विद्यार्थी - जैन स्वाध्याय सामग्री | Vidyarthi

विद्यार्थी

नाटक
जिन मंदिर भिक्षालय नहीं शिक्षालय है।
पात्र:- (i) विद्यार्थी,
(ii) व्यापारी,
(iii) युवा,
(iv) बेरोजगार,
(v) रिश्वतखोर,
(vi) नायक ।

  1. विद्यार्थी:-
    O’My God! good morning
    हे प्रभो! आनन्ददाता, ज्ञान हमको दीजिए।
    मुझको कुछ आता नहीं, फिर भी पास कीजिए।
    हे भगवान्! देखो, आपको पता ही है
    कि मैं क्रिकेट का फैन हूँ और अभी भारत-
    पाकिस्तान की श्रृंखला चल रही है, तो समझलो
    कि भारत की इज्जत दांव पर लगी है। अतः
    मैच देखना बहुत ही जरूरी है और आपको
    तो पता ही है कि बौर्ड की परीक्षा सिर पर
    है। पढ़ाई तो हो नहीं पा रही है। पढ़ाई करूँ कि
    मैच देखूं । तो हे भगवान्! सम्हाल लेना। मेरी
    इज्जत आपके ही हाथों में है। मैं अपनी पॉकेट
    मनी में से 21 रु. दानपात्र में जरूर डालूंगा।
    याद रहे भगवान् । भूल मत जाना।
    Good by !

२. व्यापारी :- अति पुण्य उदप मम आया।
सौ-सौ की गड्‌डी पाया।
चतारि मंगले, सोना मंगलं, चांदी मंगलं ।
रूपया मंगले, ड्राप्त मंगल।
हे भगवान्! आप नाराज क्यों हो
गये हो। इस बार बिल्कुल भी सीजन नहीं
चल रहा है। अरे! आपको चौवल चढ़ा सकूं
इतनी भी कमाई नहीं हो पा रही है। अरे!
जब आप हमें खाना-खाने को नहीं मिलेगा तो
हम आपको क्या चढ़ावे ? भगवान् जरा दया करो।
आप दया निधान हो । हमारी दुकान अच्छी-चलने
लग जावे और अपने मजे हो जावे । भगवान्
अपनी यह बात पक्की रही कि अपने मजे तो
आपके मजे । एक जोरदार विधान कराऊंगा। अब
तो अन्तरीक्ष पार्श्वनाथ हम तुम्हारे ही भरोसे है।
३. रिश्वतखोर :-
हे भगवान्! आप तो सर्वज्ञ
हैं। मैंने जो अर्जी लगाई है। आप तो समझ ही
गये होंगे। समझे न हो तो भगवान् में फिर
से बता रहा हूँ कि मैं तो शिरश्वतखोरी के
चक्कर में पकड़ा गया हूँ। लोगों ने कह दिया
है कि मैंने एक लाख रूपये की रिश्वत ली है मगर
राज की बात बताऊं भगवान् की तो दो लाख
की है । पर आप ही इस झंझट / मुसीबत से
छुड़वा सकते हो। अगर मैं कोर्ट में बाइज्जत
बरी हो गया तो 10% आपको दूंगा व 25% साथ
हो चढ़ा ऊंगी भी।
५. बेरोजगार :-
इधर-उधर देखते हुये.
वाह - भगवान् वाह ! आपके मंदिर में फर्स मार्लष
का, दीवारों पर ऑयलपेंट, वेदी पर सोने का पेट
छत्त चंवरादि चांदी के क्या कहना भवावान…?
अपरिग्रही भगवान् के पास इतना परिग्रह और
एक मैं आपका भक्त बेरोजगार घूम रहा हूँ।
किसी से मत कहना भगवान् ये ड्रेस भी मैने
इसरों की पहन रखी है । अरे भगवान् ! कुछ तो
सोचो हमारे बारे में, हम जैसे बेरोजगारों पर
कृपा करो। बस एक छोटी-सी नौकरी दिला दो
भगवान्! पहली वेतन आपको ही चढ़ाऊँगा।
ज्यादा क्या कहूँ भगवान् और तो आप समात
हो गये होगे।
5. युवा:
तुमसे लागी लगन, ले लो अपनी शरणा
पारस प्यारा, तुम तो करता को ब्याड हमारा ।।
हे पारसनाथ भगवान्! मैं कब से

