व्यावहारिक बाल शिक्षा भाग-४
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स्याद्वाद बाल-शिक्षा
चौथा भाग
- लेखिका *
गणिनी आर्यिका श्री 105 स्याद्वादमती माताजी
भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्
भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद् संख्या- 140
आशीर्वाद : प.पू. आचार्य श्री 108 विमलसागरजी महाराज
प.पू. आचार्य श्री 108 भरतसागरजी महाराज
संयोजन : आर्यिका श्री 105 यशस्विनी माताजी
ग्रन्थ : स्याद्वाद बाल शिक्षा (भाग-4)
लेखिका : गणिनी आर्यिका श्री 105 स्याद्वादमती माताजी
संस्करण : बाईसवाँ
वीर निर्वाण सम्वत् 2039 सन् 2013
सर्वाधिकार सुरक्षित :
प्रकाशक : भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्
पुस्तक प्राप्ति स्थान : (1) गणिनी आर्यिका स्याद्वादमती माताजी संघ
(2) आचार्य श्री भरत साहित्य सदन
सम्मेरशिखरजी
(3) श्री पार्श्वनाथ दि. जैन मन्दिर
डी-210, श्यामपार्क एक्सटेंशन
महावीर वाटिका, साहिबाबाद (उ.प्र.)
मूल्य : सदुपयोग
मुद्रक : सुभाष ऑफसेट
मदनगंज-किशनगढ़ (राज.)
फोन : 01463-242121
अनुक्रमणिका
- प्रार्थना …
प्रार्थना
हे वीतराग स्वामी, नित प्रार्थना हमारी।
अज्ञान को तजें हम, बन ज्ञान के पुजारी।। १।।
हिंसादि पाप तजकर
सत्पथ पे हम चलेंगे,
क्रोध कषाय तजकर।
समभाव हम धरेंगे ।।२।। हे वीतराग०
माता पिता की सेवा
थकि गुरुजनों की,
प्रातः सुजल्दी उठकर।
नित करेंगे ईश भक्ति ।।२।। हे वीतराग०
दो नाथ हमको शक्ति
तुम सम बनेंगे हम भी,
दुःखियों की सेवा करके।
पायेंगे आत्म शांति ।।३।। हे वीतराग०
नव देवता स्तवन
दोहा
परमेष्ठी पाँचों नमुँ, जिनवाणी उरलाय।
जिन मारग को धारकर, चैत्य चैत्यालय ध्याय ।।
(तर्ज-अहो जगत् गुरु देव सुनियो ------)
अरिहन्त प्रभु का नाम है, है जग में सुखदाई।
घाति चतु क्षयकार, केवल ज्योति पाई।
वीतराग सरवज्ञ, हित उपदेशी कहाये।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित भक्ति सुधाये ।।१।।
सिद्ध प्रभु गुणखान, सिद्धि के हो मदला।
कर्म आठ सब काट, करते मुक्ति वाला ।।
शुद्ध बुद्ध अधिकार, शिव सुखकारी नाथा।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित नावे माथा ।।२।।
आचारज गुणकार, पञ्चाचार को पाले।
शिक्षा दीक्षा प्रधान, भविजन के दुख टाले ।।
अनुग्रह निग्रह काल, मुक्ति मारग चलते।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो आचारज भजते ।।३।।
ज्ञान ध्यान लवलीन, जिनवाणी रस पीते।
अध्ययन शिक्षा प्रदान, संघ में जो नित करते ।।
रत्नत्रय गुणधाम, उपदेशामृत देते।
ऋद्धि-सिद्धि सब पाय, जो नित उपाध्याय भजते ।।४।।
३-महावीराष्टक स्तोत्र
(कविवर भगवद कृत)
वंद्ये चैतन्य मुकुट इव भावादिचिन्तितः
सर्वं भाति भव्य-व्यय-ध्रुव-लसन्तोऽन्तरहितः।
जगत्साक्षी मार्ग-प्रकटन-परो भानुदिव यो
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।१।।
अत्ताग्रं यच्छत्तुः कमल-मुकुलं भव्य-जन-रक्षितं
जनाकोपायं प्रकटयति वाद्यन्तरमपि।
स्फुटं मूर्तिर्यस्य प्रशमितमतीनां चातिविमला
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।२।।
नमनोन्केन्द्राली-मुकुट-मणि-भा-जाल-जटिलं
लसत्पादाम्भोज-द्वयमिह यदीयं तनुभृताम्।
भवज्वाला-शान्त्यै प्रभवति जलं वा स्मृतमपि
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।३।।
यदर्चा-भावेन प्रमुदित-मना दूर्द्धं इह
क्षणादात्मोत्थौ गुण-गण-समुद्रः सुख-निधिः।
लभन्ते सद्भूताः शिव-सुख-समाजुं किमु तदा
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।४।।
कनत्स्वर्णाभासोऽप्यगत-तनुर्ज्ञानि-निबहो
विचित्रार्थानां नृपति-वर-सिद्धाद्य-तनयः।
अजन्नापि श्रीमान् यिगत-भव-राग-द्युति-गतिः
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।५।।
यदीया वाग्गङ्गा विविध-नय-कल्लोल-विमला
बहुज्ञानाम्भोधिर्गिरति जनतां या स्वयमति।
इदानीमप्येष बुध-जन-मरलैः परिचिता
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।६।।
अनिवरिद्रिक-भुवन-जयी काम-सुभटः
कुमारावस्थायामपि निज-बलोधेन विजितः।
सुरानन्त्यानन्द-प्रशम-पद-राज्यस्य स जिनः
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।७।।
महामोहातः-प्रशमन-परासक्ति-भिरभूत्
निरपेक्षो बन्धुविदित-महिमा मल्लकरः।
शरण्यः साधूनां भव-भयभूतामृतगुणी
महावीर-स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ।।८।।
महावीराष्टकं भक्त्या ‘भारेणुना’ कृतम्।
यः पठेच्छृणुयाच्चापि स याति परमां गतिम् ।।९।।
४-पाक्षिक श्रावक
वीतराग भगवान को, समूह त्रियोग सगर।
श्रावक व्रत चर्चा लिखूँ, आलवाल हितकार ।।
प्रश्न १- श्रावक किसे कहते हैं और उसके कितने भेद हैं?
उत्तर- अष्टदर्शन, विवेकज्ञान एवं क्रियावान महापुरुषों को श्रावक कहते हैं।
श्रावक के १-पाक्षिक २-नैष्ठिक ३-साधक ये तीन भेद हैं।
१- पाक्षिक-हिंसादिक पाँच पापों का त्यागस्वरूप पापी जिसका
है तथा जो अभ्यास रूप से श्रावक धर्म का पालन करता है
उसको पाक्षिक श्रावक (या प्रारम्भ देशसंयमी) कहते हैं।
२- नैष्ठिक-जो निरतिचार रूप से श्रावक धर्म पालन करता
है उसको नैष्ठिक श्रावक कहते हैं।
३- साधक-जिसका देशसंयम पूर्ण हो चुका है और आत्मध्यान
में लीन होकर समाधिमरण करता है उसको साधक श्रावक
(निष्पन्न देशसंयमी) कहते हैं।
प्रश्न २- पाक्षिक श्रावक के योग्य क्रियाओं का वर्णन कीजिये?
