वीतरागता-स्वरूप उत्तम त्याग धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Vitaragata-Swaroop Uttam Tyag Dharm

वीतरागता-स्वरूप उत्तम त्याग धर्म

वीतरागतास्वरूप उत्तम त्याग धर्म

मंगलाचरण-

  • निसंग हैं जो वायु सम निर्लेप हैं आकाश से।
    निज आत्म में ही विहरते जीवन न पर की आश से।।
    जिनके निकट सिंहादिक पशु भी भूल जाते क्रूरता।
    उन दिव्य गुरुओं की अहो कैसी अलौकिक शूरता।।
  • तुम सा दानी क्या कोई हो,
    जग को दे दी जग की निधियाँ।
    दिन रात लुटाया करते हो,
    सम शम की अविनश्वर मणियाँ।।

उत्तम त्याग की परिभाषा बतायें?

  • निश्चय से- निजशुद्धात्मपरिग्रहं कृत्वा बाह्याभ्यन्तरपरिग्रह निवृत्तिस्त्यागः।
    निज शुद्धात्म के ग्रहण पूर्वक बाह्य और अंतरंग परिग्रह से निवृत्ति त्याग है,
  • व्यवहार से-त्यजति इति त्यागः हेय वस्तु का त्याग।

किसका त्याग करें?

  • त्याग का अर्थ है अभिप्राय में ममत्वभाव का त्याग, जैसे लड़की की सगाई होते ही इस घर से ममत्व नहीं छूट जाता है।

कैसी वस्तु का त्याग करें?

  • त्याग अच्छी व बुरी, उपयोगी व अनुपयोगी वस्तु का करना चाहिये। लेकिन अधिकांश लोग अनुपयोगी वस्तु का ही त्याग करते हैं।
  • त्याग करना है तो 24 परिग्रहों का त्याग करो-14 अंतरंग, 10 बहिरंग, हिंसादि पांच पापों का त्याग करो।

त्याग का स्वरूप बतायें?

  • त्याग ज्ञान में होता है वस्तु में नहीं, वस्तु हो या न हो। उदा. धोबी और चादर का एवं भरत चक्रवर्ती का, भरत घर में बैरागी।

सच्चा त्याग क्या है?

  • मोहभाव का त्याग –
    त्यजतु जगदिदानां मोहमाजन्मलीनं,
    रस्यतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत्।
    इह कथमपि नात्मानमात्मना साकमेकः,
    किल कलयति काले क्वापि तादात्म्य वृत्तिम्।।
    (समयसार कलश 22)
  • जो दुःख स्वरूप हैं, दुःखकार है, आत्मा का अहित करने वाले हैं वे रागद्वेषमोहरूप आश्रव भाव त्यागने योग्य

किसका अनुभव करें-

  • क्षण मात्र के लिये अपनी आत्मा का अनुभव करें-
    अथ कथमपि मृत्वा तत्वकौतुहली सन्,
    अनुभव भव मूर्तैः पार्श्ववर्ती मुहूर्तम्।
    पृथगथ विलसंतं स्वं समालोकय येन,
    त्यजसि झगिति मूर्त्यासाकमेकत्वमोहम्।।
    समयसार कलश 23

त्याग धर्म का स्वरूप क्या है?

  • त्याग से मंजिल तक-उदा. छत पर जाने के लिये सीढ़ियां, नाव, मुशाफिर, नाविक, पैसे का त्याग, नदी पार।

त्याग धर्म का स्वरूप क्या है?

  • त्याग एक धर्म भी है और भावना भी है।
  • सम्यक अरागपूर्वक का त्याग मोक्ष, रागपूर्वक का त्याग पुण्य।
  • त्याग नं. 6 की भावना है ऐसा त्याग करें कि छूटते गुणस्थान की प्राप्ति हो जाये।
  • त्याग का फल आकिंचन धर्म की प्राप्ति होती है।
  • त्याग के दिन दान की चर्चा, दान करने से संस्थाओं का विकास भी होता है दान जीव कल्याण के लिये।

त्याग धर्म व दान में क्या अंतर है?

  • दान की परिभाषा- अनुग्रहार्थ स्वस्यातिसर्गो दानम् एवं परानुग्रहबुद्धया स्वस्यातिसर्जनं दानम्।
  • त्याग परद्रव्यों का ही नहीं अपितु स्व परिणामों का भी होता है जैसे मोहादि, रूपये आदि वस्तुयें।
  • दान स्वपरिणामों का ही नहीं अपितु अपनी वस्तु का भी किया जाता है, जैसे रूपये, वस्तु आदि।

त्याग धर्म व दान में क्या अंतर है?