रविवार का व्रत कर रहा हूँ। पर आप हो कि
सुनते ही नहीं हो । अरे ! मैं एक शादी ही तो
कह रहा हूँ । भगवान् आपकी ही कृपा से
चक्रवर्तियों की तो 96-96 हजार शादियां हो गई
मेरी एक भी एक नहीं करवा सकते ? अरे ! मैं
पता है आपकी शादी नहीं हुई तो क्या हुआहे
भक्तों पर दया तो करनी चाहिये। हे चिन्तामणि
पार्श्वनाथ ! दया करो। किसी कन्या को मेरे ऊपर
प्रसन्न करवा दो।
6. ज्ञायक :- अभी आपने देखा कि कितने भक्त
आये और वीतरागी भगवान् से अपने-अपने राज
की बातें कहकर चले गये। ये तो गाँव-गाँव,
घर-घर की कहानी है। दर्शन करने आते है जैन
कहलाते है। भगवान् के नाम पर से और
जैन से किराना भण्डार, बर्तन भण्डार, वस्त्र भण्डार
चलाते है। पर देवदर्शन की विधि क्या है यह भी
ठीक ढंग से नहीं जानते है।
कोई एक :- तो आप ही बता दो देवदर्शन की
विधि क्या है?
ज्ञायक :- देवदर्शन की विधि बतायेगा।
कोई एक :- स्वाध्याय करने से क्या लाभ है?
ज्ञायक :- स्वाध्याय करने से हिताहित, अश्यामरण,
पूज्यपूज्य का ज्ञान होता है। पट्ट इव्य व झाल
तत्त्व का ज्ञान पूर्वक भेदज्ञान से सम्यग्दर्शन
प्राप्त होता है।
सभी एक साथ: - भैया आपने तो
हमारी आंखें खोल दी।
ज्ञायक :- भैया आप सब लोग भी मांग लेकर
भगवान् के पास आते हैं लेकिन भगवान् म लेते
है और न देते है । हम जैन है हमें जैन का
सच्चा स्वरूप नहीं मालूम, जिनवाणी मिली, उत्तम
कुल मिला फिर भी धर्म से वंचित हो रहे है।
हमसे अभागा कौन है? अर्थात कोई नहीं।
यहमानुष पर्याय :-
जय जिनेन्द्र

भेद विज्ञान

प० राजकुमार जी शास्त्र

पात्र परिचय

धनिया - धोबी
अगम - शान्त प्रकृति का युवक
ज्ञानेश - पंडित जी
दिव्यांश - किंचित उद्दंड प्रकृति वाला युवक
चित्मय - विद्वान् मित्र
(धोबी की दुकान - धनिया गुनगुना रहा है।)
धनिया - धनिया धोबी मेरा नाम,
कपड़े धोना मेरा काम।
मैल को भगाऊं, डाग को मिटाऊं, कपड़ों को चमकाऊं
हो … हो … धनिया धोबी …
(प्रेसकरते हुये) – ये सेठ लोग कितने
गंदे कपड़े कर लेते हैं। इन्हें धोते - धोते मेरे
पप्पू की अम्मा आधी घिस गई है।
दिव्यांश (आते हुए) अरे भझ्या धनिया।
धनिया - कहिए भाई साहब क्या सेवा करूँ दे
दिव्यांस - अरे भई, मैं परसों एक चादर धोने को दे गया
था। वह तैयार कर दिया क्या ?
धनिया - अरे बिल्कुल तैयार है साब, एकदम
सकासक यह रही।
दिव्यांस - ठीक है लाओ इधर, पैसे बाद में पहुंचा दूंगा।
धनिया - कोई बात नहीं भाई साहब पैसे तो आते रहेंगे।
(दिव्यांस चादर लेकर एक तरफ सो जाता है)

