वीतरागतास्वरूप उत्तम तप धर्म - जैन स्वाध्याय सामग्री | Vitragtaswrup Uttam Tap Dharm

वीतरागतास्वरूप उत्तम तप धर्म

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

वीतरागतास्वरूप
उत्तम तप धर्म

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

मंगलाचरण-

फिर तप की शोधक बहि जगे, कर्मों की कड़ियाँ टूट पड़े।
सर्वांग निजात्म प्रदेशों से, अमृत के निर्झर फूट पड़े।।
करते तप शैल नदी तट पर, तरुत्तल वर्षा की झड़ियों में।
समता रस पान किया करते, सुख दुख दोनों की घड़ियों में।।
अन्तर ज्वाला हरती वाणी, मानो झड़ती हों फुलझड़ियाँ।
भव बन्धन तड़-तड़ टूट पड़े, खिल जावें अन्तर की कलियाँ।।

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

उत्तम तप की परिभाषा बतायें?

  • परिभाषा- निश्चय से कर्मक्षयार्थ तप्यते इति तपः/समतरारागदिपरभावेच्छात्यागेन स्वरूपे प्रत्तपनं विजयं तपः।
  • व्यवहार से- इच्छानिरोधः तपः।

उत्तम तप के भेद बतायें?

  • तप के भेद- बहिरंग तप और अंतरंग तप
    बहिरंग तप-(अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन, कायक्लेश)
    अंतरंग तप-(प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग, ध्यान)

तप से क्या लाभ है?

  • तप से लाभ- तपसा निर्जरा च। त.सू. 9/3

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

अन्येतर में तप के प्रकार

  • पंचाग्नितप, जलसमाधि, भूमिसमाधि, एकपैर पर खड़ा रहना, नखकेश बढ़ाना, शिखा बढ़ाना, आदि उदा.वन, छिंगा राजा का बलि के अयोग्य

तपस्वी का स्वरूप?

  • तपस्वी का स्वरूप- विषयाशावशातीतो, निरारम्भोपरिग्रहः। ज्ञानध्यानतपो रक्तः, तपस्वी सः प्रशस्यते।।

तप की चाह क्यों?

  • तप की चाह- लोभवश, रागवश, भयवश, उदासीन होकर।

निर्जरा का कारण-

  • निर्जरा का कारण- कोटि जन्म तप तपें, ज्ञान बिन कर्म झर्रें जे। ज्ञानी के छिन माहिं, त्रिगुप्ति तैं सहज टर्रें ते।।

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

तप का भ्रम

  • कुछ नहीं खाने को तप मान लिया, जबकि आचार्यों ने इच्छाओं के काटने को तप कहा।
  • अज्ञानी सदैव रिकॉर्ड बनाने में लगा रहता है, माह, दो माह, छह माह तक उपवास करता रहता है।
  • विषय भोग व मोक्ष एक साथ नहीं-
    दोय कर्म नहीं होत सयाने।
    विषय भोग अरु मोक्षहु जाने।।
  • ज्ञान बिना ध्यान सही नहीं, जैसे भैंसे का ध्यान नहीं करना, मना करने पर भ्रम में स्वयं को भैंसा समझना।

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

तप का भ्रम

  • यदि भोजन नहीं करने का नाम तप है तो आदिनाथ ने एक वर्ष एक माह 8 दिन तक उपवास किया फिर भी केवलज्ञान नहीं हुआ। राजा भरत को कपड़े उतारते ही अन्तर्मुहूर्त में केवलज्ञान हो गया।
  • अनशनादि से मोक्ष नहीं, बल्कि अंतरंग तप में साधक हैं। अंतरंग तप होंगे तो बाहर परिणामति में आयेगा।
  • उपवास करने वाले की अपेक्षा स्वाध्याय करने वाला तप की श्रेणी में आता है। स्वाध्याय परम तपः।
  • कर्तृत्वबुद्धि की बीमारी, उदा. रुई और रुई के धुनियाँ, देखकर बीमार हो गया, रुई जल गई, ठीक होना

