वीतरागतास्वरूप उत्तम शौच धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Vitragtaswrup Uttam Shauch Dharm

वीतरागतास्वरूप उत्तम शौच धर्म

वीतरागता उत्तम शौच धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

वीतरागतास्वरूप उत्तम शौच धर्म

वीतरागता उत्तम शौच धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

मंगलाचरण

अब तक अगणित जड़ द्रव्यों से, प्रभु! भूख न मेरी शांत हुई।
तृष्णा की खाई खूब भरी, पर रिक्त रही वह रिक्त रही।।
युग-युग से इच्छा सागर में, प्रभु! गोते खाता आया हूँ।
पंचेंद्रिय मन के षड्रस तज, अनुपम रस पीने आया हूँ।।

वीतरागता उत्तम शौच धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

उत्तम शौच धर्म की परिभाषा बतायें?

  • निश्चय से-शुचेर्भावः शौचम्, अर्थात् पवित्रता का नाम शौच धर्म है, उत्तम शब्द सम्यग्दर्शन ज्ञान का सूचक है।
  • व्यवहार से- मन, वचन, काय की पवित्रता का नाम शौच धर्म है।

शौच धर्म की विरोधी कषाय कौन सी है?

  • चेतन विषयों के प्रति रागभाव को प्रेम, अचेतन विषयों के प्रति रागभाव को लोभ कहते हैं।
  • आ. अमृतचन्द्र ने समयसार गाथा 15 की टीका में जीवों के लोभियों की चर्चा की।
  • शौच धर्म की विरोधी कषाय का नाम लोभ है।

लोभ के अन्य नाम बतायें?

  • लोभ के अन्य नाम-लालसा, लालच, तृष्णा, अभिलाषा, चाह, कामना, इच्छा

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लोभ कषाय की प्रवृत्ति

जब इसके लोभ कषाय उत्पन्न हो तब इष्ट पदार्थ के लाभ की इच्छा होने से उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है। उसके साधनरूप वचन बोलता है, शरीर की अनेक चेष्टा करता है, बहुत कष्ट सहता है, सेवा करता है, विदेशगमन करता है। जिसमें मरण होना जाने वह कार्य भी करता है। जिनमें बहुत दुःख उत्पन्न हो ऐसे प्रारम्भ करता है तथा लोभ होने पर पूज्य व इष्ट का भी कार्य हो वहां भी अपना प्रयोजन साधता है, कुछ विचार नहीं रहता। तथा जिस इष्ट वस्तु की प्राप्ति हुई है उसको अनेक प्रकार से रक्षा करता है। यदि इष्ट वस्तु की प्राप्ति न हो या इष्ट का वियोग हो तो स्वयं संतापवान होता है, अपने अंगों का घात करता है तथा विष आदि से मर जाता है ऐसी अवस्था लोभ होने पर होती है। (मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ. सं. 53-54)

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लोभ का स्वरूप बतायें?

  • पैसा खर्च करने वाला निर्लोभी, खर्च नहीं करने वाला लोभी
  • लोभ के रूप-यश का लोभ, रूप का नाम, काम का लोभ, जीवन का, आरोग्य, इन्द्रिय, भोग, उपभोग
  • वस्तुतः पाँचों इन्द्रियों के विषयों की एवं मनादि कषायों की पूर्ति का लोभ ही लोभ है।

लोभ अन्य कषायों को कैसे काटता है?

  • पेट का लोभी पशु, तो पेट और पेटी का लोभी मनुष्य है। गाय की दृष्टि में पैसों की कोई कीमत नहीं।
  • लोभ दूसरी कषायों को काटता ही है तो स्वयं को भी यश का लोभी क्रोध को छोड़ता है
  • मान के लोभी क्रोध को पी जाते हैं।

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किस गति में कौन सी कषायों की प्रमुखता है?

  • कषायों का विभाजन-मनुष्य गति में मान, तिर्यंच में माया, नरक में क्रोध, देव गति में लोभ की प्रमुखता।
  • पंचेंद्रियों के विषयों के लोभ में जीवों की दशा-रूप में पतंगा, रस में मछली, स्पर्शन में हाथी, श्रोत्र में हिरण, घ्राण में भँवरा मारे जाते हैं।

लोभ से क्या हानि है?

  • नाम के लोभी भरत का मान गल गया तो हमारी क्या बात।
  • लोभ में प्राणों का विनाश, उदा. शेखचिल्ली का, या भिखारी जिसने अशर्फियाँ खा ली और मर गया।

लोभ का उदा. सहित परिणाम बतायें?