उत्तर- पाक्षिक श्रावक को १-देवपूजा २-गुरुउपासना ३-प्रदान
ये तीन धार्मिक कार्य तथा कीर्ति बढ़ाने वाले सत्कर्म लोकानुसार
तथा आगमानुसार हमेशा करते रहना चाहिए।
अर्थात् पाक्षिक श्रावक को हमेशा अपनी शक्ति के अनुसार
नित्यमाहिक पूजाओं के द्वारा अष्टान्ह भगवन् की पूजा करनी
चाहिए। क्योंकि जिस गृहस्थाश्रम में जिनेन्द्रदेव की पूजा,
गुरुभक्ति एवं धार्मिकों से गाढ़प्रीति, पात्रदान, करुणाबुद्धि,
विपद्ग्रस्तो को सहायता, नित्य सम्यग्दर्शन की पूजा,
तत्त्वचर्चा नहीं हो वह गृहस्थाश्रम नहीं अपितु एक श्मशान
भूमि है, क्योंकि वहाँ सिर्फ पंचचून कार्यों से जीवों को मारा
जाता है, उस पाप की शुद्धि नहीं की जाती है।
प्रश्न ९ - पूजा के कितने भेद हैं?
उत्तर- पूजा के दो भेद हैं- १-द्रव्य पूजा २-भाव पूजा।
(अ) द्रव्य पूजा- शुद्ध लक्ष्य से जो भगवान का पूजन किया जाता है अर्थात् अष्ट द्रव्य रूप सामग्री लेकर जो पूजन किया जाता है, वह द्रव्य पूजा कहलाती है।
(ब) भाव पूजा- पूज्य महापुरुषों का स्तोत्र, वन्दना आदि के माध्यम से गुण चिन्तन करना भाव पूजा कहलाती है।
प्रश्न १० - द्रव्य पूजा के भेद बताइये?
उत्तर- द्रव्य पूजा के भेद ५ हैं- १-नित्यमह पूजा २-अष्टाह्निक पूजा ३-इन्द्रध्वज पूजा ४-महामह पूजा ५-कल्पद्रुम पूजा।
प्रश्न ११ - नित्यमह पूजा का स्वरूप लिखिये?
उत्तर- (१) अपने घर से जल, चन्दनादि सामग्री लेकर जिन मन्दिर जाना एवं अपनी सामग्री से श्रीराग प्रभु की पूजा करना नित्यमह पूजा है।
(२) अपनी शक्ति अनुसार प्रतिमा और जिनमन्दिर बनवाना। पूजन के लिये नित्य सामग्री मिलती रहे यह सोचकर खेत, दुकानादि देना (यह भी शास्त्रोक्त है) तथा जिन कार्यों से निरन्तर धर्म भावना होती रहे ऐसे रथ और पाण्डुक शिला, चैत्य आदि साधन जुटाना भी नित्यमह पूजा है।
(३) पूर्वाङ्ग, मध्याङ्ग, अपराङ्ग तीनों समयों में प्रभु की आराधना, भक्ति, स्तुति आदि करना। मुनियों को आहारादि दान देना ये सब नित्यमह पूजा के अंग हैं।
प्रश्न १२ - अष्टाह्निक पूजा किसे कहते हैं?
उत्तर- प्रतिवर्ष नन्दीश्वर द्वीप (आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन) में शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूनम तक पूज्य पुरुषों के द्वारा की जाने वाली पूजा अष्टाह्निक पूजा है।
प्रश्न १३ - इन्द्रध्वज पूजा का स्वरूप बताइये?
उत्तर- जो देवपूजा इन्द्रादिक देवों के द्वारा की जाती है उसे इन्द्रध्वज पूजा कहते हैं।
प्रश्न १४ - महामह पूजा का लक्षण बताइये?
उत्तर- जो जिन पूजा भक्तिपूर्वक मुकुटबद्ध, मण्डलेश्वर राजाओं के द्वारा की जाती है उसे महामह सर्वतोभद्र, चतुर्मुख पूजा कहते हैं।
सब जीवों को कल्याणकारी होने से इस पूजन का नाम सर्वतोभद्र है।
चतुर्मुख जिनबिम्ब विराजमान करके चारों दिशाओं में पूजा की जाती है इसलिये भी इसे महामह पूजा कहते हैं। (चतुर्मुख, महामह, सर्वतोभद्र तीनों नाम सार्थक हैं)
प्रश्न १५ - कल्पद्रुम पूजा किसे कहते हैं?
उत्तर- इच्छित दान के द्वारा जगत् के प्राणियों की आशाओं को पूर्ण करने, चक्रवर्तियों के द्वारा जो अरहन्त प्रभु की पूजा की जाती है उसे कल्पद्रुम पूजा कहते हैं।
अर्थात् चक्रवर्ती छः खण्ड विजय करके जब साम्राज्य पद को प्राप्त करते हैं तब इन्द्र इन्द्रामर (किमिच्छिक) दान देते हैं। उस दान से सबको सन्तुष्ट करके राजाओं के साथ अरहन्त प्रभु की पूजा करते हैं। इस पूजा को कल्पद्रुम पूजा कहते हैं।
प्रश्न १६ - नित्य-नैमित्तिक पूजा का स्वरूप लिखिये?
उत्तर- नित्य वीतराग प्रभु को जो पूजा की जाती है वह नित्य पूजा है एवं पवादि को निमित्त लेकर जो पूजा की जाती है वह नैमित्तिक पूजा है। दोनों पूजाएँ उपर्युक्त पूजाओं में गर्भित हो जाती हैं।
प्रश्न १७ - द्रव्य पूजा का अधिकारी कौन है एवं भाव पूजा का अधिकारी कौन है?
उत्तर- द्रव्य पूजा के लिए गृहस्थ और भावपूजा के लिये मुनिव्रत ही अधिकारी हैं। गृहस्थ जन भावशुद्धि के लिये, द्रव्य का त्याग करके लोभ कषाय को कम करते हुए द्रव्य पूजा करते हैं।
प्रश्न १८ - पूजा के कितने भेद हैं?
उत्तर- पूजा के ७ अंग हैं- १-अभिषेक २-आह्वान ३-स्थापन ४-सन्निधिकरण ५-पूजा ६-शान्तिपाठ ७-विसर्जन।
प्रश्न १९ - अभिषेक और आह्वान का स्वरूप बताइये?
उत्तर- अभिषेक- आसुक जल आदि उत्तमोत्तम द्रव्यों से प्रतिदिन जिनाभिषेक करना चाहिये।
आह्वान- जिस प्रकार अपने घर पर किसी महापुरुष के आने पर हम आइये-आइये-आइये शब्दोच्चारण करते हैं उसी प्रकार तीन लोक के नाथ वीतराग प्रभु को अपने हृदय रूप मन्दिर में बुलाना हुआ आह्वान मुख से “ॐ ह्रीं श्रीं देवशास्त्रगुरु-समूह अत्र अवतर अवतर आह्वान आह्वान” शब्दोच्चारण करता हुआ दोनों में पूज्यों का क्षेपण करता है। यह आह्वान विधि है।
प्रश्न २० - सन्निधिकरण का स्वरूप स्पष्ट कीजिये?
उत्तर- जिस प्रकार किसी महापुरुष के घर आने पर हम आइये, बैठिये हमारे समीप बैठिये कहकर उसे अपने समीप में बैठाते हैं उसी प्रकार भगवान् आनन्दविभोर होकर प्रभु को अपने हृदय में स्थापित करते हुए कहता है, हे प्रभो! आप सदा के लिये मेरे निकट हो जाइये, इस प्रकार सन्निधिकरण के द्वारा भक्त भगवान् को अपने हृदय में बसाता हुआ ॐ ह्रीं श्रीं देवशास्त्रगुरु समूह अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरण कहकर दोनों में पुष्पों को क्षेपण करता है। यह सन्निधिकरण विधि है।
प्रश्न २१ - पूजा?
