वीतरागता स्वरूप उत्तम संयम धर्म — जैन स्वाध्याय सामग्री | Vitaragata Swaroop Uttam Sanyam Dharm

वीतरागता स्वरूप उत्तम संयम धर्म

वीतरागतास्वरूप उत्तम संयम धर्म

मंगलाचरण

इन्द्रिय के भोग मधुर विष सम, लावण्यमयी कंचन काया।
यह सब कुछ जड़ की क्रीड़ा है, मैं अब तक जान नहीं पाया।।
मैं भूल स्वयं निज वैभव को, पर ममता में अटकाया हूँ।
अब निर्मल सम्यक् नीर लिये, मिथ्यामल धोने आया हूँ।।

उत्तम संयम की परिभाषा बतायें?

  • निश्चय से इन्द्रिय निरोधः संयमः / संयमनं संयमः / अथवा निवृत्तिप्रतिकषायदण्डेन्द्रियाणां धारणानुपालननिग्रहत्यागजयः संयमः। तथा सो संजमो जो सम्माविणाभावो वा अण्णो।

संयम के प्रकार बतायें?

  • संयम पालन के प्रकार-इन्द्रिय संयम, (5 इन्द्रिय और मन) प्राणी संयम (स्थावर और त्रस)

संयम मार्गणा के अनुसार भेद बतायें?

  • सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय, यथाख्यात, संयमासंयम, असंयम। (गो.जी.का.संयम मार्गणा 465-481)

संयम की उत्पत्ति, स्थिति, वृद्धि और फलागम

विद्या वृत्तस्य संभूति स्थिति वृद्धि फलोदयाः।
न सन्त्यसति सम्यक्त्वे बीजामिव तरोरिव।। रत्न.अ.32

  • आदिनाथ की दीक्षा के समय पालकी उठाने में देवों को नहीं मनुष्यों को अधिकार क्योंकि संयम की पूर्णता मनुष्य भव में ही होती है।

मनुष्य भव में संयम की प्रमुखता

  • मनुष्य भव की सार्थकता संयम धारण करने में है।
    बहु पुण्य संयोग मिला नर तन, जिनश्रुतजिनदेव चरण दर्शन।
    हो सम्यग्दर्शन प्राप्त मुझे, तो सफल बने मानव जीवन।।
    पंचपरमेष्ठी पूजन जयमाला 6
  • यह मानुष पर्याय सुकुल, सुनियो जिनवाणी।
    इह विधि गहे न मिले, सुपुणि ज्यों उदधि समानी।।
    छह.4/6

संयम का स्वरूप बतायें?

  • अणुव्रत का धारी मनुष्य संयमी है बाहर की कैसी भी प्रतिकूलता हो।
  • वास्तविक संयम आत्मा में रमण करना है।
  • अंतरंग से बाहर की व्याप्ति- उदा. घड़े में पानी हो तो बाहर गीला हो जाता है।
  • छहकाय के जीवों का घात न हो जाये, सतर्क हैं मगर शुद्धभावों का प्रतिसमय घात हो रहा है खबर नहीं

संयम का स्वरूप बतायें?

  • संयम धारियों की अवस्था-
    ज्ञान कला जिनके घट जागी,
    ते जगमाहीं सहज बैरागी।
    ज्ञानी मगन विभव सुखमाहिं,
    यह विपरीत संभवै नाहीं।।
  • आदिनाथ की पालकी उठाने एवं संयमी मनुष्य भव पाने के लिए देव भी तरसते हैं।
  • उपयोग को पर पदार्थों से समेट कर निज में लीन होना ही संयम है।
  • संयम में दृढ़ता- सेठ सुदर्शन, रामचन्द्र

संयम का स्वरूप बतायें?

  • विषयों के लोभी होकर संयम को बिगाड़ रहे हैं जैसे कोए को भगने में चिंतामणि फेंक देना, ईंधन के लिये कल्पवृक्षों को जलाना।
  • बाह्य त्रस स्थावर की हिंसा तथा इन्द्रिय मन के विषयों में प्रवृत्ति उसको अविरति जानता है, हिंसा में प्रमाद परिणति मूल है और विषयसेवन में अभिलाषा मूल है उसका अवलोकन नहीं करता।
  • यदि बाह्य हिंसा का त्याग एवं इन्द्रियों के विषयों की प्रवृत्ति नहीं होने का ही संयम है तो फिर देवगति में संयम होना चाहिये।

संयम में इन्द्रियां बाधक कैसे है?

