वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता
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अनुक्रमणिका
श्री महावीर नमः
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता
धर्म प्रेमी बन्धुओं,
देव-शास्त्र-गुरु की पूजा में हम बोलते हैं :-
“यह अर्हत् सगुणरूप करके प्रभु जिन गुण का अर्थ बनाऊँगा।
और निश्चल तेरे सद्गुरु प्रभु अरहंत अवस्था पाऊँगा।।”
लेकिन हम कभी विचार नहीं करते कि जिन क्या है ? जिन गुण क्या है ? कैसे हैं ? जिन गुणों का अर्थ कैसे बनता है ? जिसे समझने करके भगवान् के ही समान हम भी अरहंत अवस्था प्राप्त कर सकते हैं।
भगवान् महावीर की भांति स्वयं को पहचानकर भगवान् बनने का पुरुषार्थ हर बालक, बालिका, स्त्री-पुरुष कर सकें इसी पवित्र भावना के साथ श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला ने शुभारम्भ दिनांक 2 जून 1997 से, 31- राज रोड, जैन कालोनी में किया गया है जिसकी नियमित कक्षाएँ शनिवार सांय 5:00 से 6:00 बजे तक व रविवार प्रातः 10 बजे से 11 बजे तक चलती हैं। धार्मिक संस्कारों की और सम्यग्ज्ञान नैतिक जीवन बिताने की निरन्तर प्रेरणा मिलती रहे इस उद्देश्य से संचालित यह पाठशाला वीतराग विज्ञान त्रैमासिक परीक्षा बोर्ड, जयपुर से सम्बद्ध है जिसकी नियमित ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन परीक्षाओं में उत्तीर्ण विद्यार्थी प्रथम व परितोषिक द्वारा पुरस्कृत किये जाते हैं। 30 विद्यार्थियों से आरम्भ हुई इस पाठशाला में इस समय 92 विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अपनी सक्रिय अनुपस्थिति है कि पाठशाला की नियमित कक्षाओं में अपने बच्चों को भेजकर और स्वयं भी पधारकर भगवान् महावीर के शासन काल को जीवन्त रखें।
जैन समाज का प्रत्येक सदस्य जैन धर्म के मूलभूत सिद्धान्तों को समझकर मोक्ष का पुरुषार्थ कर सके इसी पवित्र भावना से वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला के तत्वाधान में दिनांक 18 अप्रैल दिन रविवार को दोपहर 2 बजे से श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला गांधी रोड पर किया जा रहा है जिसमें बालक-बालिकाएँ, स्त्री-पुरुष सभी भाग ले सकते हैं। आइये। इन्हें भाग लेकर निज आत्मा की पहचान करके संसार का अभाव करें।
आयोजक
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
31-राज रोड, जैन कालोनी, देहरादून
(1)
प्रथम तालिका
(14 वर्ष तक की आयु के प्रतियोगियों के लिये)
प्र01. णमोकार मंत्र अर्थ सहित बोलिये ?
उ0 णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमोआइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।।
अर्थ-इस लोक के सब अरहंतों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब सिद्धों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब आचार्यों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब उपाध्यायों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब साधुओं को मेरा नमस्कार हो।
प्र02. देव किसे कहते हैं ?
उ0 पूर्ण वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी-जो इन तीन गुणों सहित होते हैं वे सच्चे देव हैं। (श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक-5)
प्र03. शास्त्र किसे कहते हैं ?
उ0 पूर्वापर विरोध रहित, वीतरागता की पोषक, सच्चे देव श्री वाणी को शास्त्र कहते हैं। (श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार, श्लोक-9)
प्र04. गुरु किसे कहते हैं ?
उ0 जो रत्नत्रय के धारक, विषयों की इच्छा से रहित, अंतरंग-बहिरंग परिग्रह रहित व आत्मज्ञानी हों - वे गुरु हैं।
प्र05. जैन धर्म का रहस्य जानकर स्वयं भी भगवान् बनने के लिये क्या जानना आवश्यक है ?
उ0 विश्व, द्रव्य-गुण-पर्याय, छह द्रव्य व सात तत्वों का ज्ञान आवश्यक है।
प्र06. विश्व किसे कहते हैं ?
उ0 जाति अपेक्षा छह द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं।
प्र07. विश्व में जाति अपेक्षा छह द्रव्य कौन-कौन से हैं ?
उ0 जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह द्रव्य हैं।
प्र08. जीवादि प्रत्येक द्रव्य कितने-कितने हैं ?
उ0 जीव द्रव्य अनन्त हैं, पुद्गल द्रव्य अनन्तार्नत हैं, धर्म-अधर्म आकाश एक-एक है और काल द्रव्य असंख्यात हैं।
(2)
प्र09. द्रव्य किसे कहते हैं ?
उ0 गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं।
प्र010. जीव द्रव्य किसे कहते हैं ?
उ0 जिसमें चेतना अर्थात् ज्ञान-दर्शन रूप शक्ति है उसे जीव द्रव्य कहते हैं।
प्र011. पुद्गल द्रव्य किसे कहते हैं ?
उ0 जिसमें स्पर्श-रस-गंध-वर्ण पाया जाये उसे पुद्गल द्रव्य कहते हैं।
प्र012. मैं कौन सा द्रव्य हूँ ?
उ0 मैं जानने देखने की शक्ति वाला जीव द्रव्य हूँ, शरीर नहीं हूँ, शरीर पुद्गल द्रव्य है।
प्र013. गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जो द्रव्य के सम्पूर्ण भागों में और उसकी सम्पूर्ण अवस्थाओं में रहते हैं उन्हें गुण कहते हैं।
प्र014. गुणों के कितने भेद हैं ?
उ0 दो भेद हैं - 1. सामान्य गुण 2. विशेष गुण।
प्र015. पर्याय किसे कहते हैं ?
उ0 गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं।
प्र016. पर्याय के कितने भेद हैं ?
उ0 दो भेद हैं - 1. व्यंजन पर्याय 2. अर्थपर्याय।
प्र017. विश्व, द्रव्य-गुण-पर्याय को जानने से क्या लाभ है ?
उ0 आत्म दृष्टि दृढ़ होती है। चेतन-अचेतन विश्व के प्रत्येक द्रव्य का स्वभाव है अर्थात् PERMANANCY WITH A CHANGE.
प्र018. प्रयोजनभूत तत्व कितने हैं और कौन-कौन से हैं ?
उ0 प्रयोजनभूत तत्व सात हैं - जीव, अजीव, आश्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष।
प्र019. जीव तत्व किसे कहते हैं ?
उ0 जिसमें मेरा ज्ञान-दर्शन पाया जाये उसे जीव तत्व कहते हैं।
प्र020. अजीव तत्व किसे कहते हैं ?
…
द्वितीय तालिका
(14 वर्ष से ऊपर की आयु के प्रतिभोगियों के लिए प्रथम व द्वितीय दोनों
तालिकाओं में)
प्र01. विश्व के प्रत्येक द्रव्य की मर्यादा क्या है?
उ0 अस्तित्व, वस्तुत्व आदि अनन्त सामान्य गुण, अनन्त विशेष गुण, एक व्यंजन
पर्याय और अनन्त अर्थ पर्याय-यह विश्व के प्रत्येक द्रव्य की मर्यादा अर्थात्
सत्ता है।
प्र02. सामान्य गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जो गुण सब द्रव्यों में रहते हैं उन्हें सामान्य गुण कहते हैं।
प्र03. विशेष गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जो गुण सब द्रव्यों में न रहकर अपने-अपने द्रव्य में रहते हैं उन्हें विशेष
गुण कहते हैं।
प्र04. जीवादि प्रत्येक द्रव्य में कौन-कौन से विशेष गुण हैं ?
उ0 जीवद्रव्य - ज्ञान,दर्शन, सुख, वीर्य, श्रद्धा, चारित्र, क्रियावती शक्ति आदि।
पुद्गलद्रव्य - स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, क्रियावती शक्ति आदि।
धर्मद्रव्य - गतिहेतुत्व आदि ।
अधर्म द्रव्य - स्थितिहेतुत्व आदि ।
आकाश द्रव्य - अवगाहनहेतुत्व आदि ।
कालद्रव्य - परिणामहेतुत्व आदि ।
प्र05. सामान्य गुण कितने हैं और कौन-कौन से हैं ?
उ0 सामान्य गुण अनंत हैं, उनमें मुख्य छह हैं 1. अस्तित्व 2. वस्तुत्व, 3. द्रव्यत्व,
4. प्रमेयत्व, 5. अगुरुलघुत्व, 6. प्रदेशत्व ।
प्र06. अस्तित्व गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जिस शक्ति के कारण द्रव्य का कभी व्यय नहीं होता और किसी से उत्पन्न
भी नहीं होता उसे अस्तित्व गुण कहते हैं ।
प्र07. वस्तुत्व गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जिस शक्ति के कारण द्रव्य में अर्थक्रियाशील अर्थात् प्रयोजनभूत क्रिया होती
है उसे वस्तुत्व गुण कहते हैं ।
प्र08. द्रव्यत्व गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जिस शक्ति के कारण द्रव्य की अवस्थायें निरन्तर बदलती रहती हैं उसे
द्रव्यत्व गुण कहते हैं ।
प्र09. जिनने मेरा ज्ञान नहीं देखा है वे अजीव तत्व हैं ।
प्र01. आत्म तत्व किसे कहते हैं ?
उ0 शुभाशुभ विकारी भावों का उत्पन्न होना आत्म तत्व है ।
प्र02. बंध किसे कहते हैं ?
उ0 शुभाशुभ विकारी भावों में आत्मा बंध तत्व है ।
प्र03. संवर तत्व किसे कहते हैं ?
उ0 शुद्धि का प्रगट होना संवर तत्व है ।
प्र04. निर्जरा तत्व किसे कहते हैं ?
उ0 शुद्धि में वृद्धि होना निर्जरा तत्व है ।
प्र05 मोक्ष तत्व किसे कहते हैं ?
उ0 सम्पूर्ण शुद्धि का प्रगट होना मोक्ष तत्व है ।
प्र06. सात तत्व विस्तारपर प्रयोजनभूत हैं ?
उ0 जीव तत्व - आत्म करने योग्य
अजीव तत्व - जानने योग्य
आस्रव-बंध - छोड़ने योग्य
संवर-निर्जरा-मोक्ष - प्रगट करने योग्य
प्र07. भगवान् महावीर ने भगवान् बनने के लिये क्या किया ?
उ0 भगवान् महावीर ने- शरीरादि अजीव तत्व है जानने योग्य है, अर्थात् उनसे
मेरा संबंध संभव नहीं है- ऐसा जानकर अपने जीव-तत्व का आश्रय लेकर,
आस्रव-बंध अर्थात् मोह राग-द्वेष को छोड़कर, संवर-निर्जरा अर्थात्
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रगट करके क्रम से मोक्ष प्राप्त किया ।
प्र08. जैन धर्म का प्रारम्भ किस तीर्थंकर से हुआ था?
उ0 जैन धर्म का प्रारम्भ किसी तीर्थंकर ने नहीं किया, जैनधर्म तो अनादि
नित्य है। तीर्थंकर तो धर्म के उपदेशक होते हैं।
प्र09. भरत क्षेत्र में भविष्य में होने वाले प्रथम तीर्थंकर कौन हैं ?
उ0 भरत क्षेत्र में भविष्य में होने वाले प्रथम तीर्थंकर राजा श्रेणिक हैं ।
प्र010. ढाई द्वीप में सुदर्शन मेरु कहाँ है ?
उ0 सुदर्शन मेरु जम्बूद्वीप के बीचो-बीच है ।
(4)
- आत्मा असंख्यात प्रदेशी और शरीर है ।
- आत्मा असंख्यात प्रदेशी और शरीर में एक-एक प्रदेशी अनंत
परमाणु हैं । - आत्मा का एक आकार है और शरीर में अनन्त परमाणु हैं अतः
शरीर के अनन्त आकार हैं ।
प्र017. अद्यावधि पाँच ठोकरमाजी ने आत्मा और शरीर के भिन्न-भिन्न लक्षण क्या
बताये हैं ?
उ0 श्री पाँच मार्ग प्रकाशक पृष्ठ 38 पर कहा है -
आत्मा - अमूर्तिक प्रदेशों का पुंज, प्रसिद्ध ज्ञानादि गुणों का धारी अविनाशी
वस्तु पुंज आत्मा है ।
शरीर - मूर्तिक पुद्गल द्रव्यों का पिंड, प्रसिद्ध ज्ञानादि गुणों से रहित,
स्पर्श-रस-गंध-वर्ण सहित, नवीन भिन्न-भिन्न संयोग हुआ है ऐसे
शरीरादि पुद्गल पर हैं ।
प्र018. पुत्र आत्मा का शरीर से संबंध सम्भव नहीं है-इस रहस्य को हम अपने
अनुमान से कैसे जानें ?
उ0 जितने जन्म का शरीर व संबंध साथ आये नहीं, वर्तमान का शरीर व मन
आदि साथ जायेंगे नहीं-अतः सिद्ध होता है कि इस समय श्री शरीर व धनादि
से मेरा संबंध सम्भव नहीं है ।
प्र019. प्रथम व द्वितीय तालिका के समस्त प्रश्नोंत्तरी का सारांश क्या है ?
उ0 1. मैं जीव तत्व हूँ - शरीर नहीं हूँ ।
2. अनादिकालीन वस्तुएँ (द्रव्य) भिन्न-भिन्न अपनी-अपनी मर्यादा सहित
परिणमित होती हैं । कोई किसी के अधीन नहीं है । कोई किसी
के परिणमन करने से परिणमित नहीं होती ।
(श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ0 52)
ऐसा जाने-माने तो सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और
सम्यक्त्त्व का प्राप्ति होकर क्रम से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
प्र020. जिनमत की परिपाटी क्या है ?
उ0 जिनमत में तो यह परिपाटी है कि पहले सम्यक्त्व होता है फिर व्रतादि होते
हैं, वह सम्यक्त्व स्व (आत्मा) और पर (शरीर) का श्रद्धान होने पर होता
है वह श्रद्धान द्रव्यगुणपर्याय के अभ्यास से होता है, इसलिये प्रथम द्रव्यगुणपर्याय
के अनुसार आत्मा और शरीर की भिन्नता का ज्ञान करके सम्यग्दर्शन प्रगट
करना योग्य है ।
(श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ 293)
(7)
प्र09. अस्तित्व-वस्तुत्व-द्रव्यत्व गुणों का क्या रहस्य है ?
उ0 अस्तित्व गुण के कारण प्रत्येक द्रव्य अविनाशीत कायम रहता हुआ, वस्तुत्व
गुण के कारण अपनी प्रयोजनभूत क्रिया करता हुआ, द्रव्यत्व गुण के कारण
वह स्वयं निरन्तर बदल रहा है अर्थात् प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है, कोई किसी
के आधीन नहीं ।
प्र010. प्रमेयत्व गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जिस शक्ति के कारण द्रव्य किसी न किसी ज्ञान का विषय अवश्य रहता
है उसे प्रमेयत्व गुण कहते हैं ।
प्र011. अगुरुलघुत्व गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जिस शक्ति के कारण द्रव्य में द्रव्यपना कायम रहता है अर्थात् एक द्रव्य
दूसरे द्रव्यरूप नहीं होता, एक गुण दूसरे गुणरूप नहीं होता और द्रव्य में
रहने वाले अनन्तगुण विकार कर अलग-अलग नहीं होते उसे अगुरुलघुत्व गुण
कहते हैं ।
प्र012. प्रदेशत्व गुण किसे कहते हैं ?
उ0 जिस शक्ति के कारण द्रव्य का कोई न कोई आकार अवश्य रहता है उसे
प्रदेशत्व गुण कहते हैं ।
प्र013. छहढाला में पं0 दौलतरामजी ने जीव के संसार परिभ्रमण का कारण क्या बताया
है ?
उ0 ‘मोह महामद पिये अनादि भूलि आपको भरमत वादि ।’
मोह के कारण अर्थात् अज्ञान के स्वरूप को भूलकर शरीर को अपना मानने
के कारण जीव चारों गतियों में भटक रहा है ।
प्र014. श्री कुन्दकुन्दाचार्य भगवान् ने संसार परिभ्रमण का कारण क्या बताया है ?
उ0 श्री कुन्दकुन्दाचार्य ने श्री प्रवचनसार गाथा 190 में कहा है जो देह सन्मानिक
में यह मैं हूँ और यह मेरा है अर्थात् "शरीर व स्त्री में ही ऐसी ममता को
नहीं छोड़ता वह संसार में परिभ्रमण करता है ।
प्र015. आत्मा और शरीर को एक मानने का फल क्या है ?
उ0 आत्मा और शरीर को एक मानना ही मिथ्यात्व है जिसका फल अनन्त संसार
है ।
प्र016. हमें अनन्त संसार में नहीं भटकना है हमें आत्मा और शरीर की भिन्नता
कैसे भासित हो ?
