वीतरागता-स्वरूप उत्तम आर्जव धर्म
वीतरागतास्वरूप उत्तम आर्जव धर्म
मंगलाचरण
यह पुष्प सुकोमल कितना है, तन में माया कुछ शेष नहीं।
निज अंतर का प्रभु! भेद कहूँ उसमें ऋजुता का लेश नहीं।।
चिंतन कुछ फिर संभाषण कुछ, परिणति कुछ की कुछ होती है।
स्थिरता निज में प्रभु पाऊँ, जो अंतर का कालुष्य धोती है।।
उत्तम आर्जव का स्वरूप
जो चिंतेइ ण वंकं ण कुणदि वंकं ण जंपदे वंकं।
ण य गोवदि णिय दोसं, अज्जवधम्मो हवे तस्स।।
जे कुटिल विचार नहीं करता, कुटिल कार्य नहीं करता, कुटिल वचन नहीं बोलता तथा अपने दोष नहीं छिपाता उसके उत्तम आर्जव धर्म होता है।
-कार्तिकेयानुप्रेक्षा
उत्तम आर्जव धर्म की परिभाषा बतायें?
आर्जव धर्म की परिभाषा निश्चय से- ऋजुभाविक आर्जवम् माया कषाय के अभाव पूर्वक कुटिलता रहित सम्यग्दर्शन ज्ञान सहित चारित्र गुण की पर्याय का नाम उत्तम आर्जव है व्यवहार से सरलता का नाम।
माया कषाय का क्या परिणाम है?
आर्जव धर्म का विरोधी कषाय माया अर्थात् छल, कपट मायाचार और उसका फल- माया तैर्यग्योनस्य तत्वार्थ सूत्र 6/16
मायाचारी प्रकट होने पर विश्वास उठ जाता है, उदा. काठ की हांडी आग पर दोबारा नहीं चढ़ती।
माया कषाय की प्रवृत्ति
जब इसके माया कषाय उत्पन्न होती है तब छल द्वारा कार्य सिद्ध करने की इच्छा होती है। उसके अर्थ अनेक उपाय सोचता है, नाना प्रकार कपट के वचन कहता है, शरीर की कपट रूप अवस्था करता है, बाह्यवस्तुओं को अन्यथा बतलाता है, तथा जिनमें अपना मरण जाने ऐसे भी छल करता है। कपट प्रगट होने पर स्वर्ग का बहुत बुरा हो, मरणादिक हो उनको भी नहीं गिनता। तथा माया होने पर किसी पूज्य व इष्ट का भी संबंध बने तो छल करता है, कुछ विचार नहीं रहता। यदि छल द्वारा कार्यसिद्धि न हो तो स्वयं बहुत संतापवान होता है, अपने अंगों का घात करता है तथा विष आदिसें मर जाता है। ऐसी अवस्था माया होने पर होती है। (मोक्षमार्ग प्रकाश पू.सं. 53)
माया कषाय की उत्पत्ति, के कारण क्या हैं?
माया कषाय की उत्पत्ति व कारण- मन वचन, काय की विरूपता में माया कषाय, मायाचारी, छल कपट एकाग्रता में आर्जव धर्म।
माया कषाय, के कारण मायाचारी, छल कपट करता है
कपट के कारण निरंतर संक्लेशता। उदा.बूढ़ा शेर, कीचड़, गीदड़, शेर के पेट में लकड़ी से मौत
कपट का सहारा कमजोर व्यक्ति लेता है।
छल कपट मनोरंजन वश या आदतवश करते हैं।
मायाचारी सदा सशंक बना रहता है, दुरंगी चाल चलता है। उदा.सेठ, सेठानी, ब्रह्मचारी, मूसल
वीतरागता उत्तम आर्जव धर्म - पं. कैलाश चन्द जैन शास्त्री
कपटी की पहचान व स्थिति उदा. सहित बतायें?