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

तप का भ्रम

  • ज्ञान बिन उपवास मनादि के पोषण के लिये करते हैं, वह उपवास नहीं लंघन है। क्योंकि- कषायविषयाहारो, त्यागो यत्र विद्यते। उपवासः स विज्ञेयः शेषं लंघनकं विदुः।।
  • ध्यान से कर्मों की निर्जरा व केवलज्ञान होता है, उपवास से नहीं।

निर्जरा का कारण

  • समस्त तपों का सार है ध्यानतप है शेष तप तो इसके पोषक हैं, 12 तप मुनियों के ही होते हैं।
  • तप से कर्मों की निर्जरा, आत्मा पवित्र हो जाती है, जैसे सोने को आग में तपाने पर सोंटची हो जाती है।

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

तप की महिमा

  • तप का प्रभाव- सेठ सुदर्शन को शूलो पर चढाते समय शूलो का सिंहासन बन जाना।
  • धर्म पथ पर चलने की कोई उम्र तय नहीं होती-साधु, बहु की चर्चा, इतनी जल्दी, समय का पता नहीं आयु 4 साल, पति की 4 माह, श्वसुर जन्म नहीं, क्या खा रहे है, बासा
  • मुनिराज तप के समय सुमेरु के समान अचल, अटल हो जाते हैं। बाह्य प्रवृति से निर्लेप रहते हैं।
  • तप के अधिकारी मनुष्य हैं, देव नहीं।

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

मनुष्य भव की सार्थकता

  • बहु पुण्य संयोग मिला नर तन, जिनश्रुतजिनदेव चरण दर्शन।
    हो सम्यग्दर्शन प्राप्त मुझे, तो सफल बने मानव जीवन।।
    पंचप.पूजन
  • यह मानुष पर्याय सुकुल, सुनिबो जिनवाणी।
    इह विधि गये न मिले, सुमणि ज्यों उदधि समानी।। छढ़.4/6

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

मनुष्य भव की सार्थकता

  • त्रय पर्याय साधिक दो हजार सागर की अवस्था में मनुष्य भव के 48 भव, विस्तार।
  • मनुष्य भव आकाश में फेंके हुये पत्थर के समान है ऊपर कितनी देर ठहरेगा।
  • छंद- दुर्लभ लही ज्यों चिंतामणि।
    त्यों पर्याय लही त्रस तणी।।
  • मनुष्य भव व्यर्थ में मत गवांओ- राजा का खजाना, जवाहरात, अशर्फियां, चांदी, तांबा के कोठे से मूर्ख, खाली हाथ बाहर आ गया, कुछ भी भी न ला सका। ऐसे ही चारों गतियों में भटका कुछ नहीं कर पाया।

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

विषयों में रमने वालों को धर्म नहीं सुहाता

  • विषयों में रमने वालों को धर्म नहीं सुहाता- जैसे मछुवारों को फूल की गंध नहीं सुहाती।
  • सुयोग्य काल में धर्म नहीं किया विषयों में मग्न, जैसे अंधे एवं गंजा जिसके सिर में खुजली थी, भूल भुलैया ये बाहर नहीं आ सका, द्वार पर आते ही सिर खुजलाने लगता।
  • पहाड से बहने वाली नदी का बहा पानी वापिस नहीं आता, वैसे ही जो समय निकल गया लौटता नहीं
  • जो कुछ होता है अच्छे के लिये होता है उदा. ठिगा राजा, मंत्री को कुयें में ढकेला. दूसरे राज्य के लोगों ने पकड बलि के लिये लिया ठिगा राजा की बलि नहीं हुई। छोड दिया, फिर मंत्री से वार्तालाप।