उ0 आत्मा और शरीर के पृथक्-पृथक् लक्षण हैं -
- आत्मा चेतना है और शरीर जड़-निर्जीव है ।
(6)
-नियमावली-
- यह प्रतियोगिता दिनांक 18 अप्रैल दिन रविवार को दोपहर 2-30 बजे से श्री दिगम्बर जैन धर्मशाला, गाँधी रोड में होगी।
- प्रतियोगिता की सुविधा के लिए 10 अप्रैल से 17 अप्रैल तक श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला, 31 राजा रोड, जैन कालोनी में सायं 5 से 6 बजे तक इन प्रश्नोत्तरी का अभ्यास कराया जायेगा।
- प्रथम बालिका में 30 प्रश्न व द्वितीय बालिका में 20 प्रश्न है।
- 14 वर्ष तक की आयु के प्रतियोगियों से प्रथम तालिका के 30 प्रश्नों में से कोई भी पाँच प्रश्न पूछे जायेंगे। बड़े बच्चों को लिखित देने की अनुमति होगी।
- 14 वर्ष से ऊपर की आयु के प्रतियोगियों से लिखित परीक्षा में प्रथम व द्वितीय दोनों तालिकाओं में से कोई भी पाँच प्रश्न पूछे जायेंगे। लिखने में असमर्थ प्रतियोगी मौखिक परीक्षा दे सकता है।
- वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता संचालन समिति का निर्णय अन्तिम व सर्वमान्य होगा।
- विजेता प्रतियोगियों को उचित पारितोषिक दिये जायेंगे।
- प्रतियोगिता में भाग लेने के इच्छुक प्रतियोगी दिनांक 15 अप्रैल तक निम्नलिखित व्यक्तियों में से किसी के पास अपना नाम लिखवाकर प्रश्नोत्तर पुस्तिका प्राप्त कर लें :-
- मैनेजर, जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून फोन:655823
- श्री सोहनलाल जैन, अजय स्टोर, धारा बाजार, देहरादून फोन:625995
- श्री बी.के.जैन, 38 तिलक रोड ‘वीर कुटीर’ देहरादून फोन:622317
- श्रीमती रश्मि जैन, सर्राफन मंदिर के पीछे, देहरादून
- श्री सुभाष जैन, Indian News Agency, चकराता रोड फोन:652280
- श्री प्रदीप जैन, 14 चमन विहार, माजरा देहरादून फोन:626967
- श्री अनिल जैन, Pearl House, सोसपड़ी चौक, क्लेमेण्टाउन।
- लिखित परीक्षार्थी कृपया कलम व डेस्क बोर्ड अवश्य लायें। पेपर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला की होगी।
- कृपया इस वीतराग विज्ञान प्रश्नोत्तर पुस्तिका की गरिमा को ध्यान में रखते हुये संभाल कर रखें।
(8)
2600वें जन्मोत्सव वर्ष के पावन उपलक्ष्य में
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता - 1
दिनांक 25 जून, दिन रविवार दोपहर 3 बजे
(स्थान- श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून)
धर्म प्रेमी बन्धुओं,
भगवान् महावीर की भांति स्वयं को पहचानकर भगवान् बनने का पुरुषार्थ हर बालक, बालिका, स्त्री-पुरुष कर सकें इसी पवित्र भावना के साथ श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला कार्यरत है।
भगवान् महावीर द्वारा कथित विश्व, द्रव्य, गुण, पर्याय, छह द्रव्य व सात तत्वों का रहस्य समझकर जैन समाज का प्रत्येक सदस्य मोक्ष का पुरुषार्थ कर सके इसी पवित्र भावना से महावीर भगवान् के 2600वें जन्मोत्सव वर्ष के उपलक्ष्य में वीतराग विज्ञान प्रतियोगिताओं का आयोजन श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला के तत्वाधान में इस वर्ष किया जा रहा है जिसमें बालक-बालिकाओं, स्त्री-पुरुष सभी भाग ले सकते हैं। इन वीतराग विज्ञान प्रतियोगिताओं में प्रथम व प्रथम प्रतियोगिता दिनांक 25 जून दिन रविवार दोपहर 3 बजे श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड पर होगी।
आप सभी से अनुरोध है कि इस प्रतियोगिता में भाग लेकर निज आत्मा की पहचान करके संसार का अभाव करें।
निवेदक
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
31-राजा रोड, जैन कालोनी, देहरादून, फोन नं० (0135) 623131
विशेष सूचनाः
- पूर्ण छपवाला प्रतियोगिता दिनांक 23 अप्रैल दिन रविवार दोपहर 3 बजे से श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड पर होगी।
- छपवाला प्रतियोगिता का समापन समारोह पुरस्कार वितरण के साथ दिनांक 14 मई दिन रविवार प्रातः 10 बजे श्री चन्द्रप्रभसागर दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर (रतनमहल मन्दिर के पीछे) होगा। सभी प्रतियोगी कृपया ठीक समय पर पहुँचें का अपना पुरस्कार प्राप्त करें।
भगवान् महावीर द्वारा कथित
विश्व, द्रव्य, गुण, पर्याय, छह द्रव्य व सात तत्वों का रहस्य
प्रश्नोत्तरी
प्र०1. णमोकार मंत्र अर्थ सहित बोलिये।
उ० णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं ।।
अर्थ- इस लोक के सब अरहंतों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब सिद्धों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब आचार्यों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब उपाध्यायों को मेरा नमस्कार हो, इस लोक के सब साधुओं को मेरा नमस्कार हो।
प्र०2. देव किसे कहते हैं? कुदेव किसे कहते हैं?
उ० जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी- जो इन तीन गुणों सहित होते हैं वे सच्चे देव हैं। जो राग-द्वेषरूपी मैल से मलिन और रूखे, गदा आदि सहित चिह्नों से पहिचाने जाते हैं उन्हें कुदेव कहते हैं।
प्र०3. शास्त्र किसे कहते हैं? कुशास्त्र किसे कहते हैं?
उ० पूर्णरूप विशेष रहित, वीतरागता की पोषक, सच्चे देव की वाणी को शास्त्र कहते हैं। एकान्तरूप कथन से दूषित, मिथ्या कषायों को पुष्ट करने वाले, मनुष्योक्त द्वारा रचित सर्वप्रकार के शास्त्रों को कुशास्त्र कहते हैं।
प्र०4. गुरु किसे कहते हैं? कुगुरु किसे कहते हैं?
उ० जो परिग्रह के धारक, विषयों की इच्छा से रहित, अन्तरंग-बहिरंग परिग्रह से रहित व आत्मज्ञानी हैं- वे गुरु हैं। जो मिथ्याचारित्र आचरण तथा वस्त्र आदि बहिरंग परिग्रह सहित हैं, महात्म्य का भाव ग्रहण करके मिथ्यात्वों को धारण करते हैं, उन्हें कुगुरु कहते हैं।
प्र०5. जैन धर्म का रहस्य जानकर स्वयं भी भगवान् बनने के लिए क्या जानना आवश्यक है?
उ० सर्वज्ञदेव अर्थात् भगवान् महावीर द्वारा कथित विश्व, द्रव्य-गुण-पर्याय, छह द्रव्य व सात तत्वों का ज्ञान आवश्यक है।
प्र०6. विश्व किसे कहते हैं?
उ० जीव अपेक्षा छह द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं।
प्र०7. विश्व में जाति अपेक्षा छह द्रव्य कौन-कौन से हैं?
उ० जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह द्रव्य हैं।
प्र०8. जीवादि प्रत्येक द्रव्य कितने-कितने हैं?
उ० जीव द्रव्य अनन्त हैं, पुद्गल द्रव्य अनन्त-अनन्त हैं, धर्म-अधर्म आकाश एक-एक हैं और काल द्रव्य असंख्यात हैं।
2
प्र०9. गुण किसे कहते हैं?
उ० गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं।
प्र०10. जीव द्रव्य किसे कहते हैं?
उ० जिसमें चेतना अर्थात् ज्ञान-दर्शन रूप शक्ति है उसे जीव द्रव्य कहते हैं।
प्र०11. पुद्गल द्रव्य किसे कहते हैं?
उ० जिसमें स्पर्श-रस-गन्ध-वर्ण पाया जाये उसे पुद्गल द्रव्य कहते हैं।
प्र०12. मैं कौन सा द्रव्य हूँ?
उ० मैं जानने देखने की शक्ति वाला जीव द्रव्य हूँ, शरीर नहीं हूँ, शरीर पुद्गल द्रव्य है।
प्र०13. गुण किसे कहते हैं?
उ० जो द्रव्य के सम्पूर्ण भागों में और उसकी सम्पूर्ण अवस्थाओं में रहते हैं उन्हें गुण कहते हैं।
प्र०14. गुण के कितने भेद हैं?
उ० दो भेद हैं- 1. सामान्य गुण 2. विशेष गुण।
प्र०15. सामान्य गुण किसे कहते हैं?
उ० जो गुण सभी द्रव्यों में रहते हैं उन्हें सामान्य गुण कहते हैं।
प्र०16. विशेष गुण किसे कहते हैं?
उ० जो गुण सभी द्रव्यों में न रहकर अपने-अपने द्रव्य में रहते हैं उन्हें विशेष गुण कहते हैं।
प्र०17. जीवादि प्रत्येक द्रव्य में कौन-कौन से विशेष गुण हैं?
उ० जीवद्रव्य — ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, श्रद्धा, चारित्र, क्रियावती शक्ति आदि।
पुद्गलद्रव्य — स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, क्रियावती शक्ति आदि।
धर्मद्रव्य — गतिहेतुत्व आदि। अधर्म द्रव्य — स्थितिहेतुत्व आदि।
आकाश द्रव्य — अवगाहनहेतुत्व आदि। कालद्रव्य — परिणामहेतुत्व आदि।
प्र०18. सामान्य गुण कितने हैं? और कौन-कौन से हैं?
उ० सामान्य गुण अनन्त हैं उनमें मुख्य भेद हैं- 1. अस्तित्व, 2. वस्तुत्व, 3. द्रव्यत्व,
4. प्रमेयत्व, 5. अगुरुलघुत्व, 6. प्रदेशत्व।
प्र०19. अस्तित्व गुण किसे कहते हैं?
उ० जिस शक्ति के कारण द्रव्य का कभी नाश नहीं होता और किसी से उत्पन्न
भी नहीं होता उसे अस्तित्व गुण कहते हैं।
प्र०20. वस्तुत्व गुण किसे कहते हैं?
उ० जिस शक्ति के कारण द्रव्य में अर्थक्रियाकारित्व अर्थात् प्रयोजनभूत क्रिया होती
है उसे वस्तुत्व गुण कहते हैं।
3
प्र०३१. द्रव्यत्व गुण किसे कहते हैं?
उ० जिस शक्ति के कारण द्रव्य की अवस्थायें निरन्तर बदलती रहती है उसे द्रव्यत्व गुण कहते हैं।
प्र०३२. अस्तित्व-वस्तुत्व-द्रव्यत्व गुणों का क्या रहस्य है?
उ० अस्तित्व गुण के कारण प्रत्येक द्रव्य अनादि अनन्त कायम रहता हुआ, वस्तुत्व गुण के कारण अपनी प्रयोजनभूत क्रिया करता हुआ, द्रव्यत्व गुण के कारण वह कार्य निरन्तर बदल रहा है अर्थात् प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र है, कोई किसी के अधीन नहीं है।
प्र०३३. प्रमेयत्व गुण किसे कहते हैं?
उ० जिस शक्ति के कारण द्रव्य किसी न किसी ज्ञान का विषय अवश्य रहता है उसे प्रमेयत्व गुण कहते हैं।
प्र०३४. अगुरुलघुत्व गुण किसे कहते हैं?
उ० जिस शक्ति के कारण द्रव्य में द्रव्यपना कायम रहता है अर्थात् एक द्रव्य दूसरे द्रव्यरूप नहीं होता, एक गुण दूसरे गुणरूप नहीं होता और द्रव्य में रहने वाले अनन्तगुण विकार कर अलग-अलग नहीं होते उसे अगुरुलघुत्व गुण कहते हैं।
प्र०३५. प्रदेशत्व गुण किसे कहते हैं?
उ० जिस शक्ति के कारण द्रव्य का कोई न कोई आकार अवश्य रहता है उसे प्रदेशत्व गुण कहते हैं।
प्र०३६. पर्याय किसे कहते हैं?
उ० गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं।
प्र०३७. पर्याय के कितने भेद हैं?
उ० दो भेद हैं- १. व्यंजनपर्याय, २. अर्थपर्याय।
प्र०३८. व्यंजनपर्याय किसको कहते हैं?
उ० द्रव्य के प्रदेशत्व गुण के विशेष कार्य को व्यंजनपर्याय कहते हैं।
प्र०३९. व्यंजनपर्याय के कितने भेद हैं?
उ० दो भेद हैं- स्वभाव व्यंजनपर्याय और विभाव व्यंजनपर्याय।
प्र०४०. स्वभाव व्यंजनपर्याय किसे कहते हैं?
उ० पर निमित्त के सम्बन्ध से रहित जो द्रव्य का जो आकार हो उसे स्वभाव व्यंजनपर्याय कहते हैं। जैसे- जीव की सिद्ध पर्याय।
प्र०४१. विभाव व्यंजनपर्याय किसे कहते हैं?
उ० पर निमित्त के सम्बन्ध से द्रव्य का जो आकार हो उसे विभाव व्यंजनपर्याय कहते हैं। जैसे- जीव की नर-नारकादि पर्याय।
प्र०४२. अर्थपर्याय किसको कहते हैं?
उ० प्रदेशत्व गुण के सिवाय बाकी सम्पूर्ण गुणों के कार्य को अर्थपर्याय कहते हैं।
प्र०४३. अर्थपर्याय के कितने भेद हैं?
उ० दो भेद हैं- स्वभाव अर्थपर्याय और विभाव अर्थपर्याय।
प्र०४४. स्वभाव अर्थपर्याय किसको कहते हैं?
उ० पर निमित्त के सम्बन्ध से रहित जो अर्थपर्याय होती है उसको स्वभाव अर्थपर्याय कहते हैं। जैसे- जीव की सम्यग्दर्शन आदि पर्यायें।
प्र०४५. विभाव अर्थपर्याय किसे कहते हैं?
उ० पर निमित्त के सम्बन्ध से जो अर्थपर्याय हो उसको विभाव अर्थपर्याय कहते हैं। जैसे- जीव के राग-द्वेष आदि।
प्र०४६. किस-किस द्रव्य में कौन-कौन सी पर्यायें होती हैं?
उ० १. जीव और पुद्गल द्रव्य में स्वभाव अर्थपर्याय, विभाव अर्थपर्याय, स्वभाव व्यंजनपर्याय और विभाव व्यंजनपर्याय- इस प्रकार चारों पर्यायें होती हैं। २. धर्म, अधर्म, आकाश काल द्रव्य में स्वभाव अर्थपर्याय और स्वभाव व्यंजनपर्याय- इस तरह केवल दो पर्यायें होती हैं।
प्र०४७. विश्व-द्रव्य-गुण-पर्याय का रहस्य क्या है?
उ० १. कायम रहते हुए स्वयं ही बदलना इस विशेष के प्रत्येक द्रव्य का स्वभाव है अर्थात् PERMANANCY WITH A CHANGE
२. जिनेन्द्र कथित विश्व व्यवस्था - जीव अनन्त, पुद्गल अनन्तानन्त, धर्म-अधर्म-आकाश एक-एक और काल लोक प्रमाण असंख्यात हैं। प्रत्येक द्रव्य में अनन्त-अनन्त गुण हैं। प्रत्येक गुण में एक ही समय में एक पर्याय का उत्पाद, एक पर्याय का व्यय और ध्रुव तीनों रहता है। इस प्रकार प्रत्येक द्रव्य के गुण में जो झुका है ही रहता है और होता रहेगा। (प्रवचनसार गाथा ५३)
३. प्रत्येक द्रव्य की सत्ता - अस्तित्व - वस्तुत्वगुण अपना सामान्य गुण, अनन्त विशेष गुण, एक व्यंजन पर्याय और अनन्त अर्थ पर्याय सहित- यह प्रत्येक द्रव्य की सत्ता है।
४. अनादिनिधन वस्तुएँ भिन्न-भिन्न अपनी-अपनी मर्यादा सहित परिणमित होती हैं। कोई किसी के अधीन नहीं है। कोई किसी के परिणमन करने में परिनिमित्त नहीं होती है। (श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ० ५२)
५. सब पदार्थ अपने द्रव्य में अनन्तगुण रहने वाले अनन्त धर्मों के चक्र को स्वयं करते हैं तथापि वे परस्पर एक दूसरे को स्पर्श नहीं करते हैं। (समयसार गाथा ३)
प्र०४८. प्रयोजनभूत तत्त्व किसे कहते हैं और कौन-कौन से हैं?
उ० प्रयोजनभूत तत्त्व सात हैं- जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, सवर, निर्जरा और मोक्ष।
प्र०४९. जीव तत्त्व किसे कहते हैं? जीव तत्त्व किस प्रकार प्रयोजनभूत तत्त्व है?
उ० जिसमें मेरा ज्ञान-दर्शन पाया जाये उसे जीव तत्त्व कहते हैं। जीव तत्त्व एक मात्र आश्रय करने योग्य प्रयोजनभूत तत्त्व है।
प्र०५०. अजीव तत्त्व किसे कहते हैं? अजीव तत्त्व किस प्रकार प्रयोजनभूत तत्त्व है?
उ० जिसमें मेरा ज्ञान-दर्शन नहीं है वे अजीव तत्त्व हैं और अजीव तत्त्व जानने योग्य प्रयोजनभूत तत्त्व है।
प्र०५१. आस्रव तत्त्व किसे कहते हैं? आस्रव तत्त्व किस प्रकार प्रयोजनभूत है?
उ० शुभाशुभ विचारों भावों का उत्पन्न होना आस्रव तत्त्व है और आस्रव तत्त्व छोड़ने योग्य प्रयोजनभूत तत्त्व है।
प्र०५२. बंध किसे कहते हैं? बंध तत्त्व किस प्रकार प्रयोजनभूत है?
उ० शुभाशुभ विचारों भावों में आत्मना बंध तत्त्व है और बन्ध तत्त्व छोड़ने योग्य प्रयोजनभूत तत्त्व है।
प्र०५३. संवर तत्त्व किसे कहते हैं? संवर तत्त्व किस प्रकार प्रयोजनभूत है?
उ० शुद्धि का प्रगट होना संवर तत्त्व है और संवर तत्त्व एक देश प्रगट करने योग्य प्रयोजनभूत तत्त्व है।
प्र०५४. निर्जरा तत्त्व किसे कहते हैं? निर्जरा तत्त्व किस प्रकार प्रयोजनभूत है?
उ० शुद्धि में वृद्धि होना निर्जरा तत्त्व है और निर्जरा तत्त्व एक देश प्रगट करने योग्य प्रयोजनभूत तत्त्व है।
प्र०५५. मोक्ष तत्त्व किसे कहते हैं? मोक्ष तत्त्व किस प्रकार प्रयोजनभूत है?
उ० सम्पूर्ण शुद्धि का प्रगट होना मोक्ष तत्त्व है और मोक्ष तत्त्व पूर्ण प्रगट करने योग्य प्रयोजनभूत तत्त्व है।
प्र०५६. भगवान् महावीर ने भगवान् बनने के लिये क्या किया?
उ० भगवान् महावीर ने- शरीरादि अजीव तत्त्व, जानने योग्य हैं अर्थात् उनसे मेरा संबंध सम्बंध नहीं है- ऐसा जानकर अपने जीव-तत्त्व का आश्रय लेकर, आस्रव-बंध अर्थात् मोह-राग-द्वेष को छोड़कर, संवर-निर्जरा अर्थात् सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र प्रगट करके क्रम से मोक्ष प्राप्त किया।
प्र०५७. जैन धर्म का प्रारम्भ किस तीर्थंकर से हुआ था?
उ० जैन धर्म का प्रारम्भ किसी तीर्थंकर से नहीं किया, जैन धर्म तो अनादिनिधन है। तीर्थंकर तो धर्म के उपदेशक होते हैं।
प्र०५८. श्री कुन्दकुन्दाचार्य ने श्री प्रवचनसार गाथा ९० में कहा है- जो देह-धनादिक में मैं हूँ और यह मेरा है अर्थात् ‘शरीर है सो मैं हूँ’ ऐसी ममता को नहीं छोड़ता वह संसार में परिभ्रमण करता है।
उ० आत्मा और शरीर को एक मानने का फल क्या है?
उ० आत्मा और शरीर को एक मानना ही मिथ्यात्व है जिसका फल अनन्त संसार है।
प्र०५९. हमें अनन्त संसार में नहीं भटकना है हमें आत्मा और शरीर की भिन्नता कैसे भासित हो?
