उत्तम तप
अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | परिभाषा |
| 2 | अतप किसे कहते हैं? |
| 3 | अतप क्यों होता है ? |
| 4 | अतप के नुकसान |
| 5 | उत्तम तप धर्म |
| 6 | सरल अर्थ |
| 7 | उदाहरण |
| 8 | उत्तम तप धर्म |
| 9 | कहानी |
परिभाषा
समस्त रागादि भावों की इच्छा के त्याग पूर्वक आत्मलीनता द्वारा विकारों पर विजय प्राप्त करना, तप है। ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है।
अतप किसे कहते हैं?
विषयों की इच्छा पूरी करने को ही, अतप कहते हैं।
तप बारह प्रकार के होते हैं-
6 बहिरंग तप - अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेश
6 अंतरंग तप - प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान
अतप क्यों होता है ?
- इच्छाओं की गुलामी के कारण व्यक्ति तप नहीं कर पाता है।
- आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति के बिना तप संभव नहीं है।
अतप के नुकसान
- निरंतर नई-नई इच्छाओं के कारण व्यक्ति सदा दुःखी रहता है।
- इच्छाओं की पूर्ति के बाद भी जीवन में संतोष नहीं होता है।
उत्तम तप धर्म
तप चाहें सुरराय, करम-शिखर को वज्र है।
द्वादश विधि सुखदाय, क्यों न करे निज सकति समा।।
उत्तम तप सब-माँहिं बखाना, करम-शैल को वज्र-समाना।।
बसयो अनादि-निगोद-मँझारा, भू-विकलत्रय-पशु-तन धारा।।
धारा मनुष्य-तन महा-दुर्लभ, सुकुल आयु निरोगता।
श्री जैनवानी तत्वज्ञानी, भई विषय-पयोगता।।
अति महादुर्लभ त्याग विषय, कषाय जो तप आदरे।
नर-भव अनुपम कनक-घर पर, मणिमयी-कलसा धरे।।
द्यानत राय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन
सरल अर्थ
उत्तम तप धर्म को देवों के राजा (इंद्र) भी चाहते हैं। यह तप कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए वज्र के समान है। ये बारह प्रकार के तप सुख को देने वाले हैं तो क्यों न उन्हें अपनी शक्ति के अनुसार धारण करें। कर्म रूपी पर्वतों को नष्ट करने के लिए उत्तम तप धर्म वज्र के समान सभी शास्त्रों में कहा है। यह जीव अनादि काल से निगोद में रहा है। वहाँ से निकलकर पृथ्वी आदि स्थावर एवं उसके बाद दो इन्द्रिय, त्रीइन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय आदि हुआ; फिर तिर्यंच का शरीर धारण किया। अब यह मनुष्य पर्याय बड़ी कठिनता से धारण की। उसमें भी उत्तम कुल, पूर्ण आयु, निरोगी शरीर, जिनवाणी का संयोग, तत्वज्ञान, आत्मचिंतन में उपयोग बड़ी दुर्लभता से प्राप्त हुआ। जो जीव महा कठिन विषय और कषाय का त्याग कर तप को आदर पूर्वक ग्रहण करते हैं, वे मनुष्य भव रूपी अलौकिक स्वर्ण घर पर, नीलमणि आदि रत्नमय कलश चढ़ाते हैं अर्थात् मनुष्य जन्म को सार्थक बनाते हैं।
उदाहरण
उत्तम तप धर्म में प्रसिद्ध
सुकुमाल मुनिराज
अतप के कारण दुर्गति को प्राप्त
कौरव
उत्तम तप धर्म
आत्मलीनता ही तप जानो।
सब पर वस्तु रहित निज मानो।।
विषयों की इच्छा नहीं करना।
निर्वाछिक हो तप आचरना।
नर भव की महिमा पहचानो।
सुकुमाल महामुनि सम तप ठानो।। - समकित शास्त्रों
तप का anti-virus हमें विषय भोगों के virus से बचाता है।
कहानी
एक बार सम्राट चन्द्रगुप्त भटक कर एक गुफा के पास पहुँचे। गुफा में से किसी व्यक्ति की आवाज आ रही थी।
वहाँ एक मुनिराज पाठ कर रहे थे।
सम्राट ने पूछा- भीतर कौन है?
भीतर से आवाज आई- पहले आप अपना परिचय दें कि आप कौन हैं?
सम्राट ने उत्तर दिया- मैं चक्रवर्ती हूँ।
भीतर से पुनः प्रश्न आया- आप चक्रवर्ती कैसे बने?
सम्राट ने उत्तर दिया- मैंने अपनी सेना के बल से षट्खंडों को वश किया है और उन पर विजय पाई है।
भीतर से आवाज आई- मैं भी षट्खंडों का विजेता चक्रवर्ती हूँ।
सम्राट ने आश्चर्य से पूछा- आप चक्रवर्ती कैसे हुए?
उत्तर आया मैंने तप बल से मन-वचन-काय, राग-द्वेष-मोह - इन षट् खंडों को जीता है। क्या तुम इन पर विजय पा सके हो।
यह उत्तर सुनकर सम्राट चंद्रगुप्त स्वयं से भी बड़े चक्रवर्ती के सामने नतमस्तक हो गया और उसने कहा- असली चक्रवर्ती तो आप ही हैं। आपके तप बल के सामने मेरा सैन्य बल कुछ भी नहीं है; क्योंकि जिसने स्वयं को जीता है, वही असली विजेता है।
जय जिनेन्द्र
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स्रोत: Gyata संग्रह।
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