वीतरागता उत्तम तप धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

विनय नाम का तप है, भावना है, मिथ्यात्व भी है

  • अंतरंग तप में विनय सबसे बडा धर्म है, विनय सम्पन्नता सबसे बडा पुण्य है तो विनय नाम का मिथ्यात्व भी है (वैनयिक मिथ्यात्व)
  • विनय तलवार के समान है सही उपयोग तो कर्म कटेंगे, गलत उपयोग तो सिर कटेगा, कर्मबंध होगा
  • बिना परीक्षण किये हर एक को नमस्कार नहीं करना चाहिये, आ. समन्तभद्र-देवागम नभोयान चामरादि…
  • विनय तप को निम्न स्तर पर नहीं लाना चाहिये।

तपों का स्वरूप

  • विनय तप के भेद-दर्शनविनय, ज्ञानविनय, चारित्रविनय, उपचारविनय।
  • स्वाध्याय-स्व-अधि- अय अर्थात् निज का ज्ञान प्राप्त होना।
  • स्वाध्याय के भेद-1.वांचना, 2.पृच्छना (पूछना) 3.अनुप्रेक्षा (चिन्तन) 4.आम्नाय (पाठ) 5.धर्मोपदेश
  • दूसरों की बुद्धि को परखते है तो दोष-परनारी संग परबुद्धि को परखियो।
  • इस मनरूपी भूत को तपरूपी खंभे पर चढाओ, उतारो।

बहिरंग तपों का स्वरूप

1.अनशन- पूर्णतः भोजन का त्याग।
2.अवमौदार्य- एकबार अल्प भोजन करना,
3.वृत्तिपरिसंख्यान-नियमों में बंधकर अल्प भोजन लेना।
4.रसपरित्याग-छहो रसों में से कुछ का त्याग,
5.विविक्तशय्यासन-निर्दोष एकान्त स्थान में प्रमाद रहित सोना, बैठना,
6.कायक्लेश-आत्मसाधना में लीन होने में शारीरिक कष्टों की परवाह न करना।
ये अंतरंग तपों के लिये भूमिका तैयार करते हैं

अंतरंग तपों का स्वरूप

7.प्रायश्चित-प्रमाद व अज्ञान से लगे दोषों की शुद्धि के लिये आलोचना, प्रतिक्रमण करना। 8.विनय- दर्शनज्ञानचारित्र के प्रति अंतर में अनंत बहुमान के भाव उनकी पूर्णता के भाव करना, 9.वैयावृत्य- शुद्धोपयोग में रहने के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहना। 10.स्वाध्याय-तत्त्व निरूपक शास्त्रों को वाचनादि। 11.व्युत्सर्ग- बाह्य अंतरंग परिग्रह का त्याग,12.ध्यान- शुद्धोपयोग रूप स्व में रमण करना।

मुनिराजों की तपश्चर्या

  • निर्ग्रन्थ दिगम्बर सदज्ञानी,
    स्वातम में सदा विचरते जो।
    ज्ञानी ध्यानी समरससानी,
    द्वादश विधितप नित करते जो।।
    (देवशास्त्रगुरु पूजन)
  • छंद-जो तप तपै खपै अभिलाषा।
    चूरे करम शिखर गुरुभाषा।। (सोलह कारण पूजन)
  • उत्तम तप निरवांछित पालैं,
    सो नर करम शत्रु को टालैं।। (दशलक्षण पूजन)

दशलक्षण पूजा का छंद-

तप चाहै सुरराय, करम शिखर को वज्र है।
द्वादशविधि सुखदाय, क्यों न करैं निज सकति समं।।
उत्तम तप सबमाहि बखाना, करम शैल को वज्र समाना।
बसयो अनादि निगोद मंझारा, भू विकलत्रय पशु तन धारा।।
धारा मनुष्य तन महादुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता।
श्री जैनवाणी तत्वज्ञानी, भई विषय पयोगिता।।
अति महा दुर्लभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदरे।
नर भव अनूपम कनक घर पर, मणिमयी कलशा धरे।।