उ० आत्मा और शरीर के पृथक्-पृथक् लक्षणों से-
१. मुझ आत्मा चैतन्य है और शरीर जड़-मिट्टी है।
२. मुझ आत्मा अरूपी है और शरीर रूपी है।
३. मुझ आत्मा असंख्यात प्रदेशी है और शरीर में एक-एक प्रदेशी अनन्त परमाणु हैं।
४. मुझ आत्मा का एक आकार है और शरीर में अनन्त परमाणु हैं अर्थात् शरीर के अनन्त आकार हैं।
प्र०६०. आचार्यकल्प पं० टोडरमल जी ने आत्मा और शरीर के भिन्न-भिन्न लक्षण क्या बताये हैं?
उ० श्री मोक्ष मार्ग प्रकाशक पृ० ३८ पर कहा है-
आत्मा - अशुद्धिकों का पुद्गल प्रसिद्ध ज्ञानादि गुणों का धारी अनादिनिधन वस्तु मुझ आत्मा है।
शरीर - पुद्गल परमाणुओं का पिण्ड प्रसिद्ध ज्ञानादि गुणों से रहित, स्पर्श-रस-गंध-वर्ण सहित, नवीन जिनका संयोग हुआ है ऐसे शरीर पुद्गल पर है।
प्र०६१. मुझ आत्मा का शरीर से संबंध सम्बंध नहीं है- इस रहस्य को हम अपने अनुभव से कैसे जानें?
उ० जिसने जन्म का शरीर व संयोग साथ आये भी, वर्तमान का शरीर व धन आदि साथ जायेंगे नहीं- आर सिद्ध होता है कि इस समय भी शरीर व धनादि से मेरा संबंध सम्बंध नहीं है।
प्र०६२. जैसा जानने तो दुःख का अभाव और सुख की प्राप्ति हो?
उ० १. मैं जीव तत्त्व हूँ - शरीर मैं नहीं हूँ।
२. अनादिनिधन वस्तुएँ (द्रव्य) भिन्न-भिन्न अपनी-अपनी मर्यादा सहित परिणमित होती हैं। कोई किसी के अधीन नहीं है। कोई किसी के परिणमित करने में परिनिमित्त नहीं होती है। (श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ० ५२)
३. ऐसे जानने तो सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और सम्यक्त्व की प्राप्ति होकर क्रम से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
प्र०६३. जिनमत की परिपाटी क्या है?
उ० जिनमत में तो यह परिपाटी है कि पहले सम्यक्त्व होता है फिर ज्ञानादि होते हैं, यह सम्यक्त्व स्व (आत्मा) और पर (शरीर) का श्रद्धान होने पर होता है यह श्रद्धान द्रव्ययोग के अभ्यास से होता है, इसलिये प्रथम द्रव्यगुणयोग के अनुसार आत्मा और शरीर की भिन्नता का ज्ञान करके सम्यग्दर्शन प्राप्त करना योग्य है। (श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ० २३)
- नियमावली -
- प्रत्येक माह एक वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता पर प्रश्नोत्तर पेपर दिया जायेगा। एक माह पश्चात् उसी प्रतियोगिता का प्रश्नोत्तर पेपर के आधार पर परीक्षा होगी। परीक्षा दिवस पर ही अगली प्रतियोगिता का प्रश्नोत्तर पेपर दे दिया जायेगा- इस प्रकार यह क्रम भगवान् महावीर के पूरे 2500वें जन्मदिवस तक चलता रहेगा।
- श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला की नियमित कक्षाओं में प्रतियोगिता के प्रश्नोत्तरों का अभ्यास कराया जायेगा। सभी इच्छुक प्रतियोगी सादर आमंत्रित हैं। नियमित कक्षाओं का समय - (1) शनिवार : सांय 5 से 6 बजे तक और रविवार : प्रातः 10 से 11 बजे तक वीतराग विज्ञान पाठशाला में।
(2) शनिवार प्रातः 10 से 11 बजे तक स्वध्याय मंदिर (सं० जैन मंदिर) में। - विजेता प्रतियोगियों को उचित परिश्रमिक दिये जायेंगे।
- ‘वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता’ संचालन समिति का निर्णय अन्तिम व सर्वमान्य होगा।
- प्रतियोगिता में भाग लेने के इच्छुक प्रतियोगी निम्नलिखित व्यक्तियों में से किसी के पास अपना नाम लिखाकर प्रश्नोत्तर पुस्तिका प्राप्त कर लें :-
- श्रीमती बीना जैन,
623131
31 लक्ष्मी पार्क, राजा रोड - श्रीमती कविता जैन,
652280
सम्बोधिका, जैन महिला बल,
इण्डियन यूथ एजेंसी, चकराता रोड - श्रीमती शकुन्तला जैन
729921
अध्यक्षा, दि०जैन महिला समिति (मदिरा)
258 खुड़बुड़ा मोहल्ला - श्रीमती बीना जैन
621764
अध्यक्षा, प्रगति जैन मिलन
4A रेसकोर्स - श्रीमती कनक जैन
654506
अध्यक्षा, महिला जागृति मंच,
6B प्रीतम रोड - श्रीमती शशि जैन
624420
अध्यक्षा, जैन वीतराग क्लब,
7 खजान बाजार - श्रीमती सरोज जैन
655841
28 गांधी रोड, सं० जैन मंदिर - श्रीमती बीना जैन
657614
C/o जैन मेडिकल हॉल
56 सुभाष रोड - श्रीमती कमलेश जैन
622853
24 आनन्द चौक - श्रीमती लीला जैन
720278
12 तिलक रोड - श्रीमती अरुणा जैन
626967
14 चमन विहार, माजरा - श्रीमती रेखा जैन
640147
पर्व हाउस, सी० एरिया, क्लेमनटाउन
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
31- राजा रोड, जैन कालोनी, देहरादून, फोन नं० (0135) 623131
के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता - 2
दिनांक 6 अगस्त, दिन रविवार दोपहर 3 बजे
(स्थान- श्री जैन धर्मशाला, गांधी रोड, देहरादून)
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र०1. वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता नं० 1 के समस्त प्रश्न व उत्तर ?
प्र०2. छह द्रव्य में मैं कौन सा द्रव्य हूँ?
उ० जीव द्रव्य, धर्म, अधर्म, आकाश, काल - इन छह द्रव्यों में मैं जीव द्रव्य हूँ।
प्र०3. सात तत्वों में मैं कौन सा तत्व हूँ?
उ० जीव, अजीव, आस्रव-बंध, संवर-निर्जरा, मोक्ष - इन सात तत्वों में मैं जीव तत्व हूँ।
प्र०4. जीव और जीव तत्व में क्या अन्तर है?
उ० (1) जिसमें ज्ञान-दर्शन पाये जाते वह जीव द्रव्य है - इसमें निगोद से लेकर
सिद्ध दशा तक के सब जीव आ गये।
(2) जिसमें मेरा ज्ञान दर्शन पाया जाये वह जीव तत्व है - इसमें निज जीव
को छोड़कर बाकी अन्य जीव से भी पृथक करना है।
प्र०5. पुद्गल द्रव्य के स्पर्श-रस-गंध-वर्ण आदि गुणों की कितनी पर्यायें होती हैं?
उ० 27 पर्यायें होती हैं -
स्पर्श गुण - हल्का-भारी, ठंडा-गरम, रूखा-चिकना, कड़ा-नरम = ये
आठ पर्यायें पुद्गल द्रव्य के स्पर्श गुण में आती हैं।
रस गुण - कड़वा-मीठा-कसैला-खट्टा-चरपरा-फीका = ये पाँच पर्यायें पुद्गल
के रस गुण में आती हैं।
गंध गुण - सुगन्ध और दुर्गन्ध = ये दो पर्यायें पुद्गल द्रव्य के गंध गुण में
आती हैं।
वर्ण गुण - काला-पीला-नीला-लाल-सफेद = ये पाँच पर्यायें पुद्गल
द्रव्य के वर्ण गुण में आती हैं।
शब्द की - सात पर्यायें होती हैं जो शब्द रूप पुद्गल स्कन्धों में से आती
हैं।
प्र०6. शरीर का हलनचलन आदि किसका कार्य है? किसका नहीं है?
उ० शरीर का हलनचलन पुद्गल के स्वयं गुण का कार्य है, आत्मा का नहीं है।
शरीर के हलनचलन का ज्ञान-आत्मा के ज्ञानगुण का कार्य है।
प्र०7. नीबू में खट्टापन किसका कार्य है? किसका नहीं?
उ० नीबू में खट्टापन पुद्गल के रस गुण का कार्य है, आत्मा का नहीं है। खट्टेपन
का ज्ञान - आत्मा के ज्ञान गुण का कार्य है।
प्र०8. फूल में सुगन्ध किसका कार्य है? किसका कार्य नहीं है?
उ० फूल की सुगन्ध - पुद्गल के गंध गुण का कार्य है, आत्मा का नहीं है।
सुगन्ध का ज्ञान - आत्मा के ज्ञान गुण का कार्य है।
प्र०9. शरीर का काला या गोरापन किसका कार्य है? किसका नहीं है?
उ० शरीर का काला या गोरापन - पुद्गल के वर्ण गुण का कार्य है, आत्मा का
नहीं है। काले या गोरापन का ज्ञान - आत्मा के ज्ञान गुण का कार्य है।
प्र०10. पुद्गल के कितने भेद हैं?
उ० दो भेद हैं - (1) परमाणु (2) स्कन्ध।
प्र०11. परमाणु किसे कहते हैं?
उ० जिसका पुद्गल विभाग नहीं हो सकता ऐसे सबसे छोटे पुद्गल को परमाणु
कहते हैं।
प्र०12. स्कन्ध किसे कहते हैं?
उ० दो या दो से अधिक परमाणुओं के संघ को स्कन्ध कहते हैं।
प्र०13. स्कन्ध के कितने भेद हैं?
उ० (1) आहारवर्गणा (2) तैजस वर्गणा (3) भाषावर्गणा (4) मनोवर्गणा (5) कार्मणवर्गणा
- इत्यादि 22 भेद हैं।
(नोट : इनका स्पष्टीकरण वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता-3 में आयेगा)
प्र०14. बंध किसे कहते हैं?
उ० जिस संबंध विशेष से अनेक वस्तुओं में एकपने का ज्ञान होता है उस संबंध
विशेष को बंध कहते हैं।
प्र०15. बंध कितने प्रकार के हैं?
उ० तीन प्रकार के हैं - (1) जीव बंध (2) पुद्गल बंध (3) उभय बंध।
प्र०16. जीव बंध किसे कहते हैं? जीव बंध में क्या समझना है?
उ० 1. जिस संबंध विशेष से आत्मा और राग द्वेष के भावों में एकपने का ज्ञान
होता है उस संबंध विशेष को जीव बंध कहते हैं। जैसे- मैं रागी हूँ, मैं द्वेषी
हूँ, मैं क्रोधी हूँ, आदि।
2 जीव बंध में यह समझना है कि आत्मा अलग है और राग-द्वेषादि भाव
अलग हैं।
प्र०17. पुद्गल बंध किसे कहते हैं? पुद्गल बंध में क्या समझना है?
उ० 1. जिस संबंध विशेष से अनेक पुद्गलों में एकपने का ज्ञान होता है उस
संबंध विशेष को पुद्गल बंध कहते हैं। जैसे- कार, मकान, धन, जेवर
आदि।
2. पुद्गल बंध में यह समझना है कि कार आदि एक दिखने वाली वस्तु में
अनेक पुद्गल हैं। एक पुद्गल का दूसरे पुद्गल से संबंध नहीं है, तो मुझ
आत्मा से संबंध कैसे हो सकता है?
प्र०18. उभय बंध किसे कहते हैं? उभय बंध में क्या समझना है?
उ० 1. जिस संबंध विशेष से आत्मा और शरीर में एकपने का ज्ञान होता है उस
सम्बन्ध विशेष को उभय बंध कहते हैं। जैसे- मनुष्य, देव, नारकी, पशु
आदि।
2. उभय बंध में यह समझना है कि मनुष्य आदि उभय बंध में ज्ञान स्वरूप
आत्मा अलग है और उनके पुद्गलों का पिंड मनुष्य शरीर अलग है।
प्र०19. अनादिकालीन से जीव को कैसा भ्रमण है?
उ० जीव अनादिकालीन से अनेक शरीर धारण करता है, पूर्व का शरीर छोड़ता है
नवीन धारण करता है, वहां एक तो स्वयं आत्मा-जीव द्रव्य और अनन्त पुद्गल
परमाणुमय शरीर - इन दोनों के संयोगरूप मनुष्य-तिर्यंचादि अनेक अवस्थायें
होती हैं, उन सब में यह मैं हूँ ऐसी अबुद्धि करता है। आत्मा और शरीर - इन
दोनों में मैं कौन हूँ और मैं कौन नहीं हूँ - ऐसा भेद नहीं कर पाता, दोनों को
एक मानता है - इस मिथ्या श्रद्धान के कारण ही आज तक धर्म की प्राप्ति नहीं
हुई।
प्र०20. पाप जीव कौन है?
उ० जो जीव जन्म-मरण के दुःखों को दूर करना चाहता है और स्वयं के आश्रय
से अविनाशी सुख प्रगट करना चाहता है - वही पाप जीव है।
प्र०21 पाप जीव का प्रथम लक्षण क्या है?
उ० 1. कुगुरु-कुदेव-कुशास्त्र की ओर से हटकर,
2. देव-शास्त्र-गुरु को यथार्थता पहचानकर निरन्तर उनका सत्समागम
- यह पाप जीव का प्रथम लक्षण है।
प्र०22. देव-गुरु-शास्त्र कैसे होते हैं? और उनका आदर क्या है?
उ० “मैं आत्मा हूँ, मेरा स्वभाव मात्र जानना ही है, पर मैं कुछ करता मेरा स्वभाव
नहीं है अर्थात् प्रकाश स्वरूप कारण रहते हुये स्वयं ही सदा रहते हैं” -
इस प्रकार जो बताते हैं वे सच्चे देव-गुरु-शास्त्र हैं। इसी प्रकार जो समझता
है वही देव-गुरु-शास्त्र का आदर करना है।
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
31-राजा रोड, जैन कालोनी, देहरादून, फोन नं० (0135) 623131
के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता - 3
दिनांक 24 सितम्बर, 2000 दिन रविवार दोपहर 2 बजे
(स्थान- श्री जैन धर्मशाला, गांधी रोड, देहरादून)
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र01. वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता नं० 1 व 2 के समस्त प्रश्न व उत्तर ?
प्र02. द्रव्य का स्वचतुष्टय क्या है ?
उ० द्रव्य क्षेत्र-काल-भाव = यह प्रत्येक द्रव्य का स्वचतुष्टय है। प्रत्येक द्रव्य का
स्वचतुष्टय उससे अन्यत्र ही है बाहर नहीं है।
प्र03. प्रत्येक द्रव्य का पृथक-पृथक क्षेत्र अर्थात् आकार क्या है ?
उ० जीव, धर्म और अधर्मद्रव्य असंख्यातप्रदेशी हैं, पुद्गल और कालद्रव्य एक प्रदेशी
हैं और आकाश द्रव्य अनन्त प्रदेशी है।
प्र04. प्रत्येक द्रव्य का काल क्या है ?
उ० प्रत्येक द्रव्य का काल अनादिनिधन है।
प्र05. प्रत्येक द्रव्य का भाव क्या है ?
उ० प्रत्येक द्रव्य के अन्दर रहने वाले अनन्त सामान्य गुण व अनन्त विशेष गुण-
द्रव्य का भाव अर्थात् खजाना है।
प्र06. द्रव्य की महिमा किससे है ?
उ० प्रत्येक द्रव्य की महिमा उसके अनन्त गुणों से है क्योंकि द्रव्य का लक्षण ही
गुण-पर्यायों वाला है। जीव द्रव्य की महिमा उसके ज्ञान-दर्शनादि अनन्त गुणों
से है। धन-वैभव, स्त्री-पुरुष, गाड़ी-बंगला, रूप-रंग, बाह्य भूम अभूम
क्रियाओं से जीवद्रव्य की महिमा नहीं है।
प्र07. प्रत्येक द्रव्य में कितने गुण हैं ?
उ० प्रत्येक द्रव्य में अनन्त-अनन्त गुण हैं। जीव अनन्त, पुद्गल अनन्तानन्त,
धर्म-अधर्म-आकाश एक-एक और काल द्रव्य लोक प्रमाण असंख्यात हैं - इन
सभी द्रव्यों में तुम संख्या अपेक्षा अनन्त हैं, कम या अधिक नहीं।
प्र023 धर्म क्या है ?
उ० श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार गाथा 2 में कहा है -
जो आत्मा को चारों गतियों में परिभ्रमण रूप दुःखों से छुड़ाकर उत्तम,
अविनाशी, अतीन्द्रिय, मोक्ष सुख में धर दे वह धर्म है। ऐसा धर्म हिंसा के बदले
में नहीं मिलता, किसी का दिया नहीं मिलता, शरीरादि कुछ करने से भी नहीं
मिलता।
प्र024 धर्म कहीं है और धर्म कैसे होता है ?
उ० श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार की गाथा 2 में लिखा है -
‘धर्म तो आत्मा का स्वभाव है। शरीरादि परद्रव्यों में आत्मबुद्धि छोड़कर अपने
ज्ञानस्वभावी आत्मा का श्रद्धान, ज्ञान और आचरण ही धर्म है।’ अर्थात् धर्म तो
आत्मा का स्वभाव है अतः अपनी परिणमन से ही धर्म होता है।
प्र025. जीव संसार में परिभ्रमण क्यों करता है ?
उ० यह जीव द्रव्य जैसा है ऐसा अपने को नहीं परिणमाता और जैसा नहीं है ऐसा
मानता है - इस विपरीत मान्यता के कारण संसार में परिभ्रमण करता है।
प्र026. हमें जन्म-मरण का अभाव करना है, धर्म की प्राप्ति करनी है हम आत्मा और
शरीर को भिन्न-भिन्न कैसे समझें ?
उ० मुनिराज श्रीकुन्दकुन्द ने पंचास्तिकाय संग्रह की गाथा 122 में कहा है -
- जो सब जानता है, देखता है, सुख की इच्छा करता है, दुःख से डरता
है वह जीव है। - अचेतन शरीर इन्द्रियाँ, मन, मकान आदि कुछ जानते नहीं, देखते नहीं,
सुख की इच्छा नहीं करते। दुःख से डरते नहीं। - अचेतन शरीर के साथ रहने पर भी आत्मा अपना ज्ञान आदि कार्य करता
है, शरीर अपना कार्य करता है। - जब तक आत्मधर्म का उदय रहता है आत्मा और शरीर दोनों साथ रहते
हैं परन्तु आत्मा शरीररूप नहीं होता और शरीर आत्मरूप नहीं होता।
प्र027. शरीर से भिन्न अपनी पहिचान होने पर धर्म किस प्रकार हो जाता है ?
