वीतरागतास्वरूप उत्तम आकिंचन धर्म
वीतरागतास्वरूप
उत्तम आकिंचन धर्म
मंगलाचरण–
अंजुली जल सम जवानी क्षीण होती जा रही।
प्रत्येक पल जर्जर जरा नजदीक आती जा रही।।
काल की काली घटा प्रत्येक क्षण मंडरा रही।
किन्तु पल-पल विषय तृष्णा तरूण होती जा रही।।
मंगलाचरण–
अहमेक्को खलु सुद्धो
दंसण णाण मइओ सदारुवी।
णवि अत्थि मज्झकिंचिवि
अण्णं परमाणुमित्तंपि।।
उत्तम आकिंचन धर्म की परिभाषा?
दश धर्मों का सार क्या है?
आकिंचन्य धर्म की विरोधी बतायें?
न किंचनः इति अकिंचनः तस्यभावः आकिंचनः। ज्ञानानंदस्वभावी आत्मा के अतिरिक्त कुछ भी मेरे नहीं है ऐसा जानना, मानना, और पर पदार्थों से विरक्त होना ही आकिंचन्य धर्म है।
आकिंचन ब्रह्मचर्य धर्म दश सार हैं।
चहुँगति दुःखें आदि मुक्ति करतार हैं।।
आकिंचन्य धर्म की विरोधी परिग्रह है।
परिग्रह किसे कहते हैं मूर्च्छा परिग्रहः, ममत्वपरिणामः परिग्रहः।
परिग्रह के भेद बतायें?
परिग्रह के भेद– आभ्यंतर 14 प्रकार का और बाह्य 10 प्रकार का परिग्रह
आभ्यंतर परिग्रह के भेद–मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा,(ग्लानि) स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद।
बाह्य परिग्रह के भेद– क्षेत्र(खेत,प्लाट) वास्तु (निर्मित भवन) धन(चांदी, सोना, जवाहरात,मुद्रा) धान्य, द्विपद (मनुष्य, पक्षी) चतुष्पद (पशु) यान (सवारी) शय्यासन, कुप्य, भांड।
परिग्रह का स्वरूप बतायें?
परिग्रह सबसे बड़ा पाप है तो आकिंचन्य सबसे बड़ा धर्म है।
दुनियाँ रूपये, धन, मकान गाड़ी आदि को ही परिग्रह जानती है, मानती है, आभ्यंतर परिग्रह को नहीं।
अंतरंग परिग्रह के त्याग बिना बाह्य परिग्रह का त्याग कार्यकारी नहीं।
परिग्रह का स्वरूप बतायें?
- परिग्रह में रुपया पैसा को मानेंगे तो मनुष्यगति के अलावा किसी भी गति में रुपये का व्यवहार नहीं होता।
- पदार्थों का अभाव ही नहीं करना वरन उनके प्रति ममत्वभाव का भी त्याग करना है।
- हास्य परिग्रह है इसलिये मूर्तियों को हसमुख कहना अवर्णवाद है।
- ममेदंबुद्धिलक्षणं परिग्रहः, परपदार्थ स्वयं परिग्रह नहीं है इनके प्रति ममत्वबुद्धि ही परिग्रह है।
परिग्रह का स्वरूप बतायें?
- अहंबुद्धि, कर्तृत्वबुद्धि, ममत्वबुद्धि, ही मिथ्यात्व है। यही बड़ा परिग्रह है इसको सबसे पहले छोड़ना चाहिये।
- पर को अपना मानने के त्याग के साथ तत्संबंधी राग के त्याग से मिथ्यात्व छूटता है। परिग्रह का त्याग करना है।
- यहां मुनियों की मुख्यता से कथन है तथा गृहस्थों को भी भूमिकानुसार परिग्रह का त्याग करना चाहिये।
परिग्रह का स्वरूप बतायें?