उत्तर-
देव प्रथम देव अहंत सिद्धात जु,
गुरु निग्रन्थ महंत मुक्तिपुर पंथ जु।
तीन रत्न जगमीति सु ये पाँच ध्याइये,
तिनकी भक्ति प्रसाद परम पद पाइये॥
दोहा- पूजो अरहंत के गुरु पूजो सार।
पूजो माता सरस्वती, नितप्रति अष्ट प्रकार॥
ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरु समूह। अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वान। ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरु समूह। अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं। ॐ ह्रीं देव-शास्त्र-गुरु समूह। अत्र मम सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरण।
प्रश्न २२ - जल चढ़ाने का छन्द बताते हुए, जल क्यों चढ़ाया जाता है, कारण बताओ?
उत्तर-
गीता छन्द
सुरपति उरग नरालय तिनवरिन्द वन्दनीय सुपद्मा,
अतिशोभनिक सुवरण उज्ज्वल देह छबि मोहित सन्मा।
वर नीर-क्षीर समुद्र घट भरि अमय बहु बहुविधि नर्च्च,
अरहंत श्रुत-सिद्धान्त गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रच्च॥१॥
प्रश्न २३ - अभिषेक और आह्वान का स्वरूप बताइये?
उत्तर- अभिषेक- आसुक जल आदि उत्तमोत्तम द्रव्यों से प्रतिदिन जिनाभिषेक करना चाहिये।
आह्वान- जिस प्रकार अपने घर पर किसी महापुरुष के आने पर हम आइये-आइये-आइये शब्दोच्चारण करते हैं उसी प्रकार तीन लोक के नाथ वीतराग प्रभु को अपने हृदय रूप मन्दिर में बुलाना हुआ आह्वान मुख से “ॐ ह्रीं श्रीं देवशास्त्रगुरु-समूह अत्र अवतर अवतर आह्वान आह्वान” शब्दोच्चारण करता हुआ दोनों में पूज्यों का क्षेपण करता है। यह आह्वान विधि है।
प्रश्न २४ - स्थापन का स्वरूप बताइये?
उत्तर- जिस प्रकार घर पर किसी महापुरुष के आने पर आइये के बाद बैठिये, बैठिये कहते हैं, उसी प्रकार जिस भव्य ने प्रभु को अपने मन मंदिर में बुलाया है वह प्रभु से प्रार्थना करता है, हे प्रभो! मेरे मन मंदिर में विराजिये बैठिये, बैठिये, बैठिये और दोनों में वह पूज्यों को दोनों हाथों से क्षेपण करता है। ॐ ह्रीं श्रीं देवशास्त्रगुरु समूह अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनं प्रथम इस प्रकार प्रभु को अपने मन में स्थापित विराजमान करता है। यह स्थापन विधि है।
प्रश्न २५ - जल चढ़ाने का छन्द बताते हुए, जल क्यों चढ़ाया जाता है, कारण बताओ?
उत्तर-
गीता छन्द
सुरपति उरग नरालय तिनवरिन्द वन्दनीय सुपद्मा,
अतिशोभनिक सुवरण उज्ज्वल देह छबि मोहित सन्मा।
वर नीर-क्षीर समुद्र घट भरि अमय बहु बहुविधि नर्च्च,
अरहंत श्रुत-सिद्धान्त गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रच्च॥१॥
प्रश्न २६ - चन्दन चढ़ाने का छन्द बताते हुए, चन्दन क्यों चढ़ाया जाता है, कारण बताओ?
उत्तर-
गीता छन्द
जि त्रिग-उदर मंझार प्राणी तपत अति दुखरे भरें।
तिन अभिज्ञान सुवचन जिनके परम शीतलता भरें॥
तसु प्रवर लोहित प्रागपावन सरस चंदन सिन्धु सर।
अरहंत श्रुत सिद्धान्त गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रच्च॥२॥
दोहा- चन्दन शीतलता करे तपत सत्तू पलीन।
जासो पूजो परमपद देवशास्त्र गुरु तीन॥२॥
ॐ ह्रीं देवशास्त्रगुरुभ्यो संसारातापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
उद्देश्य- जिस प्रकार धूप से सिके पैरों को चन्दन का लेप शांति प्रदान करता है, उसी प्रकार जिनेन्द्रदेव के रागद्वेषरूपी शीतल सुगन्धित चन्दन का लेप संसार के दुखों से संतप्त जीवों को भव समुद्र पार कराता है इसलिये संसार के आताप को दूर करने के लिये चन्दन चढ़ाया जाता है।
प्रश्न २७ - अक्षत चढ़ाने का छन्द बताते हुए, अक्षत का कारण बताइये?
उत्तर-
गीता छन्द
यह भवसमुद्र अपार तारन के निमित्त सुविधि उर।
अहंत श्रुत सिद्धान्त गुरु निरग्रन्थ भव तर नौका सो॥
उज्ज्वल अखण्डित शान्ति तुल्य पूज्य धरि त्रयपणं जूं।
अरहंत श्रुत सिद्धांति गुरु-निरग्रन्थ नित पूजा रचूं ॥३॥
दोहा- तंदुल सालि सुगन्धि अति परम अखण्डित बीन।
जासो पूजौं परमपद देव शास्त्र गुरु तीन ॥३॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतम् निर्वपामीति स्वाहा।
उद्देश्य- १०- अक्षय अविनाशी पद को प्राप्ति के लिये अक्षत चढ़ाया
जाता है।
१- अक्षत अविनाशी पद नहीं देता है परन्तु जिनेन्द्रदेव के
गुणरूपी अक्षत की प्राप्ति के लिए जिन चरणों में अक्षत
चढ़ाया जाता है। जितना उत्तम द्रव्य होगा उतना फल
भी उत्तम होगा।
प्रश्न २१- अक्षत में चावल ही क्यों चढ़ाये जाते हैं अन्य धान्य क्यों
नहीं?
उत्तर- चावल एक अक्षत धान्य है। गेहूँ को चाने वाले गेहूँ को,
ज्वार का इच्छुक ज्वारि को बोता है किन्तु चावल का
इच्छुक व्यक्ति चावल को नहीं बोता है शालो को बोता
है। चावल को अक्षय पद मिल गया है इसलिये अक्षय पद
की प्राप्ति के लिये अक्षय पद प्राप्त धान्य चावल चढ़ाया
जाता है।
प्रश्न २२- पुष्प को चढ़ाने का छंद बताते हुए, पुष्पों के चढ़ाने का
कारण बताइये?
उत्तर- गीता छन्द
जे विनयवंत सुमध्यस्थ-अंबुज प्रकाशन भान।
जे एकमुख चारित्र भासत विरजमिति प्रधान है।
लहिं वृन्दकमलादिक प्रभु-भव-भ्रव कुंदलसो बरूं।
अरहंत श्रुत सिद्धांति गुरु-निरग्रंथ नित पूजा रचूं ॥४॥
दोहा- विविध भाँति परिमल सुमन प्रवर जास आसीन।
जासो पूजौं परमपद देवशास्त्र गुरु तीन ॥४॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा।
स्याद्वाद बाल शिक्षा १५ भाग ४
उद्देश्य- जीव को समस्त शक्ति को नाश करने वाला, महान् शत्रु
“कामदेव” है जिसे वीतराग प्रभु के अलावा कोई जीत नहीं
पाया। ऐसे काम को नाश करे जिन गुणरूपी पुष्पों की
माला की प्राप्ति के लिये जिनेन्द्रदेव के चरणों में पुष्प को
चढ़ाते हैं।
प्रश्न २३- नैवेद्य का छन्द बताते हुए उसके चढ़ाने का कारण
बताइये?