उ० "मैं आत्मा हूँ, मुझमें ज्ञान है, मैं ज्ञान से जानता हूँ। शरीरादि जड़ है, शरीर में
ज्ञान नहीं है, शरीर कुछ जानता नहीं है - ऐसा निर्णय करने पर अपनी
ज्ञान-दर्शन की पर्याय, पर से हटकर निज आत्मा में एकाग्र होती है, यही
सम्यग्दर्शन है और सम्यग्दर्शन ही धर्म का प्रारम्भ है।
विशेष नोट - प्रतियोगिता के प्रश्नोत्तरों का अभ्यास पाठशाला की नियमित कक्षाओं में कराया जायेगा।
- श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, बुधवार बाजार में प्रश्नोत्तरों का अभ्यास जुलाई माह की
12, 13 व 14 तारीख में प्रातः 11 से 12 बजे तक कराया जायेगा। 3. वीतरागविज्ञान
प्रतियोगिता - 1 का पारितोषिक विरल व अविरल को क्रमवार पर ही होगा।
4
प्र08. प्रत्येक द्रव्य में गुणों की संख्या का माप क्या है ?
उ० (1) जीव अनन्त हैं, (2) जीव से अनन्तगुणे अधिक परमाणु हैं, (3) परमाणुओं से
अनन्तगुणे अधिक तीन काल के समय हैं, (4) तीन काल के समयों से अनन्तगुणे
अधिक आकाश के प्रदेश हैं और (5) आकाश के प्रदेशों से अनन्तगुणे अधिक एक
द्रव्य में (प्रत्येक द्रव्य में) गुण हैं।
प्र09. क्या प्रत्येक जीवद्रव्य में गुण समान संख्या में हैं ? इसके जानने से लाभ क्या
है ?
उ० प्रत्येक जीवद्रव्य में चाहे वह तिर्यंचगति हो, दो-तीन-चार-पाँच इन्द्रिय तिर्यंच
हो, मनुष्य हो, देव या नारकी हो, मिथ्यादृष्टि हो या सम्यग्दृष्टि हो,
श्रावक-मुनि-अरिहंत या सिद्ध परमात्मा हो - संख्या अपेक्षा गुण समान ही हैं,
कम या अधिक नहीं हैं। ऐसा जानने से दीनता व अभिमान की भावना का नाश
हो जाता है।
प्र10. जीव द्रव्य चेतन है बाकी सभी द्रव्य अचेतन हैं, तो सभी द्रव्यों में गुण समान
कैसे हो सकते हैं ?
उ० प्रत्येक द्रव्य में गुण संख्या अपेक्षा समान ही हैं। अन्तर मात्र इतना है कि चेतन
द्रव्य के गुण पर्याय चेतन (ज्ञान-दर्शन सहित) होते हैं और अचेतन द्रव्यों के गुण
पर्याय अचेतन (ज्ञान-दर्शन रहित) होते हैं।
प्र11. द्रव्य में गुण किस प्रकार रहते हैं ?
उ० (1) गुण द्रव्य के सम्पूर्ण भागों में तथा द्रव्य की सम्पूर्ण अवस्थाओं में रहते
हैं।
(2) गुण द्रव्य में बाले (बड़ाले) अथवा निकाले (घटाऐं) नहीं जा सकते।
(3) गुण द्रव्य से किसी अन्य का पृथक नहीं किये जा सकते क्योंकि प्रत्येक
द्रव्य और उसके गुणों का द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव एक ही है।
प्र12. द्रव्य में गुण किस प्रकार रहते हैं ? उदाहरण देकर समझाइये।
उ० द्रव्य में गुण चीनी में मिठास की भांति रहते हैं क्योंकि-
(1) मिठास चीनी के सम्पूर्ण भागों में है।
(2) मिठास को चीनी से सम्पूर्ण अवस्थाओं में रहती है, और
(3) मिठास को चीनी से किसी प्रकार भी पृथक नहीं किया जा सकता।
प्र13. द्रव्य में गुण किस प्रकार नहीं रहते ? उदाहरण देकर समझाइये।
उ० द्रव्य में गुण थैली में रुपयों की भांति नहीं रहते क्योंकि -
(1) रुपये थैली के सम्पूर्ण भाग में नहीं रहते।
(2) रुपये थैली की सम्पूर्ण अवस्थाओं में नहीं रहते,
(3) रुपये थैली में डाले व निकाले जा सकते हैं, और
(4) रुपये स्थिर कर अलग-अलग हो सकते हैं।
5
प्र14 गुणरहित द्रव्य का नाम बताओ ?
उ० कोई भी द्रव्य गुणरहित नहीं होता क्योंकि गुणों के समूह को ही द्रव्य कहते हैं।
प्र15. द्रव्य का अपने गुणों के साथ कैसा सम्बन्ध है ?
उ० द्रव्य का अपने गुणों के साथ तादात्म्यसिद्ध सम्बन्ध है अर्थात् कभी समाप्त न
होने वाला सम्बन्ध है।
प्र16. छहों द्रव्यों के विशेष गुणों को जानने से क्या लाभ है ?
उ० (1) सब द्रव्यों की पृथकता का यथार्थ ज्ञान होता है कि -
(अ) जिसमें ज्ञान दर्शन पाया जाये वह जीव है और जिसमें मेरा ज्ञान
दर्शन नहीं वे सब (अन्य जीव) अजीव अचेतन हैं।
(ब) जिसमें स्पर्श-रस-गंध-वर्ण पाया जाये वह पुद्गल है, पुद्गल
मुझ आत्मा से सर्वथा भिन्न है।
(स) गतिहेतुत्व से धर्मद्रव्य की, स्थितिहेतुत्व से अधर्मद्रव्य की,
अवगाहनहेतुत्व से आकाश व परिणमनहेतुत्व से कालद्रव्य की
पहचान होने पर पता चलता है कि ज्ञान-दर्शन स्वभावी आत्मा
का धर्म-अधर्म-आकाश-काल द्रव्यों से सर्वथा सम्बन्ध नहीं है।
(2) स्व-पर का भेदविज्ञान होता है जिससे मोह का सर्वथा अभाव होता है।
(3) सर्वद्रव्यों से सर्वथा भिन्न एकमात्र निज आत्मा ही उपादेय है - ऐसा पता
चल जाता है।
प्र17. छहों द्रव्यों के विशेष गुणों की यथार्थता नहीं जानने का फल क्या है ?
उ० जो जीव छहों द्रव्यों के विशेषगुणों को यथार्थतया नहीं जानता वह
ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य-श्रद्धा-चारित्र आदि अनन्त गुणों के अपने पिण्ड अपनी
आत्मा को नहीं पहचान पाता, शरीरोरि परद्रव्यों में ही आत्मबुद्धि करता हुआ,
चारों गतियों में ही जन्म-मरण के दुःख भोगता है।
प्र18. इस संदर्भ में मुनिराज श्री योगेन्दुदेव ने क्या कहा है ?
उ० श्री योगेन्दुदेव आचार्य ने श्री योगसार की गाथा 10 व 11 में कहा है -
देवदिह जं परि कहिया ते अप्पहु मुणेहि।
सो बहिरप्पा जिणभणिउ पुणु सव्वह भणेइ ।। 10 ।।
अर्थ - देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, उन परपदार्थों को ही जो आत्मा
समझता है, उसे जिनभगवान् ने बहिरात्मा कहा है। वह जीव संसार में चिर फिर
से परिभ्रमण करता है।
देवदिह जं परि कहिया ते अप्पहु मा मुणेहि।
इउ जाणिवि जुउ अप्प अप्प मुणेहि ।। 11 ।।
अर्थ - देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, वे परपदार्थ आत्मा नहीं होते-यह
जानकर हे जीव ! तू आत्मा को आत्मा पहिचान।
प्र०४. प्रत्येक द्रव्य में गुणों की संख्या का माप क्या है? उ० (1) जीव अनन्त हैं, (2) जीव से अनन्तगुने अधिक परमाणु हैं, (3) परमाणुओं से अनन्तगुने अधिक तीन काल के समय हैं, (4) तीन काल के समयों से अनन्तगुने अधिक आकाश के प्रदेश हैं, और (5) आकाश के प्रदेशों से अनन्तगुने अधिक एक द्रव्य में (प्रत्येक द्रव्य में) गुण है।
प्र०७. क्या प्रत्येक जीवद्रव्य में गुण समान संख्या में है? इसके जानने से लाभ क्या है?
उ० प्रत्येक जीवद्रव्य में चाहे वह निगोदिया हो, दो-तीन-चार-पाँच इन्द्रिय तिर्यंच हो, मनुष्य हो, देव या नारकी हो, मिथ्यादृष्टि हो या सम्यकदृष्टि हो, श्रावक-मुनि-अरहंत या सिद्ध परमात्मा हो – संख्या अपेक्षा गुण समान ही हैं, कम या अधिक नहीं है। ऐसा जानने से दीनता व अभिमान की भावना का नाश हो जाता है।
प्र०11. द्रव्य में गुण किस प्रकार रहते हैं?
(2) गुण द्रव्य में डाले (बढ़ाये) अथवा निकाले (घटाये) नहीं जा सकते। (3) गुण द्रव्य से किसी प्रकार भी पृथक नहीं किये जा सकते क्योंकि प्रत्येक द्रव्य और उसके गुणों का द्रव्य-क्षेत्र-काल एक ही है।
(2) मिठास चीनी की सम्पूर्ण अवस्थाओं में रहती है, और
(2) रूपये थैली की सम्पूर्ण अवस्थाओं में नहीं रहते,
(3) रूपये थैली में डाले व निकाले जा सकते हैं, और
(4) रूपये बिखर कर अलग-अलग हो सकते हैं।
प्र०14. गुणरहित द्रव्य का नाम बताओ ?
(अ) जिसमें ज्ञान दर्शन पाया जाये वह जीव है और जिनमें मेरा ज्ञान दर्शन नहीं वे सब (अन्य जीवों सहित) अजीव है।
प्र०17. छहों द्रव्यों के विशेष गुणों को यथार्थतया नहीं जानने का फल क्या है? उ० जो जीव छहों द्रव्यों के विशेषगुणों को यथार्थतया नहीं जानता वह ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य-श्रद्धा-चारित्र आदि अनन्त गुणों के अभेद पिण्ड अपनी आत्मा को नहीं पहचान पाता, शरीरादि परद्रव्यों में ही आत्मबुद्धि करता हुआ, चारों गतियों में ही जन्म-मरण के दुःख भोगता है।
प्र०18. इस संदर्भ में मुनिराज श्री योगीन्दुदेव ने क्या कहा है? उ० श्री योगीन्दुदेव आचार्य ने श्री योगसार की गाथा 10 व 11 में कहा है – देहादिउ जे परि कहिया ते अप्पाणु मुणेइ।
सो बहिरप्पा जिणभणिउ पुणु संसारू भमेइ ।। 10 ।।
अर्थ – देह आदि जो पदार्थ पर कहे गये हैं, उन पदार्थों को ही जो आत्मा समझता है, उसे जिनभगवान् ने बहिरात्मा कहा है। वह जीव संसार में फिर फिर से परिभ्रमण करता है।
देहादिउ जे परि कहिया ते अप्पाणु ण होहि।
इउ जाणेविणु जीव तुहुँ अप्पा अप्प मुणेहि ।। 11 ।।
प्र०19. शरीर कितने हैं?
उ० शरीर पाँच हैं- 1. औदारिक, 2. वैक्रियक, 3. आहारक, 4. तैजस, 5. कार्माण। प्र०20. औदारिक शरीर किसको कहते हैं?
उ० मनुष्य और तिर्यंचों के स्थूल शरीर को औदारिक शरीर कहते हैं। प्र०21. वैक्रियक शरीर किसको कहते हैं?
उ० जो छोटे-बड़े, पृथक-अपृथक आदि अनेक क्रियाओं को करे ऐसे देव और नारकियों के शरीर को वैक्रियक शरीर कहते हैं।
प्र०22. आहारक शरीर किसको कहते हैं?
उ० आहारक ऋद्धिधारी छठे गुणस्थानवर्ती मुनि को तत्वों में कोई शंका होने पर अथवा जिनालयादि की वन्दना करने के लिए, मस्तक से एक हाथ प्रमाण स्वच्छ और सफेद, सप्तधातु रहित पुरूषाकार जो पुतला निकलता है उसको आहारक शरीर कहते हैं।
प्र०23. तैजस शरीर किसको कहते हैं?
उ० औदारिक, वैक्रियक और आहारक इन तीन शरीरों में कान्ति उत्पन्न करने वाले शरीर को तैजस शरीर कहते हैं।
प्र०24. कार्माण शरीर किसको कहते हैं?
उ० आठ कर्मों के समूह को कार्माण शरीर कहते हैं।
प्र०25. एक जीव के एक साथ कितने शरीर का संयोग हो सकता है?
उ० एक जीव के एक साथ कम से कम दो और अधिक से अधिक चार शरीर का संयोग होता है। खुलासा इस प्रकार है-
(1) विग्रहगति में तैजस और कार्माण शरीर का संयोग होता है।
(2) मनुष्य और तिर्यंच के औदारिक, तैजस और कार्माण शरीर का संयोग होता है।
(3) देव और नारकियों के वैक्रियक, तैजस और कार्माण शरीर का संयोग होता है।
(4) आहारक ऋद्धिधारी मुनि के औदारिक, आहारक, तैजस और कार्माण शरीर का संयोग होता है।
प्र०26. स्कन्ध के कितने भेद हैं?
उ० आहारवर्गणा, तैजसवर्गणा, भाषावर्गणा, मनोवर्गणा, कार्माणवर्गणा इत्यादि 22 भेद हैं।
प्र०27. आहारवर्गणा किसको कहते हैं?
उ० जो पुद्गल स्कन्ध औदारिक, वैक्रियक और आहारक इन तीन शरीरों की रचना करता है उसको आहारवर्गणा कहते हैं।
प्र०28. तैजसवर्गणा किसको कहते हैं?
उ० जिस वर्गणा से तैजस शरीर बनता है उसको तैजसवर्गणा कहते हैं।
प्र०29. भाषावर्गणा किसे कहते हैं?
उ० जो पुद्गल स्कन्ध शब्द रूप से परिणत होता है उसको भाषावर्गणा कहते हैं। प्र०30. मनोवर्गणा किसको कहते हैं?
उ० जिस पुद्गल स्कन्ध से अष्टदल कमल के आकार द्रव्यमन की रचना होती है उसको मनोवर्गणा कहते हैं।
प्र०31. कार्माणवर्गणा किसको कहते हैं?
उ० जिस पुद्गल स्कन्ध से कार्माण शरीर बनता है उसको कार्माणवर्गणा कहते हैं। “पुद्गल की 27 पर्यायों से भेद विज्ञान किस प्रकार करना”
प्र०1. शरीर का हल्कापना क्या है? क्या आत्मा भी हल्का-भारी होता है? उ० शरीर में हल्कापना पुद्गल द्रव्य के स्पर्शगुण की विभाव अर्थपर्यायें है, आत्मा न हल्का है न भारी, आत्मा तो शरीर के हल्केपने को मात्र जानता है। प्र०2. अज्ञानी शरीर के हल्केपने को जानकर क्या करता है?
उ० अज्ञानी मात्र जानने वाला नहीं रहता, शरीर के ज्यादा हल्केपने में द्वेष करता है और ठीक होने पर राग करता है।
प्र०3. इसमें राग द्वेष किस प्रकार हुआ? और राग द्वेष का फल क्या है? उ० स्वयं ज्ञानस्वरूप आत्मा है, शरीर का हल्कापना पुद्गलों के स्पर्श गुण का कार्य है। अर्थात् शरीर का हल्कापना परद्रव्य का कार्य है। दूसरे द्रव्य के कार्य से निज आत्मा में लाभ मानना राग है और दूसरे द्रव्य के कार्य से निज आत्मा में नुकसान मानना द्वेष है। इस राग द्वेष का फल अनन्त संसार है।
प्र०4. हमें अनन्त संसार में नहीं भटकना है, हम शरीर के हल्केपने को आत्मा का माननेरूप मोह-राग द्वेष का अभाव कैसे करें?
उ० मैं अस्पर्शस्वभावी ज्ञानस्वरूप आत्मा हूँ, शरीर का हल्कापना पुद्गलों के स्पर्श गुण की विभाव अर्थपर्यायें हैं। ऐसा जानकर अपनी ज्ञान दर्शन की पर्याय को शरीर के हल्केपने से हटाकर ज्ञानस्वरूप आत्मा में एकाग्र करें तो शरीर के हल्केपने को आत्मा का माननेरूप मोह-राग-द्वेष का अभाव हो जाता है अर्थात् आस्रव-बंध (दुःख) का अभाव हो जाता है और सुख अर्थात् संवर निर्जरा की प्राप्ति होकर क्रम से मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
'विशेष नोट - पुद्गल द्रव्य के स्पर्श गुण की - हल्कापना पर्याय की भाँति भारी, ठंडा, गरम, रूखा, चिकना, कड़ा, नरम, खट्टा-मीठा, कड़वा, चरपरा, कषायला, सुगन्ध, दुर्गन्ध, काला, पीला, नीला, लाल, सफेद, निन्दा व प्रशंसा के शब्द - इन पर्यायों पर भी उपरोक्त प्रश्न 1 से 4 के अनुसार प्रश्न व उत्तर बनाकर अभ्यास करना है।
प्र०5. मुनिराज श्री कुन्दकुन्ददेव ने आत्मा और पुद्गल की 27 पर्यायों की भिन्नता के विषय में क्या कहा है?
उ० मुनिराज श्री कुन्दकुन्ददेव ने महान् ग्रंथाधिराज श्री समयसार की 390 से 404 तक की गाथाओं में कहा है -
'निज भगवान् आत्मा का हल्का-भारी, ठंडा-गरम्, रूखा-चिकना, कड़ा-नरम रूप स्पर्श के साथ, खट्टा-मीठा-कड़वा-चरपरा, कषायला रूप रस के साथ, सुगन्ध-दुर्गन्ध रूप गंध के साथ, काला-पीला-नीला-लाल-सफेद रूप वर्ण के साथ, सात प्रकार के शब्दों के साथ, पुद्गलबंधों व उभयबंधों के साथ, आठ कर्मों के साथ- सर्वथा सम्बन्ध नहीं है क्योंकि पुद्गल द्रव्य अचेतन है, उसमें ज्ञान नहीं है और मैं आत्मा ज्ञानवाला हूँ, निरन्तर जानता हूँ, इसलिये आत्मा भिन्न है और पुद्गल (शरीर) भिन्न है- ऐसा अनादि से जिनदेव कहते हैं।
प्र०6. शरीर के हल्केपने आदि को जानकर राग-द्वेष करना अज्ञान है- इस विषय में मुनिराज श्री कुन्दकुन्ददेव ने क्या कहा है?