धनिया - (प्रेस कर रहा है एवं गुनगुना रहा है।)
धनिया धोबी मेरा नाम,
कपड़े धोना मेरा काम।
मैल को भगाऊं - - - (पूर्ववत्-जीत लेना)
(अगम को आता देखकर)
धनिया - जय जिनेन्द्र अगम भाई साहब। आप तो बहुत
दिनों बाद नजर आरहें हैं कहीं बाहर गए थे क्या?
अगम - हां भाई धनीराम ! बाहर ही गया था और आज
फिर जयपुर जाना है। धनीराम मैं एक चादर गत्रकार
गया था. वह तैयार कर दिया।
धनिया - भाई साहब, धनिया समय का पाबंद है। आपकी
चादर तो कब से तैयार है, यह लीजिए। (चादर
उठाकर देता है।)
अगम - (अच्छी तरह चादर देखते हुए।)
अरे धनीराम ! यह चादर मेरा नहीं है। दूसरा
दिखाओ यह और किसी का होगा।
धनिया - अरे बाप रे मूल हो गई, अभी-अभी दिव्यांस
भाई साहब एक चादर ले गए हैं, उनका भी बिल्कुल
ऐसा ही था। कल मैं चादर बदल कर दे दूंगा।
अगम - अरे नहीं भझ्या, मुझे तो अभी रात को जयपुर
जाना है। मुझे चादर बहुत जरूरी है।
धनिया - तो भाई साहब आप ही जरा तकलीफ कर
उनके वहां से बदलते हुए चले जाना।
अगम - हां यह ठीक है।

दिव्यांस के घर जाकर)
अरे कोई है…दिव्यांस ओ दिव्यांस.
(कोई आवाज नहीं आती तो अंदर जाता है)
अच्छा तो भाई साहब चादर तानकर सो रहे
हैं। दिव्यांस ओ दिव्यांस । (चादर खींचता है)
दिव्यांस (गुस्से में, आंखें मलते हुए)
कौन बेवकूफ मेरी नींद खराब कर रहा है?
अगम- अरे भझ्या नाराज मत होओ, मैं तो अपनी
चादर लेने आया हूँ।
दिव्यांस-दिमाग तो खराब नहीं हो गया। एक तो मेरी
नींद खराब कर दी आकर, आ घ… क्या
मजा आ रहा था। दूसरे कह रहे हो कि अपनी
चादर लेने आया हूँ यह कोई कपड़े की या धोबी
की दुकान है क्या ?
अगम - अरे नहीं भझ्या, ये जो न्यादर तुमने ओदी
है, वो मेरी चादर मेरी है।
दिव्यांस- लो कर लो बात । जब साहब मेरी चादर
की अपनी बताने लगे, हद हो गई, फिर कहना
ये घर भी मेरा है। अरे भइया, ये चादर ती
मैमनी धनिया के यहाँ से धुलाकर लाया हूं।
अगम - देखो धनिया ने ही कहा है कि मेरा चादर
तुम्हारे पास है।
दिव्यांस- देखी एक बार में ही समझलो कि यह
चादर मेरा है।
अगम - तुम भी अच्छी
तरह समझलो कि यह
चादर मेरा है। (चादर खींचता है)
दिव्यांस - नहीं मेरा है ।देखो लड़ाई हो जायेगी में कहता
हूँ चादर मेरा है। (आपस में चादर खीचते हैं)
(इतने में चिन्मय व ज्ञानेश का प्रवेश)
चिन्मय - अरे यह क्या महाभारत मचा रखी है।
अगम - देखो भाई साहब यह मेरा चादर नहीं
देरहा है।
दिव्यांस - बड़ा अंधेर है भाई मेरे घर पर आकर मुझे
ही चोर बना रहा है। गुस्सा तो ऐसा आ रहा कि
सिर फोड़ कर रख हूं।
चिन्मय - ग्रुप रहो फालतू की बातें मत करो। अच्छा
अगम पे बताओ कि तुम्हारी चादर यहाँ कैसे आईई
अगम - मैंने अपनी चादर धनिया के यहां घुलने डाली
थी । मैं वहां चादर लेने गया तो मेरा चादर गलती
से इनके यहां आ गया।
दिव्यांस - अच्छा ती तुम्हारी चादर की कोई पहचान है।
अगम - हां यह देखो चादर पर मेरा नाम लिखा है।
(सभी चादर देखते हैं)
चिन्मय - अरे ! इस पर तो अगम का एन्टी लिखा
हुआ है।
दिव्यांस- यह तो सच में इसका ही है, तो फिर मेरा
चाडर कहां है।

