वीतरागतास्वरूप उत्तम क्षमा धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Vitragtaswrup Uttam Kshama Dharm

वीतरागतास्वरूप उत्तम क्षमा धर्म

वीतरागतास्वरूप उत्तम क्षमा धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
वीतरागतास्वरूप
उत्तम क्षमा धर्म
मंगलाचरण-
जड चेतन की सब परिणति प्रभु! अपने अपने में होती है।
अनुकूल कहें प्रतिकूल कहें, यह झूठी मन की वृति है।।
प्रतिकूल संयोगों में क्रोधित, होकर संसार बढाया है।
संतप्त हृदय प्रभु! चंदन सम, शीतलता पाने आया है।।

■उत्तम क्षमा का स्वरूप-
उत्तमखम तिल्लोयहिसारी, उत्तमखम जम्मोदतिहारी।
उत्तमखम रयणत्तयधारी, उत्तमखम दुग्गइदुहहारी ।।
उत्तमक्षमा तीनलोक का सार है, उत्तमक्षमा जन्मरूपी
संसार समुद्र को तार देने वाली है, उत्तमक्षमा रत्नात्रय
का धारण कराने वाली है। उत्तमक्षमा दुर्गति से दूर
करने वाली है।
■आक्रोश वचन सहन व परदोषाभाषण में उत्तमक्षमा।
■उत्तमक्षमा से मन की स्थिरता व सम्मान्यता।
■विवेक से निर्मलता का लाभ।

■उत्तम क्षमा का स्वरूप-
उत्तमखम गुणगणसहियारी, उत्तमखम मुणिविंदपियारी।
उत्तमखम बुहयणचिंतामणि, उत्तमखम संपज्जइ
थिरमणि ।।
–उत्तमक्षमा अनेक विकास के गुणों की सहकारी है,
उत्तम क्षमा मुनियों को प्रिय है, उत्तमक्षमा चिंतामणि
रत्न के समान है। उत्तमक्षमा मन को स्थिर रखने में
समर्थ है।
■असमर्थ के अपराधों की क्षमा से अपना विकास।
■क्षमा से आत्मिक गुणों का विकास।

वीतरागता उत्तम क्षमा धर्म

  • पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
    ■उत्तम क्षमा का स्वरूप-
    उत्तमखम महिणज्ज सयलजणि,
    उत्तमखम मिच्छत्त तमोमणि ।
    जहिं असमत्थहिं दोसं खमिज्जइ,
    जहिं असमत्थहिं ण उ रूसिज्जइ ।।
    –यह उत्तमक्षमा समस्त पुरूषों के द्वारा पूज्य है, यह
    उत्तक्षमा मिथ्यात्व रूप अंधकार को नष्ट करने के लिये
    मणि के समान है,दोष वहां नही है जहां असमर्थ पुरूषों
    के दोषों को क्षमा कर दिया जाता है। उदा. राजा,
    हिरणी का वचन व उसके बच्चे, राजा की क्षमा

वीतरागता उत्तम क्षमा धर्म

  • पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
    ■उत्तम क्षमा का स्वरूप-
    • क्रोध से अंतरंग व बहिरंग दोनों गुणों का विनाश ।
    • कोहेण जो ण तप्पदि, सुरणर तिरिएहिं कीरमाणेवि ।
    उवसग्गे वि रउद्दे तस्स खिमा णिम्मला होदि ।। कार्तिकेयानुप्रेक्षा
    – जो देव मनुष्य तिर्यंचों द्वारा घोरन्घोर उपसर्ग होने पर भी क्रोध से
    संतप्त नही होते हैं उनके निर्मल अर्थात् उत्तमक्षमा होती है।
    ■ जैसे विषधर सर्प के हलाहल विष से प्राणों का घात होता है वैसे
    ही क्रोध से आत्मा के ज्ञानादि गुणों का घात होता है।
    ■ उदा. श्रेणिकपुर की कन्या तूंकरी, क्रोध से जुआरी, चोरों, रंगरेज के
    हाथों दुख सहने पडे, अंत में क्षमा भाव धारण किया।
    • क्रोधी पुरूष के जप, तप, व्रत पूजादि मणिधारी सर्प के समान हैं।

उत्तम क्षमा ■क्षमा स्वभावी आत्मा के आश्रय से
की निश्चय व उत्पन्नवीतरग परिणति का नाम क्षमा है,
व्यवहार से व्यवहार से-कठिन परिस्थितियों में भी
परिभाषा खेदखिन्न न होना, सहन करना क्षमा है।
बतायें? ■धर्म के लिये क्या नही करना इसकी
धर्म के लिये सूची लम्बी होगी मगर क्या करना
क्या-क्या चाहिये, तो गृहस्थ के छह आवश्यक
करना केसाथ शास्त्र स्वाध्याय, आत्मचिंतन,
चाहिये क्या तत्वों का अभ्यास, आत्मलीनता ।
नही?