- कपटी की पराजय-उदा. कामी पुरुष, पनिहारिन का जवाब तेरे जैसा मेरा नौकर है।
- कपटी की अस्थिरता-उदा. नीला सियार, या मोर पंख वाला कौआ
- कपट छिपाये न छिपे, छिपे ना मोटो भाग्य। दाबी दूबी न रहे, रुई लपेटी आग।।
- मायाचारी बगुले के समान एकाग्रता दिखाता है।
उज्ज्वल वर्ण गरीब गति एक टांग मुख ध्यान।
देखत लागत भगवतत् निषटकपट की खान।। - मन वचन काय की विरूपता का नाम माया कषाय है, मायाचारी है। उदा. मरी वेश्या, कामी पुरुष, कुत्ता, चोर, ब्रह्मचारी।
वीतरागता उत्तम आर्जव धर्म - पं. कैलाश चन्द जैन शास्त्री
- कपटी व्यक्ति से सावधान-
अरकतिया के मुख नहीं, नहीं गाँव के दन्त।
जो नर मीठे बोलते, इपसे बचिये संत।। - आरे के मुख नहीं हैं, गाँव नामक कीड़े के दांत नहीं हैं पर वे धीरे-धीरे लकड़ी और जीव को काटते रहते हैं इसी प्रकार कपटी व्यक्ति भी मीठा बोलते हुये हानि पहुंचाते हैं।
- कपट से अर्जित धन की दुर्गति- उदा. वेश्या का धन, दान की इच्छा, संयासी भांड ले गया। और कहा-
गंगजी का घाट पर, खाई खीर और खांड।
यौंका धन यों ही गया, तुम वेश्या हम भांड।।
वीतरागता उत्तम आर्जव धर्म - पं. कैलाश चन्द जैन शास्त्री
- कषायों के उल्टे नाम के अनुसार चलो-
रोष का उल्टा सरो अर्थात् आत्मकल्याण का कार्य पूरा हो। मान का उल्टा नमा अर्थात् नम्र बनो। माया का उल्टा यामा ये जो है मुझे नहीं चाहिये। लोभ का उल्टा भलो अर्थात् दूसरों का भला करो।
वीतरागता उत्तम आर्जव धर्म - पं. कैलाश चन्द जैन शास्त्री
- कपट से स्वयं के परिणामों का बिगाड़ना-
- सरल परिणामों से आर्जवधर्म की प्राप्ति-
- कपटी साधु ने सेठ के लड़के को गहनों के लोभ में मार कर जमीन में दबा दिया, सी. आई डी शिष्य के भेष में साधु के पास रहने लगा पानी के बबूलों ने भेद खोल दिया, पकड़ा गया।
वीतरागता उत्तम आर्जव धर्म - पं. कैलाश चन्द जैन शास्त्री
कपट भाव को उदा. सहित समझायें?
- अंदर की कुटिलता बाहर आ ही जाती है, उदा. पालने का बच्चा, भावों को पकड़कर हंसता है, रोता है।
- जैसे म्यान में टेड़ी तलवार प्रवेश नहीं करती, वैसे ही कुटिल परिणामों का आत्मा में प्रवेश नहीं होता।
- वक्र छेद वाले दाने में धागा प्रवेश नहीं करता, वैसे ही बुरे परिणामों में आत्मा का प्रवेश नहीं होता।
- सर्प वक्र चलता है मगर बिल में सीधा ही प्रवेश करता है वैसे ही बाहर में धर्म के कर्म उदय में हो तो सांसारिक कार्यों में प्रतिकूलतायें दिखाई देती हैं
- पानी में मिट्टी लगी तुंबी की मिट्टी घुलते ही ऊपर आ जाती है, वैसे ही कपट खुलते ही इज्जत चली जाती है।
वीतरागता उत्तम आर्जव धर्म - पं. कैलाश चन्द जैन शास्त्री
सरलता के प्रभाव से हानि का अभाव कैसे?
- सरलता के प्रभाव से हानि का अभाव-उदा. बनारसी दास, चोर, मा के संबोधन से संपत्ति वापिस।
- मन में सरलता हो, पवित्रता हो तो बाहर आ जाती है, उदा. मिट्टी के घड़े में पानी भरेंगे तो बाहर गीला हो जाता है।
विरूपता, वक्रता व कुटिलता का क्या स्वरूप है?
- माया कषाय मन, वचन, काय की विरूपता, वक्रता व कुटिलता का नाम नहीं, बरन आत्मा की विरूपता, वक्रता व कुटिलता का नाम है।
- वस्तु का जैसा स्वभाव है वैसा न मानना अन्यथा परिणमन करना विरूपता है, वक्रता है जो जिसका कर्ता, धर्ता, हर्ता नहीं है उसे उसका मानना, चाहना, अनन्त कुटिलता है।
दशलक्षण पूजा का छंद-
कपट न कीजे कोय, चोरन के पुर न बसैं।
सरल सुभावी होय, ताके घर बहु संपदा।।
उत्तम आर्जव रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुखदानी।
मन में होय सो वचन उचरिये, वचन होय सो तन सों करिये।।
करिये सरल तिहुँ जोग अपने, देख निर्मल आरसी।
मुख करें जैसा लखैं तैसा, कपट प्रीति अंगारसी।।
नहिं लहै लक्ष्मी अधिक छल करि, करम बन्ध विशेषता।
भय त्यागि दूध विलाव पीवै, आपदा नहिं देखता।।
सरल अर्थ
पूजन के छंद का अर्थ- छल कपट नहीं करना चाहिए धन संपत्ति चोरों के यहां नहीं होती वे हमेशा निर्धन ही होते हैं किन्तु जिनका स्वभाव सरल होता है उनके यहां बहुत धन सम्पदा होती है।
उत्तम आर्जव सरल स्वभाव को कहते हैं रंचमात्र भी दगा दुःख को देने वाला है, जो विचार(सम्यक्) मन में हो वही वचन में रहना और जो वचन से कहा जाय वही काय से करना चाहिए। इस प्रकार से तीनों योगों को सरल करना चाहिए, जैसे निर्मल स्वच्छ दर्पण में जैसा अपना मुंह करोगे वैसा ही दिखेगा। छल कपट की प्रीति अंगारों से प्रीति करने के समान है (जैसे अंगारों में ऊपर राख दिखती है और अन्दर अग्नि दहकती रहती है) अधिक छल करके कोई भी धन सम्पदा प्राप्त नहीं कर सकता बल्कि अधिक कर्म बंध करता है उस कर्मबंध का ध्यान नहीं करता, जैसे- बिल्ली आंख बंद करके दूध पीते समय भय का त्याग करती है और पीछे मार पड़ेगी ऐसा ध्यान नहीं रखती, उसी प्रकार छल करने वाला कर्मबंध का ध्यान नहीं करते हुए छल करता रहता है।
मन में कुविचार हो तो क्या करें?