अगम-तुम्हारा चादर यह रहा। तुम तो मेरी बात
सुन ही नहीं रहे थे। मैं तुम्हारा चादर धनिया
के यहां से लेकर आया हूं।
दिव्यांस-मुझसे बड़ी भूल हो गई। मैं आपकी चादर
को अपनी मानकर व्यर्थ ही झगड्डा कर रहा था।
आप कृपया मुझे क्षमा कर देवें।
चिन्मय- अरे भाइ‌यो। ऐसी ही भूल हम सब अनादि
से कर रहे हैं। पर पदार्थों को अपना मान-मान कर।
अगम-क्या बात कर रहे हो मैं तो किसी की चीज
को हाय भी नहीं लगाता।
चिन्मय- भझ्या अगम, यह बात इतनी जल्दी समझ
में नहीं आ जायगी। इसे तो गंभीरता से
समझना पड़ेगा।
चिन्मय- देखो हमारे साथ यह जो अतिथि भाई
साहब आये हुए हैं इनका नाम ज्ञानेशकुमार
है। यह ध्रुवधाम से आये हैं, इस संबंध में
येही हमें समझायेंगे।
ज्ञानेश- जय जिनेन्द्र ! मैंने आपकी सभी बातें सुनी है जिस
तरह दिव्यांस आपकी चादर को अपनी मानकर सो रहा
था, उसी तरह हम सब भी दूसरी वस्तुओं को अपना
मानकर सो रहे हैं।
दिव्यास-क्या बात कर रहे हो भाई साहब, सो तो मैं
पहले रहा था, अभी तो मैं जाग रहा हूं।

ज्ञानेश- नहीं मझ्या ! अभी तो आपकी रूप निद्रा दूरी है
भाव निदा जिसे मोह तीह कहते हैं वह नहीं दी।
अगम- इस मोह नीद से क्या होता है?
ज्ञानेश-जैसे दिव्यांस हव्यनिद्रा में तुम्हारे चादर को अपनी
मानकर सो रहा था। वैसे ही हम सब मोह तीह
में शरीर, धन पुचादि, पर पदार्थों को अपना
मानकर सो रहे हैं।
चिन्मय- यह बात पूरी तरह समझ में नहीं आई, जरा
अच्छी तरह समझाओ न ।
ज्ञानेश- अच्छा सुनो। आप सब अपना नाम तो अनते ही होंगे।
दिव्यांस-हां-हां क्यों नहीं, मेरा नाम दिव्यांस है।
ज्ञनिरा- और तुम्हारा १
अगम-मेरा नाम अगम है।
ज्ञानेश-ये तो आपने इस शरीर के नाम बताए हैं, आप
अपना नाम बताइए ना
दिव्यांस-लो करलो बात । क्या मैं और मेरा शरीर अलग-अलग
थोड़े ही हैं। हम दोनों एक ही तो हैं।
ज्ञानेश - नहीं भझ्या। यही तो हमारी भूल है जो अनादिकाल ने
चली आ रही है और इस मूल के कारण ही हमें नरक
तिर्यंच आदि गतियों के दुख उठाना पड़ रहे हैं।
दिव्यांस- ये बात तो समझ में नहीं आई। ठीक है
चादर में तो आपने चिन्ह दिखाकर समझा दिया
कि वह चादर मेरा नहीं है । पर गरीर तो मैंही
हूँ । इस पर तो मेरा ही अधिकार है। ए