वस्तु का स्वभाव ■क्रोध आत्मा का अनादि का विभाव गुण है, क्षमा
और विभाव गुण स्वभावगुण है। वत्थु सहावो धम्मो, चारितं खलु
बतायें? धम्मों, दंसण मूलो धम्मो
निश्चय से क्रोध ■जब वस्तु का अनुकूल प्रवर्तन नही हो, जबकि
कब होता है? वस्तुयें स्वतंत्र हैं। इष्ट अनिष्ट की कल्पना ना होना
क्रोध की परिभाषा, ■झल्लाहट, चिडचिडापन, क्षोभ, तमतमाना, आंखे
स्वभाव, स्थिति लाल होना आदि. क्षमा को समझने के लिये क्रोध
बतायें? को समझाते हैं जैसे राम की महिमा के लिये रावण
का वर्णन करते हैं।
■विवेकशून्य हो जाता है उदा. दीपायन मुनि ।
क्रोधान्ध व्यक्ति की क्रोध में स्वयं की गलती नही दिखती दूसरों की ही
दशा कैसी होती गलतियां दिखाई देती है उदा. मालिक, नौकर, कांच
है? का गिलास । क्रोधोदयाद् भवति कस्य न कार्यहानि
(आत्मानुशासन छंद 216)

क्रोध को शांति
भंग करने वाला
मनोविकार क्यों
कहा?
क्रोध का एक रूप
बैर है वह कैसे?
क्रोध किन कारणों
से नही करता है?
■अज्ञान के कारण क्रोध की उत्पति मन में ही होती है
वह स्वयं उदवेलित तो होता ही है, दूसरों को भी
प्रभावित करता है, माहोल को खराब कर देता है यह
मन का विकार है, संचारी भाव है
• क्रोध का एक रूप है बैर जो पीढी दर पीढी चलता
रहता है। गुस्सा …आ…जाता है… चला जाता है क्रोध
योजना नहीं बनाता क्षणिक ही रहता है, जबकि बैर
योजनायें बनाता रहता है। बैर हाथ पर रखे अंगारे की
तरह है दूसरों को जलाये या न जलाये स्वयं तो जल
ही जाता है।
■क्रोध कई कारणों से नही करता- राग से, लोभ से,
कर्मबंध से, पापबंध से, भय से, पराधीनता से, आदि
क्योंकि उसका प्रतिष्ठा चली जायेगी।
• क्रोध से हानि-
क्रोधाद् भवति सम्मोहः, सम्मोहत् स्थितिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बृद्धिनाशो, बुद्धिनाशाप्रणस्यति ।।
क्रोध से मूढता होती है मूढता से स्मृति भ्रांत, स्मृति
भ्रांत से बुद्धि नाशबुद्धि नाश से व्यक्ति का नाश हो
जाता है।
■स्वयं स्वयं में सर्व वस्तुएँ, सदा परिणमित होती हैं।
इष्ट अनिष्ट न कोई जग में, व्यर्थ कल्पना झूठी हैं ।।
☐ मित्र क्षमा सम जगत में,नही जीव को कोय।
अरू बैरी नही क्रोध सम, निश्चय जानो लोय ।।

