उत्तम शौच
अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | परिभाषा |
| 2 | लोभ किसे कहते हैं? |
| 3 | जीव लोभ क्यों करते हैं? |
| 4 | लोभ के नुकसान |
| 5 | उत्तम शौच धर्म |
| 6 | सरल अर्थ |
| 7 | उदाहरण |
| 8 | उत्तम शौच धर्म |
| 9 | कहानी |
परिभाषा
‘शुचेर्भावः शौचम्’ शुचिता अर्थात् पवित्रता का नाम शौच है। शौच के साथ लगा ‘उत्तम’ शब्द सम्यग्दर्शन की सत्ता का सूचक है। अतः सम्यग्दर्शन के साथ होने वाली वीतरागी पवित्रता ही उत्तम शौच धर्म है।
लोभ किसे कहते हैं?
लालच को लोभ कहते हैं।
लोभ को पाप का बाप कहा जाता है, क्योंकि जगत में ऐसा कौनसा पाप है जिसे लोभी न करता हो? उसकी प्रवृत्ति जैसे भी हो, येन-केन-प्रकारेण धनादि भोग-सामग्री इकट्ठी करने की ही रहती है।
जीव लोभ क्यों करते हैं?
- हमें जितना मिला है, उतने में हम संतुष्ट ना होकर और ज्यादा पाने की इच्छा करते हैं।
- दूसरों की अधिक वस्तुयें देखकर उन्हें पाने की ओर आकर्षित होते हैं।
लोभ के नुकसान
- लोभी व्यक्ति जितना मिलता है, उसमें कभी भी खुश नहीं रह पाता है।
- वह और अधिक पाने के चक्कर में हमेशा दुखी रहता है।
- लोभ के कारण जितना मिला है, उसे भी खो देता है अथवा उसका भी सुखपूर्वक भोग नहीं कर पाता।
उत्तम शौच धर्म
धरि हिरदै संतोष, करहु तपस्या देह सों।
शौच सदा निरदोष, धरम बड़ो संसार में।।
उत्तम शौच सर्व-जग जाना, लोभ ‘पाप को बाप’ बखाना।
आशा-पास महादुःखदानी, सुख पावे संतोषी प्राणी।।
प्रानी सदा शुचि शील-जप-तप, ज्ञान-ध्यान प्रभाव तें।
नित गंग जमुन समुद्र न्हाये, अशुचि-दोष स्वभाव तें।।
ऊपर अमल मल-भर्यो भीतर, कौन विधि घट शुचि कहे।
बहु देह मैली सुगुन-थैली, शौच-गुन साधु लहे।।
द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन
सरल अर्थ
हृदय में संतोष धारण करके, शरीर से तपस्या करनी चाहिए। निर्दोष शौच धर्म ही सर्व जगत में प्रसिद्ध है। आशा अर्थात् इच्छा रूपी नाग महादुःख को देने वाला है। संतोष को धारण करने वाले प्राणी सुख प्राप्त करते हैं। यह जीव शील, जप, तप, ज्ञान, ध्यान के प्रभाव से पवित्रता प्राप्त करता है। गंगा-यमुना आदि नदियों एवं समुद्रों में निरंतर नहाने से भी पवित्रता नहीं होतीः क्योंकि इस शरीर का स्वभाव ही अपवित्र (अशुचि) है। यह शरीर ऊपर से तो मल रहित पवित्र दिखाई देता है, परंतु इसके भीतर मल भरा हुआ है। तब ऐसे शरीर को किस प्रकार से पवित्र कहा जाए। जिनका शरीर तो बहुत मैला है, परंतु जो उत्तम गुणों के भंडार हैं- ऐसे महाव्रती साधु ही इस उत्तम शौच गुण को प्राप्त करते हैं।
उदाहरण
उत्तम शौच धर्म में प्रसिद्ध
बाहुबली भगवान
लोभ के कारण दुर्गति को प्राप्त
सुभौम चक्रवर्ती
उत्तम शौच धर्म
परम पवित्र आत्मा जानो।
लोभ पाप का बाप बखानो।।
लोभी का चित्त महा मलीना।
निर्लोभी जीवन नित जीना।।
दुर्गति में गिरे सुभौम लोभ से।
बाहुबली शिव गए शौच से।।
- समकित शास्त्री
यह anti-virus हमारे system को बाहर से ही नहीं
अंदर से भी Clean कर देता है।
कहानी
स्कूल के छात्र ने अपने अध्यापक से पूछा कि ये लालच क्या होता है?
अध्यापक ने उसे थ्योरी की बजाय प्रेक्टिकली समझाने के लिए कहा कि स्कूल के बाहर एक बड़ी-सी खिलौनों की दुकान है। तुम वहाँ जाओ और अपना मनपसंद खिलौना लेकर आओ। पर शर्त यह है कि जब तुम खिलौना चुनने के लिए दुकान में घूमोगे तो फिर पीछे मुड़कर नहीं आ सकते और खिलौना चुनते ही तुम्हें आगे के खिलौने न तो देखने मिलेंगे और न ही अपना चुना हुआ खिलौना बदलने का मौका।
छात्र उस दुकान पर जाता है, उसे एक खिलौना पसंद आता है, पर यह सोचकर कि कहीं आगे ज्यादा अच्छा खिलौना हुआ तो वह आगे बढ़ता गया। कई बार उसे लगा कि पीछे छूटा हुआ खिलौना ही ज्यादा अच्छा था, पर नियम के अनुसार वह पीछे मुड़कर नहीं जा सकता था।
आखिर में वह बिना खिलौने के ही वापस अपने अध्यापक के पास आया और सारी बात अपने अध्यापक को बताई। तब उसके अध्यापक ने समझाया कि यही लालच है कि हमें जो मिलता है, हम उसमें संतुष्ट न होकर और ज्यादा और अच्छा पाने के कारण जो मिला होता है, उसके भी महत्व को न पहचान कर उसे भी खो बैठते हैं और बाद में पछताते हैं।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3001.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
प्रूफरीडिंग बाकी है