वीतरागतास्वरूप उत्तम मार्दव धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Vitragtaswrup Uttam Mardav Dharm

वीतरागतास्वरूप उत्तम मार्दव धर्म

वीतरागतास्वरूप उत्तम मार्दव धर्म

मंगलाचरण-

उज्ज्वल हूँ कुन्द धवल हूँ प्रभु! पर से न लगा हूँ किंचित भी।
फिर भी अनुकूल लगे उन पर, करता अभिमान निरंतर ही।।
जड़ पर झुक झुक जाता चेतन, की मार्दव की खंडित काया।
निज शाश्वत अक्षयनिधि पाने, अब दास चरण रज में आया।।

उत्तम मार्दव धर्म

परिभाषा बतायें?
निश्चय से मृदु भावः मार्दवम्, व्यवहार से कोमलता का नाम मार्दव है।

मान कषाय के कारण मनुष्य अपने आपको कैसा मानता है?
मान कषाय के कारण मानी अपने को ऊंचा, दूसरों को नीचा रखता है। मान की पुष्टि के लिये छल कपट करता है। क्रोध करता है। मान नं. 2 की कषाय है क्रोध के विपरीत है। मानी महात्माओं को नमस्कार नहीं करने पर झगड़ते देखे जाते हैं।

मान कषाय के कारण जीव की स्थिति कैसी होती है?

मान कषाय की प्रवृत्ति-जब इनके मान कषाय उत्पन्न होती है तब औरों को नीचा व अपने को ऊंचा दिखाने की इच्छा होती है और उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है। अन्य की निन्दा करता है, अपनी प्रशंसा करता है व अनेक प्रकार से औरों की महिमा मिटाता है, अपनी महिमा कराता है। महाकष्ट से जो धनादिक का संग्रह किया उसे विवाहांदि में खर्च करता है तथा कर्ज लेकर भी खर्चता है। मरने के बाद हमारा यश रहेगा ऐसा विचारकर अपना मरण करके भी अपनी महिमा बढ़ाता है। यदि कोई अपना सम्मादिक न करे तो उसे भयादिक दिखाकर दुख उत्पन्न करने अपना सम्मान कराता है। तथा मान होने पर कोई पूज्य-बड़े हों उनका भी सम्मान नहीं करता, कुछ विचार नहीं रहता। यदि अन्य नीचा और स्वयं ऊंचा दिखाई न दे, तो अपने अंतरंग में आप बहुत संतापवान होता है और अपने अंगों का घात करता है तथा विष आदि से मर जाता है ऐसी अवस्था मान होने पर होती है। (मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ. 53)

क्रोध कषाय और मान कषाय में क्या अंतर है?

क्रोध में शत्रु बनते हैं मान में मित्र, निंदा शत्रु करते हैं, मित्र प्रशंसा करते हैं। प्रतिकूलता में क्रोध और अनुकूलता में मान कषाय उत्पन्न होती है। मान भी क्रोध के समान खतरनाक है। क्रोध में वस्तु नष्ट करते हैं, तो मान में दबा कर रखते हैं। क्रोधी एकांत चाहता है पर मानी भीड़ चाहता है। क्रोधी वियोग चाहता है मानी संयोग चाहता है। पर पदार्थों के ममत्व के कारण क्रोध और मान होता है। उदा. सेठ और मिल का

मान को मीठा जहर क्यों कहा?

क्योंकि मान कषाय के उदय में जीव अपनी प्रशंसा चाहता है एवं स्वयं को उच्च और दूसरे की निन्दा करता है व नीचा समझता है वर्तमान में कुछ समय के लिये समाज में प्रतिष्ठा तो मिल जाती है मगर नीच गोत्र कर्म का बंध भी हुआ है इसका भान नहीं रहता, यह मान शहद लपेटी तलवार के समान है क्योंकि परआत्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोदभावनाचे च नीचैर्गोत्रस्य। त.सू.6/25 इसीलिये मान को एक मीठा जहर कहा है। उदा. मानपत्रा का… जिसकी पीठ पीछे प्रशंसा हो वह भाग्यशाली है। लेकिन प्रशंसा निंदा से अधिक खतरनाक है तर्क सहित।

मान कषाय के कितने भेद है?

