उत्तम शौच या उत्तम सत्य ?
उत्तम शौच या उत्तम सत्य ?
- प्रो. वीरसागर जैन
दशलक्षण महापर्व में प्रतिदिन एक-एक धर्म की आराधना की परम्परा प्रचलित है, किन्तु उसमें चौथे-पांचवें दिन एक मतभेद सामने आता है कि कहीं तो उत्तम शौच की आराधना पहले होती है और कहीं उत्तम सत्य की ? इससे समाज में उलझन एवं अव्यवस्था उत्पन्न होती है । यहां हम इसी समस्या पर कुछ विचार शास्त्रानुसार करना चाहते हैं ।
सर्वप्रथम तो इस संबंध में हमने स्वयं अनेकानेक शास्त्रों का अवलोकन किया और पाया कि प्रायः सभी प्रमुख शास्त्रों में शौच पहले आता है और सत्य बाद में, अतः क्रम तो शौच का ही पहले आना चाहिए; किन्तु कविवर पं. द्यानतराय कृत दशलक्षण धर्म की पूजा के अर्घ्यों में पहले सत्य छुपा है, बाद में शौच और वही पूजा समाज में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है; अतः कुछ लोग सत्य की पूजा पहले करने लगे और शौच की बाद में ।
प्रश्न है कि यदि सभी शास्त्रों में शौच पहले था तो कविवर द्यानतरायजी जैसे विद्वान से यह गलती कैसे हो गई कि उन्होंने सत्य का अर्घ्य पहले लिखा और शौच का बाद में ?
उत्तर- मुझे लगता है कि उन्होंने भी शौच का ही अर्घ्य पहले लिखा है, सत्य का बाद में, किन्तु बाद में किसी पाण्डुलिपिकार से यह क्रम भंग हो गया है और फिर उसी की परम्परा चल पड़ी है ।
प्रश्न- आपको कैसे लगता है ? क्या आधार है इसका ?
उत्तर- देखिए, यदि द्यानतरायजी सत्य को पहले और शौच को बाद में मानते होते तो उन्होंने स्थापना एवं जयमाला में शौच को पहले और सत्य को बाद में कैसे लिखा है ? इससे स्पष्ट होता है कि द्यानतरायजी को भी पूर्ववर्ती समस्त आचार्यों की भांति शौच का ही क्रम पहले मान्य है, सत्य का नहीं ।
पुनश्च, जैन शास्त्रों में सर्वाधिक प्रमाणभूत ग्रन्थ ‘तत्त्वार्थसूत्र’ है । उसमें (नौवें अध्याय के छठे सूत्र में) भी शौच को पहले और सत्य को बाद में लिखा है । न केवल तत्त्वार्थसूत्र में, उसकी आचार्य पूज्यपाद कृत सर्वार्थसिद्धि, आचार्य अकलंक कृत तत्त्वार्थराजवार्तिक, आचार्य विद्यानन्दि कृत तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आदि में भी शौच की ही पहले व्याख्या लिखी गई है, सत्य की बाद में ।
इसके अतिरिक्त एक ‘दशलक्षण विधान’ भी बहुत सुंदर पाया जाता है जिसे पं. टेकचंदजी ने लिखा है । उसमें भी उत्तम शौच की पूजा पहले आती है और उत्तम सत्यकी बाद में ।
इससे ज्ञात होता है कि उमास्वामी, पूज्यपाद, अकलंक, विद्यानन्दि आदि सभी महान आचार्यों और द्यानतराय, टेकचंद आदि लगभग सभी विद्वान कवियों को भी पहले शौच का ही क्रम मान्य है और वही सब शास्त्रों की मूलभूत परम्परा है । यद्यपि शास्त्रों में ही क्वचित्-क्वचित् सत्य को पहले लिखा हुआ मिलता है, परन्तु उसकी मुख्यता नहीं है ।
वैसे भी यदि हम इनको कथाओं के अभाव की अपेक्षा समझाना चाहें तो भी शौच का ही क्रम वैज्ञानिक प्रतीत होता है । चतुर्थ कषाय लोभ है, अतः उसके अभावस्वरूप प्रकट होनेवाला चतुर्थ धर्म भी शौच ही उचित सिद्ध होता है ।
अतः हम सबको एकमत से शौच को पहले और सत्य को बाद में मनाने का निर्णय कर लेना चाहिए, ताकि समाज में उलझन एवं अव्यवस्था समाप्त होकर एकरूपता की स्थापना हो ।
किन्तु खेद है कि लोग आजकल अपने को सुधारने की बजाय पुस्तकों में परिवर्तन करने लगे हैं । ‘पूजन-पाठ-प्रदीप’ की नई पुस्तकों में भी दशलक्षण पूजा की जयमाला में क्रम बदलकर छपाया जा रहा है । ‘तत्त्वार्थसूत्र’ के संबंधित सूत्र (अध्याय 9, सूत्र 6) में भी क्रम-परिवर्तन करके छपाया जा रहा है । अभी-अभी अमर ग्रंथालय उदासीन आश्रम इन्दौर से पं. टेकचंदजी का ‘दशलक्षण विधान’ छपकर आया है, उसमें भी यह क्रम अपनी मर्जी से बदलने का अक्षम्य अपराध किया गया है, यह विकृत परम्परा शीघ्र रुकनी चाहिए ।
मूल दस्तावेज़ (PDF): 500.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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