वीतरागतास्वरूप उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
वीतरागतास्वरूप उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
मंगलाचरण-
जो मोह माया मान मत्सर मदन मर्दन वीर हैं।
जो विपुल विघ्नों बीच में भी ध्यान धारण धीर हैं।
जो तरण तारण भव निवारण भव जलधि के तीर हैं।
वे वंदनीय जिनेश तीर्थंकर स्वयं महावीर हैं।।
मंगलाचरण-
अरि मित्र महल मसान कंचन,
कांच निन्दन स्तुति करन।
अर्धावतारन असि प्रहारन में,
सदा समता धरन।।
परिभाषा
उत्तम ब्रह्मचर्य की परिभाषा बतायें?
निश्चय से- ब्रह्मणि चरति इति ब्रह्मचर्यः
ब्रह्म अर्थात् निजशुद्धात्मा में चरना, रमना ही ब्रह्मचर्य है।।
व्यवहार से- स्पर्शन इन्द्रिय के विषय सेवन के त्याग को ही नहीं माना वरन, पांचों इन्द्रियों और मन के विषयों के त्याग को ब्रह्मचर्य कहते हैं।
ब्रह्मचर्य व्रत की भावनायें बतायें?
स्त्रीरागकथाश्रवण तन्मनोहरांग निरीक्षण पूर्वैरतानुस्मरण वृष्येष्ट रस स्वशरीर संस्कार त्यागाः पंच, (मोशा.7-7) 1
ब्रह्मचर्य व्रत की भावनायें
ब्रह्मचर्य व्रत की भावनायें बतायें?
ब्रह्मचर्य व्रत की भावनायें-
- स्त्रीरागकथाश्रवण 2 स्त्रीमनोहरांग निरीक्षण त्याग 3 पूर्वैरतानुस्मरण त्याग 4 कामोद्दीपन रस त्याग 5 स्वशरीरसंस्कार त्याग
ब्रह्मचर्य व्रत के अतिचार बतायें?
ब्रह्मचर्य व्रत के अतिचार-
परविवाहकरणपरगृहीतत्वरिकागमनं अनंगक्रीडा कामतीव्राभिनिवेशाः 7/28,
- परविवाहकरण 2 परगृहीतत्वरिकागमन
- अपरगृहीतत्वरिकागमन 4 अनंगक्रीडा
- कामतीव्राभिनिवेश।
ब्रह्मचर्य धर्म की धारणा क्या है और सही स्वरूप बतायें?
यदि स्पर्शन इन्द्रिय के विषय सेवन के त्याग को ब्रह्मचर्य कहते हैं तो स्पर्शन के आठ पर्यायें हैं ठंडा, गरम, कड़ा, नरम, सूखा, चिकना, हलका और भारी, इनमें आनंद मानना ही विषय सेवन है इनमें से किसी न किसी का सेवन निरंतर चल रहा है, तो ब्रह्मचर्य कहां रहा।
स्पर्शन इन्द्रिय अखण्ड है शेष इन्द्रियां उपांग हैं, अंश हैं, इसलिये इन्द्रियों के विषय सेवन का त्याग करो।
ब्रह्मचर्य धर्म की धारणा क्या है और सही स्वरूप बतायें?
- अखण्ड पद के लिये अखण्ड स्पर्शन इन्द्रिय को जीतना, जैसे पाकिस्तान पर विजय तो सभी राज्यों पर विजय प्राप्त करना है।
- अन्य इन्द्रियों का विषय सेवन तो कभी कभी होता है स्पर्शन का निरंतर चलता रहता है।
- इन्द्रियों की बहिर्वृत्ति है, तो आत्मा की अन्तःवृत्ति में है।
ब्रह्मचर्य धर्म की धारणा क्या है और सही स्वरूप बतायें?
- ब्रह्मचर्य को पदवी बना दिया गया, बड़ी सभाओं में घोषणा की जाने लगी, दिखावे की होड़ लग गयी।
- जैसे कुम्हार के चाक पर मिट्टी के पात्र बनते हैं, वैसे ही नारी के संसर्ग से मन में नाना प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं।
- इन्द्रियों द्वारा परपदार्थों को भोगना और आनन्द मानना ब्रह्मचर्य का घातक है।
- पांचों पापों के त्याग को ब्रह्मचर्य कहते हैं। पापों में कुशील की प्रमुखता रहती है।
ब्रह्मचर्य धर्म पालन के लिये कैसा चिंतन करना चाहिये?
- शील की रक्षा नौ बाड़- कुशील का सेवन मन,वचन,काय,'कृत,कारित, अनुमोदन अगुणा3= 9 से रक्षा करना।
- ब्रह्मचर्य सिद्धि के लिये असंगति और अभक्ष्य का त्याग-उदा.नृत्यशाला,मृदंग, धिक्कार,मजीरा किनको,नर्तकी दर्शकों की ओर हाथ फैलाकर इनको।
- बाजार की, अभक्ष्य, अनजान वस्तु का सेवन नहीं। मर्यादित सामग्री का सेवन
ब्रह्मचर्य धर्म पालन के लिये कैसा चिंतन करना चाहिये?
- सप्त व्यसनों का त्यागी होना चाहिये जुआ,चोरी,शराब,परस्त्रीगमन,वेश्यागमन, मांस,शिकार खेलने का त्यागी हो।
- ब्रह्मचर्य बिना तप व्रत आदि की निष्फलता
- ब्रह्मचर्य के विपरीत बात सुनने में अनर्थ, उदा.शेखचिल्ली, स्वप्न में शादी, बच्चे, पत्नी से झगड़ा, थप्पड़ मारना
ब्रह्मचर्य धर्म पालन के लिये कैसा चिंतन करना चाहिये?