NOTES DATE
ज्ञानेश- देखो समझने से समझ में आता है सकसमे
से नहीं । आप समझने की कोशिश करोगे तो जरूर
समझ में आयगा । अच्छा यह बताओ किनीव
किसे कहते हैं?
अगम - अरे जो जानता- देखता और सुख-दुख का
अनुभव करता है वही तो जीव है।
ज्ञानेश और पुद्‌गल १
चिन्मय - जिसमें स्पर्श, रस, गंधे और वर्ष पाया
जाए उसे पुद्‌गल कहते हैं।
ज्ञानेश-बहुत बढ़िया, आप सबको तो सब याद है।
अच्छा दिव्यांस तुम बताओ; तुम्हारा रंग कैसा है?
दिव्यांस - मेरा रंग गोरा है।
ज्ञानेश-और वजन कितना है?
दिव्यांस - 45 किलो।
ज्ञानेश-अब बताओ कि गोरा, काला रंग, एल्का भारी
वजन, सुगंध - दुर्गन्ध यह सब किसमें पाये
जाते हैं?
ज्ञनिश-जैसे शरीर की अपनी पहिचान है उसी तरह
जीव की भी अपनी पहिचान है वो है जानना देखना।
हम सब जानते देखते हैं इसलिए हम जीव है शरीर नहीं।
दिव्यांस-क्या बात है ज्ञानेश भाई साब । आपने तो सच्ची
मैं हमें जगा दिया। हम तो अभी तक शरीर और
जीव दोनों के गुणों को अपना ही मान कर
सो रहे थे।
ज्ञानेश-शरीर, धन परिवार को तो छोड़ों हमारे भीतर जो
राग-द्वेष गुस्सा के भाव होते हैं वो भी जीव
नहीं है जीव का स्वभाव नहीं हैं।
चिन्मय-पर इन सब भावों को तो हम ही कर रहे हैं।
ज्ञानेश-प्रेम का भाव हो या क्रोध का या मान का लोभ
का या दया दान का यह सब जैसा संयोग होता
है वैसे होते हैं और हमारी अज्ञानता से होते हैं।
अतः शरीरादि पर पदार्थों के कारण होने वाले होने
से और दुख के कारण होने से वह भी जीव
नहीं है।
दिव्यांस - अभी-अभी ती चिन्मय ने बताया था कि स्पर्श चिन्मय - पर भाई साहब पुष्य कराव तो मुनिराज के भी होते हैं।
रस-गंध ये सब पुद्गल में पाए जाते हैं मुझे
इतना भी याद नहीं रहता क्या है
ज्ञानेश-तो फिर यह कैसे मूल रहे हो कि गोरा रंग और
पड किलो का वजन पुद्‌गल का है, जीव का नहीं।
चिन्मय-अरे हां यार! ये बात तो सच्ची हैकि यह सब तो
पुद्र्गल है पुद्‌गल का है। तो फिर मैं कौन हूँ?
अगम आज तो आपने भेदज्ञान का बड़ा ही सुन्दर स्वरूप
समझाया है । पर यह भेदज्ञान होगा कैसे ?
ज्ञानेश - मुनिराज के पुण्य भाव होता जरूर है पर उसे
वह अपना नहीं मानते उन भावों पर भावों पर रीझते
नहीं हैं। वह उसे अपना दोष मानकर जात्मा में ही
लीन होते हैं।