उत्तर- गीता छन्द
अति सकल नाददोष जाको सुधा-सुरा समान है।
दुरन्त भयरोग तासु नाशन को सुप्रसिद्ध समान है ॥
उत्तम छहों सयुक्त नित, नैवेद्य करि पूज मैं धरूं।
अरहंत श्रुत सिद्धांति गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रचूं ॥५॥
दोहा- नानाविधि संयुक्त रस व्यंजन सारस नवीन।
जासो पूजौं परमपद देवशास्त्र गुरु तीन ॥५॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
उद्देश्य- पच्चीसवां क्षुधारोग की शान्ति के लिये नैवेद्य चढ़ाया है।
वह सोचता है कि यद्यपि यह नैवेद्य अतिसुगंधारी है, भूख
को शान्त नहीं कर सकता है किन्तु हे प्रभो! आपके गुणरूपी
व्यंजनों का मनरूपी अनुभव आहार मुझे अविनाशी सुख
को देने वाला है। जिन गुणरूपी सुन्दर मधुर व्यंजनों की
प्राप्ति के लिये नैवेद्य चढ़ाया जाता है।
प्रश्न २५- दीप का छन्द बताते हुए दीप चढ़ाने का कारण बताइये ?
उत्तर- गीता छन्द
जे त्रिगुण उद्यम नाश कीने मोह तिमिर महाबली।
सिहिं कर्मघाती ज्ञानदीप प्रकाश ज्योति प्रभाबली ॥
इह भाँति दीप प्रवाल कंचन के सुभामन मैं धरूं।
अरहंत श्रुत सिद्धांति गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रचूं ॥६॥
दोहा- स्वपर प्रकाशक ज्योति अति दीपक समकरि हीन।
जासो पूजौं परमपद देवशास्त्र गुरु तीन ॥६॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
स्याद्वाद बाल शिक्षा १६ भाग ४
उद्देश्य- मिथ्याज्ञान/मोहांधकार को क्षय करने के लिए दीप
चढ़ाया जाता है। वह सोचता है हे प्रभो! यह जड़ दीपक बाह्यमुख
है संसार के मोह से अंधकार को ही नष्ट करने में समर्थ है
परन्तु आपका अखण्ड केवलज्ञानरूपी दीपक मेरे समस्त
अज्ञानमोह/मोहांधकार को क्षय करने में समर्थ है। अतः
मोहांधकार का नाश कर केवलज्ञान ज्योति को अन्तर में
प्रकट करने के लिए दीप चढ़ाया जाता है।
प्रश्न २६- धूप चढ़ाने का छंद एवं धूप चढ़ाने का अर्थ बताइये ?
उत्तर- गीता छन्द
जो कर्म ईधन दहन अग्नि समुद्र सम उद्धत लसै।
वर धूप तासु सुगन्धिताकरि सकल परिमल हसै ॥
इह भाँति धूप चढ़ाव नित भव ज्वलननिधि नहीं परूं।
अरहंत श्रुत सिद्धांति गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रचूं ॥७॥
दोहा- अग्नि महि परिमल दहन चन्दनादि गुण लीन।
जासों पूजौं परमपद देवशास्त्र गुरु तीन ॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्व० स्वाहा।
उद्देश्य- अष्टकर्मरूपी शत्रुओं को क्षय करने के लिये अग्नि में धूप
चढ़ाया जाता है। भक्त सोचता है यद्यपि यह धूप मेरे अष्टकर्मों
को नाश नहीं कर सकती है, परन्तु आपकी गुणरूपी धूप
ही मेरे कर्म ईधन को जलाने में समर्थ है। इसलिये जिनगुणरूपी
धूप से अष्टकर्मों को जलाने (क्षय करने) के लिए धूप चढ़ायी
जाती है।
प्रश्न २७- फल चढ़ाने का छन्द एवं फल चढ़ाने का अर्थ बताइये ?
उत्तर- गीता छन्द
लोचन सुप्रसन्न भान उप उत्साह के करतार है।
मोपै न उपमा जाय वरणी सकल फल गुण सार है ॥
सो फल चढ़ावन अर्पण पूर अस अमृत रस सरूं।
अरहंत श्रुत सिद्धांति गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रचूं ॥८॥
स्याद्वाद बाल शिक्षा १७ भाग ४
दोहा- जे प्रधान फल नित पंच किरण रस लीन।
जासों पूजौं परम-पद देव शास्त्र गुरु तीन ॥८॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्व० स्वाहा।
उद्देश्य- संसार के दुखों से भयभीत मानव आत्मलता सहित सुख को
चाहता है। यह सुख मोक्ष में है। इसलिये भक्त मोक्षफल
की प्राप्ति के लिये फल चढ़ाता है। भक्त सोचता है, यद्यपि
फल तो अभी जड़ आचार्य मुझे शाश्वत सुख दे नहीं सकते
किन्तु जिनेन्द्रदेव के गुणरूपी फलों की प्राप्ति मुझे करना
है अतः मोक्ष फल की प्राप्ति के लिये फल चढ़ाते हैं।
प्रश्न २८- अर्घ्य का छन्द बताते हुए बताइये कि अर्घ्य क्यों चढ़ाया
जाता है?
उत्तर- गीता छन्द
जलतरल उज्ज्वल गंध अक्षत पुष्प वर दीपक धरूं।
वर धूप निरमल फल विविध बहु जन्म के पातक हरूं ॥
इह भाँति अर्घ चढ़ाव नित भवि भक्त शिव पंथहिं मरूं।
अरहंत श्रुत सिद्धांति गुरु निरग्रन्थ नित पूजा रचूं ॥९॥
दोहा- नवोविधि अर्घ संजोयके अति उदार मन लीन।
जासों पूजौं परम-पद देव शास्त्र गुरु तीन ॥९॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घं निर्व० स्वाहा।
उद्देश्य- संसारी जीव जन्म-जरा-मृत्यु से, संसार के आतप से, परस्पर
जीवन से, काम एवं क्षुधा की वेदना से, अज्ञान एवं कर्मों
से पीड़ित हुआ शाश्वत अखंड सुख की प्राप्ति के लिये
अर्घ्य चढ़ाता है।
प्रश्न २९- जयमाला किसे कहते हैं ?
उत्तर- पूज्य पंचपरमेष्ठी एवं नवदेवताओं की अष्टद्रव्य से पूजा के
बाद विशेष भक्ति व श्रद्धापूर्वक जो गुणों का स्मरण करना,
गुणानुवाद करना जयमाला है।
अथवा
पूज्य पुरुषों के गुणों की आरती को जयमाला कहते हैं।
प्रश्न ३०- देव, शास्त्र एवं गुरु का स्वरूप नवमालाके माध्यम से
बताइये ?
स्याद्वाद बाल शिक्षा १८ भाग ४
उत्तर- दोहा- देवशास्त्र गुरु रत्न शुभ तीन रतन करतार।
श्रद्धा-ज्ञान-भिन्न कहूँ आरती अल्प सुगुणविकार ॥
अरहंत का स्वरूप-
कंचन की कंचन प्रकृति नाशि, जीते अष्टदश दोषराशि।
जे परम सुगुण हैं अनंतवीर्य, कहत के छ्यालीस गुणगंभीर ॥
शुभ समवसरण शोभा अपार, शत इन्द्र नमनकर शीश धार।
देवाधिदेव अरहंतदेव, बंदो मन, वचन तन करि सुदेव ॥१॥
जिनवाणी का स्वरूप-
जिनकी धुनि है ओंकाररूप निर अक्षयमय महिमा अनूप ॥
दश अष्ट महाभाषा समेत लघुभाषा सात शतक सुचेत ॥
सो स्याद्वादमय सप्तभंग गुणधर गूढ़ बारह सुअंग।
रवि शशि न हरे सो तम हराय, सो शास्त्र नमो बहुश्रुति लखाय ॥२॥
गुरु का स्वरूप-
गुरु आचरण उज्ज्वलाय साधु, तन मन धनमय निधि अगाध।
संसार-देह वैरागभाव, निरलांछी तपै शिवपद निभाव ॥
गुण छत्तीस पच्चीस आठ बीस भव दारुण-तरण जिनराज ईश।
गुरु की महिमा वरणी न जाय, गुरु नाम जपो मन वचन काय ॥३॥
सोरठा- कीजै शक्ति प्रमाण शक्ति बिना सरधा धरै।
ध्यात सरवाधान सहज-अमर पद भोगवै ॥
ॐ ह्रीं देवाशास्त्रगुरुभ्यो जयमाला पूर्णा निर्व० स्वाहा।
प्रश्न ३१- जयमाला में किसका वर्णन है ?