- शीलव्रत का उदा, लक्ष्मण का राम को कथन नाहं जानामि केयूरे, नाहं जानामि कुण्डले। नूपुरे त्वामि जानामि, नित्यं पदाभिवन्दनात्।।
- कारण एक विचार अनेक-उदा. मरी वेश्या, कामी पुरुष, कुत्ता, चोर, ब्रह्मचारी।
- मन में विकारभाव उत्पन्न नहीं हो।
- आचार्यों का उपदेश-
तू स्थाप निज को मोक्ष पथ में,
घ्या अनुभव तू उसे।
उसमें ही विहार कर,
न विहार कर पर द्रव्य में।।
ब्रह्मचर्य धर्म पालन के लिये कैसा चिंतन करना चाहिये?
जिसने कामभाव को जीत लिया वो महावीर-
अनिवारोद्रेकस्त्रिभुवन जयी काम सुभटः।
कुमारवास्थायामपि निजबलघातेनविजितः।।
स्फुरित्यानन्द प्रक्षमपदराज्याय स जिनः।
महावीरस्वामी नयन पथगामी भवतु मे।
इसी प्रकार से काम रूपी शत्रु को जीते।
- नारी जाति के प्रति मातृत्व, धन के प्रति मिट्टी के समान दृष्टि रहनी चाहिये-
मातृत्वत् परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
वीतरागता उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
ब्रह्मचर्य धर्म पालन के लिए कैसा चिंतन करना चाहिए?
- नीतिकार का कथन-
स्त्रियश्चरित्रं पुरुषस्य भाग्यं देवो न जानाति कुतो मनुष्यः।
किसी भी प्रकार के प्रलोभन में नहीं आयें।
क्योंकि-नारी - न, अरि जिसके समान कोई शत्रु न हो। - जैसे नमक की पोटली पानी में घुलते ही हल्की हो जाती है वैसे ही कर्मों की निर्जरा होते ही आत्मा शुद्ध हो जाती है।
- ब्रह्मचर्य में अडिग- सेठ सुदर्शन, नेमिनाथ, जम्बूस्वामी।
वीतरागता उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
दशलक्षण पूजा का छंद-
शील बाढ़ नौ राख,ब्रह्म भाव अन्तर लखो।
करि दोनों अभिलाख, करहु सफल नर भव सदा।।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन आनौ, माता बहिन सुता पिछानौ।
सहै बान वरषा बहु सूरे, टिकै न नैन बान लखि कूरे।।
कूरे तिया के अशुचि तन में, काम रोगी रति करें।
बहु मृतक सडहिं मसान माहीं, काग ज्यों चोंचैं भरैं।।
संसार में विष बेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा।
घानत धरमदश पैंडि चढ़ि कै, शिव महल में पग धरा।।
वीतरागता उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
पूजन के छंद का अर्थ-
शील को नौ बाड़े लगाकर सुरक्षित रखना चाहिए,(व्यवहार ब्रह्मचर्य) और अन्तर में ब्रह्म अर्थात् आत्म चिंतन करना चाहिए(निश्चय ब्रह्मचर्य) शील की नौ बाड़ों की एवं आत्मचिंतन इन दोनों की प्राप्ति के अभिलाषी बनके मनुष्य जन्म सफल करना चाहिए। उत्तम ब्रह्मचर्य मन में धारण कर माता, बहिन और पुत्री की पहचान करना चाहिए। यह जीव रणभूमि में सूरवीरों द्वारा की जाने वाली बाणों की वर्षा को सहन कर लेता है। परन्तु स्त्रीयों के क्रूर नेत्र रूपी बाण को सहन नहीं कर पाता, ऐसा काम रोग से पीड़ित स्त्री के अपवित्र शरीर में रति(प्रेम) करता है जिस प्रकार श्मशान में मरे,सड़े हुए शरीर में कौआ प्रेम करके चोंचों से मृत शरीर को खाता है। संसार में स्त्री विष बेल के समान है। इसलिए सभी मुनिराजों ने स्त्रियों का त्याग कर दिया। श्री घानतराय जी कहते है कि वे दश धर्म रूपी सीढ़ियां चढ़कर मोक्ष रूपी महल में प्रवेश हो जाता है।
वीतरागता उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
(6) उत्तम ब्रह्मचर्य-
ब्रह्म अर्थात् निज शुद्धात्मा में चरण, रमण करना ही ब्रह्मचर्य है। उक्त च’‘ब्रह्मणि चरति इति ब्रह्मचर्यः’'निश्चय से अपनी आत्मा में विचरण करना, रमना जमना एवं अनुभव करना ही ब्रह्मचर्य है। व्यवहार से पंचेन्द्रियों के विषयों के त्याग को ब्रह्मचर्य कहते है। काम और भोग के विषयों के त्याग को बाह्य(व्यवहार) ब्रह्मचर्य कहते है!
‘‘मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत्’’ पर स्त्री को माता के समान और पर द्रव्य को मिट्टी के समान मानने वाला ब्रह्मचर्य का साधक बन सकता है !
वीतरागता उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
उत्तम ब्रह्मचर्य
जय जिनेंद्र
पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा. निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज. 9460674306
मूल दस्तावेज़ (PDF): 302.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है