ag
NOTES DATE
नाटक :- जीव है सो मैं ही हूँ।
मित्र एक लेखिका : श्र.डॉ. आरती जैन
ज्ञानेश जब हम प्रतिदिन स्वाध्याय करेंगे, चिंतन करेंगे पात्र दस विद्‌वान
मनन करेंगे, तत्त्व का अभ्यास करेंगे तो यह भेडशान
अवश्य एवं जल्दी ही होगा।
दिव्यांस क्यों अगम भैया कुछ समझ में आया अब
पहला मित्र
す
चलो भाई! कहीं तीर्थ वंदना को
चलते हैं।
तो आप चिन्मय के साथ रोजाना स्वाध्याय में जाना। दूसरा मित्र हौ भाई ! विचार तो बहुत अच्छा है,
अगम मैं तो जाऊंगा ही और तुझे भी साथ में ले चलेगा।
दिव्यांस क्यों नहीं मैं भी जरूर चलूंगा।
ज्ञानेश ये हुई न कोई बात। आओ हम सब भेदज्ञान
चलो चलते हैं।
तीसरा मित्र- पर मित्र! ये तो बताओ कौन-से
तीर्थ चलने का विचार है?
प्राप्त करके मोसमहल में चलें। बीच में पुण्य-पाप चौथा मित्र - मेरातो विचार है कि पार्श्वनाथ
के भाव अवं तो उन्हें अपने ज्ञानभाव सेनष्ट
कर मुक्ति मार्ग में बढ़े चलेंगे।
धनियाच (दौड़कर अति हुए) अरे भाइयो। हमें यहीं संसार
में ही छोड़ दोगे क्या? हमें भी तो साथ में ले चलो।
भगवान् के दर्शन करने बनारस नगरी
चलते हैं।
ई सभी मित्र एक साथ हाँ- हाँ बनारस
नगरी ही चलते हैं)
शनिश अरे भझ्या। जिनवाणी तो हम सबको मुक्तिमार्ग पाँचवा मित्र - (छटवे मित्र से) - चेतन ! ऐसा
में चलने का आमन्त्रण देती है।
चलो हम सब चलें (सब मिलकर गाते हैं)
मुक्ति मार्ग प्राप्त कर बढ़े चलो बढ़े चलो।
रूको न एक क्षण कभी बढ़े चलो बढ़े चलो।
ये विकार मार्ग में बदल-बदल कर आयेंगे।
काम भेष पुण्य का बना, तुझे सदा रिझायेंगे।
डिदि शत्रु जानकर इन्हें दले चलो दले चलो.
मुक्तिमार्ग प्राप्त कर बढ़े चलो बढ़े चलो ।।
महावीर भगवान् की जय हो।
J
करना तुम आज ही नाव वाले से
बात कर लेना, रात्रि - 07 बजे हमसब
निकल जायेंगे।
छत्वा मित्र- ठीक है मित्र! मैं नाव वाले से
बात कर
कर लूंगा. ए./
सातवा मित्र - तो मित्रों आज शाम हम सभी
गंगा के घाट पर मिलते हैं जयजिनेन्द्र
इ प्रत्युत्तर- समवेत स्वर में जयजिनेन्द्र)
( सभी एक चक्कर लगाकर
(सभी मित्र नाव में एक के पीछे एक बैठ

जायेंगे, चार मित्रों के हाथ में हाँड रहेगा,
जिसे वे एक्टिंग कर चलायेंगे।)
यात्रा प्रारंभ करते समय - बोलो
पार्श्वनाथ भगवान् की जय।
आठवाँ मित्र - मित्रों ! बनारस पहुँचने में बहुत
समय लगेगा … ऐसा करते हैं समय
बिताने के लिए कुछ करते हैं।
नौवाँ मित्र - ठीक है भाई ! अन्ताक्षरी खेलते हैं।
दसवा मित्र - शुरू करो अंताक्षरी लेकर प्रभुकानाम
समय बिताने के लिए करना है कुछ काम। - म
से बोलो
पहला मित्र - मीठे रस से भरी जिनवाणी लागे,
जिनवाणी लागे। मने आत्मा की बात
घणी प्यारी लागे।।
दूसरा मित्र - गा रे भैया, गारे भैया, गारे भैयागो
प्रभु गुण गा तू समय न गवा।।
तीसरा मित्र - बनारस वाले 2 पार्श्वनाथ हमारे
बनारस वाले।
वामादेवी घर जन्म लियो है, माताकी
कोख को धन्य कियो है
अश्वसेन की आंखों के तारे 2
पार्श्वनाथ हमारे, बनारस वाले…
चौथा मित्र - बाजे कुण्डलपुर में बधाई की नगरी
[[?]] में वीर जन्मे - 2 महावीर जी

