूल अर्थ के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए?
खोज: Vyavhar Nay Ki Paribhasha Me Aye ‘Bheduvyaran / Bhedopchar’ Shabd Ka
धन्यवाद, परन्तु एक बात यहां यह है कि इस गाथा को व्यवहार नय के सामान्य लक्षण के रूप में उपोद्धात में कहा गया है। इस कारण जो भी लक्षण सामान्य का बनाया जा रहा है वह विशेष में भी पाया जाना चाहिए। अर्थात ये अर्थ सद्भूत और असद्भूत दोनों में ही घटित होना चाहिए।
मुझे भी भेद का उपचार ही लग रहा था लेकिन जब आलाप पद्धति में निश्चय नय की परिभाषा देखते है (in the above screenshot) तो वहाँ भी अभेदानुपचार लिखा है । लेकिन उसका अर्थ - अभेद का अनुपचार - ऐसा तो नहीं कर सकते । वहाँ तो अभेद व अनुपचार यही अर्थ घटित होगा ।
इसलिए भेदुवायारं का अर्थ भेद व उपचार अधिक उपयुक्त है ।
इसमें षष्ठी तत्पुरुष लगाने की बजाय कर्मधारय समास लगायेंगे तो ठीक बैठेगा याने
भेद ही है उपचार ऐसा भेदोपचार
अभेद ही है अनुपचार ऐसा अभेदोपचार
आगम में भेदोपचार, अभेदोपचार, सादृश्योपचार, अभेदवृत्ति आदि अनेक शब्दों का राजवार्तिक, सर्वार्थसिद्धि आदि ग्रंथो में प्रयोग किया गया हैं जहाँ इनका अर्थ भेद और उपचार ऐसे दो शब्द अलग अलग करके नहीं किया जाता. ये द्वंद्व समास करके दो शब्दों को एक नहीं किया गया है बल्कि उसे एक ही अर्थ में लिया है.
ऐसा भी कह सकते है, लेकिन फिर प्रश्न यह होता है कि इसमें तो मात्र सद्भूत व्यवहार नय का ग्रहण हुआ । असद्भूत व्यवहार नय का कार्य भेद में अभेद बताना है, उसका ग्रहण नहीं हो पाया ?
दोनों शब्दों में कोई अंतर नहीं है। 'भेदुपयारं ’ प्राकृत शब्द है और ‘भेदोपचार’ संस्कृत शब्द है। भेदुपयारं इस शब्द में लोप सन्धि हुई है ; अतः भदोपयारं शब्द नहीं बना है, परन्तु विकल्प से ‘भदोपयारं’ यह सन्धि भी होती है । जैसे ‘लोगुत्तमा’ और ‘लोगोत्तमा’ दोनों ही प्रयोग में आते हैं।
भेदुपयारं इसमें द्वन्द्व समास है , व्यवहार नय वस्तु के धर्म का (में) भेद व उपचार करता है।