उत्तम क्षमा — जैन स्वाध्याय सामग्री | Uttam Kshama

उत्तम क्षमा

उत्तम क्षमा

निदेशक - डॉ.बी.सी. जैन

परिभाषा

क्षमा स्वभावी आत्मा के आश्रय से आत्मा में जो क्रोध के अभाव रूप शान्ति स्वरूप पर्याय प्रकट होती है, उसे क्षमा कहते हैं।

क्रोध किसे कहते हैं ?

गुस्सा करने को क्रोध कहते हैं।

क्रोध आत्मा की एक ऐसी विकृति है, ऐसी कमजोरी है, जिसके कारण उसका विवेक समाप्त हो जाता है, भले-बुरे की पहचान नहीं रहती।

क्रोध क्यों आता है ?

  • जब हमें लगता है कि किसी ने मेरा बुरा किया या काम बिगाड़ा
  • जैसा हमने सोचा वैसा ना होकर कुछ और हो (अपेक्षा की उपेक्षा)

क्रोध के नुकसान

  • बने हुए काम भी बिगड़ जाते हैं।
  • स्वयं भी दुःखी होते है और दूसरों के साथ भी संबंध बिगाड़ लेते हैं।

उत्तम क्षमा धर्म

पीड़ें दुष्ट अनेक, बाँध मार बहुविधि करें।
धरिये छिमा विवेक, कोप न कीजै पीतमा।।
उत्तम छिमा गहो रे भाई, इह-भव जस, पर-भव सुखदाई।
गाली सुनि मन खेद न आनो, गुन को औगुन कहें अयानो।।
कहि है अयानो वस्तु छीनें, बाँध मार बहुविधि करें।
घर तैं निकारै तन विदारै, वैर जो न तहाँ धरै।।
ते करम पूरब किये खोटे, सहें क्यों नहीं जीयरा।
अति क्रोध-अगनि बुझाय प्राणी, साम्य-जल ले सीयरा।।
द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन

सरल अर्थ

अनेक प्रकार बाँधकर, पीटकर या नाना प्रकार से दुष्टों के द्वारा कष्ट दिए जाने पर भी सज्जन क्रोध नहीं करते हैं एवं क्षमा रूपी विवेक को धारण करते हैं। हे भाई! उत्तम क्षमा को धारण करने से इस भव यश में तथा दूसरे भव में सुख प्राप्त होता है। यदि कोई गाली देता है तो मन में खेद-शोक नहीं लाना चाहिए। यदि अज्ञानी/मूर्ख लोग अपने गुणों को अवगुण (दोष) भी कहें, हमारी वस्तु भी छीन लें, इतना ही नहीं, कई प्रकार से सताये जाने पर, बाँधे मारे जाने पर, घर से निकाल देने पर, शरीर को छिन्न-भिन्न कर देने पर भी वैर (दुश्मनी) को धारण नहीं करना चाहिए। हे जीव! जो पूर्व जन्म में खोटे (पाप) कर्म किए तो सहन करने (भोगने) ही पड़ेंगे। हे जीव! क्रोध रूपी अग्नि को समता रूपी शीतल जल लेकर बुझाना चाहिए। यही उत्तम क्षमा धर्म है।

उदाहरण

उत्तम क्षमा धर्म में प्रसिद्ध
यशोधर मुनिराज

क्रोध के कारण दुर्गति को प्राप्त
द्वीपायन मुनि

उत्तम क्षमा धर्म

क्षमा धर्म का मूल है।
क्रोध को करना भूल है।।
क्रोध क्षमा से मिटता है।
क्रोधी मानव पीटता है।।
क्रोध से द्विपावन नरक गए।
क्षमा से यशोधर मुक्त हुए।।

  • समकित शास्त्री

क्षमा का anti-virus हमारे operating system को cool down रखता है और क्रोध virus से बचाता है।

कहानी

एक बार एक संत अपने कुछ शिष्यों को जीवन के रहस्य समझने के लिए उन्हें एक गाँव ले गये। वहाँ एक ही परिवार के कुछ लोग लड़-झगड़ रहे थे तथा एक-दूसरों पर चीख-चिल्ला रहे थे। शिष्यों को जिंदगी के सबक सिखाने के लिए गुरु ने शिष्यों से पूछा कि लोग गुस्से में चीखते-चिल्लाते क्यों है? शिष्य ने कुछ सोचते हुए कहा- क्योंकि लोग गुस्से में अपना संयम और आपा खो देते हैं, इसलिये चीखते-चिल्लाते हैं।

गुरु ने फिर कहा पर जब लोग इतने नजदीक खड़े हैं तो फिर गुस्से में भी चिल्लाने की जरूरत क्यों पड़ती है? धीमी आवाज में भी तो अपना रोष प्रकट किया जा सकता है न!

शिष्य ने उत्तर खोजने की कोशिश की, पर कुछ समझ न आने पर गुरु की ओर ही मुख किया। तब गुरु ने कहा- जब हम सामने वाले पर क्रोधित होते हैं तो मन ही मन उससे दूर हो जाते हैं और दूर के व्यक्ति तक अपनी बात पहुँचाने के लिए चिल्लाना ही पड़ता है। व्यक्ति जितना दूर होगा, उतना ज्यादा जोर से चिल्लाना पड़ता है; उसीप्रकार हम सामने वाले से जितने ज्यादा क्रोधित होते हैं, मन से हम उससे उतना ही दूर हो जाते हैं और उतना ही ज्यादा उस पर चीखते-चिल्लाते हैं।

कहानी

जैसे क्रोध आने पर हम सामने वाले व्यक्ति पर चिल्लाते हैं, उसकी बात भी सुनना पसंद नहीं करते, उससे दूर जाना चाहते हैं; क्योंकि हम मन ही मन उससे दूर हो जाते हैं तो उसीप्रकार हम क्रोध करते समय अपने आत्म-स्वभाव से भी दूर हो जाते हैं, अपनी आत्मा की बात भी सुनना नहीं चाहते और आत्म-स्वभाव से दूर भागते हैं। इसलिये सबसे पहले अपने आत्मा के प्रति क्रोध का नाश करो।
शिष्य जीवन का एक महत्त्वपूर्ण सबक सीख चुका था।

जय जिनेन्द्र
www.jainpathshalajaipur.com
Youtube: Jain Pathshala Jaipur
E-mail: [email protected]
Phone : 0141-3567401, 8619804009, 8955872717
विशेष सहयोग - समकित शास्त्री


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3025.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है