वीतरागता स्वरूप उत्तम सत्य धर्म
वीतरागतास्वरूप उत्तम सत्य धर्म
मंगलाचरण-
कठिन वचन मत बोल,
पर निन्दा अरु झूठ तज।
साँच जवाहर खोल,
सतवादी जग में सुखी।।
उत्तम सत्य धर्म की परिभाषा बतायें?
निश्चय से- सत्ते हित यत कथ्यते तत् सत्यम् तथा सद्द्रव्य लक्षणम् 5/29, उत्पादव्ययध्रौव्य युक्तं सत् 5/30, व्यवहार से हित मित प्रिय और सत्य बोलना सत्य धर्म है।
सत्यवचन को सत्यधर्म माना जाय तो?
सत्यवचन को सत्यधर्म मान लिया जाय तो सत्य धर्म की खोज बंद हो जायेगी, उदा. नकली हत्यारे को पकड़ने पर असली हत्यारा नहीं मिलेगा,
जो सत्य धर्म को नहीं जानते हैं वह खोजकर सत्यधर्म प्राप्त कर लेंगे, मगर जिसने सत्य वचन को ही सत्यधर्म मान लिया वह कभी सत्यधर्म को प्राप्त नहीं कर सकते। उदा.जागृत व्यक्ति सोने का बहाना करना
सत्यवचन को सत्यधर्म माना जाय तो?
वचन पुद्गल का पर्याय है, सत्य है आत्मा का धर्म।
सत्याणुव्रत, सत्यमहाव्रत, भाषासमिति, वचनगुप्ति
सत्यवचन को सत्यधर्म मानोंगे तो सिद्धों के सत्यधर्म नहीं बनेगा क्योंकि वचन का अभाव है।
सत्य बोलना धर्म नहीं है तो झूठ बोलना धर्म कैसे हो सकता है। यह तो पाप है, तो मौन रहना धर्म है क्या? नहीं फिर तो एकेन्द्रियके वचन व्यवहार नहीं है वह भी सत्यधर्म के भागीदार होंगे।
सत्याणुव्रत, सत्यमहाव्रत में क्या अंतर है?
सत्याणुव्रत और सत्यमहाव्रत में अंतर-
अणुव्रत गृहस्थों के, महाव्रत मुनियों के होते हैं।
जो सदा रहे वही धर्म है जो छुट जाये वह धर्म नहीं, उदा. महाव्रत होने पर अणुव्रत छूट जाते हैं।
सत्य को मानने से पहले जानना क्या जरूरी है?
सत्य बोलने से पहले सत्य जानना जरूरी है, समझना जरूरी है।
सत्य जानने पर भी जीवन भर न बोले तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
सत्य बोलने वाले को सोचना पड़ता है झूठ बोलने वाले को नहीं, उदा.दिल्ली में कितने कोय हैं
सत्य बोलना सरल है झूठ बोलना कठिन है, उदा. बच्चे का कथन पापा कह रहे है कि पापा घर पर नहीं है।
युधिष्ठिर का कथन अश्वत्थामा हतः नरो न कुंजरो वा।
सत्य को मानने से पहले जानना क्या जरूरी है?
सत्य जानना और मानना ही सत्यधर्म नहीं, सत्य समझपूर्वक उत्पन्न वीतराग परिणति ही सत्यधर्म है।
सत्य या असत्य वस्तु में नहीं, ज्ञान या दृष्टि में होता है, पट को घट कहे तो वस्तु में परिवर्तन नहीं।
गल्ती जहां हो वहां मिटानी चाहिये, उदा. चेहरे पर दाग है दर्पण में नहीं।
वस्तु खोती नहीं वस्तु संबंधी ज्ञान अवश्य खो जाता है।
असत्य बोलने से क्या हानि है?