उत्तर- जयमाला में अरहंत (देव), जिनवाणी और गुरु का वर्णन है।
प्रश्न ३२- अर्हन्त (देव) कैसे हैं ?
उत्तर- जिन्होंने कर्मों की ८३ प्रकृतियों का नाश कर लिया है जो
१८ दोषों से रहित हैं। जो अनंत चतुष्टय गुणों से युक्त एवं
छियालीस गुणों से सुशोभित हैं। जिनके समवसरण की
शोभा अपूर्व है तथा जो इन्द्रों के द्वारा वंदनीय है ऐसे
अरहंत देव हैं। जो कि देवाधिदेव हैं। उनको मन, वचन,
काय से नमस्कार है।
स्याद्वाद बाल शिक्षा १९ भाग ४
प्रश्न ३३- जिनवाणी का स्वरूप जयमाला से बताइये ?
उत्तर- जिनेन्द्रदेव के मुख से निकली हुई ओंकाररूप वाणी,
निरक्षर एवं अनुपम महिमा से युक्त है। जो १८ महा
भाषाओं एवं ७०० लघु भाषाओं से युक्त है। गणधर के
द्वारा गुंथी गई यह जिनवाणी स्याद्वादमयी एवं सप्तभंग
से सुशोभित है। सूर्य और चन्द्रमा भी जिस अंधकार को
दूर नहीं कर सकते ऐसे अज्ञानंधकार को हरण करने
वाली माता जिनवाणी है।
प्रश्न ३४- गुरु का स्वरूप जयमाला से बताइये ?
उत्तर- आचार्य, उपाध्याय, साधु जो बाह्य में नग्न है एवं
रत्नत्रयनिधि के समुद्र हैं। संसार और शरीर में वैराग्य
को धारण करने वाले, बीजा रहित होकर तपों को तपते
हुए मोक्ष की ओर लक्ष्य बनानेवाले गुरु होते हैं। उनमें
आचार्य ३६ मूलगुण के धारक एवं उपाध्याय २५ और
साधु २८ मूलगुण के धारी होते हैं। वे गुरु सब समुद्र
से तिरने वाले जहाज के समान हैं। ऐसे दिगम्बर
निर्ग्रन्थ गुरुओं की महिमा का वर्णन नहीं किया जा
सकता है। मन, वचन, काय से दिगम्बर गुरुओं को
नमस्कार कर उनका ध्यान करना चाहिये।
प्रश्न ३५- शान्ति पाठ बताते हुए बताइये इसे बोलते समय क्या
करना चाहिये ?
( शान्ति पाठ बोलते समय दोनों हाथों से पुष्प क्षेपण
करना चाहिए।)
शान्तिपाठ
उत्तर-
शान्तिनाथं मुखं शशि शशिरौ शीलगुणव्रतसंभरी।
लक्ष्मं एकं सो आठं विरजि निरंजनं वन्दते काम ललं ॥
पंचमं चक्रवर्ती पदधारी सोहम तीर्थंकर सुहकारी।
इन्द्र नरेन्द्र पूज्य जिननायक नमो शान्तिनाथं शिवधायकं।
विघ्न विध्वंसको वरधु वंद्या दुष्टग्रहं आसुरी वाणी हरणं।
छत्र चामर झामरहल भारी ये तुव प्रातिहार्य मनोहारी ॥
स्याद्वाद बाल शिक्षा २० भाग ४
वसंततिलका
शान्ति जिनेश शान्ति सुखदाई जगत्पूज्य पूज्यौ शिरसाई ।
परमशान्ति दीजै हम सबको पढ़ैं जिनैं पुनि बार सब कौं ॥
पूर्व जिन्हैं मुकुट हार किरीट लाके,
इन्द्रादि देह अरु पूज्य पदाम्बुज जाके ।
सो शान्तिनाथ वरवंश जादवदीप,
मेरे लिए करौहै शान्ति सदा अनूप ॥
इन्द्रवज्रा
संजुगकों को प्रतिपालकों को व्रतनों को यतिनायकों को ।
राजा प्रजा राज सुरेशकों को कीजै सुखी है जिन शान्तिको दे ॥
स्रग्धरा छन्द
होवै सारी प्रजा को सुख बलयुत हो धर्मधारी नरेश ।
होवै वर्षा समै पै तिलभर न रहै व्याधियों का अंदेश ॥
होवै चोरी न जारी सुसमय बरसैं हो न दुष्काल भारी ।
सारैं हे देश धारैं जिनवर सुखको जो सदा सौख्यकारी ॥
दोहा- धार्मिकर्म जिन नाशरकरि, पायो केवलराज ।
शान्ति करो सब जगत में, बुधधार्मिक जिनराज ॥
( इसके बाद तीन बार जयघोष छोड़नी चाहिये )
( दोनों हाथों को जोड़कर प्रार्थना करें— )
शास्त्रों का हो पठन सुखदा लाभ सत्संगती का,
सद्गुणों का सुजस करके दोष सबी कमी का ।
बाँटैं प्यारे चरन चित्त के, आपका रूप धारूँ,
तीनों खेड़ैं चरन जिनके मोक्ष जोलौं न पारूँ ॥
आर्या छन्द
तब पद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में ।
तबलों लीन रहौ प्रभु, जबलौं पाऊँ न मुक्तिपद मैंनें ॥
अष्ट पद मात्रा से दूषित जो कुछ कहा गया मुझ से ।
क्षमा करो प्रभु सो सब, करुणा करि पुनि छुड़ाओ मन दुख से ॥
प्रश्न ३४- स्थापना के पुष्पों का क्या करना चाहिये ?
उत्तर- स्थापना के पुष्पों को मस्तक पर लगाकर, चढ़ी हुई
सामग्री में मिला देना चाहिये । उन्हें जलाना या कुएँ में
विसर्जन आदि नहीं करना चाहिये । जिनसे यह मान्यता
है कि होने में भगवान आये हैं तथा उन अष्टों वापिस
भेजकर पुष्पों को अग्नि में क्षेपण करना युक्त मानते हैं
यह अनुचित परम्परा है । भगवान तो कभी आते ही
नहीं, भक्त तो उन्हें अपने हृदय में आह्वान करता हुआ
पुष्पों का क्षेपण आनन्दकरण करता है अतः पुष्प मात्र
शिरोधार्य कर अन्य सामग्री में मिला देना चाहिये ।
प्रश्न ३५- विसर्जन पाठ बोलिये ?
उत्तर- बिन जाने वा जानके, रही टूट जो कोय ।
तुम प्रसादी परम गुरु, सो सब पूरन होय ॥१॥
पूजन विधि जानूँ नहीं, नहीं जानूँ आह्वान ।
और विसर्जन हूँ नहीं, क्षमा करहु भगवान ॥२॥
मनहीन धनहीन हूँ, क्रियाहीन जिनदेव ।
क्षमा करहु रखहु मुझे, देहु चरण की सेव ॥३॥
आये जो जो देवगण, पूजी भक्ति प्रमाण ।
ते सब जावहु कृपाकर, अपनी-अपनी थान ॥४॥
प्रश्न ३६- इस प्रकार पूजा के पश्चात् क्या करना चाहिए ?