मान के भेद-
ज्ञान पूजां कुल जाति, बलऋद्धि तपो वपुः।
अष्टावाश्रित्य मानित्वं स्मयमाहुरितस्मया।।
आठों मद (ज्ञान,पूजा,कुल,जाति बल, ऋद्धि, तप,शरीर)
अज्ञानी को होते हैं ज्ञानी को नहीं।
ज्ञान का मद ज्ञानी को नहीं अज्ञानी को होता है।
मान का एक रूप दीनता के रूप भी हैं।
दीन आगे झुकता है मानी पीछे की ओर अकड़ता है।
जिसके पास रूपया,रूप,बल,ज्ञान आदि कुछ भी न हो
दीन हो तो क्या वह मार्दवधर्म का धारी है, नहीं
ये तो उसके पापकर्म का उदय है।

दश लक्षण पूजा का छंद-

मान महाविषरूप, करहिं नीच गति में।
कोमल सुधा अनूप, सुख पावे प्राणी सदा।।
उत्तम मार्दव गुन मन माना, मान करन को कौन ठिकाना।
बसयो निगोद मांहि तैं आया, दमरी रूकन भाग बिकाया।।
रूकन बिकाया भाग बश तैं, देव इक इन्द्री भया।
उत्तम मुआ चाण्डाल हूवा, भूप कीड़ों में गया।।
जीतव्य जोवन धन गुमान, कहा करें जल बुदबुदा।
करि विनय बहु गुन बड़े जन की, ज्ञान का पावें उदा।।

उत्तम मार्दव गुण मन को अच्छा लगने वाला है, मान करने का क्या आधार है क्योंकि अनंत काल से निगोद में रहता था वहां से आकर स्थावर में वनस्पति काय का जीव हुआ, कभी दमरी (सबसे छोटी मुद्रा) के भाव बिक गया, कभी रूकन अर्थात् बिना मूल्य के ही बिक गया भाग्य उदय से यह जीव देव हुआ और देव पर्याय से आकर एकेन्द्रिय हो गया, उत्तम पर्याय से चांडाल हुआ, राजा भी कीड़ों में जाकर उत्पन्न हो गया। हे! आत्मा, इस जीवन की युवावस्था और धन का घमण्ड क्यों करता है। ये सब जल के बुल-बुले के समान होने वाले हैं। जिनमें बहुत गुण हैं अर्थात् गुणवान है, जिनकी बड़ी आयु है ऐसे माता-पिता आदि की विनय करना चाहिए जिससे ज्ञान की प्राप्ति होती है।

अभिमानी व ज्ञानमद के कुछ उदाहरण बताईये?

  1. अभिमानी व्यक्ति ऐसा समझता है कि मैं ही सब कुछ करता हूँ, उदा. सेठ के 4 पुत्र कमांक, जुवारी, अंधा, पुजारी।
  2. नाविक, ज्ञानी पुरूष समुद्र मंत्रों का वेता कुछ काम न आया, नदी में बह गया।
  3. अपने को बड़ा समझने की इच्छा से बुरा भी कर लेते है, उदा. सुनार, सुनारिन, भुजबंद, घर में आग लगाना

मदों के कुछ उदाहरण बताईये?

  • बल मद-अभिमानी रावण ने 72 जिनालयों सहित कैलाश पर्वत उठाया तब मुनि बाली ने पैर का अंगूठा दबाया जिससे रावण भी पंत के नीचे दब गया।
  • यौवन मद-रूपवान स्त्री पर एक साधु मोहित हो गया, स्त्री ने दूसरे दिन आने को कहा दूसरे दिन अपने रक्त से भरा कटोरा भिक्षा में दिया और कहा-
    यौवन था तब रूप था, थे ग्राहक सब लोय।
    यौवन रत्न गुमों पुन:, बात न पूछे कोय।।

कुछ और उदाहरण बताईये?

  1. मानी की टेक उदा. पति,पत्नी, सिर दर्द का बहाना,
    पत्नी-अपनी टेक चलाई, पति की मूंछ मुंडाई।
    पति-पीछे देख लुगाई मुंडन की पलटन आई।।
  2. अपनी शान बनाये रखने में लगा रहता है,
    उदा. कोरे कागज की कविता- असली ही पढ़ सकता है।

नम्र व्यक्ति का स्वभाव कैसा होता है?

  1. नम्रता का उदा. नदी गोदला घास, घमंडी रावण ठोस वृक्ष।
  2. बड़े बड़ाई न करै, बड़े न बोले बोल।
    हीरा मुख से न कहे, बड़ा हमारा मोल।।

वीतरागता उत्तम मार्दव धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

  • जैसे नदी में बड़ा पत्थर डालने पर पानी इधर उधर बहने लगता है वैसे ही जब आत्मा में मोह राग, द्वेष, मानादि उत्पन्न हो जाते हैं तो उपयोग इधर उधर भटकने लगता है।
  • जैसे बैलगाड़ी के नीचे चलने वाला कुत्ता समझता है कि गाड़ी मैं चला रहा हूँ, वक्से ही संसारी जन समझते हैं कि परिवार का भरण पोषण में कर रहा हूँ, बच्चों को मैंने पढ़ाया तो सभी एक से क्यों नहीं पढ़े।

वीतरागता उत्तम मार्दव धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

कुछ और उदाहरणों से नम्र व्यक्ति का स्वभाव कैसा होता है?