क्षमा
का
स्वरूप
बतायें
?
■क्षमा शीतल जल के समान है क्रोधाग्नि को शांत
करने वाला है। ज्ञानी की क्षमा मोक्ष का कारण है
तो अज्ञानी की क्षमा संसार का कारण। उदा. बिल्ली
अपने बच्चे को मुंह से पकडती है तथा चूहे को भी
अपने मुंह से पकडती है दोनों में अंतर ।
"अज्ञानी कुत्ते की भांति लाठी को पकडता है, ज्ञानी
सिंह की भांति लाठी चलाने वाले को पकडता है।
■क्षमा कैसी होती है, सुनो- उदा. बरैया जी, गर्म
पत्नी द्वारा पानी डालने पर भी शांत रहकर कहते हैं
अब तक गरजती रही मगर आज बरसी हो ।
• क्षमाभाव में स्थित- उदा. उपसर्ग के समय
पार्श्वनाथ, अकंपनाचार्य मुनि, गजकुमार मुनि,
सुकमाल मुनि
वीतरागतास्वरूप उत्तम क्षमा धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
■उत्तमा क्षमा का स्वरूप-
प्रतिशोध समर्थोऽपि, यः आत्मभाव स्वभावतः।
क्षमिस्यति स्वपरान् सा, उत्तमा क्षमा भवेत्।।
प्रतिशोध शक्ति होते हुये भी जो आत्मा के सहज से स्वपर
को क्षमा करते है, उसको उत्तम क्षमा कहते हैं।
पूजाकोटिसमं स्तोत्रं, स्तोत्रकोटि समं जपः।
जपः कोटिसमं ध्यानं, ध्यानकोटिसमं क्षमः ।।
करोडों पूजा के बराबर एक स्तोत्र है, करोडों स्तोत्रों के
बराबर एक जप, करोडों जपों के बराबर एक घ्यान है और
करोड बार किये गये ध्यान के बराबर एक बार की क्षमा
बताई गयी है।

क्रोध
की
उत्पत्ति
का
कारण

विनाश
कैसे?
जब इसके क्रोध कषाय उत्पन्न होती है तब दूसरे का बुरा
करने की इच्छा होती है और उसके अर्थ अनेक उपाय विचारता
है, मर्मच्छेदी गालीप्रदानादि रूप वचन बोलता है। अपने अंगों से
तथा शस्त्र पाषाणादिक से घात करता है। अनेक कष्ट सहनकर
तथा धनादि खर्च करके व मरणादि द्वारा अपना भी बुरा करके
अन्य का बुरा करने का उद्यम करता है अथवा औरों से बुरा
होना जाने तो औरों से बुरा कराता है। स्वयं ही उसका बुरा
होता हो तो अनुमोदन करता है। उसका बुरा होने से अपना
कुछ भी प्रयोजन सिद्ध न हो तथापि उसका बुरा करता है। तथा
क्रोध होने पर कोई पूज्य या इष्टजन भी बीच में आये तो उन्हें
भी बुरा कहता है, मारने लग जाता है, कुछ विचार नही रहता।
तथा अन्य का बुरा न हो तो अपने अंतरंग में आप ही बहुत
संतापवान होता है और अपने ही अंगों का घात करता है तथा
विषादि से मर जाता है। ऐसी अवस्था क्रोध होने से होती है।
(मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ.सं. 52)
दशलक्षण पूजा का छंद-
पीडै दुष्ट अनेक, बांध मार बहुबिध करे।
धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा ।।
उत्तम छिमा गहो से भाई, इह भव जस, पर भव सुखदाई।
गाली सुन मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहै अयानो ।।
कहि है अयानो वस्तु छीनै, बांध मार बहुबिध करै।
घर तैं निकारे तन विदारै, बैर जो न धरै ।।
तैं करम पूरब किये खोटे, सहै क्यों नहिं जीयरा।
अति क्रोध.- अगनि बुझाय प्रानी, साम्य जल ले सीयरा।।