उत्तर- पूजा के पश्चात् पूजक का मन जिनचरणी से इतना
निर्मल हो जाता है कि वह ध्यान करता है कि हे प्रभो !
जिस प्रकार पारसमणि का स्पर्श करके लोहा भी सोना
बन जाता है, दीपक की सेवा करके निर्धन धनवान बन
जाता है फिर हे प्रभो ! मैं भी आपकी भक्ति के प्रसाद से
आपके समान बन जाता हूँ तो कोई आश्चर्य नहीं है ।
इसलिए मैं अब आपका दास नहीं हूँ ।
प्रश्न ३७- जिन पूजा का फल बताइये, उदाहरण देकर समझाइये ?
उत्तर- जिन पूजा से पूजक स्वयं पूज्य बनता है । जिनेन्द्र भक्त
भगवान् पूजा के फल से इन्द्र के ऐश्वर्य को प्राप्त
करता है एवं मुकुटबद्ध राजाओं के द्वारा पूज्य चक्रवर्ती
के पद को प्राप्त कर त्रैलोक्य पूज्य तीर्थङ्कर पद को प्राप्त
करके पूज्य तीर्थङ्कर पद को प्राप्त करता है ।
मेंढक की कथा—
रत्नापुर नगरी में एक सेठ
रहता था । उसकी भवदत्ता नाम की सेठानी थी । आर्तध्यान
से मर कर सेठ अपनी अग्नि की बावड़ी में मेंढक हो
गया । एक दिन भवदत्ता पानी लाने के लिए बावड़ी पर
गई । उसकी देखकर मेंढक को जाति स्मरण हो गया ।
उसी समय पूर्ण संस्कारवश वह भवदत्ता के शरीर पर
चढ़ गया । बार-बार दूर करने पर भी वह हटता नहीं
था । एक दिन वह अवधिज्ञानी मुनिराज से यह जानकर
कि यह तुम्हारे पति का जीव है, जो आर्तध्यान से मेंढक
हुआ है । भवदत्ता ने उसे अपने घर में रख लिया । एक
दिन वनपाल ने राजा श्रेणिक से कहा आपके नगर में
वर्द्धमान प्रभु का समवसरण आया है, सभी हर्ष से प्रभु
के दर्शन को जा रहे थे । श्रेणिक भी अपने हाथी पर
सवार हो प्रभु दर्शन को चल दिये । यह देखकर मेंढक
भी प्रभु-भक्ति पूजा की भावना से मुख में कमल पैड़ड़ी
लेकर भगवान की पूजा के लिये जा रहा था । जनसमूह
की भीड़ बहुत थी । यह मेंढक राजा श्रेणिक के हाथी के
पाँव तले दबकर मर गया । प्रभु-पूजा की भावना से
मरकर देव हुआ और श्रेणिक से पहले प्रभु महावीर के
समवसरण में जाकर भक्ति-गान करने लगा ।
जब एक मेंढक भी पूजा की भावना के फल से
देव पर्याय को प्राप्त हो गया तो क्या जो भव्यत्मा नित्य
भगवान की अष्टद्रव्य से श्रद्धा-भक्ति पूर्वक पूजा करते हैं
वे मोक्षलक्ष्मी को नहीं पा सकेंगे ? अवश्य पायेंगे ।
प्रश्न ४०- मेंढक ने एक द्रव्य से पूजा की हम (मनुष्य) भी एक
द्रव्य से पूजा कर सकते हैं क्या ?
उत्तर- मेंढक तिर्यञ्च था उसके लिए अष्टद्रव्य से पूजा करना
संभव नहीं था अतः एक द्रव्य से पूजा करना भी योग्य
था किन्तु मनुष्यों को अष्ट द्रव्यों से ही पूजा करनी
चाहिये । हाँ, परिस्थितिवश वह एक दो आदि द्रव्यों से
भी शक्ति अनुसार कर सकता है । परन्तु समर्थ होने पर
श्रावक को शुद्ध अष्टद्रव्यों से ही पूजा करना चाहिये ।
अन्यथा पशु और मनुष्य में कोई अन्तर नहीं रहेगा ।
५- नैतिक श्रावक
प्रश्न ४१- नैतिक श्रावक किसे कहते हैं ?
उत्तर- देवशास्त्र का घात करने वाली कषायों के क्षयोपशम की
तारतम्यता के अंश से दार्शनिक आदि ११ श्रावक सम्बन्धी
संयम स्थानों के वर्गीभूत तथा उनसे लिया वाला धार्मिक
श्रावक कहलाता है । श्रावक के ११ संयम स्थानों को
११ प्रतिमा भी कहते हैं ।
प्रश्न ४२- प्रतिमा किसे कहते हैं ?
उत्तर- संयम अंश ज्यों ज्यों भोग अरुचि परिणाम ।
उदय प्रतिज्ञा को भयो, प्रतिमा ताको नाम ॥
भोगों के प्रति जब अरुचि जागृत होती है तब संयम अंश
जागृत होता है तथा प्रतिज्ञा लेने की भावना उत्पन्न होती
है । प्रतिमा लेना ही प्रतिमा है ।
प्रश्न ४३- ग्यारह प्रतिमाओं के नाम बताइये ?
उत्तर- १-दार्शनिक प्रतिमा २-व्रतिक प्रतिमा ३-सामयिक प्रतिमा
४-प्रोषध प्रतिमा ५-सचित्तत्याग प्रतिमा ६-रात्रिभुक्तित्याग
प्रतिमा ७-ब्रह्मचर्य प्रतिमा ८-आरम्भत्याग प्रतिमा
९-परिग्रहत्याग प्रतिमा १०-अनुमतित्याग प्रतिमा
११-उद्दिष्टत्याग प्रतिमा ।
प्रश्न ४४- दार्शनिक प्रतिमा का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- २४ दोष रहित सम्यग्दर्शन का धारक, संसार शरीर और
भोगों से विरक्त, षट्कायप्रेमी का ध्यान करने वाला और
अष्टमूलगुणों का धारक जीव दर्शन प्रतिमा का धारी
होता है ।
प्रश्न ४५- व्रत प्रतिमाधारी का स्वरूप लिखिये ?
उत्तर- जो माया, मिथ्या, निदान इन तीन शल्यों से रहित होता
हुआ अतीचार रहित ५ अणुव्रत, ३ गुणव्रत और
४ शिक्षाव्रतों का पालन करता है उसको व्रत प्रतिमाधारी
कहते हैं ।
प्रश्न ४६- माया, मिथ्या, निदान तीन शल्यों का स्वरूप लिखिये
तथा इन्हें शल्य क्यों कहते हैं बताइये ?
उत्तर- माया- दूसरों को ठगना ।
मिथ्यात्व- अनन्त श्रद्धान अर्थात् विपरीतार्थाभिनिवेश ।
निदान- संसार के भोगों की इच्छा ।
जो शरीर में प्रवेश किये हुए काँटे आदि शल्य के समान
निरन्तर शरीर व मन के सन्ताप में कारण हो उसको
शल्य कहते हैं । माया, मिथ्या, निदान जिस आत्मा में
प्रवेश कर जाते हैं उसके अन्दर काँटे की तरह सन्ताप
उत्पन्न करते हैं, इसीलिए इन्हें शल्य कहा है ।
प्रश्न ४७- अणुव्रत का स्वरूप एवं भेद बताइये ?
