श्रुतकेवली vs उपाध्याय भगवंत

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श्रुतकेवली और उपाध्याय में क्या अंतर है ? क्या श्रुतकेवली के भी कुछ अतिसय या रिद्धि होती है ? श्रुतकेवली मनः पर्याय ज्ञानी होते है ? क्या श्रुतकेवली के अगले भव का भी कोई नियम है क्या ?

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श्रुतकेवली

केवल आत्मा को जानने वाला अथवा सकलश्रुत को जानने वाला ही श्रुतकेवली है। इसी से १० या १४ अंगों के जानने से भी श्रुतकेवली कहलाता है और केवल समिति गुप्तिरूप अष्ट प्रवचन मात्र को जानने से भी श्रुतकेवली कहलाता है।

उपाध्याय
मूलाचार / आचारवृत्ति / गाथा संख्या ५११ वारसंगं जिणक्खादं सज्झायं कथितं बुधे। उवदेसइ सज्झायं तेणूवज्झाय उच्चदि ।५११।

= बारह अंग चौदहपूर्व जो जिनदेवने कहे हैं उनको पण्डित जन स्वाध्याय कहते हैं। उस स्वाध्यायका उपदेश करता है, इसलिए वह उपाध्याय कहलाता है।

धवला पुस्तक संख्या १/१,१,१/३२/५० चोद्दस-पुव्व-महोपहिमहिगमम सिवत्थिओ सिवत्थीणं। सीलंधराणं वत्ता होइ मुणीसो उवज्झायो ।३२।

= जो साधु चौदह पूर्वरूपी समुद्रमें प्रवेश करके अर्थात् परमागमका अभ्यास करके मोक्षमार्गमें स्थित हैं, तथा मोक्षके इच्छुक शीलंधरों अर्थात् मुनियोंको उपदेश देते हैं, उन मुनीश्वरोंको उपाध्याय परमेष्ठी कहते हैं।

श्रुतकेवली के ऋद्धि

ति.प./४/१००१
**सयलागमपारगया सुदकेवलिणामसुप्पसिद्धा जे। **
एदाण बुद्धिरिद्धि चोद्दसपुव्वि त्तिणामेण।१००१
= जो महर्षि सम्पूर्ण आगम के पारंगत हैं और श्रुतकेवली नाम से प्रसिद्ध हैं उनके चौदह पूर्वी नामक बुद्धि ऋद्धि होती है।१००१।

रा.वा./३/३६/३/२०२/९
सम्पूर्ण श्रुतकेवलिता चतुर्दशपूर्वित्वम् ।
= पूर्ण श्रुतकेवली हो जाना चतुर्दशपूर्वित्व है। (ध.९/४,१,१३/७०/७)।

चा.सा./२१४/२
श्रुतकेवलिनां चतुर्दशपूर्वित्वम्
श्रुतकेवली के चतुर्दशपूर्वित्व नाम की ऋद्धि होती है।

निश्चय व्यवहार श्रुतकेवली
जो श्रुत से केवल शुद्धात्मा को जानते हैं वे श्रुतकेवली हैं वह तो परमार्थ है; और जो सर्व श्रुतज्ञान को जानते हैं वे श्रुतकेवली हैं यह व्यवहार है।

ऋद्धिधारी श्रुतकेवली मनः पर्यय ज्ञान धरी होते हैं। शेष भी हो सकते हैं। ( यदि किसी के पास आगम प्रमाण हो तो कृपया उपलब्ध कराएं)

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