पूजन के छंद का अर्थ-बहुत दुर्जन लोग दुख देवें, बांधकर अनेक प्रकार
से मारपीट करे। यातनायें दें वहां, हे! पवित्र आत्मा क्रोध को न करके
विवेकपूर्वक उत्तम क्षमा को धारण कीजिये। हे भाई, उत्तम क्षमा को ग्रहण
करो, यह क्षमा इस भव में यश और अगले भव में सुख को देने वाली है।
कोई अज्ञानी गुणों को अवगुण रूप भी कहता है, गालियां (अपशब्द) भी
देता है तो भी मन में खेद (दुःख) नही करना चाहिये। ऐसा वह अज्ञानी
अपशब्द कहता हुआ हमारी कोई वस्तु छीन लेवे, बांध देवे अनेक प्रकार
से मारे, घर से निकाल देवे, शरीर का छेदन करे (विदारन करे) तब भी
वहां उससे बैरभाव धारण नही करना चाहिए। किन्तु चिंतन करना चाहिए
कि पूर्व भवों में मैंने जो पाप कर्मों का संचय किया था, जो पापकर्म किये
हैं। हे जीव अब उन्हें क्यों नही सहन करोगे (भोगोगे) । अत्यन्त भीषण
क्रोध रूपी अग्नि को हे जीव समता रूपी अत्यन्त शीतल जल से बुझाओ।
अर्थात् क्रोध के समय समता धारण करो।
यदि कोई डांटे
तब उसका
जबाब नहीं दें
तो क्या यह
क्षमा है?
क्या मन, वचन,
काय की
विकृति वाला
क्षमाधारी है?
• यह क्षमा नही, उदा. मालिक ने नौकर
को डांटा, कुछ नही कहा, सहन कर
लिया मगर खेदखिन्न हो गया, नौकर
के मन में बैर भाव उत्पन्न होने लगा।
• नही- जिसके मन में विकार भाव
उत्पन्न हो रहे हैं वचन में वहीं
उच्चारण करे एवं शरीर से भी करने
लगे तो समाज में अराजकता फैल
जायेगी इसलिये मन, वचन, काय की
विकृति वाला क्षमाधारी नही है।

क्या क्रोधी को
उपदेश देना
चाहिए?
कषायों के
अभाव से क्या
होगा?
■ जब क्रोधी को क्रोध आ रहा तो उपदेश
देना सार्थक नही है, क्योंकि अच्छे बुरे का
ज्ञान नही रहता है न ही सुनना चाहता है
जैसे- उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शांतये,
पयः पानं भुजंगानां केवलं विष वर्धनम् ।।
■कषायों के अभाव से चारित्रगुण की पर्याय
क्षमा प्रकट होती है धीरे-धीरे क्षमाभाव
बढते-बढ़ते पूर्णता को प्राप्त होता है जो
उत्तम सुख का दाता है। प्रतिकूलताओं को
भी घी भंति पी जाना चाहिये। उदा. सासु
दामाद, खिचडी, घी।

माता झाडू
लगाते समय
चींटी को
बोलकर भगाती
है तो क्या पाप
नही लगेगा ?
क्रोध करने से
क्या-क्या हानि
होती है?
■माता झाडू लगाते समय चींटी को बोलकर भगाती है तो
पाप लगेगा क्योंकि चींटी तीन इन्द्रिय जीव है सुन नही
सकती, जैसे पहले माताये घर को गोबर से लीपते समय
कहती थीं अज्ञानता का व हिंसा का दोष तो लगेगा ही
चींटी चींटी चढो पहाड, तुम पर आई गोबर की धार।
जो तुम न चढो तो तुम पर पाप, हम न कहें तो हम पर
पाप ।।
■क्रोधकृत दोष- कांति परिवर्तन, मुद्रा परिवर्तन,
शीतलता में परिवर्तन, तिरस्कार, विवेक व सुख का
नाश, संचित पुण्य क्षण में नष्ट, साधु भी धर्म रहित
हो जाता है, विकृत रूप, प्रियजन भी बैरी हो जाते हैं,
पूज्य भी अवज्ञा का पात्र होता है, अनेक दोषों का
भागीदार होना, क्रोध ने मुनियों को भी नही छोडा।

क्रोध कितने
प्रकार का होता
है?
क्रोध करने
से क्या-क्या
फल मिलता
है?
■क्रोध की चार श्रेणी हैं अनंतानुबंधी,
अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन संबंधी।
■क्रोध करने का फल-उदा तूकारी
क्रोध कर मरे और मारे तो फांसी होय,
किंचित हूँ मारे तो जाये जेलखाने में।
जो कबहुँ निर्बल भयो हाथ पैर टूट गये,
ठौर ठौर पट्टी बंधी, पडे सफाखाने में।।
पीछे से कुटुंबी जन हाय हाय करत फिरत,
जाय जाय पांव परें, तहसील और थाने में।
किचिंत हूँ किये तैं क्रोध ऐते दुख होय भ्रात,
होते हैं अनेक गुण जरा गम खाने में।।
कषायों की
मंदता में उत्तम
क्षमा हो सकती
है क्या?
क्षमा से क्या-
क्या मिलता
है?
•कषायों की मंदता में उत्तम क्षमा नही हो
सकती है कषायों के अभाव में उत्तम क्षमा
होती है, कषायों की मंदता तो लेश्या का
परिणाम है।
'क्षमाबलम् शक्तानां, शक्तानां भूषणं क्षमा।
क्षमा वशीकृते लोके क्षम्या किं न सिद्धयति।
•क्षमा खडगं करे यस्य शत्रूणां किं करिष्यति।
अतृणा पतिता बन्हि स्वमेवोपशाम्यति।।
•इस प्रकार क्षमा से संसार को भी वश में
कर सकते हैं तथा घर में भी शांति बनी
रहती है। आत्मा में लीन हो सकते हैं।