  • वस्तु, रूपये पैसे का दान भी होता है तो त्याग भी होता है।
  • दान स्व वस्तु का ही होता है तो त्याग पर वस्तु का भी हो सकता है।
  • दान में पुण्य की भावना प्रमुख होती है तो त्याग में धर्म की भावना।
  • दान और त्याग में अंतर- त्याग में शुद्धभाव, धर्म, महान, स्वाधीनता है, तो दान में शुभभाव, पुण्य, पराधीन, परतंत्रता है।

त्याग धर्म व दान में क्या अंतर है?

  • दान में मोह नहीं छूटता, कषायें मंद होती है।
  • त्याग में मोहादि भाव छूट जाते है, कषायों का अभाव होता है।
  • त्याग खोटी चीज का, दान अच्छी चीज का होता है, जैसे क्रोधादि त्याग, दान नहीं।
  • कुछ का त्याग होता है दान नहीं, जैसे रागद्वेष, माता पिता, स्त्री आदि।
  • कुछ का दान होता है त्याग नहीं, जैसे ज्ञानदान, अभयदान।
  • कुछ का दान भी होता है त्याग भी जैसे आहार, औषधि, रूपया, पैसा आदि।

दान का स्वरूप बतायें?

  • दान के 4 भेद- ज्ञानदान, आहारदान, औषधिदान, अभयदान।
  • दान में देनेवाला, लेने वाला व वस्तु की आवश्यकता होती है मगर त्याग में कुछ भी नहीं चाहिये।
  • दान कमाई पर प्रतिबंध नहीं लगाता, त्याग के बाद कुछ भी नहीं कमा सकते।
  • दान देने को कहते हैं मगर त्याग न देने न लेने को कहते हैं।

दान का स्वरूप बतायें?

  • दान में संयोग होता है, त्याग में वियोग होता है।
  • दान तो निर्लोभियों का था मगर यश और पैसों के लोभियों ने विकृत कर दिया, संस्थाओं में चारों दान।
  • संक्लेश परिणामों से दिया गया चंदा दान नहीं हो सकता।
  • वास्तविक दान- दान देय मन हरष विशेषे, इह जस परभव सुख देखे।
  • संयतस्य योग्य ज्ञानादि दान पुण्य।

दान का स्वरूप बतायें?

  • दान की प्रेरणा-
    सत्पात्रेषु यथाशक्ति, दानं देयं गृहस्थितेः।
    दानहीना भवेत्तर्षा, निष्फलैव गृहस्थिता।।
    पद्मनंदी
  • दान नहीं दिया तो पुण्यक्षीण हो जाता है।
    जैसे कुये से पानी नहीं निकाला तो विषैला जाता है।
  • मानपूर्वक दान का फल-
    मान बढ़ाई कारणे जे धन खरचे मूढ।
    मरकर हाथी होयेंगे, धरती लटके सूंड।।

सज्जन का क्या कर्तव्य है?

  • सज्जन का कर्तव्य-
    पानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम।
    दोनों हाथ उलीचिये यह सज्जन का काम।

  • पदानुसार कार्य-
    ध्यानेन शोभते योगी, संयमेन तपोधनः।
    सत्येन वचसा राजा, गृही दानेन शोभते।।

  • आवश्यक कर्तव्य-
    देव पूजा गुरुपास्ति, स्वाध्याय संयमःतपः।
    दानं चेति गृहस्थानां षट कर्माणि दिनेदिने।।

  • आत्मा में पर वस्तुयें प्रवेश नहीं कर सकती है यदि प्रवेश करे तो वस्तु तो जड़ है फिर आत्मा भी एकमेक होकर जड़रूप हो जाना चाहिये, तो त्याग कैसे करें, वस्तुओं के प्रति ममत्वभाव का त्याग करना चाहिये।

  • धन की तीन स्थिति- भोग, दान और नाश।

  • त्याग से दूसरों पर भी विजय-उदा. राजा युद्ध के लिये जा रहा था रास्ते में साधु मिला, बताया जो बैर भाव तुम्हारे अंदर बैठा है पहले उस पर विजय तो कर लो, राजा ने विचार किया दीक्षा ले ली, शत्रु राजा आया देखकर चरणों में झुक गया।

  • अभयदान की महिमा -विशल्या ने उस रहे अजगर को अभयदान दिया था। मरकर देव हुई फिर राजा के यहां विशल्या नाम से जन्म जिसके नहाने के पानी से दूसरों का रोग दूर हो जाता था।

  • धन का दान करने से इस भव में यश, परभव में पुण्य-उदा. राजा, दान मंत्री की चतुराई, हथेली में बाल क्यों नहीं, दान देने से, दान लेने से, हाथ मलने से।

  • त्याग से शांति-उदा. शराबी को डॉक्टर ने कहा जिन्दा रहना है तो शराब, एवं अन्य नशाकारों का त्याग कर दो, तो कर देता है मगर विद्वान कहें तो हंसता है।

  • दान तीन प्रकार का-1.राजसदान-बदले में कुछ पाने की लालसा, 2.तामसीदान-अपात्रों को दान देना, 3.सात्विक दान- कषायों से रहित, सद्भावनापूर्वक देना।

दान की परंपरा किसने शुरू की?