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  • लोभ का परिणाम- सेठ ने देव से वरदान मांगा जिसको छुये सोने का हो जाये, खाना, पीना छूट गया
  • लोभ पाप का बाप है, उदा. बनारस में पं. और वेश्या का
  • पाप का धन पाप में, उदा. वेश्या और भांड का
  • लोभी को पुण्यक्षीण होने पर द्रव्य नहीं मिलता।
  • कुछ लोभ तो लोभ सा नहीं दिखता धर्म का भ्रम हो जाता है, उदा. सेठ का स्वर्ग के लोभ में गजरथ
  • न मोक्षोऽपि मुमुक्षताम् अर्थात् मोक्ष के लोभियों को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है मिथ्यात्व की शल्य वाला मोक्ष नहीं जा सकता, उदा. जिसके पैर में कील चुभी हो वह दौड़ नहीं सकता।

लोभ से हानि-

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  • लोभात्क्रोधाः प्रभवति, लोभात्कामः प्रजायते।
    लोभान्मोहस्य नाशश्च, लोभः पापस्य कारणं।।
    लोभ से क्रोध होता है, लोभ से काम होता है, लोभ से मोह(प्रेम) का नाश होता है, लोभ सब पापों का कारण है।
  • नवद्वार बहे घिनकारी यह शरीर की अपवित्रता है, तो क्रोधादि कषायें आत्मा की अपवित्रता है।
  • ब्रह्मचर्य के विपरीत बात सुनने से हानि- उदा. चेला तीर्थयात्रा पर गया रास्ते में बरात देखी, कुलवृद्धि के बारे में जाना, रात में कुयें के पास सो गया स्वप्न में स्वयं की शादी, बच्चे, पत्नी ने कहा आगे खिसको तो कुयें में गिर गया।

पवित्रता का क्या स्वरूप है?

वीतरागता उत्तम शौच धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

  • पवित्र परिणाम होने पर पापों का शमन, उदा. भ्रष्ट विधवा का
  • जैसे मदिरा से भरे घड़े को खूब साफ किया जाय तो भी बदबू आती रहेगी, वैसे ही चित्त में मिथ्यात्व, मोह, कषायें भरी हो तो क्रिया काण्ड से दूर नहीं होगें। आत्मध्यान लगाना ही पड़ेगा।
  • पल रुधिर रागमल थैली, कीकश वशादितैं मैली।
    नव द्वार बहे घिनकारी, अस देह करे किमियारी।।
    ( इसमें आत्मा रूपी हीरा पड़ा है )
  • मिथ्यात्व रूपी कोयले को पुण्य रूपी दूध पानी से धोये तो स्वच्छ नहीं होगा। उदा. मूर्ख को समझावतें
  • सबसे खतरनाक कषाय लोभ(लोभान्ता) सबसे बड़ा धर्म शौच- शौच सदा निर्दोष, धर्म बड़ो संसार में।

पवित्रता का क्या स्वरूप है?

वीतरागता उत्तम शौच धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

  • शरीर की शुचिता, अशुचिता को देखने वाले मोवी हैं, उदा. अष्टावक का
  • जैसे साबुन से कपड़े का मैल हट जाता है, वैसे ही आत्मध्यान से द्रव्यकर्म, नौकर्म, भावकर्म हट जाते हैं।
  • शौच धर्म की प्रकटता-
    भेदज्ञान साबू भयौ, समरस निरमल नीर।
    धोबी अंतर आतमा, धोवे निज गुन चीर।।
  • अब तक पूजा भक्ति करने पर भी शौच धर्म नहीं-
    वीत्यो अनंतो काल यह, मेरी अशुचिता ना गई।
    तिस अशुचिताहर एक तुम ही, भरहु बांछा चित्त ठई।
    अब अष्टकर्म विनाश सब मल, दोष रागादिक हरौ।
    तनरूप कारानेह तें, उद्धार शिववासा करौ।।

शौच धर्म या पवित्रता का क्या स्वरूप है?

वीतरागता उत्तम शौच धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

  • हड्डी मांस खून आदि रहने पर भी केवलज्ञान हो जाता है। मगर जरा सा राग रहने पर केवलज्ञान नहीं।

  • सर्वज्ञ के लिये वीतरागी होना जरूरी है वीत देह नहीं, वीत हड्डी नहीं, उदा. वादिराज मुनि को कोढ़ था परन्तु अन्तर में शौच धर्म के धनी थे।

  • मुनिराज नहाने के साथ नहाने के राग का भी त्याग करते हैं।

  • आत्म स्वभाव की सामर्थ्य ऐसी है जो पर्याय उस पर झुके वह भी पवित्र हो जाती है, उदा. पारसमणि

  • संतोष से दरिद्रता का अभाव-साधु के पास 4 अशर्फियां थी किसी गरीब को देना चाहता था, एक राजा दूसरे राजा से युद्ध करने जा रहा था रास्ते में वह साधु मिला उसने एक अशर्फी राजा पर फेंक दी राजा ने कारण जाना, सेना को वापिस भेज दिया और सन्यासी बन गया।