(1) उत्तम क्षमाः- क्षमा आत्मा का स्वभाव है, क्षमा स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो क्रोध के अभाव रूप शांति स्वरूप पर्याय
प्रकट होती है, उसे क्षमा कहते है। और क्रोध नही करना सहनशील रहना व्यवहारिक क्षमा है। क्रोध आत्मा की एक ऐसी विकृति है, जिसके
कारण प्राणी का विवेक समाप्त हो जाता है, भले बुरे की पहचान नही रहती है, क्रोध में व्यक्ति अन्धा सा हो जाता है। जिस पर क्रोध आता
है, उसको गाली देने लगता है, भला बुरा कहने लगता है, यहाँ तक की स्वयं की जान जोखम में डालकर उसका बुरा करना चाहता है,
उसको मार डालना चाहता है । लोक में जितनी भी हत्यायें, आत्म हत्यायें होती है, वह सब क्रोध के तीव्र आवेश में ही होती है। क्रोधी
व्यक्ति को अपनी गलती कभी नजर नही आती है, सदैव दूसरों की ही गलती दिखाई देती है, द्वारिका जैसी पूर्ण विकसित और सम्पन्न
नगरी का विनाश द्वीपायन मुनि के क्रोध के कारण ही हुआ था। "क्रोधोदयाद् भवति कस्य न कार्य हानिः "क्रोध के उदय में किस किसके
कार्य की हानि नही होती । क्रोध में व्यक्ति तुरन्त बदला लेना चाहता है यदि कारण वशात् बदला तुरन्त नही ले पाये तो वह क्रोध
धीरे-धीरे बैर का रूप धारण कर लेता है और बैर पीढी दर पीढी चलता रहता है, योजना बद्ध तरीके से बदला लेते रहते है कई प्राणी
राग से, लोभ से, कर्म बन्ध से, पाप भय से, पराधीनता से क्रोध नही करते है। एवं अपनी निर्बलता से भी क्रोध नही करते है, जबकि उनके
अन्दर क्रोध की ज्वाला धधकती रहती है। वह बाह्य दृष्टि से क्षमाधारी नही कहे जा सकते है।
वस्तुतः क्षमा तो मुनियों की होती है, श्रावकों, सम्यग्दृष्टियों की होती है। लौकिक में "क्षमा वीरस्य भूषणम् " क्षमा वीरों का आभूषण है, ना
कि निर्बलों एवं कायरों का आभूषण है। क्षमा नाम पृथ्वी का भी है पृथ्वी पर कितने अत्याचार होते है, कहीं कूप खनन, विस्फोट आदि
मगर पृथ्वी सब कुछ शांत भाव से उसे सहन करती रहती है।
क्षमाबलमशक्तानां शत्रुणां भूषणं क्षमा ।
क्षमा वशीकृते लोके क्षमया किं न सिद्धयति ।।
अर्थात् क्षमा असमर्थों को बल देती है और समर्थों की आभूषण है, क्षमा के द्वारा संसार को वश में कर लिया जाता है, क्षमा से
क्या-क्या सिद्ध नहीं होता।
क्रोध भी कई रूपों में पाया जाता है। झल्लाहट, चिडचिडाहट, क्षोभ आदि वस्तुतः पर को क्षमा कई बार किया मगर अपनी
आत्मा को एक बार भी क्षमा नही किया । यदि क्षमा स्वभावी आत्मा का अनुभव करे तो पर्याय में क्षमा प्रकट हो जायेगी फिर क्रोधादि
विकार भाव शुद्ध आत्मा से स्वतः ही नष्ट हो जायेगें यथा —
क्षमा खडगं करे यस्य शत्रुणां किं करिष्यति । अतृणां पतितां वह्नि स्वयमेवोपशाम्यति ।।

उत्तम क्षमा
जय जिनेंद्र पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा. निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज.9460674306 22


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 293.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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