भावार्थ

पूजन के छंद का अर्थ- उत्तम तप को देवों के राजा इन्द्र भी चाहते हैं, यह तप कर्म रूपी पर्वत को नष्ट करने के लिए वज्र के समान है, यह सुख देने वाला तप बारह प्रकार का है, इन तपों को अपनी शक्ति के अनुसार क्यों धारण नहीं करते हो।
उत्तम तप धर्म का सब ग्रंथों में वर्णन मिलता है, कर्म रूपी पर्वत को नष्ट करने के लिए यह वज्र के समान है। अनादि काल से यह जीव निगोद में रह रहा है। वहां से निकल कर पृथ्वी आदि स्थावर हुआ, स्थावर के बाद त्रस पर्याय में विकलेन्द्रि हुआ और फिर पशुओं (तिर्यंच) के शरीर को धारण किया अब दुर्लभ यह मनुष्य पर्याय प्राप्त की है उसमें भी उच्चकुल, पूर्णआयु, निरोग शरीर, जिनवाणी का संयोग, तत्वज्ञान, आत्म चिंतन में उपयोग अत्यन्त दुर्लभता से प्राप्त किया है जो व्यक्ति अत्यन्त महादुर्लभ विषय और कषाय का त्याग कर तप को आदरपूर्वक ग्रहण करते हैं वे मनुष्य भवरूपी स्वर्ण गृह पर रत्नमयी कलशा चढाते हैं अर्थात् नर जन्म धन्य करते हैं।

(6). उत्तम तपः-

''समस्तरागादिपर भावेच्छात्यागेन स्वरूपे प्रतपनं वितपनं तपः" अर्थात् समस्त रागादि परभावों की इच्छा के त्याग द्वारा स्व स्वरूप में प्रतपन करना वितपन करना तप है। तप के साथ उत्तम शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। और सम्यग्दर्शन के बिना किया गया तप समस्त तप निरर्थक है।
सम्मतविरहिया णं सुठुवि उग्गं तवं चरंताणं ।
ण लहंति वोहिलाहं अवि वाससहस्सकोडीहिं ।।
यदि कोई जीव सम्यक्त्व के विना करोंडों वर्षो तक उग्र तप भी करे तो भी वह बोधि लाभ प्राप्त नहीं कर सकता ।
इच्छाओं के निरोध का नाम तप है तथा कर्मों को नष्ट करने के लिए जो तप किया जाए वह तप है 'इच्छा निरोधोः तपः। कर्मक्षयार्थं तप्यते इति तपः ।। तप दो प्रकार का होता है :- अतंरंग और बहिरंग अंतरंग और बहिरंगतप 6-6 के भेद से 12 प्रकार का होता है कर्मों को क्षय करने के लिए तप ही माध्यम है तप से ही (1) सबिपाक (2) अबिपाक रूप से कर्मों की निर्जरा होती है। अतंरंग तप से ही धीरे- धीरे समस्त कर्मों का अभाव हो जाता है। और मुक्ति को प्राप्त करता है। बाह्य तप अनशनादि से लेकर काय क्लेश तक के तपों से इन्द्रियों का निरोध होता हैं।
तपों में स्वाध्याय को परम तप कहा गया है ''स्वाध्यायः परमं तपः। मगर अज्ञानी जीव पंचाग्नितप, जलसमाधि, भूमिसमाधि, एक पैर पर खडे रहना, नखकेश एवं शिखा बढाकर तप आदि करते है। वह सब बाल तप के समान है जिसको आचार्यों ने संसार मार्ग को बढाने के रूप में बताया है अज्ञानी जीव, लोभ वश, रागवश, यशवश, भयवश, उदासीन वश आदि कारणों से कठोर तप व्रत आदि करते है अंतरंग तप के विना बहिरंग तप निरर्थक है।

उत्तम तप

पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा. निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज.9460674306


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 299.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है