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असत्य बोलने से राजा वसु की दशा।
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सत्य के घात से घोर आपदायो का भोक्ता।
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नौकर द्वारा वर्ष में एक बार झूठ बोलने से सेठ सेठानी का परिवार में विकट स्थिति।
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झूठ बोलने वाले पर विश्वास कोई नहीं करता जैसे ग्वाले ने कहा मेरी बकरियों को शेर खा गया।
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झूठ से एकबार ही भ्रमित किया जा सकता है, जैसे-काष्ठ की हांडी एक बार ही चढ़ाई जा सकती है
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परपीड़ाकारी वचन न बोलने से आत्मरक्षा- उदा. जीभ और दांत।
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निष्ठुर वचन बाण के समान- उदा.जंगल में शेर के पैर में कांटा चुभ गया, डरते लकड़हारे ने कांटा निकाला,बदले में शेर लकड़ी का बोझ ढोने लगा,लकड़हारा धनी गन गया दूसरे ने पूछा तो कहा मेरे पास एक गीदड़ है,शेर को वचन चुभ गये लकड़हारे से कहा या तो मुझे मार दे नही तो तुझे खा जाऊंगा लकड़हारे ने शर को मार दिया।
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सत्य वचन झलिये मत बोलो कि पड़ोसी को अच्छा लगेगा, जबकि ऐसा मानो कि सत्य बोलना मेरा स्वरूप है।
असत्य वचन कौन से हैं?
- झूठ के वचन-विपरीतवचन,परपीड़ितवचन,स्वपर का घात, हास्य,निन्दा,परस्पर कलह, गुप्त बातें प्रकट करना, खोटा लेख लिखना, राजाज्ञा भंग करना, शब्दों के अर्थ बदल देना,दृढ़वाद, धर्मात्माओं का विरोध व्यक्ति का नाम बदल कर बुलाना, चोर, ढोर, मूर्ख,गधा आदि वचन झूठ की श्रेणी में आते हैं।
- चरणानुयोग के अनुसार असत्यवचन- गर्हित, सावद्य, अप्रियम्
- कैसा सत्य नहीं बोलना चाहिए- सत्यं ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यमप्रियम्।
असत्य वचन बोलने के क्या कारण हैं?
- झूठ बोलने के कई कारण हैं-राग, द्वेष, मोह, लोभ, भैरवश, आशावश, क्रोधवश, मानवश, लज्जावश, कौतुकवश।
सत्यवचन की महिमा बतायें?
- सत्यवचन के पालने वाले राजा दशरथ, हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर।
- वचन की पालना- सत्यवचन के कारण राजा ने शनीचर की मूर्ति खरीदी।
- सत्यव्रत से व्यसन की निवृत्ति- चोर ने दरबारियों को सत्य कहते हुये राजा का घोड़ा चुराया।
सत्यधर्म की महिमा बतायें?
- सत्य सूर्य के समान भवरूपी अंधकार का दलन करता है।
- वस्तु जैसी है वैसी जानने का नाम सत्य है यह ज्ञान का कार्य है, अच्छे बुरे का भेद करना राग द्वेष का कार्य है।
- दूसरों के प्राणों की रक्षा करने के लिये यदि झूठ भी बोला तो किंचित पाप का भागी होता है जैसे शिकारी जीवित पक्षी को हाथ में लिये मुनिराज से पूछता है यह मरा है या जिन्दा।
- सत्यवादी पर लोक विश्वास।
- सत्य से पुण्यकर्म की प्राप्ति।
सत्यधर्म की महिमा बतायें?
- मुनिराज के पास रत्नत्रय की निधि रहती है न सम्हालें तो रागद्वेष के चोर ले जायेंगे।
- रागद्वेष के मैल में आत्माारूपी मां का ज्ञान रूपी पुत्र खो गया।
- वस्तु को सत्य समझने की आवश्यकता है समझौते की नहीं,उदा. आग गर्म है या ठंडी, 50/- गर्म, 50/- ठंडी।
- वस्तु के स्वरूप को सत्य समझ का नाम धर्म है।
- सत्य से मनुष्य जन्म की सफलता।
वीतरागता उत्तम सत्य धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
- सत्य से आर्जव धर्म की प्राप्ति- उदा. जंगल, रीछ, मनुष्य, शेर, मनुष्य पेड़ पर चढ़ गया रीछ ने रक्षा का वचन दिया, शेर के बहकावे में मनुष्य आ गया लेकिन रीछ नहीं।
धोखेबाज से सावधानी?