  • राजा श्रेयांस ने मुनि आदिनाथ को इक्षुरस का आहार देकर आहार दान की परंपरा शुरू की।

दान से पुण्य की प्राप्ति?

  • जैसे नारियल के अंदर पानी आ जाता है वैसे ही पुण्योदय से संपत्ति आती है।
  • जैसे हाथी कैंथ(बील) को साबुत निगल जाता है और अंदर का सारा रस चूस लेता है वैसे ही पापौदय में धन चला जाता है।

दान से पुण्य की प्राप्ति?

  • दान से पुण्य- घर गये सो खो गये, दे गये सो ले गये। (पुण्य की प्राप्ति)

कहाँ दान व्यर्थ है-

वृथावृष्टिः समुद्रेषु, वृथा तृप्तेषु भोजनं।
वृथा दानं धनाढ्येषु, वृथा दीपो दिवापि च।

  • दान पात्र जीव को दिया जाता है कुपात्र को नहीं अन्यथा कुभोग भूमि में जाना पड़ेगा। उदा. सेठानी, मछुवारा, रजार्ड संपत्ति का विनाश।

धन की स्थिति-

आपदार्थ धनं रक्षेत्? श्रीमतां कुतःआपदा।
क्वाचिदत्वात समायाति? संचितोऽपि विनश्यति।

दश लक्षण पूजा का छंद-

दान चार परकार, चार संघ को दीजिए।
धन बिजुली उनहार, नर भव लाहो लीजिए।।
उत्तम त्याग कह्यो जगसारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निहचै रागद्वेष निरवारें, ज्ञाता दोनों दान संभारें।।
दोनों संभारें कूप जल सम,दरब घर में परिनिया।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय खोया बह गया।।
धनि साधु शास्त्र अभय दैवैया, त्याग राग विरोध को।
बिन दान श्रावक साधु दोनों, लहें नाही बोध को।।

सरल अर्थ

पूजन के छंद का अर्थ- दान चार के हैं ये चारों दान चार संघ अर्थात् मुनि,आर्यिका,श्रावक,श्राविका को देना चाहिए। धन सम्पत्ति वैभव बिजली की चमक की तरह है अतः मनुष्य भव का लाभ लेना चाहिए। उत्तम त्याग समस्त संसार में श्रेष्ठ है। वे दान औषधदान, शास्त्रदान, अभयदान, ज्ञानदान के भेद से चार प्रकार का है। यह तो व्यवहार त्याग है। निश्चय त्याग- रागद्वेषके त्याग को कहते हैं। ज्ञानीजन दोनों दान(निश्चय और व्यवहार) करते हैं। कुँए का पानी खर्च न हो तो खराब हो जाता है। और यदि खर्च होता रहे तो खराब नहीं होता। उसी प्रकार घर में धन सम्पत्ति वैभव हो तो दान करना चाहिए जो श्रेष्ठ है। नहीं तो नष्ट हो जायेगा लेकिन रहने वाला नहीं है। धन्य हैं वे साधु जो शास्त्रदान, अभयदान के देने वाले है और रागद्वेष का त्याग करने वाले हैं। बिना दान के श्रावक और साधु दोनों ही सम्यक्ज्ञान को प्राप्त नहीं होते।

(6).उत्तम त्याग:-

त्याग धर्म की जब भी चर्चा होती है तब नेगेटिव रूप से दान की चर्चा चलने लगती है अर्थात् रुपया, पैसा, धन, धान्यादि दान करना ही त्याग माना जाता है ! वस्तुतः त्याग तो “त्याजति इति त्यागः” जिसका सर्वथा त्याग किया जाये वह त्याग है !
त्याग वस्तु का नहीं वस्तु के प्रति ममत्व आदि परिणामों का होता है एवं परिणाम का त्याग हो जाये तो वस्तु का त्याग स्वतः ही हो जाता है !
दान में मोह नहीं छूटता है दान करने के बाद और कमाने की इच्छा होती है दान-नाम, यश, कीर्ति आदि के लोभ से दिया जाता है और त्याग में कोई चाह नहीं होती है !
त्याग बुरी वस्तु का करते है कुछ वस्तुएँ ऐसी है जिनका त्याग भी होता है और दान भी जैसे- आहार, औषधि, रुपया, पैसा !
कुछ का त्याग होता है, दान नहीं जैसे- रागद्वेष, माता-पिता, स्त्री आदि ! (राग दान, माता दान आदि नहीं ) कुछ का दान होता है त्याग नहीं जैसे- ज्ञान दान अभय दान (ज्ञान त्याग नहीं ) दान में योग्य दान योग्य वस्तु योग्य पात्र होना चाहिए ! त्याग में कुछ भी नहीं चाहिए ! दान चार प्रकार के कहे गये है !
(1) औषध
(2) शास्त्र
(3) अभय
(4) आहार !


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 300.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है