  • जैसे पानी में काई आने पर पानी अपवित्र नहीं होता, काई ही अपवित्र है उसको निकाल देते हैं, वैसे ही आत्मा में रागद्वेष आने से आत्मा अपवित्र नहीं होती, रागद्वेष को नष्ट होने से आत्मा पवित्र हो जाती है इसीलिये रागद्वेष को हटाने का प्रयत्न करो।

शौचधर्म का स्वरूप-

सम संतोष जलेषण य, जो धोवादि तिण्ह लोहमल पुजं।
भोजन गिद्धि विहीणो, तरसु सुचित्तं हवे विमल।।
जे समतारूपी जल से तृष्णारूपी महामैल को धोते हैं, एवं
भोजन में भी जिनको गृद्धता-लालसा नहीं होती है, उनको
उत्तमशौच धर्म होता है।
■जैसे किसी को 105 डिग्री बुखार था 103 रहने पर कहता
है कुछ आराम है जबतक पूर्ण बुखार उतर नहीं जाता ठीक
नहीं माना जा सकता, वैसे ही मुनिराज की दृष्टि में संज्वलन
संबंधी राग आग के समान है जबतक राग नष्ट नहीं हो
जाता तबतक आत्मा संसार रोग से मुक्त नहीं हो सकती।

दशलक्षण पूजा का छंद-

धरि हिरदै सन्तोष, करहु तपस्या देह सों।
शौच सदा निरदोष, धर्म बडो संसार में।।
उत्तम शौच सर्व जग जाना, लोभ पाप का बाप बखाना।
आशा पाश महा दुखदानी, सुख पावै सन्तोषी प्रानी।।
प्रानी सदा शुचि शील जप तप, ज्ञान ध्यान प्रभाव तैं।
नित गंग जमुन समुद्र न्हाये, अशुचि दोष सुभाव तैं।।
ऊपर अमल मल भरयो भीतर, कौनविधि घट शुचि कहैं।
बहु देह मैली सगुन थैली, शौच गुन साधू लहें।।

पूजन के छंद का अर्थ-

हृदय में संतोष धारण कर शरीर से तपस्या
करनी चाहिए, दोष रहित शौच धर्म ही संसार में सबसे बड़ा धर्म है।
उत्तम शौच धर्म सर्व जगत में विख्यात है यह लोभ कषाय के अभाव
में होता है। लोभ सर्व पापों को (उत्पन्न) करने वाला है। आशा इच्छा
रूपी पाश भयानक दुःखों को देने वाली है अतःसंतोष को धारण
करने वाले जीव सुख को प्राप्त करते हैं। इस जीव की शुचिता
(पवित्रता) शील, जप, तप, ज्ञान, ध्यान के प्रभाव से होती है, हमेशा
गंगा यमुना आदि नदियों में एवं समुद्र में भी स्नान करने से शुचिता
अर्थात् पवित्रता नहीं होती क्योंकि इस शरीर का स्वभाव ही अपवित्र
है। यह रूपर से अत्यन्त निर्मल दिखता है परन्तु इसके अन्दर मल
भरा हुआ है ऐसे शरीर को किस प्रकार पवित्र कहा जा सकता है।
जिनका शरीर तो मलिन है पर जो गुणों के भंडार है ऐसे महाव्रती
साधु ही इस शौच गुण को प्राप्त करते हैं।

(4). उत्तम शौच:-

क्रोध, मान, माया और लोभ कषाय के अभाव में उत्तम शौच धर्म
की प्रकटता होती है। व्यवहार में ‘शुचेर् भावः शौचम्’ शुचिता अर्थात्
पवित्रता का नाम शौच है। लोभी व्यक्ति अपने व पराये का भेद
नहीं कर पाता है। क्रोध के समान ही लोभ में भी अन्धा हो जाता
है, जिसके कारण अपने ही भाई, स्त्री एवं पुत्रादि का वध कर
बैठता है। एवं स्वंय को भी जोखिम में डाल लेता है। इसीलिए लोभ
को पाप का बाप कहा गया है। लोभ के कई रूप हैं तृष्णा,
अभिलाषा, लालसा, लालच, महत्वाकांक्षा, कामना, चाह आदि। लोभ
की पुष्टि वश रूप से, नाम, काम, जीवन, आरोग्य, इन्द्रिय,
भोग, उपभोग आदि से होती है। जैसे- पारसमणि के सम्पर्क से
लोहा भी सोना बन जाता है वैसे ही शौच धर्म स्वभावी आत्मा के
आश्रय से पर्याय में भी शुद्धता प्रकट होती है, उसी शुद्धता का नाम
ही शौच धर्म है।

जय जिनेंद्र
पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा.निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज. 9460674306


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 296.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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