वीतरागतास्वरूप उत्तम क्षमावाणी पर्व - | Vitragtaswrup Uttam Kshamavani Parv

वीतरागतास्वरूप उत्तम क्षमावाणी पर्व

अनुक्रमणिका

जय जिनेंद्र

मंगलाचरण-

मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमोगणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलं।।
सर्वमंगलमांगल्यं, सर्व कल्याणकारकं।
प्रधानं सर्व धर्माणाम्, जैनं जयतु शासनं।।

मंगलाचरण-

खम्मामि सव्व जीवाणं,
सब्बे जीवा खमन्तु मे।
मित्ती मे सव्वभूएसु,
बैरं मज्झं ण केण वि।।

क्षमापना का अर्थ व स्वरूप समझाओ?

  • क्षमापना का अर्थ- एक दूसरे के प्रति अज्ञान, प्रमाद वश मन, वचन, काय से किये गये अपराध भावों को भी समता भाव सहित क्षमा करना और क्षमा मांगना ही क्षमाभाव धारण करना।

  • क्षमा भाव एक रसायन है जिससे मन के सभी विकार शांत हो जाते हैं।

  • क्षमा एक महामंत्र है जिससे दुष्ट, क्रूर भी वश में हो जाते हैं।

  • क्षमा शीतल गिरि के चंदन के तरह है जो स्वयं शीतल रहते हुये कोधाग्नि को भी शीतल कर देता है, एवं पाषाण हृदय को को पिघला देता है। आस पास के वातावरण में धर्म की खुशबू बिखेर देता है।

  • क्षमा भाव को वाणी की सीमा में नहीं बांधा जा सकता अंतरंग की गहराइयों से मेरे सब दोष मिथ्या हो ऐसा कहते हुये मिच्छामि दुक्कड़म् कहते हैं।

मनोमालिन्य का अर्थ बतायें?

  • मेरे द्वारा दूसरे के मन में उत्पन्न होने वाला विकार।

क्षमा का माहात्म्य बताओ?

  • क्षमा आत्मा का धर्म है वाणी का नहीं

  • क्रोध कषाय की मंदता में ही क्षमा मांगने या करने के विचार उत्पन्न होते हैं।

  • रंग राग से मनाने का पर्व नहीं है अपने अंतर में निज आत्मा में प्रमादवश विकृति के परिमार्जन करने का पर्व है।

  • क्षमा करने कराने के सच्चे अधिकारी

  • प्रत्येक जीव – प्रमादवश, अज्ञानतावश अपराध हुआ हो

  • सच्ची क्षमा अपनी आत्मा से मांगे जिसका भान नहीं किया।

  • क्षमा व्यक्तिगत होती है, विनम्र भाव से होती है।

  • पर्वराज का उदात्त दान क्षमा है।

  • जबतक शत्रुता समाप्त नहीं, तबतक सच्ची क्षमा याचना सही नहीं।

  • क्षमा वीरस्य भूषणं यह वीरों का आभूषण है, शत्रु भी शरण में आ जाने पर क्षमा करना चाहिये।

  • मन, वचन, काय, प्रमाद, अज्ञान, जाने अनजाने में किसी को दुख दिया हो, वह अपराध है, ऐसे अपराधों से निवृत्त होना ही क्षमा है।

  • क्षमादि धर्मों की आराधना से कषाय भावों से निवृत्त होना ही क्षमा है।

  • क्षमावाणी में क्षमा आदि दीपक शब्द है अर्थात् क्षमा से ब्रह्मचर्य तक का सार समाहित है।

  • खुम्माम सव्व जीवाणा… मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ में क्रोध का त्याग, सभी जीव मुझे क्षमा करें में मान का त्याग समाहित है। सभी जीव मेरे मित्र हैं माया का त्याग है सरलता का सूचक हैं।

  • क्षमा मांगने में जबतक मान कषाय बाधक है तबतक क्षमा वाणी नहीं।

  • क्षमा करना सभी कहते हैं मगर क्षमा किया यह नहीं बोलते।

  • जिस प्रकार साबुन से कपड़े का मैल साफ हो जाता है उसी प्रकार क्षमायाचना से आत्मा में उत्पन्न हुये विकार साफ हो जाते हैं।

  • अपनी वासनाओं को, कषायों को मारना, विकारों को जीतना ही वीरता है।

  • धर्मवीर ही क्षमाधारक हैं युद्धवीर नहीं।

  • उपसर्ग की अवस्था में मुनिराज का समभाव ही क्षमा का प्रतीक है।

  • जो उपसर्गों को जीते वो वीर, शत्रु मित्र को समान आशीर्वाद दे वह क्षमाधारक।

  • स्वं से क्षमायाचना, स्वं को क्षमा करना ही क्षमावाणी है।

  • निश्चय क्षमावाणी तो स्वयं के प्रति सजग हो जाना है।

  • व्यवहार से क्षमावाणी है तो आत्मा के आश्रय से क्रोधादि कषायों के उपशान्त होना ही क्षमा है।

  • क्षमा हने औरों को, अरु क्रोध हने आपको।

  • क्षमा बोलते समय- सव्वेसु मैत्री गुणेषु प्रमोद – प्रेमभाव हो सब जीवों से, गुणी जनों में हर्ष प्रमो। ऐसा होना चाहिये।

क्षमाभाव में स्थित मुनिराजों का स्वरूप?

वर्तमान में क्षमा की अवधारणा?

  • क्षमाभाव का उदा.-
    अरि मित्र महल मसान कंचन,
    कांच निन्दन श्रुति करन।
    अर्धावतारन असि प्रहारन में,
    सदा समता धरन।।
  • क्षमापर्व को ग्रीटिंग कार्ड, पत्र तक सीमित कर दिया गया
  • जिनके प्रति अपराध किया है उनसे क्षमायाचना न करके मित्रों से क्षमायाचना
  • व्हाट्सएप्प या मैसेज कर क्षमा याचना कर रहे हैं।

क्षमाभाव याचना-

विगत वर्ष में प्रमादवश हुई हो, हमसे कोई भूल।
क्षमा सुमन बरसायें आत्मन्, चिर करुणा के मूल।।

  • जी दुखाया आपका ही, जान अनजान में।
    या कहे हों दुर्वचन ही, भूलकर अभिमान में।।
    वीर का भूषण क्षमा है, वह मुझे भी दीजिये।
    मैला मन का धुल सके, वह स्नेह वृष्टि कीजिये।।

उत्तम क्षमा

जय जिनेंद्र

पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा. निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज. 9460674306


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2410.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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