- सत्य की ओट में भ्रष्टाचार- सत्यघोष की कहानी
- चमत्कार को नमस्कार- जादूगर वे मौसम में झूले आम दिखा कर ठगता है।
- सत्य से चमत्कार- उदा. बनिया, किराने की दुकान राज्य में अकाल, राजा द्वारा बनिये से बारिस न होने की बात कही तो बनिये ने तराजू की डांडी बादलों की ओर की तो बारिस हाने लगी।
- सत्य का अन्य पर प्रभाव- उदा बालक, गुदड़ी में 5 मोहरें, जंगल, चोर प्रभावित।
दश लक्षण पूजा का छंद-
कठिन वचन मत बोल, परनिन्दा अरु झूठ तज।
साँच जवाहर खोल, सतवादी जग में सुखी।।
उत्तम सत्य बरत पालीजै, पर विश्वासघात नहीं कीजै।
साँचे झूठे मानुष देखो, आपन पूत स्वपास न पेखो।।
पेखो तिहायत पुरुष साँचे को दरब सब दीजिये।
मुनिराज श्रावक की प्रतिष्ठा साँच गुण लख लीजिये।।
ऊँचे सिंहासन बैठे वसु नृप, धरम का भूपति भया।
बच झूठ सेती नरक पहुँचा, सुरग में नारद गया।।
पूजन के छंद का अर्थ-
कठोर वचन, पर निन्दा, और झूठ वचनों का त्याग करना सत्यधर्म है सत्यरूपी जवाहर रत्न का उपयोग करना चाहिए क्योंकि सत्यवादी प्राणी संसार में सुखी रहते हैं।
उत्तम सत्यधर्म का पालन करना चाहिए, दूसरों का विश्वासघात नहीं करना चाहिए। सत्यवादी और झूठे मनुष्यों को देखो झूठे बोलने वाले अपने पुत्र पर भी विश्वास नहीं करते अर्थात झूठे व्यक्तियों पर कोई विश्वास नहीं करता निस्वार्थ सत्यवादी का सभी विश्वास करते हैं और अमानत स्वरूप धन भी देते हैं। मुनिराजों की और श्रावकों की प्रतिष्ठ (इज्जत) सत्य गुण से सत्यधर्म से ही है। राजा वसु ऊँचे सिंहासन पर बैठकर न्याय करना था झूठ बोलने के कारण से नरक में गया और सत्य को बोलने वाले नारद स्वर्ग में गया।
(5) उत्तम सत्य :-
सत्यधर्म के बारे में अधिकांश व्यक्ति यह मानते हैं। कि सत्य बोलना ही सत्य धर्म है। वस्तुतः सत्य बोलना ही सत्य धर्म नहीं है, बल्कि सत् स्वभावी आत्मा के आश्रय से उत्पन्न होने वाली पर्याय को उत्तम सत्यधर्म कहा है। व्यवहार में सत्य बोलना, असत्य नहीं बोलना आदि को सत्य व्रत कहा है। एवं ‘सत् हितं यत् कथ्यते तत् सत्यम्’ वस्तुतः व्यवहार में असत्य नहीं बोलना सदैव सत्य ही बोलना सत्य व्रत को ही धर्म की श्रेणी में माना गया है। जबकि सत्य बोलना सत्यानुव्रत, सत्यमहाव्रतों के अन्तर्गत आता है और हित मित प्रिय बोलना भाषा समिति में आता है कुछ भी नहीं बोलना वचन समिति में आता है यह सब चारित्र पालन के सोपान है यदि झूठ नहीं बोलने को सत्य धर्म माना जाए तो वचन व्यवहार से रहित एकेन्द्रियादि जीव और सिद्धों के नहीं बोलने पर सत्यधर्म की सत्ता से रहित माना जायेगा। जबकि ऐसा नहीं है द्रव्य का लक्षण सत् है, आत्मा भी एक द्रव्य है वह आत्मा सत् स्वभावी है जिसके आश्रय से उत्तम सत्य धर्म की प्राप्ति होती है। जगत में व्यक्ति कई कारणों से झूठ बोलते है जो वस्तुतः सत्य से प्रतीत होते है। रावण, लोमश, महेश्वर, देववश, कोषवश इस प्रकार से झूठ बोलने वाले को कुछ सोचना भी नहीं पड़ता है, सत्य बोलने वाले को सत्य की जानकारी पढ़नी पड़ती है तथा ‘सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् , न ब्रूयात् सत्यमप्रियं’
जय जिनेंद्र
पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा.निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज. 9460674306
मूल दस्तावेज़ (PDF): 297.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है