उ० मुनिराज श्री कुन्दकुन्ददेव ने महान् ग्रंथाधिराज श्री समयसार की 373 से 382 तक की गाथाओं में कहा है-
(1) औदारिक आदि शरीरों में स्पर्श की हल्कापना आदि आठ पर्यायें, रस की पाँच पर्यायें, गंध की दो पर्यायें, वर्ण की पाँच पर्यायें, शब्द की सात पर्यायें, धन, मकान, कार, जेवर आदि पुद्गलबंध व पुरुष, स्त्री, लड़का, लड़की आदि उभयबंध- ये सब परद्रव्य हैं। ये सब परद्रव्य मुझ आत्मा से यह नहीं कहते कि तू मुझे स्पर्श कर, तू मुझे चख, तू मुझे सूंघ, तू मुझे देख, तू मुझे सुन, तू मुझे जान।
(2) मुझ आत्मा भी अपनी सत्ता छोड़कर उन्हें जानने नहीं जाता क्योंकि प्रत्येक द्रव्य- अस्तित्व वस्तुत्व आदि अनन्त सामान्य गुण, अनन्त विशेष गुण, एक व्यंजनपर्याय और अनन्त अर्थपर्यायों रूप- अपनी-अपनी सत्ता में रहता है, अपनी सत्ता से बाहर न निकला है और न निकल सकता है।
(3) ये परद्रव्य दूर हों या समीप हों- मुझ आत्मा अपने स्वभाव से ही जानता है। (4) ये परद्रव्य मनोहर हों या अमनोहर हों- मुझ आत्मा में किंचित विशेषता उत्पन्न नहीं कर सकते।
(5) मुझ आत्मा-दीपक की भाँति- पुद्गल की पर्यायों के प्रति सम्बन्ध रहित है। (6) तथापि शरीर के हल्केपने आदि को जानकर राग द्वेष करना- सो अज्ञान है, संसार का कारण है।
(7) संसार में नहीं भटकना है तो ज्ञानस्वरूप अपनी आत्मा को पुद्गल की पर्यायों से सर्वथा भिन्न जान।
विशेष नोट
- प्रतियोगिता के प्रश्नोत्तरों का अभ्यास पाठशाला की नियमित कक्षाओं में कराया जायेगा। 2. श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, झण्डा बाजार में प्रश्नोत्तरों का अभ्यास प्रत्येक बुधवार को प्रातः 11 से 12 बजे तक कराया जायेगा। 3. वीतरागविज्ञान प्रतियोगिता-2 का पारितोषिक वितरण 24 सितम्बर को सभास्थल पर ही होगा।
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
३१-राजा रोड, जैन कालोनी, देहरादून, फोन नं० (०१३५) ६२३१३१
के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता-4
दिनांक १२ नवम्बर २००० दिन रविवार दोपहर ३ बजे
(स्थान - श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून)
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र०१ निम्नलिखित १ से ३५ तक के प्रश्नों के उत्तर पक्के याद करके नई कापी में लिखिये।
(१) देव-शास्त्र- गुरू किसे कहते हैं ?
(२) कुदेव - कुशास्त्र - कुगुरू किसे कहते हैं ?
(३) जाति अपेक्षा और संख्या अपेक्षा विश्व किसे कहते हैं ?
(४) द्रव्य किसे कहते हैं ? व गुण किसे कहते हैं ?
(५) गुणों के कितने भेद हैं ? सामान्य और विशेष गुण किसे कहते हैं ? (६) जीवादि प्रत्येक द्रव्य में कौन कौन से विशेष गुण हैं ?
(७) सामान्य गुण कितने हैं व कौन-कौन से हैं?
(८) अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व व प्रदेशत्व गुणों की परिभाषा क्या है?
(९) पर्याय किसे कहते हैं व पर्याय के कितने भेद हैं ?
(१०) व्यंजनपर्याय, स्वभावव्यंजन पर्याय व विभाव व्यंजन पर्याय किसे कहते हैं ? (११) अर्थपर्याय, स्वभाव अर्थपर्याय व विभाव अर्थपर्याय किसे कहते है ? (१२) विश्व - द्रव्य - गुण - पर्याय का रहस्य क्या हैं ?
(१३) जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल-प्रत्येक द्रव्य की पृथक पृथक सत्ता क्या है ?
(१४) प्रयोजनभूत तत्व कितने हैं व कौन-कौन से है ?
(१५) सात तत्वों की परिभाषा क्या-क्या है व प्रत्येक किस प्रकार प्रयोजनभूत है ? (१६) पुद्गल के स्पर्श-रस-गंध-वर्ण आदि गुणों की कितनी पर्यायें होती है ? (१७) पुद्गल के कितने भेद हैं ? परमाणु व स्कन्ध की परिभाषा ?
(१८) बंध किसे कहते हैं ? बंध कितने प्रकार के हैं ?
(१६) जीव बंध, पुद्गल बंध, उभयबंध किसे कहते हैं व प्रत्येक में क्या समझना है ? (२०) शरीर कितने हैं ? प्रत्येक की परिभाषा क्या है ?
(२१) स्कन्ध के कितने भेद हैं ? प्रत्येक की परिभाषा क्या है ? (२२) जीव-पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश-काल-प्रत्येक द्रव्य का पृथक-पृथक द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव क्या है ?
(२३) प्रत्येक द्रव्य में गुणों की संख्या का माप क्या है ? (२४) क्या प्रत्येक जीवद्रव्य में गुण समान संख्या में हैं ? इसके जानने से लाभ ? (२५) द्रव्य में गुण किस प्रकार रहते हैं ?
(२६) द्रव्य में गुण किस प्रकार रहते हैं ? और किस प्रकार नहीं रहते ? दोनों का उदाहरण देकर स्पष्टीकरण करिये ?
(२७) गुणरहित द्रव्य का नाम बताओ ? द्रव्य और गुणों का सम्बन्ध बताओ ? (२८) छहों द्रव्यों के विशेष गुणों को जानने के क्या लाभ है ? और न जानने से क्या नुकसान हैं ?
(२६) मैं भारी हूँ - इस वाक्य में शरीर के भारीपने से भेदविज्ञान किस प्रकार करना ? चार प्रश्न लगाकर समझाइये ?
(३०) जिनमतं की परिपाटी क्या है ?
(३१) अनादिकाल से जीव को कैसा श्रद्वान है ?
(३२) देव गुरु शास्त्र कैसे होते है ? उनका आदर क्या है ? (३३) धर्म क्या है ? धर्म कहाँ है ? धर्म कैसे मिलता है ? (३४) शरीर से भिन्न अपनी पहचान होने पर धर्म किसप्रकार हो जाता है ? (३५) वीतराग - विज्ञान प्रतियोगिता १-२ व ३ में अब तक आपने किस-किस आचार्य के, किस किस ग्रन्थ की, किस-किस गाथा या पृष्ठ का अभ्यास किया है- नाम व न० लिखिये ?
प्र०२ जैन धर्म के अमूल्य सिद्वान्त क्या हैं ?
उ० (१) एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का स्वामी नहीं, एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का कर्ता नहीं, एक द्रव्य दूसरे द्रव्य का भोक्ता नहीं-क्योंकि
A- प्रत्येक द्रव्य की सत्ता अलग अलग है।
B- प्रत्येक द्रव्य का द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव अलग अलग है। इसलिये देह आदि पर द्रव्यों का स्वामी बनकर मोह-राग-द्वेष करता उचित नहीं।
(२) द्रव्य - गुण को व्यापक कहते हैं और पर्याय को व्याप्य कहते हैं, अतः व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध एक द्रव्य का उसकी पर्याय में ही होता है, दो भिन्न-२ द्रव्यों में नहीं। जैसे सोना और आभूषण में व्याप्य व्यापक सम्बन्ध है, सुनार और आभूषण में नहीं।
प्र०३ एक कार्य के कितने कर्ता कहलाते हैं ?
उ० एक कार्य के चार कर्त्ता कहलाते हैं ?
१) निमित्त कारण
२) त्रिकाली उपादान कारण
३) अनन्तरपूर्व क्षणवर्ती पर्याय क्षणिक उपादान कारण
४) उस समय पर्याय की योग्यता क्षणिक उपादान कारण
(इसका विस्तृत स्पष्टीकरण वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता न०५ में होगा)
प्र०४ कषाय किसे कहते हैं ?
उ० कष अर्थात् संसार, आय अर्थात् लाभ। जीव के जिस भाव से संसार का लाभ हो अर्थात् चारों गतियों में परिभ्रमण हो उसे कषाय कहते हैं।
प्र०५ कषाय कितने प्रकार की हैं ?
उ० चार प्रकार की हैं -
१) अनन्तानुबंधी क्रोध-मान-माया-लोभ ३) प्रत्याख्यान क्रोध-मान-माया-लोभ २) अप्रत्याख्यान क्रोध-मान-माया-लोभ ४) संज्वलन क्रोध-मान-माया-लोभ
प्र०६ वीतरागता कितने प्रकार की होती हैं ?
उ० वीतरागता चार प्रकार की होती है
१) स्वरूपाचरण चरित्र २) देशचारित्र ३) सकल चारित्र ४) यथाख्यात चारित्र
प्र०७ चारों प्रकार की वीतरागता किस द्रव्य के किस गुण का कार्य है ? उ० चारों प्रकार की वीतरागता जीवद्रव्य के चारित्रगुण की स्वभाव अर्थ पर्यायें हैं।
प्र०८ चारों प्रकार की वीतरागता की प्राप्ति का क्रम क्या है ? उ०
कषाय का अभाव वीतरागता की प्राप्ति गुणस्थान नाम
१. अनन्तानुबंधी क्रोधादि स्वरूपाचरणचारित्र चौथा अविरत सम्यक्दृष्टि २. अप्रत्याख्यान क्रोधादि देशचारित्र पाँचवा व्रती श्रावक ३. प्रत्याख्यान क्रोधादि सकलचारित्र छटा-सातवाँ मुनिराज
४. संज्वलन क्रोधादि यथाख्यात चारित्र बारहवीं मुनिराज
गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं
यह निर्णय किस प्रकार करना ?
(१) मैं मनुष्य हूँ – इसमें मनुष्य शरीर औदारिक शरीर है, इसका कर्ता आहारवर्गणा है. मुझ आत्मा नहीं – ऐसा माना तो गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं – ऐसा निर्णय हो।
(२) यह देव है– देव वैक्रियक शरीर है, इसका कर्ता आहारवर्गणा है आत्मा नहीं – ऐसा माना तो गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं– ऐसा निर्णय हो। (३) भगवान् ने आठ कर्मों का नाश किया – इसमें आठ कर्म कार्माण शरीर है, इनका कर्त्ता कार्माणवर्गणा है, भगवान् की आत्मा नही – ऐसा माना तो गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं – ऐसा निर्णय हो।
(४) मुझे बुखार हो गया – इसमें गर्मपना पुद्गलों के स्पर्शगुण का कार्य है मुझ आत्मा का नहीं– ऐसा माना तो गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं – ऐसा निर्णय हो
(५) यह मेरा सोने का हार है – इसमें सोने का हार औदारिक शरीर है. इसका कर्ता आहारवर्गणा है मुझ आत्मा नहीं – ऐसा माना तो गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं – ऐसा निर्णय हो।
(६) मै बोली– इसमें शब्द का कर्ता भाषावर्गणा है, मुझ आत्मा नहीं – ऐसा माना तो गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं – ऐसा निर्णय हो।
उपरोक्त निर्णय का फल
इस प्रकार वस्तु स्वरूप का अभ्यास करने से शरीर, मकान, रूपया–पैसा, गाडी, सोना–चाँदी आदि परद्रव्यों में से स्वामीपने की, कर्त्ता–भोक्तापने की मान्यता नष्ट हो जाती है, कषाय उत्पन्न नहीं होती, वीतरागता उत्पन्न हो जाती है, जन्म–मरण का अभाव हो जाता है।
विशेष नोट
(१) प्रतियोगिता के प्रश्नोत्तरों का अभ्यास पाठशाला की नियमित कक्षाओं में कराया जायेगा। (२) श्री दिगम्बर जैन मन्दिर, झण्डा बाजार में प्रश्नोत्तरों का अभ्यास प्रत्येक बुधवार को प्रातः ११ से १२ बजे तक कराया जायेगा। (३) वीतरागविज्ञान प्रतियोगिता–३ का पारितोषिक वितरण १२ नवम्बर को सभास्थल पर ही होगा।
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
३१–राजा रोड, जैन कालोनी, देहरादून, फोन नं० (०१३५) ६२३१३१
के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता–5
दिनांक २८ जनवरी २००१ दिन रविवार दोपहर २ बजे
(स्थान – श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून)
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र०१ निम्नलिखित १ से ३२ तक के प्रश्नों के उत्तर पक्के याद करके नई कापी में लिखिये।
(१) देव – शास्त्र – गुरू व कुदेव – कुशास्त्र – कुगुरू किसे कहते हैं ? (२) जाति अपेक्षा और संख्या अपेक्षा विश्व किसे कहते हैं ?
(३) द्रव्य, गुण, सामान्य और विशेष गुण किसे कहते हैं ?
(५) सामान्य गुण कितने है व कौन–कौन से हैं? प्रत्येक की परिभाषा लिखिये। (६) पर्याय, व्यंजनपर्याय, स्वभाव व विभाव व्यंजनपर्याय किसे कहते हैं ? (७) अर्थपर्याय, स्वभाव व विभाव अर्थपर्याय किसे कहते है ?
(८) विश्व – द्रव्य – गुण – पर्याय का रहस्य क्या हैं ?
(९) जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल – द्रव्यों की पृथक पृथक सत्ता क्या है ? (१०) प्रयोजनभूत साततत्वों की परिभाषा व प्रत्येक किस प्रकार प्रयोजनभूत है ? (११) पुद्गल के स्पर्श–रस–गंध–वर्ण आदि गुणों की कितनी पर्यायें होती हैं ? (१२) निम्नलिखित पर्यायें किस द्रव्य के किस गुण का कार्य है – हल्कापन, गोरापन, दुर्गध, खट्टापन, मिथ्यादर्शन, मीठापना, सकलचारित्र, नरमंपना, मीठे का ज्ञान, रूखा, कडा, राग–द्वेष, सुख, सम्यकदर्शन, मिध्याचारित्र, कडवा, कषाय, यथाख्यातचारित्र, पीला व लाल, मतिज्ञान व श्रुतज्ञान
(१३) पुद्गल के कितने भेद हैं ? परमाणु व स्कन्ध की परिभाषा ?
(१४) बंध किसे कहते हैं ? बंध कितने प्रकार के हैं व प्रत्येक में क्या समझना है? (१५) निम्न कौन–कौन सा बंध है, इसमें अनेक वस्तुयें क्या है ?
मनुष्य, मैं क्रोधी हूँ, स्त्री, कार, मकान, मैं दयावाला, मैं रागी हूँ, देव, शेर, बिच्छु, कीडी, लडका, पुत्री।
(१६) शरीर कितने हैं ? प्रत्येक की परिभाषा क्या है ?
(१७) निम्नलिखित के शरीर का नाम क्या है और उसका कर्ता कौन है – निगोदिया शरीर, पृथ्वीकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, कीडा–मकोडा, मक्खी, मच्छर, चिडिया, कौआ, तोता, मछली, हाथी–शेर, कुत्ता, बिल्ली, मनुष्य, नारक, आहारक ऋद्धिधारी के मस्तक का पुतला आठकर्म मनुष्य शरीर की चमक, आहारक शरीर की चमक
(१८) स्कन्ध के भेद, प्रत्येक की परिभाषा व निम्न कार्यों का कर्ता कौन सी वर्गणा है ? बोलना, चलना, हार, कपड़े, मकान, द्रव्यमन, तैजस शरीर, घंटे की आवाज, दौडना, कार्माण शरीर, रोटी, मधुर स्वर ।
(१६) गुणों के कार्य को पर्याय कहते है यह निर्णय किस प्रकार करना ? दो उदाहरण देकर समझाइये और इस निर्णय का फल क्या है।
(२०) जीव-पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश-काल-प्रत्येक द्रव्य का पृथक-पृथक द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव क्या है ?
(२१) प्रत्येक द्रव्य में गुणों की संख्या का माप क्या है ? (२२) क्या प्रत्येक जीवद्रव्य में गुण समान संख्या में हैं? इसके जानने से लाभ ? (२३) द्रव्य में गुण किस प्रकार रहते हैं? और किस प्रकार नहीं रहते ? दोनों का उदाहरण देकर स्पष्टीकरण करिये ?
(२४) छहों द्रव्यों के विशेष गुणों को जानने के लाभ और न जानने से क्या नुकसान है? (२५) जिनमतं की परिपाटी क्या है अनादिकाल से जीव को कैसा श्रद्वान है? (२६) धर्म क्या है? धर्म कहाँ है ? धर्म कैसे मिलता है ?
(२७) शरीर से भिन्न अपनी पहचान होने पर धर्म किसप्रकार हो जाता है ? (२८) जैन धर्म के अमूल्य सिद्वान्त क्या हैं ?
(२६) एक कार्य के कितने कर्ता कहलाते हैं ?
(३०) कषाय किसे कहते हैं व कषाय कितने प्रकार की हैं ?
(३१) वीतरागता कितने प्रकार की होती हैं ? प्रत्येक किसद्रव्य के किसगुण का कार्य हैं? (३२) चारों प्रकार की वीतरागता की प्राप्ति का क्रम क्या है ? प्र०२ मन्दिर की बेदी मे विराजमान पूर्ण वीतरागी और सर्वज्ञ भगवान् क्या कर रहें है? उ० भगवान् अपनी आत्मा में पूर्णलीन अतीन्द्रिय सुख का भोग कर रहें हैं। प्र०३ मन्दिर की बेदी में विराजमान भगवान् हमें क्या संदेश देरहें है? उ० "मैंने शरीरादि परद्रव्यों से सर्वथा भिन्न अपनी आत्मा का स्वरूप समझकर, अपने आत्मा में पूर्ण लीनता करके, इस परमातम पद को प्राप्त किया, तू भी अपनी आत्मा का स्वरूप समझकर स्वयं में लीन हो जा’ -यह संदेश भगवान् दे रहें हैं। प्र०४ मुझ आत्मा का स्वरूप कैसा है ?
उ० चेतन को है उपयोग रूप बिन्मूरत चिन्मूरत अनूप।
पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल इनतें न्यारी है जीव चाल ।।
अर्थः १. ‘चेतन को है उपयोग रूप’ अर्थात् मैं ज्ञान दर्शन उपयोगमयी जीव तत्व हूँ और मेरा कार्य ज्ञाता दृष्टा है।
२. ‘बिन्मूरत’ अर्थात आँख, नाक, कान औदारिक आदि शरीरोंरूप मेरी मूर्ति नहीं है।
३. ‘चिन्मूरत’ अर्थात चैतन्य अरूपी असंख्यात प्रदेशी मेरा एक आकार है। ४. ‘अनूप’ अर्थात सर्वज्ञ स्वभावी होने से मुझ आत्मा ही अनुपम है। ५. ‘पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल इनतें न्यारी है जीव चाल’ अर्थात् मुझ आत्मा के अलावा विश्व में जीव अनन्त, पुद्गल अनन्तानन्त, धर्म-अधर्म-आकाश एक एक और काल द्रव्य असंख्यात है-इनसे से मुझ आत्मा का सर्वथा सम्बंध नहीं है। प्र०५ मिथ्यादृष्टि जीव को धर्म की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? उ० शरीरादि परद्रव्यों से सर्वथा भिन्न अपनी आत्मा को न पहचानने के कारण मिथ्यादृष्टि जीव आत्मा के कार्यों और शरीरादि के कार्यों के बीच निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध को नहीं जानता, दोनों को एक मानकर आत्मा और शरीर में कर्ता-कर्म मानता है, फलस्वरूप मोह, राग, द्वेष की वृद्धि करता हुआ संसार में ही परिभ्रमण करता रहता है।
प्र०६ एक ही समय में आत्मा और शरीरादि परद्रव्यों का कार्य भिन्न-भिन्न किस प्रकार हो रहा है ?
