उत्तम त्याग
परिभाषा
निज शुद्धात्मा के ग्रहण पूर्वक, बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह से निवृत्ति ही उत्तम त्याग है।
अतत्याग किसे कहते हैं?
रागादि के कारण पर वस्तु के ग्रहण को, अतत्याग कहते हैं।
त्याग धर्म है।
दान पुण्य है।
जीव त्याग क्यों नहीं कर पाता है?
- तीव्र राग और आसक्ति के कारण त्याग नहीं हो पाता है।
- गुण और दोष की सच्ची समझ नहीं होने के कारण भी व्यक्ति अपने दोषों का त्याग नहीं कर पाता है।
त्याग न करने के नुकसान
- अपने विकारों एवं दोषों का त्याग किए बिना जीवन में सुख समृद्धि संभव नहीं है।
- अपने दोषों को पहचानकर उनका त्याग नहीं करने पर लोक में भी निंदा के पात्र बनते हैं।
- गलत कार्यों का त्याग नहीं करने पर तत्संबंधी पाप का बन्ध निरंतर चलता रहता है।
उत्तम त्याग धर्म
दान चार परकार, चार संघ को दीजिए।
धन बिजुली उनहार, नर-भव लाहो लीजिए।।
उत्तम त्याग कह्यो जग सारा, औषध शास्त्र अभय आहारा।
निहचै राग-द्वेष निरवारे, ज्ञाता दोनों दान संभारे।।
दोनों संभारे कूपजल-सम, दरब घर में परिनिया।
निज हाथ दीजे साथ लीजे, खाय-खोया बह गया।।
धनि साधु शास्त्र अभय-दिवैया, त्याग राग-विरोध को।
बिन दान श्रावक-साधु दोनों, लहें नाहीं बोध को।।
द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन
सरल अर्थ
दान चार प्रकार का है। ये चार संघ अर्थात् मुनि, आर्यिका, श्रावक - श्राविका को देना चाहिए। धन, सम्पत्ति, वैभव, बिजली की चमक की तरह हैं। अतः दान देकर मनुष्य भव का लाभ ले लेना चाहिए।
समस्त संसार में उत्तम त्याग धर्म श्रेष्ठ कहा गया है। औषधि, शास्त्र, अभय, आहार दान- ये तो व्यवहार त्याग के रूप में हैं। राग और द्वेष का निवारण करना (त्यागना), निश्चय त्याग है। बुद्धिमान लोग दोनों (व्यवहार और निश्चय) दान करते हैं। कुएँ का पानी नहीं निकालने पर खराब हो जाता है और उससे अधिक बढ़ता भी नहीं है तथा निकालने पर खराब नहीं होता एवं जितना निकालते हैं, उतना फिर से भर जाता है। उसीप्रकार धन में धन, वैभव की दान के अभाव में स्थिति बनती है। इसलिए धन-सम्पत्ति को अपने हाथ से दान देकर साथ में ले लीजिए। धन वैभव खाने-पीने में खर्च करना तो बह जाने के समान है, वह नष्ट हो जायेगा; लेकिन साथ रहने वाला नहीं है। धन्य हैं वे साधु, जो ज्ञानदान, अभयदान देने वाले हैं और राग-द्वेष त्यादि विकारों का त्याग करने वाले हैं। दान के बिना श्रावक और साधु सम्यग्ज्ञान को प्राप्त नहीं करते।
उदाहरण
उत्तम त्याग धर्म में प्रसिद्ध
पुकरुवा भील
अत्याग के कारण दुर्गति को प्राप्त
क्रूद्र
उत्तम त्याग धर्म
त्याग रूप ही आत्मधर्म है।
राग-द्वेष तो भाव कर्म हैं।।
कषाय भाव से मुख को मोड़ो।
अभक्ष्य और पापों को छोड़ो।।
भव: दुःख के अभाव का कारण।
भील पुरुख्वा वीर गया बन।। - समकित शास्त्रो
यह anti - virus हमारे अंदर मौजूद अनुपयोगी वस्तुओं को delete करने की सलाह देता है।
कहानी
सन् 1912 में असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया गया। उस समय देशबंधु चितरंजन दास देश के अद्वितीय प्रतिभाशाली बैरिस्टर थे। महात्मा गाँधी ने देशबंधु से देश सेवा के लिए वकालत छोड़ देने का आग्रह किया। तब देशबंधु ने उत्तर दिया- आप मुझे वकालत करने दीजिए। उसकी 50 हजार रुपया से अधिक मासिक आमदनी मैं पूरी काँग्रेस को दे दिया करूँगा।
तब गांधीजी बोले- हमें रुपया नहीं चाहिए। रुपयों को लात मारने वाला त्यागी व्यक्ति चाहिए। तुम-सा व्यक्ति पाकर हम जितना चाहेंगे, उतना रुपया पा सकेंगे। दास बाबू ने गाँधी जी की बात मान ली।
जय जिनेन्द्र
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3003.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है