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परि अर्थात चारों ओर से ग्रह अर्थात ग्रहण करे, संचय करे, वह परिग्रह कहलाता है।
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रागद्वेष मोहादि मेरे नहीं हैं।
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मुक्ति के अभिलाषी को समस्त परिग्रह का त्याग करना चाहिये।
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मोहरागद्वेष भावों की उत्पत्ति का नाम ही हिंसा है, परिग्रह है-
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अप्रादुर्भावः खलु रागादीनां भवत्यहिंसेति।
तेषामेवोत्तपत्तिर्हिंसेति जिनागमस्य संक्षेपः।। -
संतोष भाव से दरिद्रता का अभाव- उदा. फकीर, एक पैसा, राजा जो दूसरे राजा से युद्ध करने जा रहा था, फकीर ने राजा पर पैसा फेंक दिया, जिसके मन में संतोष नहीं वह सबसे बड़ा गरीब है। राजा विरक्त हो गया। मोह माया में सुख मान रहा था ससे विरक्त हुआ
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भ्रम से संकट-उदा. सेठ, गेरू(लाल रंग) शौच को गया लाल रंग देखकर भ्रम से बीमार हो गया, कितना खून निकल गया, बच्ची द्वारा सही बात सुनने से भ्रम मिट गया। वैसे ही जीव अज्ञान अवस्था में भटक रहा है ज्ञान होते ही वैराग्य धारण कर लेता है।
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भ्रम की मार- उदा. जैसे किसी ने बच्चे से कह दिया तेरा कान कौआ ले गया, बच्चा रोता हुआ इधर उधर भागता है, किसी सज्जन के समझाने पर शांत होता है वैसे ही यह जीव संसार के विषयों में सुख खोजता फिरता है, भटकता है, ज्ञानिजनों के सम्बोधन से ज्ञान होता है विषयों की संसार की असारता को छोड़ता हुआ आकिंचन धर्म की प्राप्ति करता है।
परिग्रह त्यागी की स्थिति बतायें?
- परिग्रह मुक्त राजा भरत-
ज्ञान कला जिनके घट जागी,
ते जगमाहीं सहज बैरागी।
ग्यानी मगन विषै सुखमाहिं,
यह विपरीत संभवै नाहीं।। - जैसे बच्चे रूठ जाते है किसी की नहीं सुनते वैसे ही विषयकषायों से रूठ जाओ, इन्द्रियों की मत सुनो।
वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
कैसा चिंतन करना चाहिये ?
- मेरा स्वरूप देहवाला नहीं जाति, कुल, वर्ण वाला नहीं, मैं तो ज्ञायक हूँ।
- मेरा स्वरूप पुद्गल वाला, इसकी पर्यायों वाला नहीं, मैं तो स्व से परिपूर्ण हूँ अतीन्द्रिय हूँ।
- अपने ज्ञानदर्शन स्वरूप के बिना अन्य किंचित मात्र भी मेरा नहीं है, मैं किसी अन्य द्रव्य का नहीं, ऐसे अनुभव को आकिंचन कहते हैं।
- छंद-तन से जिनका ऐक्य नहीं,
हो सुत, तिय मित्रों से कैसे।
चर्म दूर होने पर तन से,
रोम समूह रहें कैसे।।
वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
कैसा चिंतन करना चाहिये ?
- ज्ञानानंद स्वभावी आत्मा को जानना, मानना, रम जाना ब्रह्मचर्य है तो उससे भिन्न पर पदार्थों एवं उनके लक्ष्य से उत्पन्न होने वाले चिद् विकारों को अपना नहीं मानना, नहीं जानना, नहीं रमना आकिंचन धर्म है।
- जैसे समुद्र से नदी नहीं निकलती भले ही पानी का भंडार हो,(साकिंचन) पहाड़ से निकलती है भले पानी नहीं हो,(आकिंचन) वैसे ही कषायों से आकिंचन नहीं बना जाता।
वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
कैसा चिंतन करना चाहिये ?
- जगत के पदार्थ सुन्दर दिखते हैं, सु उपसर्ग, उन्दी क्लेदने धातु है अरच्य प्रत्यय से बना है अर्थात् जो तड़फा तड़फा कर मारे, क्लेद करे, दुखी करे, ऐसे सुन्दर पदार्थ पर मत रीझो।
- मन नपुंसक लिंग है इन्द्रियों के पीछे भागता रहता है।
- जैसे आतिशी शीशे से कागज जल जाता है, वैसे ही इन्द्रिय, मन पर संयम हो तो आकिंचन धर्म की प्राप्ति होती है।
- पाप के उदय से पापी नहीं होता है, ज्ञानियों को भी पाप का उदय आता है।
वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
कैसा चिंतन करना चाहिये ?