पाँचवाँ मित्र- जीयरा हो हो जीयरा- 2
जीवराज उड़ के आओ सम्मेद शिखर
भाव सहित वंदन करो पार्श्वचरण में।।
जीयरा हो हो जीयरा-
छटवाँ मित्र - रंगमा-रंगमा - रंगमा रे।
प्रभु तारा ही रंग मा रंग गयो रे।।
सातवाँ मित्र - रोम-रोम से निकले प्रभुवर,
नाम तुम्हारा हा नाम तुम्हारी।।
आठवाँ मित्र - रोम-रोम पुलकित हो जाये।
जब जिनवर के दर्शन पाय।।
नौवा मित्र - ये धर्म है आतमज्ञानी का,
सीमंधर महावीर स्वामी का
इस धर्म का भैया क्या कहना,
ये धर्म है वीरों का गहना
जय हो-
दसवा मित्र - होली खेली मुनिराज, शिखरवन में,
रे अकेले वन में, मधुवन में-
पहला मित्र - (इशारा करते हुए)- अरे, अरे !
मित्रों ! देखो बनारस नगरी आ गई।
बोलो - पाशर्वनाथ भगवान् की जय।
(नाव से उतर कर खडे होजाते है।)
दूसरा मित्र - देखो मित्रो ! नगरी में जाने से पहले
एक बार गिनती कर लें, पूरे हैं कि नहीं।
तीसरा मित्र - चलो में गिनता हूँ,… (गिनेगा)

एक-दो - तीन
नौ।
NOTES DATE
आठवा मित्र- ये तो हमें नहीं मालूम लेकिन-
हम अपने गाँव से दस मित्र आये थे,
अब नौ ही बचे।
अरे ! अरे ! रे ये क्या हुआ, जब हम पण्डित जी - अच्छा- अच्छा मैं समझ गया,
गांव से निकले थे तो पूरे दस थे, लेकिन
अब नौ ही बचे…
चौथा मित्र - अरे भाई ! तुमने अच्छे से नहीं
गिना, मैं गिनता हूँ-
एक-दो
नौ, अरे नौ ही हैं.
पांचवा मित्र - अरे, अरे! लगता है तुम दोनों
चलो कोई बात नहीं मैं गिनता
हूँ। देखो एक-दो दस। देखो
तुम लोग तो पूरे दस हो। तुम दूसरों
को तो गिन रहे थे, लेकिन स्वयं को
गिनना भूल जा रहे थे, इसलिए दुखी हो
रहे थे।
की ही गिनना नहीं आता- मैं अंग्रेजी सिद्धान्त में इसी प्रकार यह जीव, जीव को
में गिनता हूँ, वन- टू — नाइन
अरे क्या बात है, नाइन ही हैं।
छटवा मित्र - अरे लगता है, रास्ते में अपना
एक मित्र डूब गया । ऊं उं. उं-
(सब मित्र रोने लगते हैं।)
(तभी वहां से एक पंडितजी
निकलते हैं।)
पण्डितजी - क्यों भाई क्या बात है? तुम
सब रो क्यों रहे हो?
सातवां मित्र - क्या बताये ! हमारा एक मित्र
गंगा में डूब गया।
पण्डित जी - क्या…? गंगा में डूब गया,
(पार्किन) कब डूबा है
जानने के नाम पर जीव द्रव्य, जीव तत्त्व,
जीव पदार्थ, जीवास्तिकाय आदि सभी
को जानता है। जीव के सभी भेद
संसारी-मुक्त, त्रस - स्थावर, गुणस्थान,
मार्गणास्थान, जीवसमास, सभी कुछ सीख
लेता है, जीव की परिभाषा भी रट लेता
है, लेकिन वह ज्ञान-दर्शन को धारण
करती हुई वस्तु में स्वयं हूँ, जीव है
सो मैं ही हूँ, ऐसी प्रतीति नहीं करता,
ऐसा भाव भासन नहीं करता, इसलिए
संसार में परिभ्रमण कर दुःखी होता है
यदि स्वयं को जान ले तो, परम सुखी हो जावे।


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2751.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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