उ० एक ही समय में आत्मा और शरीरादि परद्रव्यों का कार्य भिन्न-भिन्न किस प्रकार
होतें है नीचे चार्ट में देखें -
त्रिकाली उपादान
कारण
कुम्हार का
ज्ञान गुण
कुम्हार का
चारित्र गुण
हाथ चाक आदि
आहारवर्गणा
के स्कन्ध
मिट्टी
सम्बन्ध
सम्बन्ध
सम्बन्ध
सम्बन्ध
व्यापक
व्यापक
व्यापक
व्यापक
अनन्तरपूर्व क्षणवर्ती
पर्याय क्षणिक
उपादान कारण
व्याप्य
व्याप्य
व्याप्य
व्याप्य
उस समय पर्याय
की योग्यता क्षणिक
उपादानकारण
(कार्य) उपादेय
ज्ञान हुआ
राग हुआ
हाथ, चाक आदि
की क्रिया
घड़ा
बना
निमित्त
नैमित्तिक
सम्बन्ध
प्र०७ निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध किसे कहते हैं ?
उ० उपादान स्वयं स्वतः कार्यरूप परिणमित होता है उस समय भावरूप या अभावरूप किस उचित निमित्त कारण का उस कार्य के साथ सम्बन्ध है यह बताने के लिए उस कार्य को नैमित्तिक कहते हैं। इसप्रकार भिन्न-भिन्न पदार्थों के स्वतंत्र सम्बन्ध को निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध कहते हैं।
प्र०८ कुम्हार ने घडा बनाया- इस वाक्य पर निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध की परिभाषा लगाकर बताइये ?
उ० उपादान अर्थात् मिट्टी स्वयं स्वतः कार्यरूप अर्थात् घडेरूप परिणमित होती है उस समय भावरूप या अभावरूप किस उचित निमित्त कारण का अर्थात् ज्ञान, राग, हाथ, चाक आदि का उस कार्य के अर्थात् घडा बनने के साथ सम्बन्ध है - यह बताने के लिये उस कार्य को अर्थात् घडा बनने को नैमित्तिक कहते हैं। इस प्रकार भिन्न भिन्न पदार्थों के अर्थात् ज्ञान, राग, हाथ, चाक आदि के और घड़ा बनने के स्वतंत्र सम्बन्ध को निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध कहते हैं।
इससे क्या सिद्ध हुआ ?
जिस समय मिट्टी में घडे रूप कार्य हुआ, उसी समय जीव के ज्ञानगुण में ज्ञानकार्य हुआ, जीव के चारित्रगुण में रागपरिणाम हुआ, हाथ रूप आहारवर्गणा में हाथ के हलन चलन रूप परिणाम हुआ, चाक आदि रूप आहारवर्गणा में चाक के हलन चलन रूप परिणाम हुआ। सबका द्रव्य क्षेत्र काल भाव अलग अलग है अतः एक का दूसरे से कोई सम्बन्ध नहीं है परन्तु सब कार्यों का समय एक है - इसे ही निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध कहते हैं
प्र०६ निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध और व्याप्य व्यापक सम्बन्ध में क्या अन्तर है ? उ०१ निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध भिन्न-भिन्न द्रव्यों की एक समय की पर्यायों के बीच होता है। २ व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध एक द्रव्य का उसकी पर्यायों के साथ होता है। प्र०१० निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध और व्याप्य व्यापक सम्बन्ध को कुछ उदाहरण देकर समझाइये ?
उ०
१) मिट्टी और घड़े में व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। कुम्हार का ज्ञान, राग, हाथ चाक आदि और घड़े में निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध है।
२) सोना और आभूषण में व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। सुनार, औजार व आभूषण में निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध है।
३) आटा और रोटी में व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। बाई, हाथ, तवा, चकला आदि और रोटी में निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध है।
४) गाली सुनकर क्रोध आया-इसमें आत्मा के चारित्रगुण और क्रोधपरिणाम में व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। अन्यजीव, गाली के शब्द, कान व क्रोध परिणाम में निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध है।
५) मैने मुँह से शब्द बोला-इसमें भाषावर्गणा और शब्द कार्य में व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। आत्मा, शरीर, मुँह व शब्द कार्य में निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध है। प्र०११ एक कार्य के कितने कर्त्ता कहलाते हैं ?
उ०
एक कार्य के चार कर्त्ता कहलाते हैं
(१) निमित्त कारण
(२) त्रिकाली उपादान कारण
(३) अनन्तरपूर्व क्षणवर्ती पर्याय क्षणिक उपादान कारण
(४) उस समय पर्याय की योग्यता क्षणिक उपादान कारण।
प्र०१२ निमित्त कारण किसे कहते हैं?
उ०
जो पदार्थ स्वयं कार्यरूप न परिणमे, परंतु कार्यकी उत्पत्तिमें अनुकूल होनेका जिसमें आरोप आ सके उस पदार्थ को निमित्त कारण कहते हैं। जैसे-घड़ेकी उत्पत्तिमें कुम्हार हाथ, चाक, आदि।
प्र०१३ कुम्हार ने घडा बनाया, इस वाक्य पर निमित्त कारण की परिभाषा लगाइये ? उ०
जो पदार्थ अर्थात् कुम्हार का ज्ञान, राग, हाथ, चाक आदि स्वयं स्वतः तो कार्यरूप अर्थात् घडा बनने रूप न परिणमें परन्तु कार्य अर्थात् घड़े की उत्पत्ति में अनुकूल होने का जिस पर आरोप आ सके उस पदार्थ को अर्थात् कुम्हार के ज्ञान, राग, हाथ, चाक आदि को निमित्त कारण कहते हैं।
प्र०१४ उपादान कारण किसे कहते हैं?
उ०
(१) जो द्रव्य स्वयं कार्यरूप परिणमित हो उसे त्रिकाली उपादान कारण कहते हैं जैसे घड़े की उत्पत्ति में मिट्टी।
(२) जो कार्य हुआ, उससे पहली पर्याय को अनन्तरपूर्व क्षणवर्ती पर्याय क्षणिक उपादान कारण कहते हैं जैसे घडा बनने से पहले मिट्टी की पिंड रूप दशा। (३) जो कार्य हुआ उसे उस समय पर्याय की योग्यता क्षणिक उपादान कारण कहते हैं- जैसे घडा बना।
प्र०१५ निमित्त कारण क्या बताता है ?
उ०
निमित्त कारण बताता है कि कार्य के समय कार्य के बाहर कौन उपस्थित था। प्र०१६ त्रिकाली उपादान कारण क्या बताता है ?
उ०
त्रिकाली उपादान कारण बताता है कि किस द्रव्य के अन्दर कार्य हुआ। प्र०१७ निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध क्या बताता है ?
उ०
जीव, पुद्गल, शरीरादि प्रत्येक द्रव्य प्रतिसमय स्वतंत्र रूप से अपना अपना कार्य कर रहें हैं परस्पर कोई भी सम्बन्ध नहीं है।
नोट :- वीतरागविज्ञान प्रतियोगिता-४ का पारितोषिक वितरण २८ जनवरी २००१ को सभास्थल पर ही होगा। बुधवार, शनिवार व रविवार की कक्षायें पूर्ववत चलेंगी। श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
३१-राजा रोड, जैन कॉलोनी, देहरादून, फोन नं० (०१३५) ६२३१३१ के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता-६
दिनांक १ अप्रैल २००१ दिन रविवार दोपहर ३ बजे
(स्थान - श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न
प्र० १. वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता नं० ५ के प्रश्न १ से १७ तक के उत्तरों को पक्का याद करना है?
निम्न प्रश्न २, ३ व ४ का कापी में लिखकर अभ्यास करना है
प्र० २. निम्नलिखित पर्यायें किस द्रव्य के किस गुण का कार्य है - मिथ्यादर्शन-सम्यकदर्शन : मतिज्ञान-श्रुतज्ञान-अवधिज्ञान- मनःपर्ययज्ञान-केवलज्ञान-कुमतिज्ञान-कुश्रुतज्ञान-कुअवधिज्ञान ; अशुभभाव-शुभभाव-वीतराग भाव ; चक्षुदर्शन-अचक्षुदर्शन-अवधि दर्शन - केवलदर्शन : सुख-दुख ; गमन करना-स्थिर होना।
प्र० ३. निम्न कार्यों का कर्ता कौन सी वर्गणा या कौन सा गुण है - सोने का हार, मकान, रूपये, तेज बोलना, कपडे, हल्का व भारीपना, मीठापना, फूल की सुगंध, घातिया कर्म-ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय, अन्तराय व अघातिया कर्म-वेदनीय, आयु, नाम, गोत्र। प्र० ४. निम्नलिखित वाक्यों पर निमित्त कारण की परिभाषा व निमित्त -नैमित्तिक सम्बन्ध की परिभाषा लिखिये व साथ ही इससे क्या सिद्ध हुआ -
(अ) मैंने रोटी बनाई (ख) मैने कपडे पहने (ग) मैं बहुत तेज बोलता हूँ (घ) यह मेरे रूपये हैं (ड.) गाली सुनकर मुझे गुस्सा आया (च) भगवान् को देखकर मुझे शुभभाव हुआ (छ) मुझे शास्त्र से ज्ञान हुआ। प्र० ५. शास्त्रों का अर्थ समझने के लिये क्या जानना आवश्यक है? उ०
प्रथमानुयोग, चरणानुयोग-करणानुयोग और द्रव्यानुयोग रूप जिनागम में निश्चय व्यवहार रूप वर्णन है। अतः शास्त्रों का अर्थ समझने के लिये निश्चय व्यवहार का ज्ञान आवश्यक है।
प्र० ६. निश्चय और व्यवहार की परिभाषा क्या है?
उ०
यथार्थ का नाम निश्चय है और उपचार का नाम व्यवहार है।
(श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ० १६३)
एक ही द्रव्य के भाव को उस स्वरूप ही निरूपण करना सो निश्चयनय है – जैसे मिट्टी के घडे को मिट्टी का घड़ा कहना। उपचार से उस द्रव्य के भाव को अन्य द्रव्य के भाव स्वरूप निरूपण करना सो व्यवहारनय है, जैसे घी के संयोग के कारण उपचार से मिट्टी के घडे को घी का घडा कहना। (श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ० २४६)
प्र० ७. शास्त्रों में निश्चय और व्यवहार के कथन हैं, तो हम व्यवहारनय और निश्चयनय के कथनों की पहचान कैसे करें?
उ० जहाँ दो द्रव्यों, दो गुणों, या दो पर्यायों को मिलाकर निरूपण किया हो वहाँ समझ लेना कि यह व्यवहारनय का कथन है। जैसे- आत्मा अर्थात् जीव द्रव्य और मनुष्य शरीर अर्थात् पुद्गल द्रव्य-दोनों को मिलाकर ऐसा निरूपण किया गया हो कि मनुष्य जीव या मैं मनुष्य हूँ तो समझ लेना यह व्यवहारनय का कथन है। जहाँ शरीर से भिन्न मैं आत्मा हूँ- ऐसा स्वतंत्र निरूपण किया हो वहाँ समझ लेना कि यह निश्चयनय का कथन है।
प्र० ८. जहाँ मनुष्य जीव, दो इन्द्रिय जीव, नारकी जीव-ऐसा व्यवहारनय का कथन हो – वहाँ क्या समझना है?
उ० यहाँ व्यवहार से मनुष्य आदि पर्यायों को जीव कहा, सो मनुष्य आदि पर्यायों को जीव नहीं मान लेना। वहाँ ऐसा समझना कि यह मनुष्य पर्याय तो जीव और पुद्गल के संयोगरूप है। इसमें निश्चय से जीव द्रव्य भिन्न है उस ही को जीव मानना। जीव के संयोग से मनुष्य शरीरादि को भी उपचार से जीव कहा सो कथन मात्र ही है। परमार्थ से मनुष्य शरीरादि जीव होते नहीं – ऐसा ही श्रद्धान करना। (श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ २५२)
प्र० ९. निश्चय और व्यवहार के विषय में हमेशा क्या याद रखना चाहिये? उ० निश्चयनय से जो निरूपण किया हो उसे तो सत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान अंगीकार करना। व्यवहारनय से जो निरूपण किया हो उसे असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान छोडना।
(श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृ० २५०)
प्र० १०. निश्चय और व्यवहार के विषय में हमेशा क्या याद रखना – इसे उदाहरण देकर समझाइये?
उ० मैं ज्ञान दर्शन उपयोगमयी जीव तत्व हूँ… ऐसा निश्चयनय से जो निरूपण किया हो उसे तो सत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान अंगीकार करना चाहिये। मैं मनुष्य (नाम) हूँ… ऐसा व्यवहारनय से जो निरूपण किया हो उसे असत्यार्थ मानकर उसका श्रद्धान छोड़ना।
प्र० ११. मैं मनुष्य (नाम) हूँ – ऐसे व्यवहारनय का श्रद्धान छोडकर मैं ज्ञानदर्शन उपयोगमयी जीव तत्व हूँ – ऐसे निश्चयनय का श्रद्धान अंगीकार करने के विषय में श्री कुन्दकुन्द आचार्य ने मोक्षपाहुड गाथा – ३१ में क्या कहा है?
उ० १. जो व्यवहार में सोता है अर्थात् मैं मनुष्य हूँ– ऐसे व्यवहारनय का श्रद्धान छोडकर मैं ज्ञान दर्शन उपयोगमयी जीव तत्व हूँ। ऐसे निश्चयनय का श्रद्धान करता है वह योगी अपने आत्मकार्य में जागता है अर्थात् धर्म की प्राप्ति करता है।
२. जो व्यवहार में जागता है अर्थात् मैं मनुष्य ही हूँ – ऐसी श्रद्धा करता है वह अपने कार्य में सोता है अर्थात् कभी धर्म प्राप्त नहीं कर सकता।
३. इसलिए मैं मनुष्य हूँ – ऐसे व्यवहारनय का श्रद्धान छोडकर, मैं ज्ञान दर्शन उपयोगमयी जीवतत्व हूँ – ऐसे निश्चयनय का
श्रद्धान करना योग्य है।
प्र० १२. व्यवहारनय का श्रद्धान छोड़कर निश्चयनय का श्रद्धान करना क्यों योग्य है?
उ० क्योंकि, व्यवहारनय– स्वद्रव्य-परद्रव्य को, स्वद्रव्य के कार्य और परद्रव्य के कार्यों को, निमित्त व नैमित्तिक को किसी को किसी में मिलाकर निरूपण करता है, सो ऐसे ही श्रद्धान से मिथ्यात्व होता है, इसीलिये उसका श्रद्धान छोडना।
निश्चयनय उन्हीं को अर्थात् स्वद्रव्य – परद्रव्य को, स्वद्रव्य के कार्य व परद्रव्य के कार्यों को यथावत् निरूपण करता है, किसी को किसी में नहीं मिलाता है, सो ऐसे ही श्रद्धान से सम्यक्त्व होता है, इसीलिये उसका श्रद्धान करना। (श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ २५१) प्र० १३. निश्चय-व्यवहार के विषय में श्री समयसार गाथा ११ में क्या कहा है? उ० श्री समयसार गाथा ११ में श्री कुन्दन्कुन्द आचार्य कहते है :- व्यवहारनय अभूतार्थ दर्शित, शुद्धनय भूतार्थ है।
भूतार्थ आश्रित आत्मा सुदृष्टि निश्चय होय है।।
अर्थ – व्यवहारनय अभूतार्थ है, सत्यस्वरूप का निरूपण नहीं करता, किसी अपेक्षा उपचार से अन्यथा निरूपण करता है। शुद्धनय जो निश्चय है, वह भूतार्थ है, जैसा वस्तु का स्वरूप है वैसा निरूपण करता है। जो जीव निश्चय का आश्रय लेता है वह जीव नियम से सम्यक्दृष्टि होता है।
प्र० १४. यदि ऐसा है तो जिनमार्ग में दोनों नयों का ग्रहण करना कहा है सो कैसे?
उ० जिनमार्ग (चारो अनुयोगों) में कहीं तो निश्चयनय की मुख्यता लिये व्याख्यान है, उसे तो ‘सत्यार्थ ऐसे ही हैं’ - ऐसा जानना। तथा कहीं व्यवहारनय की मुख्यता लिये व्याख्यान है, उसे ‘ऐसे है नहीं, निमित्तादि की अपेक्षा उपचार किया है’ - ऐसा जानना। इस प्रकार जानने का नाम ही निश्चय - व्यवहार दोनों नयों का ग्रहण है।
प्र० १५. व्यवहारनय और निश्चयनय के व्याख्यान को उदाहरण देकर समझाइये?
उ० १. व्यवहारनय कहता है मैं मनुष्य हूँ, निश्चयनय कहता है मनुष्य औदारिक शरीर है, इसका कर्त्ता आहारवर्गणा है, मैं तो ज्ञान दर्शन उपयोगमयी जीव तत्व हूँ।
२. व्यवहारनय कहता है मैं उठता-बैठता हूँ, निश्चयनय कहता है उठना-बैठना कार्य आहारवर्गणा’ का हे मेरा कार्य मात्र जानना- देखना है।
३. व्यवहारनय कहता है आठकर्मों के कारण जीव संसार में घूमता है, निश्चयनय कहता है, आठकर्म कार्माण शरीर है, इनका कर्ता कार्माणवर्गणा है, जीव मिथ्यात्व-राग-द्वेष के कारण संसार में घूमता है।
४. व्यवहारनय कहता है देव शास्त्र गुरू के आश्रय से धर्म होता है, निश्चयनय कहता है-आत्मा के आश्रय से धर्म होता है। प्र० १६. निम्न भजन को कक्षा में सिखाये गये अर्थ व लय के साथ याद करिये? उ० आत्मा हूँ, आत्मा हूँ, आत्मा ।
मैं सदा ज्ञायक-स्वभावी आत्मा …।।टेक।। शस्त्र से भी मैं कभी कटता नहीं।
अग्नि से भी मैं कभी जलता नहीं।
जल गलाये तो गले न आत्मा ।।१।।
चर्म-चक्षु से कभी दिखता नहीं।
मूर्ख जन अज्ञान वश जाने नहीं।
ज्ञानियों की साध्य-साधक आत्मा ।।२।।
गोरा-काला जो भी दिखता चाम है।
मोटा-पतला होना इसका काम है।
सब शरीरों से रहित मैं आत्मा ।।३।।
नोट : • वीतरागविज्ञान प्रतियोगिता - ५ का पारितोषिक वितरण १ अप्रैल को सभास्थल पर ही होगा।
• बुधवार, शनिवार व रविवार की कक्षायें पूर्ववत चलेंगी।
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
३१-राजा रोड, जैन कॉलोनी, देहरादून, फोन नं० (०१३५) ६२३१३१ के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता-७
दिनांक १० जून २००१ दिन रविवार दोपहर ३ बजे
(स्थान - श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न
निम्नलिखित १ से २८ तक के प्रश्नों के उत्तर पक्के याद करिये। १. देव - शास्त्र- गुरू व कुदेव - कुशास्त्र - कुगुरू किसे कहते हैं? २. जाति अपेक्षा और संख्या अपेक्षा विश्व किसे कहते हैं ? ३. द्रव्य, गुण, सामान्य और विशेष गुण किसे कहते हैं ? ४. जीवादि प्रत्येक द्रव्य में कौन-कौन से विशेष गुण हैं ? ५. सामान्य गुण कितने हैं व कौन-कौन से हैं? प्रत्येक की परिभाषा लिखिये।
६. प्रत्येक द्रव्य में गुणों की संख्या का माप क्या है? ७. क्या प्रत्येक जीवद्रव्य में गुण समान संख्या में है? इसके जानने से लाभ?