  • इन्द्रिय, मन आत्मज्ञान में बाधक है इन पर विजय प्राप्त करना, उदा. सर्वजीत का,
  • इन्द्रियां संसारी विषयों में उलझाने में निमित्त होने से संयम में बाधक हैं साधक नहीं-भैंसे और पाड़ा
  • इन्द्रिय के भोग छोड़ने में नहीं जोड़ने में लगे हुये हैं। उदा. पेट के नाम पर पेटी भर रहे हैं।
  • आत्मारूपी टंकी के पांचों इन्द्रियरूपी नलों से ज्ञानरूपी पानी बह रहा है।

संयम में इन्द्रियां बाधक कैसे है?

  • मनुष्य का पेट भर जाता है पर मन नहीं भरता है।
  • दिनरात भक्ष्य अभक्ष्य जाने बिना खाने वाले तिर्यंच से भी गये बीते है, पक्षी रात्रि में नहीं खाते।
  • जैसे अग्नि अतृप्त स्वभावी है वैसे ही इन्द्रिय भी अतृप्त स्वभावी है।
  • इन्द्रियां ठग है जो आत्मा को ठग रही हैं, जैसे 4 धूर्तों द्वारा ब्राह्मण की गाय ठग ली गयी।

संसार के विषयों में सुख क्यों नहीं है?

  • विषयों के लोभी को आत्मा की गंध नहीं आती, उदा. केहारिन, मालिन का एवनमक और शक्कर चींटीं।
  • विषयों के सुख से हानि-उदा. राजा की शैया पर नौकर सो गया बाद में पिटा।
  • पदार्थों में सुख मानना कुत्ते का हड्डी चूसने के समान है।
  • ब्रह्मा ने उल्लू, कुत्ता, गधा, आदमी बनाये आदमी को अन्य की 20-20 आयु दी 40 वर्ष के बाद उल्लू, कुत्ता, गधा जैसी दशा होती है।

इन्द्रियों के लोभियों की दशा कैसी होती है?

  • इन्द्रियों में रत जीवों की दशा-
    अली मातंग मृग सल्लभ मीन,
    विषय इक-इक में मरते हैं।
    नतीजा क्या न पावें
    वे विषय पांचों जो करते हैं।।

इन्द्रियों की सार्थकता किसमें है?

  • इन्द्रियों की सार्थकता किस में है-
    पावन मेरे नयन भये तुम दरसतैं।…
    एक भव सुखकार ही।
  • गृहस्थ के 6 आवश्यक कर्तव्य-
    देव पूजा गुरुपास्ति, स्वाध्याय संयमः तपः।
    दानं चेति गृहस्थानां षट कर्माणि दिने दिने।।

संसार के विषयों में सुख नहीं?

  • संसार के विषयों में सुख नहीं-
    जो संसार विषै सुख हो तो तीर्थंकर क्योंत्यागें।
    काहे को शिव साधन करते, संयम सौं अनुरागे।।
  • जो विषयासंत तजी मुद नाहि लिपटात।
    ज्यों नर डारे वमन कर श्वान स्वाद सो
    खात।
  • आत्मा रूपी रत्न को मोह, राग, द्वेष, इन्द्रिय
    के चोर लूट रहे हैं।

वीतरागता उत्तम संयम धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

  • जैसे हलाहल जहर से एक बार ही मरण होता है, वैसे ही विषयविष के सेवन से कितने भवों में जन्म मरण होता है इसकी खबर नहीं है।
  • जैसे सूर्य की किरणें तालाब को सुखा देती हैं। वैसे ही संयम से रागद्वेष विषय कषायें नष्ट हो जाती हैं।
  • जैसे व्यापारी धान का सार चावल का व्यापार करता है धानके भूसे का नहीं इसकी कोई कीमत नहीं है वैसे ही आत्मा के बिना, संयम के बिना व्रत, जप, तप, पूजा क्रियाकाण्ड की कोई कीमत नहीं।
  • जैसे सोने का पारखी शुद्ध सोने को ही खरीदता है खोटे सोने को नहीं वैसे ही तत्वज्ञानी ज्ञायक की ही बात सुनता है। विषय कषाय की बात नहीं सुनना चाहता।

वीतरागता उत्तम संयम धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

संसार के विषयों में सुख नहीं?

संसार में सुख नहीं मिला-
भव वन में घूम चुका,
कण कण को जी भर भर देखा।
मृगसम मृगतृष्णा के पीछे,
मुझको न मिली सुख की रेखा।।
तीन लोक की संपदा भी अनाकुल सुख नहीं देती-
तीन लोक की संपदा, इन्द्र सरीखे भोग।
काग बीट सम गिनत हैं सम्यग्दृष्टि लोग।।