उत्तर- स्थूल हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील एवं परिग्रह इन पाँच
पापों का एकदेश त्याग अणुव्रत कहलाता है । वे इस
प्रकार हैं—१-अहिंसाणुव्रत २-सत्याणुव्रत ३-अचौर्याणुव्रत
४-ब्रह्मचर्याणुव्रत ५-परिग्रहपरिमाणाणुव्रत ।
प्रश्न ४८- अहिंसाणुव्रत का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदन से
संकल्पपूर्वक त्रस जीवों का घात नहीं करना अहिंसाणुव्रत
है । जैसे—
१- हिंसा कहूँ ऐसा विचार मन में स्वयं नहीं करना ।
२- मारो-मारो ऐसा वचन दूसरों से नहीं कहना ।
३- इसने हिंसा की यह अच्छा किया ऐसा मनमें विचार नहीं
करना ।
४- मारता हूँ ऐसा वचन स्वयं नहीं कहना ।
५- मारो-मारो ऐसा वचन मुख से नहीं कहना ।
६- इसने हिंसा की, यह अच्छा किया ऐसा वचन मुख से
नहीं कहना ।
७- अपने शरीर से स्वयं हिंसा करना ।
८- मुक्कों आदि से शरीर के द्वारा हिंसा नहीं करना ।
९- हिंसा करते हुए को नेह आदि के इशारे से, चुटकियों आदि
से प्रेरणा नहीं करना ।
प्रश्न ४९- सत्याणुव्रत का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- जिसमें स्थूल झूठ को न तो आप बोलता है, न दूसरों से बुलवाता है और न ही दूसरों को आपत्ति के लिये सच भी स्वयं बोलता है, न दूसरों से बुलवाता है उसे सत्याणुव्रत कहते हैं। अर्थात् जिस वचन के बोलने पर राजा आदि से द्वेष मिलता है। स्वयं या दूसरे किसी का वध होता है ऐसा स्थूल झूठ स्वयं न बोलना, न दूसरों से बुलवाना सत्याणुव्रत है।
प्रश्न ५०- अचोर्याणुव्रत का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- जो व्रती बालक किसी की रखी हुई, गिरी हुई, भूली हुई वस्तु को बिना दी हुई नहीं लेता है और नहीं देता है उसको वह क्रिया अचोर्याणुव्रत है।
प्रश्न ५१- ब्रह्मचर्याणुव्रत का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- जो पाप के डर से पर स्त्री को न तो स्वयं भोगता है और न दूसरों को भुगताता है। उसकी यह क्रिया परस्त्रीत्याग अथवा स्वदारसन्तोष नामक अणुव्रत है।
प्रश्न ५२- परिग्रहपरिमाणाणुव्रत का लक्षण बताइये ?
उत्तर- क्षेत्र, वास्तु, हिरण्य, सुवर्ण, धन, धान्य, दासी, दास, कुप्य, भांड इन दसों परिग्रहों को परिमित रखकर उससे अधिक में इच्छा नहीं रखना इच्छापरिमित नामक परिग्रहपरिमाणाणुव्रत है।
प्रश्न ५३- पाँच अणुव्रतों में प्रसिद्ध मनुष्यों के नाम बताइये ?
उत्तर- १-अहिंसाणुव्रत में—समपाल चाण्डाल २-सत्याणुव्रत में—धनदेव सेठ ३-अचोर्याणुव्रत में—श्रेणिक पुत्र वाणिज्य ४-ब्रह्मचर्याणुव्रत में—एक वैश्य की पुत्री नीली और ५-परिग्रहपरिमाणाणुव्रत में—राजपुत्र जयकुमार विशेष प्रसिद्ध हुए।
प्रश्न ५४- गुणव्रत का स्वरूप एवं भेद बताइये ?
उत्तर- जो अणुव्रतरूपी में गुण वृद्धि या दृढ़ता करते हैं उनको गुणव्रत कहते हैं। ये गुणव्रत तीन है—१-दिग्व्रत २-अनर्थदण्डव्रत ३-भोगोपभोगपरिमाण व्रत।
प्रश्न ५५- दिग्व्रत का लक्षण बताइये ?
उत्तर- सूक्ष्म पापों से भी मुक्त होने के लिये दसों दिशाओं को सीमित करके इससे बाहर जीवनपर्यंत नहीं जाऊँगा। इस प्रकार संकल्प या प्रतिज्ञाकरना दिग्व्रत है।
प्रश्न ५६- अनर्थदण्डव्रत का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- दसों दिशाओं को मर्यादा के भीतर प्रयोजन रहित पापबंध के कारण, मन, वचन, काय की प्रवृत्तियों से विरक्त होने को अनर्थदण्डव्रत कहते हैं।
प्रश्न ५७- अनर्थदण्ड के भेद बताइये ?
उत्तर- अनर्थदण्ड के ५ भेद हैं—१-पापोपदेश २-हिंसादान ३-अपध्यान ४-दुःश्रुति ५-प्रमादचर्या।
१-पापोपदेश—तिर्यंचों का व्यापार हिंसा आरम्भ छल आदि की कथाओं का बार-बार उपदेश देना।
२-हिंसादान—हिंसा के कारणभूत तलवार, फरसा, कुदारी, फावड़ा, छुरी, कटार आदि वस्तुओं का दान देना।
३-अपध्यान—द्वेष और राग से अन्य की स्त्री, धन आदि के नाश होने, बंध जाने, कट जाने आदि के चिन्तन को अपध्यान कहते हैं।
४-दुःश्रुति—आरम्भ परिग्रह, साहस, मिथ्यात्व, देशादि बढ़ाने वाले शास्त्रों का सुनना।
५-प्रमादचर्या—बिना प्रयोजन जमीन खोदना, जल गिराना, अग्नि जलाना, वनस्पति तोड़ना, घूमना-फिरना आदि सब प्रमादचर्या नामक अनर्थदंड है।
प्रश्न ५८- भोगोपभोगपरिमाण गुणव्रत का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- राग से होने वाली आसक्ति को घटाने के लिये परिग्रहपरिमाण के भीतर नित्य काम आने वाले इन्द्रिय विषयों का नियत समय या जीवनपर्यंत के लिये परिमाण करना भोगोपभोगपरिमाण व्रत है।
प्रश्न ५९- भोग और उपभोग का लक्षण बताइये ?
उत्तर- जो पदार्थ एक बार भोगने के बाद भोगने योग्य नहीं रहता है वह भोग है। जैसे—भोजन, गंध, माला आदि। जो पदार्थ बार-बार भोगने में आता है उसे उपभोग कहते है। जैसे—वस्त्र, आभूषण आदि।
प्रश्न ६०- शिक्षाव्रत का लक्षण एवं भेद बताइये ?
उत्तर- जिन व्रतों से मुनि बनने की अर्थात् महाव्रत पालने की शिक्षा मिले उसे शिक्षाव्रत कहते हैं। शिक्षाव्रत के चार भेद हैं—
१-देशावकाशिक २-सामायिक ३-प्रोषधोपवास ४-वैयावृत्य।
प्रश्न ६१- देशावकाशिक शिक्षाव्रत का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- दिग्व्रत में जो जीवनपर्यंत के लिये आवागमन के क्षेत्रादि की बड़ी मर्यादा की थी उसमें भी काल के विभाग से कमी करना देशावकाशिक व्रत है। इसी को देशव्रत भी कहते हैं। जैसे—मैं प्रसिद्ध गली, घर, मकान आदि से बाहर नहीं जाऊँगा आदि।
प्रश्न ६२- सामायिक शिक्षाव्रत का लक्षण बताइये ?
उत्तर- दिग्व्रत तथा देशव्रत की मर्यादा के भीतर और बाहर सब जगह सामायिक के लिए निश्चित समय में पाँचों पापों का मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदना से त्याग करना सामायिक नामक शिक्षाव्रत है।
प्रश्न ६३- सामायिक के समय क्या विचार करना चाहिये ?