  1. नम्र स्वभाव वाला मनुष्य फल से लदे हुये वृक्ष के समान होता है जैसे शाखा फलों के भार से झुक जाती है वैसे ही मनुष्य क्षमादिगुणों के भार से विनयशील हो जाता है कहते भी है विनय बिना विद्या नहीं…
  2. विनय के बिना विद्या की प्राप्ति नहीं, उदा.पं. जी. 10-12 बच्चे, आम या फोड़ा को चूसना।
  3. समुद्र विशाल जल का भण्डार होते हुये भी अपनी सीमा का उल्लंघन नहीं करना, वैसे ही गुणवान पुरुष भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता।

वीतरागता उत्तम मार्दव धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

  • मान कषाय से अपमान की प्राप्ति।
  • जैसे आंगन में बेल पल्लवित होकर पूरे आंगन में छा जाती है वैसे ही आत्मा में मार्दव धर्म फैलकर संसार में यश दिलाती है।

वीतरागता उत्तम मार्दव धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

  • विनयहीन व्यक्ति की विद्या व्यर्थ-
    अविनीतस्य या विद्या, सा चिरं नैव तिष्ठति।
    मर्कटस्य गले बद्धा, मल्लीनां मालिका यथा।।
    विनयहीन व्यक्ति की विद्या बन्दर के गले में पड़ी हुई मालती की माला के समान दीर्घ काल तक नहीं ठहरती है।
  • मार्दव भाव दया का मूलक है।
  • मान कलह का कारण है।

वीतरागता उत्तम मार्दव धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

रावण का मान क्या था?

रावण का मान-
जानि है कायर मुझे नृपगण सभी संग्राम से।
तासे लड़ना है मुझे धुन बांध के अब राम से।
जीतकर अर्पू सिया प्यारी जु उनके प्राण से।
यश होय मेरा विश्व में बेशक सिया के दान से।

वचन की कठोरता व कोमलता का उदा. बतायें?

वचन की कठोरता-शुष्कः वृत्तिच्छये।
व कोमलता-नीरस तरुवर विलसति पुरूतः
दोनों का अर्थ एक ही है
पढ़ पढ़ शास्त्र अनेकों फाड़े, तोड़ी कई मालायें।
क्रोध मान घिसा न मन का घिस डाली प्रतिमायें।।

हमारी स्थिति कैसी है?

वीतरागता उत्तम मार्दव धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

(2) उत्तम मार्दवः- क्षमा के समान उत्तम मार्दव भी आत्मा का स्वभाव है, मार्दव धर्म की प्रकटा से प्राणी का जीवन बाह्य में विनम्र एवं कोमल स्वभाव वाला होता है। आत्मा में मार्दव स्वभाव का गुण है, उस मार्दव स्वभावी आत्मा के अवलम्बन से आत्मा में मान कषाय के अभाव रूप शांति स्वरूप जो पर्याय प्रकट होती है उसे मार्दव कहते हैं। बाह्य में “मृदोर्भाव मार्दव” अर्थात् मृदुता - कोमलता का नाम मार्दव है मान कषाय के कारण आत्म स्वभाव में विद्यमान कोमलता का अभाव हो जाता है, उसमें अकड़ सी उत्पन्न हो जाती है, जब यह मान कषाय अपना प्रभाव दिखाती है, तब यह जीव अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा समझने लगता है अपने को ऊँचा दूसरों को नीचा दिखाता है घमण्ड करता है, मान सम्मान की चाह करता है अपनी प्रशंसा चाहता है। यह मान आठ कारणों से होता है। ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, तप और शरीर इन आठ भावों के आश्रय से मान किया जाता है। मान कषाय के कारण रावण भी राम के द्वारा सपरिवार नष्ट हुआ। मान एक मीठा जहर है जो धीरे-धीरे चढ़ता है और समूल नष्ट कर देता है। अतः मान कषाय के अभाव में पर को “अपना” मानना छोड़ना भी पड़ता है। वर्तमान में धन के मद में अथाच्य अत्याचार हो रहे है इससे अपने मार्दव स्वभावी आत्मा का पतन होता है। इसलिए कहा है
मान महा विषरूप, करहिं नीच गति जगत में।
कोमल सूधा अनूप, सुख पावैं प्राणी सदा ।।

वीतरागता उत्तम मार्दव धर्म

  • पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
    उत्तम मार्दव
    जय जिनेंद्र
    पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
    जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा.निदेशक
    14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
    बीकानेर राज. 9460674306

:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 294.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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