- अंतरंग शुद्धि होने से बहिरंग शुद्धि नियम से होती है। उदा. घड़े के अंदर पानी हो तो बाहर गीला हो ही जाता है।
- व्यसनमुक्त एवं सदाचार युक्त जीवन होने से जैनियों के पास संपत्ति दिखाई देती है। लेकिन संपत्ति के मोह में फंसते नहीं, इसीलिये दान करते हैं।
- नास्तिरूप से आकिंचन्य अस्ति रूप से ब्रह्मचर्य धर्म
वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
दशलक्षण पूजा का छंद-
परिग्रह चौबीस भेद, त्याग करै मुनिराजजी।
तिसना भाव उच्छेद, घटती जान घटाईए।।
उत्तम आकिंचन गुण जानों, परिग्रह चिंता दुख ही मानों।
फाँस तनक़ सी तन में सालै, चाह लंगोटी की दुख भालै।।
भालैं न समता सुख कभी नर, बिना मुनि मुद्रा धरै।
धनि नगन पर तन नगन ठाडे, सुर असुर पायनि परै।।
घरमाहिं तिसना जो घटावै, रुचि नहीं संसार सों।
बहु धन बुरा हूँ भला कहिये, लीन पर उपगार सों।।
वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
पूजन के छंद का अर्थ-
परिग्रह के चौबीस भेद हैं उनका त्याग (व्यवहार आकिंचन) मुनिराज करते हैं और तृष्णा भाव को नष्ट करते हैं (निश्चय आकिंचन) श्रावकों को भी धीरे-धीरे दोनों प्रकार के परिग्रह को घटाना चाहिए। उत्तम आकिंचन श्रेष्ठ गुण है, परिग्रह चिन्ता दुःख के ही पर्याय है छोटी सी फाँस भी पूरे शरीर को दुःखी कर देती है, उसी प्रकार लंगोटी का आवरण या लंगोटी की चाह दुःख को देने वाली होती है। यह मनुष्य महाव्रत अर्थात् निर्ग्रन्थ दिगम्बर मुनि की मुद्रा को धारण किये बिना समता और सुख को प्राप्त नहीं कर सकते। वे मुनिराज धन्य हैं जो पर्वतों पर नग्न खड़े रहकर तप करते हैं। उनके चरणों की पूजा सुर असुर आदि सभी करते हैं। घर में रहते हुए भी जो तृष्णा को घटाते हैं, तथा जिनकी रुचि संसार में नहीं है। ऐसे जीवों का धन यद्यपि बुरा ही होता है, परोपकार में लगने के कारण फिर भी अच्छा कहा गया है।
वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
(6). उत्तम आकिंचनः-
न किंचनः इति आकिंचनः तस्य भावः आकिंचनः! किंचनः कः ?
परिग्रहः ! कः परिग्रहः ? मूर्च्छा परिग्रहः, ममत्व परिणामः परिग्रहः!
परिग्रहस्य कति भेदः ? द्वौ आभ्यन्तरवाह्यचेति ! मिथ्यात्व, क्रोध,
मान, माया, लोभ, हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा,
स्त्रीवेद, पुरूषवेद, नपसंकवेद !
वाह्य परिग्रहः दशधाः- क्षेत्र (खेत, प्लाट) वास्तु (निर्मितभवन) धन (चांदी, सोना,
जवाहरात, मुद्रा) धान्य, द्विपद (मनुष्य, पक्षी) चतुष्पद (पशु) यान (सवारी) शय्यासन,
कुप्य, भांड। पहले अंतरंग परिग्रह का त्याग होता है फिर बाह् परिग्रह
का। बाह्य परिग्रह का त्याग भावों की शुद्धि के लिए किया जाता
है परन्तु रागादि भाव रूप आभ्यन्तर परिग्रह के विना वाह्य परिग्रह
का त्याग निष्फल है। पर पदार्थ के छूटने से कोई अपरिग्रही नहीं
होता,बल्कि उसके रखने का भाव उसके प्रति एकत्व बुद्धि या ममत्व
परिणाम छोडने से परिग्रह छूटता है। आत्मा तो अपरिग्रही अर्थात्
आकिंचन धर्म का धनी है।
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वीतरागता उत्तम आकिंचन धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
Image of a Jain monk meditating under a tree, with another person bowing before him. Text “उत्तम आकिंचन्य” is visible below the image.
जय जिनेंद्र
पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा. निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज.9460674306
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मूल दस्तावेज़ (PDF): 301.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है