उत्तम मार्दव - जैन स्वाध्याय सामग्री | Uttam Mardav

उत्तम मार्दव

अनुक्रमणिका

परिभाषा

संयमन को संयम कहते हैं अर्थात् उपयोग को परपदार्थ से समेट कर अपने में सीमित करना अथवा व्रतों, समितियों का पालन करना, क्रोधादि का निग्रह करना और पाँच इन्द्रियों के विषयों को जीतना संयम है।

असंयम किसे कहते हैं ?

पाँच इन्द्रिय एवं मन के विषयों में रत परिणाम असंयम है।

संयम दो प्रकार का होता है-
छहकाय के जीवों के घात एवं घात के भावों के त्याग को प्राणीसंयम और पंचेन्द्रियों तथा मन के विषयों के त्याग को इन्द्रियसंयम कहते हैं।

असंयम क्यों होता है?

  • हिंसा में प्रमाद परिणति मूल कारण होती है।
  • विषय सेवन में अभिलाषा मूल कारण है।

असंयम के नुकसान

  • संयम के बिना अहिंसा का पालन संभव नहीं है।
  • जीवन में धैर्य का अभाव हो जाता है।
  • लौकिक कार्यों में भी सफलता के लिए संयम और अनुशासन आवश्यक होता है।
  • संयम से रहित सफल व्यक्ति भी अवनति को प्राप्त होता है।

उत्तम संयम धर्म

काय-छहों प्रतिपाल, पंचेन्द्री-मन वश करो।
संयम-रतन संभाल, विषय-चोर बहु फिरत हैं।।
उत्तम संजम गहु मन मेरे, भव-भव के भाजें अघ तेरे।
सुरग-नरक-पशुगति में नाहीं, आलस-हरन करन सुख ठाहीं।।
ठाहीं पृथ्वी जल आग मारुत, रूख त्रस करुना धरो।
सपरसन रसना घ्रान नैना, कान मन सब वश करो।
जिस बिना नहीं जिनराज सीझे, तू रुल्यो जग-कीच में।
इक घरी मत विसरो करो नित, आव जम-मुख बीच में।।

द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन

सरल अर्थ

छह काय के जीवों की रक्षा और पाँच इंद्रियाँ एवं मन को वश में करना चाहिए। विषय-कषाय रूपी चोर बहुत घूम रहे हैं, इसलिए संयम रूपी रत्न संभाल कर रखो। हे मेरे मन! उत्तम संयम धर्म को ग्रहण करो, जिसके कारण अनेकानेक भवों के पाप नष्ट हो जायेंगे। आलस्य को हरने वाला और सुख को देने वाला यह उत्तम संयम धर्म देव, नरक, तिर्यंच गति में नहीं होता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति- ये पाँच स्थावर और त्रस इन छह काय के जीवों की दया धारण कर स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण एवं मन को वश में करो। इस संयम के अभाव में जिनराज (तीर्थंकर) गृहस्थ अवस्था में थे, उन्होंने संयम अंगीकार नहीं किया था, तब तक वे मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सके थे। इसलिए हे जीव! इस संयम को ग्रहण न करने के कारण से ही तुम संसार रूपी कीचड़ में फँसे हो। हम निरंतर मृत्यु रूपी यमराज के मुख की ओर जा रहे हैं। इसलिए उत्तम संयम धर्म को एक क्षण को भी नहीं भूलना चाहिए।

उदाहरण

उत्तम संयम धर्म में प्रसिद्ध
पांडव मुनिराज

असंयम के कारण दुर्गति को प्राप्त
ब्रहादत्त चक्रवर्ती

उत्तम संयम धर्म

संयम आतम रतन अमूल्य।
असंयमी जीवन पाप का मूल।।
जीवों के प्रति दया को धारो।
गज-मृगादि के दुःख विचारो।।
तंदुल मच्छ नरक में जाता।
महामच्छ सुर गति को पाता।। - समकित शास्त्री

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कहानी

एक पिता अपने पुत्र के साथ पतंग उड़ा रहे थे।
पुत्र ने कहा- ये डोर पतंग को रोके हुए है, नहीं तो ये पतंग आसमान में कितनी ऊँची जा सकती थी। पिता पुत्र के आशय को समझ रहे थे। उन्होंने पतंग की डोर काट दी। डोर कटते ही पतंग आसमान में थोड़ा और ऊपर गई।

यह देख खुश होते हुए बेटे ने कहा- देखा, मैंने कहा था न पापा! डोर के कारण ही पतंग की उन्नति रुकी हुई थी, पर यह क्या! पतंग थोड़ा ऊपर जाने के बाद हिचकोले खाते हुए नीचे की ओर आने लगी और पेड़ में फँसकर फट गई। अब मुस्कुराने की बारी पिता की थी।
पिता बोले- बेटा! डोर ने पतंग को रोका नहीं था, बल्कि सँभाला हुआ था। उसको संयमित रखा था। बिना डोर के पतंग का हाल तो तुम देख ही चुके हो।
इसीप्रकार आत्म-संयम भी ऊपर से देखने पर रुकावट जैसा प्रतीत होता है, पर यदि हम भी अपनी इंद्रियों और मन पर संयम की डोर नहीं बाँधेंगे तो हमारी दशा भी फटी हुई पतंग की भाँति हो जायेगी।


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3027.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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