वीतरागता उत्तम संयम धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

दशलक्षण पूजा का छंद-

काय छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्रिय मन वश करो।
संयम रतन संभाल, विषय चोर बहु फिरत हैं।।
उत्तम संयम गहु मन मेरे, भव भव के भाजें अघ तेरे।
सुरग नरक पशुगति में नाहीं, आलस हरन करन सुख ठाहीं।
ठाहीं पृथ्वी जल आग मारुत, रूख त्रस करुणा धरो।
सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सब वश करो।।
जिस बिना नहीं जिनराज सीझे तू रूल्यो जग कीच में।
इक घरी मत विसरो करो नित, आव जम मुखबीच में।।

वीतरागता उत्तम संयम धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

पूजन के छंद का अर्थ-छह काय के जीवों को रक्षा करना और पांच इन्द्रियों और मन को वश में करना उत्तम संयम धर्म है। संयम रूपी रत्न को संभालकर रखना चाहिए क्योंकि विषयवासना रूपी बहुत चोर घूम रहे हैं। उत्तम संयम धर्म को हे मन धारण करो, इसे धारण करने से अनेक भवों के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह संयम स्वर्ग, नरक और पशु (तिर्यंच) गति में नहीं है। यह संयम आलस का हरण करने वाला और सुख को करने वाला है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति ये स्थावर और त्रस इन छह काय के जीवों पर दयाभाव धारण कर स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कान और मन को वश करना संयम धर्म है। इस संयम के बिना तीर्थंकर भी मोक्ष को प्राप्त नहीं हुए और जिसके नहीं धारण करने से ही यह आत्मा संसार रूपी कीचड़ में फंसा रहता है। हमें इस संयम को एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए हम जम अर्थात् मृत्यु के मुख में जा रहे है।।

वीतरागता उत्तम संयम धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

(6). उत्तम संयमः–

संयम अर्थात् मन सहित कषायेन्द्रियोंके धारणानु पालन निग्रह त्यागजाय संयमः।। अर्थात् संयम को संयम कहते है संयम अर्थात् इन्द्रियों की पंचदावों से मनके हरण आत्मसुख करना अर्थात ये शीतल करना अपने में लगाना। उद्योग की स्वानुभूति स्वाधीनता ही नियम धर्म है अथवा पांच पापों का त्याग करना पांच समितियों का पालन करना कषायदि कषायों का निग्रह करना आत्मज्ञान रूप तीन गुप्ती का त्याग करना और पांच इन्द्रियों के विषयों को जीतना ब्रह्मचर्य संयम है। सो संयमों जो समाधिभाविकामण अण्णों अर्थात् संयम वही है जो सम्यकत्व का अविनाभावी हो अन्य नहीं। संयमः द्विविधा (1) प्राणीसंयमो-द्विधैर्यवृतिः।
(1) प्राणी संयम- छह काय के जीवों के घात एवं घात के भावों के त्याग को प्राणी संयम कहते है।
(2) इन्द्रिय संयम- पंचेंद्रियों तथा मन के विषयों के त्याग को कहते है। संयम एक बहुमूल्य रत्न है इसको लूटने के लिए पंचेंद्रियों के विषय रूपी चोर सभी दिशाओं चारों ओर चक्कर लगा रहे है। इसलिए इस संयम को संभाल कर रखना बहुत जरूरी है। मनुष्य भव की सार्थकता संयम धारण करने में है आत्म रमणता ही नियमसंयम है। मनुष्य गति के अलावा किसी भी गति में संयम की क्रिया नहीं होती है। देव भी इस संयम के लिए तरसते है इन्द्रियों के वैराग्य के बिना देव और मनुष्यों में भेद युद्ध होता है देव कहते है कि हे! मनुष्यो मेरा सारा वैभव ले लो एक पल के लिए अपना भव मुझे दे दो। अन्त में आदिनाथ स्वयं सावधान करते है कि जिसमें संयम की धारणा एवं पूर्णता करने सामर्थ्य है वही इस पाठकों को उठा सकता है। संयम की पूर्णता होने पर भव भव के पाप नष्ट हो जाते है। यथा-

उत्तम संयम गहु मन मेरे आलस हरन करन सुख ठाही।।
प्राणी संयम में त्रस और स्थावर जीवों के घात के भावों का त्याग आता है, लेकिन वर्तमान में यह प्रमादी व्यक्ति प्रमाद और कषाय के योग से दय अशुद्ध भाव हिंसा भी करता ही है तथा अपनी इन्द्रियों और मन को भी संयमित नहीं कर पा रहा है। अगर इस विषय कषाय में सुख होता तो तीर्थंकर इसको क्यों त्यागते !
“जो संसार विषे सुख हो तो तीर्थंकर क्यों त्यागे।
काहे को शिव साधन करते संयम सों अनुरागे।।”

वीतरागता उत्तम संयम धर्म - पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री

उत्तम संयम

जय जिनेन्द्र
पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा. निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज. 9460674306


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 298.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है