८. दव्य में गुण किस प्रकार रहते हैं? और किस प्रकार नहीं रहते? दोनों उदाहरण देकर स्पष्टीकरण करिये?
९. छहों द्रव्यों के विशेष गुणों को जानने के लाभ और न जानने से क्या नुकसान है?
१०. पर्याय, व्यंजनपर्याय, स्वभाव व विभाव व्यंजनपर्याय किसे कहते हैं? ११. अर्थपर्याय, स्वभाव व विभाव अर्थ पर्याय किसे कहते है? १२. विश्व-द्रव्य-गुण-पर्याय का रहस्य क्या है?
१३. जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल-द्रव्यों की पृथक पृथक सत्ता क्या है?
१४. जीव-पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश-काल-प्रत्येक द्रव्य का पृथक-पृथक द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव क्या है?
१५. प्रयोजनभूत सात तत्वों की परिभाषा व प्रत्येक किस प्रकार प्रयोजनभूत है ? १६. पुद्गल के स्पर्श-रस-गंध-वर्ण आदि गुणों की कितनी पर्यायें होती है?
१७. पुद्गल के कितने भेद हैं? परमाणु व स्कन्ध की परिभाषा? स्कन्ध के भेद व प्रत्येक की परिभाषा?
१८. बंध किसे कहते है? बंध कितने प्रकार के हैं व प्रत्येक में क्या समझना है?
या, मैंने
तर है?
ा है?
श्यक
मार्ग
का
न
य
छ
१६. शरीर कितने है? प्रत्येक की परिभाषा क्या है।
२०. मैं मनुष्य हूँ – इनमें गुणों के कार्य को पर्याय कहते हैं यह निर्णय किस प्रकार करना ? और इस निर्णय का फल क्या है?
२१. जिनमत की परिपाटी क्या है? अनादि काल से जीव को कैसा श्रद्धान है?
२२. धर्म क्या है? धर्म कहाँ है? धर्म कैसे मिलता है?
२३. शरीर से भिन्न अपनी पहचान होने पर धर्म किस प्रकार हो जाता है? २४. जैन धर्म के अमूल्य सिद्धान्त क्या है?
२५. एक कार्य के कितने कर्त्ता कहलाते है?
२६. कषाय किसे कहते हैं व कषाय कितने प्रकार की है?
२७. वीतरागता कितने प्रकार की होती हैं? प्रत्येक किस द्रव्य के किस गुण का कार्य है?
२८. चारों प्रकार की वीतरागता की प्राप्ति का क्रम क्या है?
२. निम्नलिखित १ से २५ तक के प्रश्नों के उत्तर पक्का याद करके कापी में लिखिये ? कापी बनाने के प्रश्नपत्र में १५ अंक होंगे। १. मुझ आत्मा का स्वरूप कैसा है ?
२. मन्दिर की बेदी में विराजमान पूर्ण वीतरागी और सर्वज्ञ भगवान् क्या कर रहे हैं और हमें क्या संदेश दे रहे हैं?
३. जीव द्रव्य के ज्ञान, दर्शन, सुख, श्रद्धा, चारित्र, क्रियावती शक्ति, गुणों का कार्य कितने कितने प्रकार का है ? प्रत्येक का नाम लिखिये ? ४. घातिया कर्म और अघातिया कर्म कौन कौन से है। नाम लिखिये। ५. निम्नलिखित पर्यायें किस द्रव्य के किस गुण का कार्य है – भारीपन, नीला, सम्यकदर्शन, कडापना, रागद्वेष, सुगन्ध, नरमपने का ज्ञान, स्वरूपाचरण चारित्र, चक्षुदर्शन, चलना और ठहरना, कषायला। ६. निम्नलिखित शरीरों के नाम क्या है? उनके कर्त्ता कौन है? निगोदिया शरीर, जलकाय, नारक, देव, चींटी, हाथी, लड़की, ज्ञानावरणीय कर्म, औदारिक शरीर की चमक, मोहनीय कर्म, आहारक ऋद्धिधारी के मस्तक का पुतला।
७. निम्न कार्यों का कर्त्ता कौन सी वर्गणा है?
चलना, बोलना, मकान, साड़ी, जेवर, ताली की आवाज, मुंह हिलना, मधुर आवाज, रोटी, गाडी, गाली के शब्द, प्रशंसा के शब्द, तैजस शरीर, कार्माण शरीर।
८. निम्नलिखित कौन-कौन सा बंध है। इसमें अनेक वस्तुयें क्या है और प्रत्येक में क्या समझना है ?
लड़का, मनुष्य, कार, मैं रागी हूँ, पुत्री, हाथी, सोने का हार ६. निम्नलिखित वाक्यों पर निमित्त कारण की परिभाषा व निमित्त नैमित्तिक सम्बन्ध की परिभाषा लिखिये व साथ ही इससे क्या सिद्ध हुआ – मैं बाजार से सामान लाई, मैंने खाना बनाया, यह मेरा मकान है, प्रशंसा के शब्द सुनकर मुझे सुख मिला, मैंने नाक से सुगन्ध का ज्ञान किया, मैंने जीभ से मीठे का ज्ञान किया।
१०. मिथ्यादृष्टि जीव को धर्म की प्राप्ति क्यों नहीं होती ? ११. निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध और व्याप्य व्यापक सम्बन्ध में क्या अन्तर है? १२. उपादान कारण किसे कहते है?
१३. निमित्त कारण क्या बताता है? त्रिकाली उपादान कारण क्या बताता है? निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्ध क्या बताता है?
१४. शास्त्रों का अर्थ समझने के लिये निश्चय व्यवहार का ज्ञान क्यों आवश्यक है?
१५. निश्चय की पहचान क्या है और व्यवहार की पहिचान क्या है? मोक्ष मार्ग प्रकाशक पृष्ठ १६३, २४६, २५० के आधार से उत्तर लिखिये।
१६. जहाँ मैं मनुष्य हूँ, दो इन्द्रिय जीव, नारकी जीव – ऐसा व्यवहारनय का कथन हो, वहां क्या समझना है?
१७. मैं मनुष्य हूँ – ऐसे व्यवहारनय का श्रद्धान छोडकर मैं ज्ञानदर्शन उपयोगमयी जीव तत्व हूँ – ऐसे निश्चयनय का श्रद्धान करना क्यों योग्य है? इस विषय में श्रीमोक्षपाहुड गाथा ३१ में, श्रीमोक्षमार्ग प्रकाशक पृष्ठ २५१ व श्री समयसार गाथा ११ में क्या कहा है?
१८. जिनमार्ग में दोनों नयों का ग्रहण करना किस प्रकार कहा है ? १६. निम्नलिखित वाक्यों में निश्चयनय और व्यवहारनय के कथनों को अलग-अलग पहचानिये और इनका ग्रहण किस प्रकार करना–यह
लिखिये–
मैं सत्य बोलती हूँ, मैं मनुष्य हूँ, मैं आत्मा हूँ, आँख से ज्ञान होता है, बोलना कार्य भाषावर्गणा का है. मैं रोटी बनाती हूँ, यह मेरी कार है, रोटी औदारिक शरीर है इसका कर्त्ता आहारवर्गणा है, मैं उठता-बैठता हूँ, आठ कर्मों के कारण जीव संसार में घूमता है. मेरा कार्य ज्ञाता दृष्टा है, ज्ञान मुझ आत्मा के ज्ञान गुण में से आता है. सुगन्ध दुर्गंध का कर्त्ता पुद्गल का गंध गुण है, नाक से खुशबू का ज्ञान होता है, गोरा काला तो शरीर की अवस्था है मैं तो अवर्णस्वभावी हूँ, निन्दा के शब्दों के कारण दुःख होता है. मैं जन्म मरण रहित अनादिअनन्त हूँ।
२०. आत्मा हूँ आत्मा हूँ, आत्मा … इस भजन को याद करके लिखिये। २१. निम्न की परिभाषा लिखिए :-
१. देव २. गुरू ३. शास्त्र ४. विश्व ५. द्रव्य ६. गुण ७. पर्याय ८. सामान्य गुण ६. विशेषगुण १०. व्यंजनपर्याय ११. अर्थपर्याय १२. जीवतत्व १३. अजीवतत्व १४. आस्रवतत्व १५. बंधतत्व १६. संवरतत्व १७. निर्जरातत्व १८. मोक्षतत्व १६. जीवद्रव्य २०. पुद्गलद्रव्य २१. परमाणु २२. स्कन्ध २३. आहारवर्गणा २४. तैजसवर्गणा २५. भाषावर्गणा २६. मनोवर्गणा २७. कार्माणवर्गणा २८. औदारिक शरीर २६. वैक्रियक शरीर ३०. तैजस शरीर ३१. कार्माण शरीर ३२. कषाय ३३. अस्तित्वगुण ३४. वस्तुत्वगुण ३५. द्रव्यत्वगुण ३६. प्रमेयत्व गुण ३७. अगुरुलघुत्वगुण ३८. प्रदेशत्व गुण ३६. कुदेव ४०. कुगुरू ४१ कुशास्त्र
२२. पात्र जीव कौन है और पात्र जीव का प्रथम लक्षण क्या है? २३. मुनिराज श्रीकुन्दकुन्द ने पंचास्तिकायसंग्रह की गाथा १२२ में आत्मा और शरीर की भिन्नता के बारे में क्या कहा है?
२४. आत्मा और पुद्गल की २७ पर्यायों की भिन्नता के विषय में श्रीकुन्दकुन्द आचार्य ने श्री समयसार की ३६० से ४०४ तक की गाथाओं में और श्री समयसार की ही ३७३ से ३८२ तक की गाथाओं में क्या कहा है? २५. निम्न भजन को कक्षा में सिखाये गये अर्थ व लय के साथ याद करिये - प्रश्नपत्र में ५ अंक इस भजन के होंगे।
रोम-रोम से निकले प्रभुवर नाम तुम्हारा, हाँ ! नाम तुम्हारा । ऐसी भक्ति करूँ प्रभु की’ पाऊँ न जन्म दुबारा ।। टेक ।। जिन मन्दिर में आया, जिनवर दर्शन पाया।
अन्तर्मुख मुद्रा को देखा, आतम दर्शन पाया।।
जनम जनम तक न भूलूंगा’, यह उपकार तुम्हारा ।।१।।
अरहंतों को जाना, आतम को पहिचाना।
द्रव्य और गुण-पर्यायों से. जिन सम निज को माना।
भेदज्ञान ही महामंत्र है’, मोह तिमिर क्षयकारा ।।२।। पंच महाव्रत धाऊँ, समिति गुप्ति अपनाऊँ
निर्ग्रन्थों के पथ पर चलकर, मोक्ष महल में आऊँ
पुण्य-पाप की बन्ध श्रृंखला’, नष्ट करूँ दुखकारा ।। ३ ।। देव-शास्त्र-गुरू मेरे, हैं सच्चे हितकारी
सहज शुद्ध चैतन्यराज की, महिमा जग से न्यारी।।
भेदज्ञान बिन नहीं मिलेगा’, भव का कभी किनारा।।
रोम-रोम से निकले प्रभुवर नाम तुम्हारा, हौं नाम तुम्हारा ।। विशेष नोट
• जो प्रतियोगी किसी कारणवश अब तक की वीतराग- विज्ञान प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं ले पाये हैं वे इस वीतराग-विज्ञानप्रतियोगिता नं० ७ से प्रारम्भ कर धर्म लाभ अवश्य उठायें।
• दूसरी ढाल पर आधारित " कौन बनेगा मुक्तिपति" जमा करने की अन्तिम तिथि २२ अप्रैल है इसका परिणाम व पुरस्कार वितरण दिनांक ६ मई को श्रीकुन्दकुन्द स्वाध्याय मंदिर (सरनीमल मंदिर) में प्रातः १० बजे होगा। समय से अवश्य पधारें।
• वीतरागविज्ञान प्रतियोगिता - ६ का पारितोषिक वितरण १० जून को सभास्थल पर ही होगा।
• वीतराग विज्ञान पाठशाला की निम्न नियमित कक्षाओं में अपने बच्चों सहित आप स्वयं भी उपस्थित हों और जैन धर्म के रहस्यों को जानें- १. बुधवार झंडा मन्दिर
२. शनिवार कुन्दकुन्द स्वाध्याय मन्दिर
३. शनिवार ३१ लक्ष्मी पार्क, राजा रोड
४. रविवार ३१ लक्ष्मी पार्क, राजा रोड
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
३१-राजा रोड, जैन कॉलोनी, देहरादून, फोन नं० (०१३५) ६२३१३१ के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता-८
दिनांक २६ जुलाई २००१ दिन रविवार दोपहर ३ बजे
(स्थान - श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न -
विश्व की व्यवस्था
प्र० १. विश्व किसे कहते हैं?
उ० जाति अपेक्षा छह द्रव्यों के समूह को विश्व कहते हैं? प्र० २. छह द्रव्यों के समूह को क्या कहते है?
उ० विश्व कहते हैं?
प्र० ३. क्या छह द्रव्यों के पिण्ड को विश्व कहते हैं? उ० बिल्कुल नहीं, क्योंकि प्रत्येक द्रव्य पृथक-पृथक है। प्र० ४. विश्व के पर्यायवाची शब्द क्या-क्या है?
उ० ब्रह्माण्ड, लोक, दुनिया, वर्ल्ड, जगत् आदि विश्व के पर्यायवाची शब्द है। प्र० ५. विश्व में कितने द्रव्य है?
उ० इस विश्व में छह द्रव्य है।
प्र० ६. हमें तो विश्व में बहुत से द्रव्य दिखते हैं? आप छह ही क्यों कहते हैं? उ० जाति अपेक्षा छह हैं, संख्या अपेक्षा बहुत हैं। प्र० ७. जाति अपेक्षा छह द्रव्य कौन कौन से हैं?
उ० जीव, पुदगल, धर्म-अधर्म, आकाश और काल हैं।
प्र० ८. संख्या अपेक्षा बहुत से द्रव्य किस प्रकार हैं? उ० (१) जीव अनन्त (२) पुद्गल अनन्तानन्त (३) धर्म एक (४) अधर्म एक (५) आकाश एक (६) कालद्रव्य लोक प्रमाण असंख्यात है। इस प्रकार संख्या अपेक्षा द्रव्य बहुत से हैं।
प्र० ९. जाति अपेक्षा छहद्रव्य के समूह को एक नाम से क्या कहते हैं? उ० विश्व कहते है।
प्र० १०. विश्व अर्थात् क्या है?
उ० समस्त पदार्थ-द्रव्य-गुण-पर्याय।
प्र० ११. जीवद्रव्य कितने हैं और कहाँ-कहाँ पर रहते हैं? उ० जीव द्रव्य अनन्त हैं और वे सम्पूर्ण लोकाकाश में भरे हुए हैं। प्र० १२. पुद्गलद्रव्य कितने हैं और कहाँ-कहाँ पर रहते हैं? प्रातः ११ से १२ बजे तक
प्रातः १० से ११ बजे तक
सायं ४.३० से ५.३० बजे तक
प्रातः १० से ११ बजे तक
उ० जीवद्रव्य से अनन्तगुणे अधिक पुद्गलद्रव्य हैं और वे सम्पूर्ण लोकाकाश में भरे हुये हैं।
२. प्रत्येक द्रव्य का कायम रहकर बदलना, उसका स्वभाव है तो मैं पर का करूँ या पर मेरा करे, ऐसी पर कर्तृत्व की बुद्धि छोड।
३. जब एक द्रव्य दूसरे द्रव्य को स्पर्श भी नहीं करता तो मैं पर को भोगू या पर मुझे भोगे ऐसी पर भोक्तृत्व की बुद्धि छोड।
प्र० २२ विश्व की व्यवस्था को जानने से क्या लाभ होता है? उ०
१. केवली भगवान् के लघुनन्दन बन जाते है।
२. जैसा पदार्थों का स्वरूप है वैसा ही श्रद्धान ज्ञान हो जाये तो सर्व दुख मिट जाते हैं।
प्र० २३ इस विश्व के समस्त द्रव्यों को पृथक-पृथक जानकर हम भी केवली भगवान् के लघुनन्दन बनना चाहते है, दुःख मिटाना चाहते हैं - इसके लिये हमें क्या जानना आवश्यक है?
उ०
सब द्रव्यों का लक्षण जानना आवश्यक है।
प्र० २४ लक्षण किसे कहते हैं?
उ०
अनेक मिले हुये पदार्थों में से किसी एक पदार्थ को पृथक करने वाले हेतू को लक्षण कहते हैं। जैसे जीव का लक्षण ज्ञान-दर्शन।
प्र० २५ सच्चे लक्षण की पहिचान क्या है?
उ०
जो लक्षण लक्ष्य में तो सर्वत्र हो अलक्ष्य में किसी भी स्थान पर न पाया जाये-यही सच्चे लक्षण की पहचान है। जैसे जीव का लक्षण-ज्ञान-दर्शन, पुद्गल का लक्षण स्पर्श-रस-गंध वर्ण आदि।
प्र० २६ लक्ष्य किसे कहते हैं?
उ०
जिसका लक्षण किया जाये उसे लक्ष्य कहते है। जैसे जीव का लक्षण ज्ञान दर्शन कहा, तो इसमें जीव लक्ष्य है और ज्ञान-दर्शन लक्षण है। प्र० २७ अलक्ष्य किसे कहते हैं?
उ०
लक्ष्य के अतिरिक्त अन्य पदार्थों को अलक्ष्य कहते है। जैसे जीव का लक्षण ज्ञान दर्शन कहा, तो इसमें ज्ञान-दर्शन लक्षण है, जीव द्रव्य लक्ष्य है और जीव द्रव्य के अलावा पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश-काल- ये अलक्ष्य हैं। प्र० २८ लक्षणाभास किसे कहते है?