उत्तर- प्रत्याख्यान सामायिक में विचार करे कि यह संसार अशाश्वत है, अशुभ है, अनित्य है, दुःखदायक और परवश है। मोक्ष केवल उल्टा अर्थात् शाश्वत है, शुभ है, नित्य है, सुखमय है और आत्मरूप है। इसलिए यह मोक्ष ही मुझे उपादेय है। मैं एक हूँ, अखंड हूँ, अविनाशी हूँ, मेरी आत्मा ही मुझे उपादेय है।
प्रश्न ६४- प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत का लक्षण बताइये ?
उत्तर- प्रत्येक माह की पर्व तिथियों (अष्टमी, चतुर्दशी) को व्रत धारण की इच्छा से खाद्य (रोटी, दाल, भात आदि), स्वाद्य (लाडू, पेड़ा, बरफी आदि), लेह्य (रबड़ी, चटनी, अचारस आदि), पेय (दूध, पानी, छाछ आदि) चार प्रकार के आहार का त्याग करना प्रोषधोपवास शिक्षाव्रत है।
प्रश्न ६५- उपवास का अर्थ क्या है ? उपवास के दिन क्या कार्य नहीं करना चाहिये ?
उत्तर- उप=वने समीप, वास=रहना=आत्मा के समीप रहना उपवास है। उपवास के दिन अशुभ कार्य नहीं करना चाहिये। उपवास के दिन हिंसादि पाँच पापों का त्याग, आरम्भ त्याग, श्रृंगारादि तेल, इत्र, माला, स्नान, अंजन लगाने का त्याग करना चाहिये। सिनेमा देखना, शतरंज, ताश, कैरम आदि खेलने का उपवास के दिन त्याग करना चाहिये।
(जिनेंद्र देव की पूजा, दान के लिये स्नान करना निषिद्ध नहीं है)
प्रश्न ६६- उपवास के दिन क्या-क्या करना चाहिये ?
उत्तर- उपवास के दिन जिनअभिषेक, पूजा, पाठ आदि करते हुए आत्मस्थ रहित होकर जिनवाणी अमृत का पान स्वयं भी करना, दूसरों को भी कराना चाहिये। तथा भक्ति, पठन, पाठन, ध्यानादि शुभ कार्यों में समय बिताना चाहिये।
प्रश्न ६७- वैयावृत्य का लक्षण बताइये ?
उत्तर- (१) गुणों के विधान गृहत्यागी मुनि, आर्यिका, क्षुल्लक, क्षुल्लिका के बिना बिना किसी फल की इच्छा से यथाशक्ति दान देना वैयावृत्य नामक शिक्षाव्रत है।
(२) गुणानुरागी भव्यत्मा के द्वारा व्रतीजनों के उपसर्गादि दूर करना, औषधिादि देना, मार्गजन्य थकावट को दूर करना, पैर आदि दबाना, चार प्रकार के (आहार, औषध, शास्त्र, अभय) दान देना, उनका उपचार करना ये सब वैयावृत्य शिक्षाव्रत कहलाता है।
प्रश्न ६८- सामायिक प्रतिमाधारी का लक्षण बताइये ?
उत्तर- चारों दिशाओं में तीन-तीन कुल १२ आवर्त और ९-९ कुल ४ प्रथम करके बाह्य और आभ्यंतर परिग्रह रहित मुनि के समान षडावश्यक का पद्मासन से मन, वचन, काय को शुद्ध रखकर सुबह, दोपहर और शाम के समय सामायिक करने वाला व्यक्ति सामायिक प्रतिमाधारी कहलाता है।
प्रश्न ६९- चौथी प्रोषध प्रतिमाधारी का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- प्रत्येक माह की दोनों अष्टमी और चतुर्दशी के दिनों में अपनी शक्ति के अनुसार उत्तम, मध्यम, जघन्य रीति से विधिपूर्वक प्रोषधोपवास करने वाला प्रोषध प्रतिमाधारी कहलाता है।
प्रश्न ७०- सचित्त त्याग प्रतिमाधारी का लक्षण बताइये ?
उत्तर- जो दयालु भव्यत्मा अपक्व, कच्चे, मूल, अंकुर, सचित्त, जड़, फल, शाक, शाली, कोयल, जमीकंद, मूल और बीज नहीं खाता है वह पानी भी गरम, भ्रामक करके ही पीता है। वह सचित्तत्याग प्रतिमाधारी है।
प्रश्न ७१- रात्रिभुक्ति त्याग प्रतिमाधारी का लक्षण बताइये ?
उत्तर- जो दयालु व्रती श्रावक रात्रि में दाल-भात, खड़ी, दूध, पेड़ा, पानी आदि चार प्रकार का आहार स्वयं नहीं करता है और दूसरों को भी नहीं कराता है उसे रात्रिभुक्तित्याग प्रतिमाधारी कहते हैं। इसे देवभक्तिमुत्यागी भी कहते हैं।
प्रश्न ७२- ब्रह्मचर्य प्रतिमाधारी का लक्षण बताइये ?
उत्तर- जो व्रती श्रावक शरीर को रजोवीर्य से उत्पन्न अपवित्रता का पिंजर जल-मल से दुर्गंध ग्लानि युक्त, हाड़, माँस का पिंजर जानना कामदेव का हमेशा त्याग कर शरीर से ममत्व छोड़ कर आत्मस्वभाव में लीन होता है, वह ब्रह्मचर्य प्रतिमाधारी कहलाता है।
प्रश्न ७३- आरम्भ त्याग प्रतिमा का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- जो जीव हिंसा के कारणभूत खेती, व्यापार और आरम्भ के कार्यों से विरक्त हो के वह आरम्भत्याग प्रतिमाधारी कहलाता है। (जिनपूजा और आहार दानादि शुभ कार्य करने का निषेध नहीं है)
प्रश्न ७४- परिग्रहत्याग प्रतिमाधारी का लक्षण बताइये ?
उत्तर- जो मनुष्य बाह्य में दस प्रकार के परिग्रहों से तथा अंतरंग में चौदह प्रकार के परिग्रहों से सर्वथा ममता को छोड़कर निर्मोही होकर परिग्रह का त्याग करता है वह परिग्रहत्याग प्रतिमाधारी कहलाता है।
प्रश्न ७५- बाह्य और अभ्यंतर परिग्रहों के भेद बताइये ?
उत्तर- बाह्य परिग्रह १० प्रकार के हैं—१-क्षेत्र २-वास्तु ३-हिरण्य ४-सुवर्ण ५-धन ६-धान्य ७-दासी ८-दास ९-कुप्य १०-भांड।
अभ्यंतर परिग्रह १४ प्रकार का है—१-मिथ्यात्व २-क्रोध ३-मान ४-माया ५-लोभ ६-हास्य ७-रति ८-अरति ९-शोक १०-भय ११-जुगुप्सा १२-स्त्रीवेद १३-पुरुषवेद १४-नपुंसकवेद।
प्रश्न ७६- अनुमति त्याग प्रतिमाधारी का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- जो किसी भी पाप कार्य, खेती आदि आरम्भ कार्य, धनादि परिग्रह एवं विवाह आदि एक लोक सम्बन्धी कार्य में अनुमति नहीं देता है वह अनुमति त्याग प्रतिमाधारी कहलाता है।
प्रश्न ७७- उद्दिष्टत्याग प्रतिमाधारी का स्वरूप बताइये ?
उत्तर- जो व्यक्ति भव्यत्मा घर छोड़कर मुनियों के पास जाकर व्रतों को धारण करता है, तपों को तपता है, भिक्षा से भोजन करता है एवं लंगोटी और खण्डवस्त्र धारण करता है वह उद्दिष्टत्याग प्रतिमाधारी कहलाता है।
६ - मुनिचर्या
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3053.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है