- मन में कुविचार हो तो- मन में होय सो मन में रखिये, वचन होय सों तन से न करिये।
- वचन, काय की प्रवृत्ति पर रोक सरकार लगा देती है मन की प्रवृत्ति पर धर्म रोक लगाता है।
- लौकिक कार्यों की सिद्धि मायाचार से नहीं, पूर्व पुण्योदय से होती है।
- सरलता के परिणामों का प्रभाव-उदा. गदर के समय लूटपाट, सेठ न धन आंगन में रख दिया लुटेरों ने लूटा नहीं, पहरेदार लगा दिये।
आर्जव धर्म का क्या स्वरूप है?
- चिंतन कुछ फिर संभाषण कुछ, परिणति कुछ की कुछ होती है, इसलिये भावों में पवित्रता आवश्यक है।
- आत्मा का जैसा स्वभाव है वैसा ही मानना, जानना और तन्मय होकर परिणाम जाना ही आर्जव धर्म है।
- मन, वचन, काय की एकरूपता से आर्जव धर्म नहीं, यदि हो तो सिद्धों के ये तीनों नहीं है फिर भी धर्म है
- एकेन्द्रिय के मन वाणी नहीं है इनकी विकृति नहीं देखी जाती तो क्या इनके भी आर्जव धर्म है? नहीं
- आर्जव धर्म और माया कषाय जीव के भाव हैं, मन, वचन, काय पुद्गल की अवस्थायें हैं।
- मुनियों के उत्कृष्ट आर्जव धर्म तो ध्यान काल में ही होता है।
मुनिराज किसका व कैसा चिंतन करते हैं?
- मुनिराजों का चिंतन-
दिन-रात आत्मा का चिन्तन,
मृदु सम्भाषण में वही कथन।
निर्वस्त्र दिगम्बर काया से भी,
प्रगट हो रहा अन्तर्मन।। - अरि मित्र महल मसान कंचन,
कांच निन्दन स्तुति करन।
अर्धावतारन असि प्रहारन,
में सदा समता धरन।।
(2) उत्तम आर्जव:-
क्षमा एवं मार्दव के समान ही आर्जव भी आत्मा का स्वभाव है। आर्जव स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में छल, कपट, मायाचार के अभाव रूप शांति स्वरूप जो पर्याय प्रगट होती है उसे आर्जव कहते है। व्यवहार से “ऋजुभाव आर्जव” अर्थात सरलता का नाम आर्जव है। आर्जव के साथ लगा उत्तम शब्द सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की सत्ता का सूचक है। आर्जव धर्म की विरोधी कषाय माया है। माया कषाय के उदय में आत्मा में स्वभावगत सरलता न होकर कुटिलता, वक्रता एवं विरूपता उत्पन्न हो जाती है। छल, कपट आदि के भाव उत्पन्न होने लगते है, मन में वचन में और काया में कुटिलता दिखाई देती है कुछ लोग मनोरंजन के लिए भी इस प्रकार का उद्यम करते है। मायाचारी सदैव संरक्षक एवं भयाक्रांत बना रहता है। उसमें डर समाया रहता है कि कहीं उसका भेद प्रकट नहीं हो जाये। प्रकट होने पर उस पर से सभी का विश्वास उठ जाता है जैसे काष्ठ की हांडी चूल्हे पर एक ही बार चढती है दुबारा नहीं।
एवं :-
उज्ज्वल वर्ण गरीब गति एक टांग मुख ध्यान।
देखत लागत भगवतवत् निपट कपट की खान।।
वीतरागता उत्तम आर्जव धर्म
पं.कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
उत्तम आर्जव
जय जिनेंद्र
पं. कैलाश चन्द्र जैन शास्त्री
जैनदर्शनाचार्य, से.नि. सहा.निदेशक
14/214 मुक्ताप्रसाद नगर
बीकानेर राज.9460674306
मूल दस्तावेज़ (PDF): 295.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है