उ०
जो लक्षण सदोष हो उसे लक्षणाभास कहते हैं।
प्र० २६ लक्षण के कितने दोष है?
उ०
तीन दोष है (१) अव्याप्ति दोष (२) अतिव्याप्ति दोष (३) असम्भव दोष प्र० ३० अव्याप्ति दोष किसे कहते हैं?
उ०
लक्ष्य के एक भाग में लक्षण का रहना अव्याप्ति दोष है। जैसे पशु का लक्षण सींग।
प्र० ३१ अतिव्याप्ति दोष किसे कहते हैं?
उ०
लक्ष्य और अलक्ष्य में लक्षण का रहना - उसे अतिव्याप्ति दोष कहते हैं। जैसे-गाय का लक्षण सींग।
प्र० ३२ असम्भवदोष किसे कहते हैं?
उ०
लक्ष्य में लक्षण का पाया ही न जाना-उसे असम्भव दोष कहते हैं। जैसे-मनुष्य का लक्षण सींग
प्र० ३३ इस विश्व के प्रत्येक द्रव्य का तीनों दोषों से रहित सच्चा लक्षण जानने से क्या होता हैं ?
उ०
(१) छहों द्रव्यों की पृथकता का ज्ञान होता है।
(२) स्व-पर का भेद ज्ञान होता है।
प्र० ३४ निम्नलिखित भजन को कक्षा में सिखाये गये अर्थ व लय के साथ याद करिये?
उ०
हे प्रभो ! चरणों में तेरे आ गये।
भावना अपनी का फल हम पा गये। । टेक ।।
वीतरागी हो तुम्ही सर्वज्ञ हो।
सप्त तत्वों के तुम्हीं मर्मज्ञ हो ।।
मुक्ति का मारग तुम्हीं से पा गये। । टेक।।१।।
विश्व सारा है झलकता ज्ञान में।
किन्तु प्रभुवर लीन है निज ध्यान में।।
ध्यान में निज ज्ञान को हम पा गये।। टेक । । २ ।।
तुमने बताया जगत् के सब आत्मा।
द्रव्य दृष्टि से सदा परमात्मा।।
आज निज परमात्मा पद पा गये ।। टेक ।।३।।
विशेष नोट
• जो प्रतियोगी किसी कारणवश अब तक की वीतराग- विज्ञान प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं ले पाये हैं वे इस वीतराग-विज्ञानप्रतियोगिता नं० ८ से प्रारम्भ कर धर्म लाभ अवश्य उठायें। यहाँ से विषय पुनः प्रारम्भ हो रहा है। अपने बच्चों को भी इस प्रतियोगिता से प्रवेश दिलाकर नैतिक संस्कारों में वृद्धि करें। • तीसरी ढाल पर आधारित " कौन बनेगा मुक्तिपति" का परिणाम व पुरस्कार वितरण दिनांक ७ जुलाई को श्री जैन धर्मशाला, गांधी रोड में दोपहर ३ बजे होगा। समय से अवश्य पधारें।
• वीतरागविज्ञान प्रतियोगिता - ७ का पारितोषिक वितरण २६ जुलाई को सभास्थल पर ही होगा।
• वीतराग विज्ञान पाठशाला की निम्न नियमित कक्षाओं में अपने बच्चों सहित आप स्वयं भी उपस्थित हों और जैन धर्म के रहस्यों को जानें- १. बुधवार - झंडा मन्दिर प्रातः ११ से १२ बजे तक
२. शनिवार कुन्दकुन्द स्वाध्याय मन्दिर प्रातः १० से ११ बजे तक ३. शनिवार ३१ लक्ष्मी पार्क, राजा रोड सायं ४.३० से ५.३० बजे तक ४. रविवार ३१ लक्ष्मी पार्क, राजा रोड प्रातः १० से ११ बजे तक प्र० १३. धर्म, अधर्म द्रव्य कितने-कितने हैं और कहाँ-कहाँ पर रहते हैं? उ० धर्म और अधर्म द्रव्य एक एक हैं। और वे सम्पूर्ण लोकाकाश में व्याप्त है। प्र० १४. आकाशद्रव्य कितने हैं और कहाँ-कहाँ पर रहते हैं।
उ० आकाशद्रव्य एक है और वह लोकाकाश और अलोकाकाश में व्याप्त है। प्र० १५. कालद्रव्य कितने हैं और कहाँ-कहाँ पर रहते हैं?
उ० कालद्रव्य लोकप्रमाण असंख्यात है और वे लोकाकाश के एक एक प्रदेश पर रत्नों की भाँति जड़े हुए हैं।
प्र० १६. छह द्रव्यों के समूह को विश्व कहा तो क्या वे सब आपस में मिले हुये है? उ० आपस में बिल्कुल मिले हुये नहीं है क्योंकि छह द्रव्यों के पिण्ड को विश्व नहीं कहा अपितु छह द्रव्यों के समूह को विश्व कहा है। अतः प्रत्येक द्रव्य पृथक पृथक अपना-अपना कार्य करता है एक का दूसरे से सर्वथा सम्बन्ध नहीं है।
प्र० १७. विश्व में जाति अपेक्षा छह द्रव्य हैं। यह कथन कैसा है? उ० व्यवहारनय का कथन है
प्र० १८. विश्व में जाति अपेक्षा छह द्रव्य है? इसका निश्चय कथन क्या है? उ० प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने क्षेत्र में है। अर्थात् अपने-अपने द्रव्य-क्षेत्र-काल- भाव में है यह निश्चयनय का कथन है।
प्र० १६. विश्व के समस्त द्रव्यों की क्या व्यवस्था है?
उ० १. इस विश्व का प्रत्येक द्रव्य अपने-अपने द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव में ही रहता है।
२. इस विश्व के समस्त द्रव्य कायम रहते हुये स्वयं ही बदल रहे हैं। ३. इस विश्व का प्रत्येक द्रव्य अपने में अन्र्त्तमग्न अपने अनन्त धर्मों (गुणों) के चक्र को स्पर्श करता है लेकिन एक द्रव्य दूसरे द्रव्य को सर्वथा स्पर्श नहीं करता है।
४. इस विश्व के प्रत्येक द्रव्य में अनन्त अनन्त गुण हैं, प्रत्येक गुण में प्रत्येक समय एक पर्याय का उत्पाद, एक पर्याय का व्यय और द्रव्य गुण ध्रौव्य रहता है। ऐसा अनादिकाल से हो चुका है, हो रहा है और होता रहेगा। ५. अनादिनिधन वस्तुयें भिन्न-भिन्न अपनी मर्यादा सहित परिणमित होती हैं। कोई किसी के आधीन नहीं है। कोई किसी के परिणमित कराने से परिणमित नहीं होती।
प्र० २०. विश्व का प्रत्येक द्रव्य अपना अपना स्वतंत्र परिणमन करता है क्या कहीं पूजा में आया है?
उ० देव शास्त्र गुरु की पूजा में आया है -
जड़ चेतन की सब परिणति प्रभु अपने-अपने में होती है।
अनुकूल कहें प्रतिकूल कहें, यह झूठी मन की वृत्ति है।।
प्र० २१. विश्व के सर्व द्रव्यों की व्यवस्था को जानकर हमें क्या करना चाहिये? उ० १. इस विश्व का प्रत्येक द्रव्य स्वतन्त्र है क्योंकि प्रत्येक द्रव्य का द्रव्य क्षेत्र-काल-भाव सर्वथा पृथक पृथक है इसलिये शरीरादि परद्रव्यों को अपना मानना छोड।
श्री दिगम्बर जैन वीतराग विज्ञान पाठशाला
३१-राजा रोड, जैन कॉलोनी, देहरादून, फोन नं० (०१३५) ६२३१३१
के तत्वाधान में
वीतराग विज्ञान प्रतियोगिता-६
दिनांक १७ सितम्बर २००१ दिन रविवार दोपहर ३ बजे
(स्थान - श्री जैन धर्मशाला, गाँधी रोड, देहरादून
प्रतियोगिता में पूछे जाने वाले प्रश्न —
द्रव्य
प्र० १. द्रव्य किसे कहते हैं?
उ० गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं।
प्र० २. गुणों के समूह को क्या कहते हैं?
उ० गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं।
प्र० ३. द्रव्य के पर्यायवाची शब्द क्या-क्या है?
उ० वस्तु, सत्, सत्ता, तत्व, अर्थ, पदार्थ आदि द्रव्य के पर्यायवाची शब्द हैं। प्र० ४. गुणों का समूह कौन सा द्रव्य है?
उ० जीव अनन्त, पुद्गल अनन्तानन्त, धर्म-अधर्म-आकाश एक-एक और काल द्रव्य लोकप्रमाण असंख्यात - ये सभी द्रव्य गुणों का समूह हैं। प्र० ५. क्या मैं भी गुणों का समूह हूँ?
उ० मैं एक जीव द्रव्य हूँ, मैं भी गुणों का समूह हूँ।
प्र० ६. क्या प्रत्येक सिद्ध भगवान् भी गुणों का समूह है?
उ० हाँ, प्रत्येक सिद्ध भगवान् भी पृथक-पृथक जीव द्रव्य है। अतः प्रत्येक सिद्ध भगवान् भी गुणों के समूह हैं।
प्र० ७. क्या निगोदिया, पेड का जीव, मक्खी, चूहा, शेर, हाथी आदि सब गुणों के समूह है?
उ० निगोद से लेकर चारों गतियों के जीव तथा पंच परमेष्ठी सब गुणों के समूह हैं क्योंकि ये सब जीवद्रव्य हैं।
प्र० ८. क्या शरीर, धन, मकान आदि पुद्गल भी गुणों के समूह हैं? उ० शरीर, धन, मकान आदि में अनन्त-अनन्त पुद्गल परमाणु हैं; प्रत्येक पुद्गल परमाणु भी गुणों का समूह है।
प्र० ६. क्या धर्म-अधर्म-आकाश-काल द्रव्य भी गुणों के समूह हैं? उ० गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं। धर्म-अधर्म-आकाश काल भी द्रव्य हैं, अतः ये सब भी गुणों के समूह हैं।
प्र० १०. गुणरहित द्रव्य का नाम बताओ?
उ० कोई भी द्रव्य गुणरहित नहीं होता क्योंकि गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं। प्र० ११. क्या प्रत्येक द्रव्य में गुण समान ही है?
उ० प्रत्येक द्रव्य में गुण संख्या अपेक्षा समान हैं।
प्र० १२. प्रत्येक द्रव्य में गुण कितने है?
उ० प्रत्येक द्रव्य में अनन्त-अनन्त गुण है।
प्र० १३. प्रत्येक द्रव्य के अनन्त गुणों की संख्या का क्या माप है? उ०
१. जीव अनन्त हैं। २. जीव से अनन्तगुने अधिक पुद्गल है।
३. पुद्गल से अनन्तगुने अधिक तीन काल के समय हैं।
४. तीन काल के समयों से अनन्तगुने अधिक आकाश के प्रदेश हैं। ५. आकाश के प्रदेशों से अनन्तगुने अधिक एक द्रव्य में गुण है। प्र० १४. प्रत्येक द्रव्य के अनन्त गुण द्रव्य में किसप्रकार रहते हैं? उ०
१. जैसे चीनी में मिठास है वैसे ही द्रव्य में गुण हैं।
२. जैसे सोने में पीलापन है वैसे ही द्रव्य में गुण हैं।
प्र० १५. द्रव्य के अनन्त गुण द्रव्य में किस प्रकार नहीं रहते? उ०
जैसे बोरी में गेहूँ भरे हैं वैसे द्रव्य में गुण नहीं रहते क्योंकि - १. गेहूँ बोरी में डाले जा सकते हैं और निकाले जा सकते है लेकिन गुण द्रव्य में डाले अथवा निकाले नहीं जा सकते।
२. गेहूँ बोरी के सम्पूर्ण भागों व सम्पूर्ण अवस्थाओं में नहीं रहते लेकिन गुण द्रव्य के सम्पूर्ण भागों व सम्पूर्ण अवस्थाओं में रहते हैं। ३. बोरी फट जाये तो गेहूँ बिखर कर अलग-अलग हो जाते हैं लेकिन द्रव्य में रहने वाले अनन्त गुण कभी भी बिखर कर अलग-अलग नहीं होते।
प्र० १६. प्रत्येक द्रव्य का अपने अनन्त गुणों के साथ कैसा सम्बन्ध है? उ०
प्रत्येक द्रव्य का अपने गुणों के साथ तादात्म्यसिद्ध सम्बन्ध है। अर्थात् कभी अलग न होने वाला सम्बन्ध है।
प्र० १७. गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं। प्रत्येक द्रव्य अनन्त-अनन्त गुणों का उ०
समूह है- इसको जानने से क्या लाभ होता है?
१. निज भगवान् आत्मा की महिमा आ जाती है।
२. शरीर, धन, मकान आदि परद्रव्यों की महिमा छूट जाती है।
प्र० १८. द्रव्य को जानने से निज भगवान् आत्मा की महिमा कैसे आ जाती है? उ०
१. इस विश्व में जीव अनन्त हैं।
२. जीव से अनन्तगुने अधिक पुद्गल द्रव्य हैं।
३. पुद्गल से अनन्तगुने अधिक तीन काल के समय है।
४. तीन काल के समयों से अनन्तगुने अधिक आकाश के प्रदेश हैं। ५. आकाश के प्रदेशों से अनन्तगुने अधिक एक द्रव्य में गुण है। ६. एक द्रव्य के गुणों से अनन्तगुने अधिक सब द्रव्यों के गुण हैं। ७. सब द्रव्यों के गुणों से अनन्तगुने अधिक सब द्रव्यों के सब गुणों की पर्यायें हैं।
८. सब पर्यायों से अनन्तगुने अधिक अविभाग प्रतिच्छेद हैं। इस प्रकार विश्व में ८ नं० तक ही ज्ञेय हैं।
९. मुझ आत्मा में केवलज्ञान की शक्ति है। केवलज्ञान की पर्याय में ८ नं० तक सारा विश्व एक समय में जाना जा सकता है; ऐसे ऐसे अनन्त विश्व हों तो भी एक समय में ज्ञेय हो सकते हैं मगर है नहीं। तो उस एक समय की केवलज्ञान पर्याय की ताकत का क्या कहना !
१०. केवलज्ञान एकबार प्रारम्भ होने पर सादिअनन्त काल तक
केवलज्ञान-केवलज्ञान अनन्त पर्यायें होती रहती हैं। केवलज्ञान आत्मा के ज्ञान गुण में से आता है। जिस ज्ञान गुण में से केवलज्ञान की अनन्त पर्यायें आती ही रहती हैं; उस ज्ञानगुण की ताकत का क्या कहना ! ११ ज्ञान जैसे अनन्तगुण मुझ आत्मा में हैं। मैं उन अनन्त गुणों का स्वामी हूँ। मुझ आत्मा का क्या कहना !
ऐसा जाने माने तो अपनी महिमा आवे।
प्र० १९. द्रव्य को जानने से शरीर, आदि परद्रव्यों की महिमा कैसे छूट जाती है? उ०
लोकाकाश में जाति अपेक्षा छह द्रव्य हैं। १. प्रत्येक द्रव्य अनन्त अनन्त गुणों का समूह है। २. सबके पास गुण संख्या अपेक्षा समान है। कम या ज्यादा नहीं हैं। ३. किसी भी द्रव्य में गुण डाले या निकाले नहीं जा सकते। ऐसा जाने माने तो शरीर, धन आदि परद्रव्यों की ओर देखना ही नहीं रहता, एकमात्र अनन्तगुणों के अभेद पिण्ड निजआत्मा की ओर ही देखना रहा। प्र० २०. सम्यग्दर्शन, श्रावकपना, मुनिपना, श्रेणी, अरहंत व सिद्ध दशा की प्राप्ति उ०
किसके आश्रय से होती है?
एकमात्र ज्ञान-दर्शन-सुख-वीर्य-श्रद्धा-चारित्र-क्रियावतीशक्ति आदि अनन्त गुणों के अभेद पिण्ड निजआत्मा के आश्रय से सम्यक्दर्शन से लेकर सिद्ध दशा की प्राप्ति होती है। मुझ आत्मा से सर्वथा भिन्न शरीर से, शरीर की क्रिया से धर्म का सर्वथा सम्बन्ध नहीं है।
प्र० २१. छह द्रव्यों को कितने प्रकार से दो भागों में बांटा जा सकता है? उ०
१. जीव-अजीव २. रूपी-अरूपी ३. क्रियावतीशक्ति सहित-क्रियावतीशक्ति रहित ४. वैभाविकशक्ति सहित-वैभाविकशक्ति रहित ५. जड-चेतन ६. एकप्रदेशी-बहुप्रदेशी ७. एक-अनेक
प्र० २२ छह द्रव्यों में जीव कौन है और अजीव कौन हैं?
उ०
छहद्रव्यों में ज्ञानदर्शन वाला एक मात्र जीव द्रव्य है और ज्ञान दर्शन रहित पुद्गल-धर्म-अधर्म-आकाश-काल-ये पाँच द्रव्य अजीव हैं।
प्र० २३ छह द्रव्यों में रूपी कौन है और अरूपी कौन है?
उ०
छह द्रव्यों में स्पर्श-रस-गंध-वर्णवाला एक मात्र पुद्गलद्रव्य रूपी है और जीव, धर्म, अधर्म, आकाश, काल ये पाँच द्रव्य अरूपी हैं।
प्र० २४ छहद्रव्यों में क्रियावतीशक्ति सहित कौन है और क्रियावतीशक्ति रहित कौन है?
उ०
जीव और पुद्गल द्रव्य क्रियावतीशक्ति सहित हैं और धर्म, अधर्म, आकाश, काल - ये चार द्रव्य क्रियावतीशक्ति रहित है, अनादिअनन्त स्थिर हैं। प्र० २५ छहद्रव्यों में वैभाविकशक्ति सहित कौन है और वैभाविकशक्तिरहित कौन है? उ०
जीव और पुद्गल द्रव्य वैभाविकशक्ति सहित है और धर्म, अधर्म, आकाश, काल - ये चार द्रव्य वैभाविकशक्ति रहित है।
प्र० २६ छहद्रव्यों में जड कौन हैं और चेतन कौन है?
उ०
पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल - ये पाँच द्रव्य जानने-देखने की शक्ति रहित जड हैं और जानने-देखने की शक्तिवाला एकमात्र जीवद्रव्य चेतन है। प्र० २७ छहद्रव्यों में एकप्रदेशी कौन है और बहुप्रदेशी कौन है? उ०
पुद्गल और काल द्रव्य एकप्रदेशी हैं और जीव, धर्म, अधर्म, आकाश-ये चार द्रव्य बहुप्रदेशी हैं क्योंकि जीव-धर्म-अधर्म असंख्यातप्रदेशी और आकाश द्रव्य अनन्त प्रदेशी है।
- अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें -
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3035.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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