उत्तम क्षमा धर्म
अनुक्रमणिका
| क्र. | विवरण |
|---|---|
| 1 | उत्तम क्षमा धर्म |
| 2 | उत्तम मार्दव धर्म |
| 3 | उत्तम आर्जव धर्म |
| 4 | उत्तम सत्य धर्म |
| 5 | उत्तम शौच धर्म |
| 6 | उत्तम संयम धर्म |
| 7 | उत्तम तप धर्म |
| 8 | उत्तम त्याग धर्म |
| 9 | उत्तम आकिञ्चन धर्म |
| 10 | उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म |
उत्तम क्षमा धर्म
क्रोध नहीं करना तथा संसार के तमाम जीवों से मैत्री भाव का होना उत्तम क्षमा कहलाता है। अगर किसी जीव ने कर्म के उदय से किसी जीव के साथ कोई तरह का दुर्व्यवहार रूप गाली देना, मारना आदि किया हो तो उसको सुनकर या सहकर मन में क्लेश न करते हुए उसको क्षमा कर देना सो ही क्षमा धर्म है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम मार्दव धर्म
मानकषाय को जीतना ही मार्दव धर्म है। इस धर्म को धारण करने की यही परीक्षा है कि जिस समय कोई अन्य पुरुष किसी प्रकार के गर्व के आवेश में आकर अनादर कर देवे तो उस समय अपनी आत्मा में अनादर करने वाले के प्रति किसी प्रकार के प्रतिकार करने की भावना नहीं होना और तत्त्व स्वरूप का चिन्तवन करते हुए उसको सहन कर जाना ही मार्दव धर्म है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम आर्जव धर्म
माया कषाय का जीतना आर्जव धर्म है। मन वचन काय को सरल रखना, किसी के प्रति कपट भाव नहीं रखना, मन में जैसे बात हो उन्हीं को वचन से प्रगट करना तथा वैसी ही काय की चेष्टा करना सो आर्जव धर्म है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम सत्य धर्म
सर्वथा झूठ बोलने का त्याग करना सत्य धर्म है। हित मित प्रिय प्रमाणिक वचन बोलना, निंद्य गुह्य और अवद्यवचन नहीं बोलना, दूसरों की आत्मा, में संक्लेश उत्पन्न करने वाले वचन नहीं बोलना जो जैसा हो उसको वैसा ही कहना सत्यधर्म है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम शौच धर्म
तत्त्वविवेक पूर्वक लोभ कषाय का त्याग करना शौचधर्म है। शरीर की सफाई रखना, स्नान करना, तेल फुलेल लगाना, साफ कपड़े पहनना शौच नहीं है असली शौच तो हृदय से लोभ का त्याग करना ही शौचधर्म है क्योंकि लोभ ही संपूर्ण पाप का जनक है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम संयम धर्म
छह काय के जीवों की रक्षा करना तथा पांचों इन्द्रियों और मन को वश में करना इसी का नाम संयम है। संयम ही तमाम कर्मों का नाश करने वाला है इसी से आत्मा निर्मलता होती है बड़े बड़े पुण्यात्मा तीर्थंकरों ने भी इसी संयम से सिद्धपद प्राप्त किया। ऐसा दुर्लभ संयम मनुष्य भव में ही धारण किया जा सकता है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम तप धर्म
इन्द्रियों और मन के विषयों में उत्पन्न होने वाली
अभिलाषाओं को रोकना तथा आत्मा में रहने वाले
कषाय रूपी मल के शोधने के लिए संयम रूपी अग्नि
को प्रज्वलित करना तप है। लोभ कषाय के उदय से
नाना प्रकार की इच्छाएँ पैदा होती हैं जो इच्छाएं
आत्मा को संयम से दूर रखती हैं ऐसी इच्छाओं का
रोकना ही तप है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम त्याग धर्म
दश प्रकार (क्षेत्र, वास्तु, हिरण्य- चांदी, सुवर्ण-
सोना, धन- पशु आदि, धान्य- अनाज, दासी- दास
कुप्प कपड़ादि, भाण्ड- बर्तन) का बाह्य परिग्रह और
१४ प्रकार (मिथ्यात्व १ क्रोध २ मान ३ माया ४ लोभ
५ हास्य ६ रति ७ अरति ८ शोक ९ भय १० जुगुप्सा
११ स्त्रीवेद १२ पुरुषवेद १३ और नपुंसकवेद १४) का
त्याग इस प्रकार २४ प्रकार के परिग्रह का त्याग करना
त्याग- धर्म है
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम आकिञ्चन धर्म
आत्मस्वरूप से भिन्न जो शरीरादिक उनमें
संस्कारादिक के अभाव के निमित्त ये हमारा,
ऐसा ममत्वस्वरूप अभिप्राय का अभाव सो
आकिञ्चन्य धर्म है।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म
पहिली जो नाना प्रकार के कला- गुणों से चतुर ऐसी स्त्रियों का अनुभव किया हो इस समय उनके स्मरण करने का त्याग, तथा स्त्रीमात्र की कथा श्रवण करने का त्याग, रस सुगंधादि से वासित स्त्रियों के संसर्गसहित शय्यासनादिक के संसर्ग का त्याग करना तथा विषयानुराग रहित होकर ब्रह्म जो अपना शुद्ध आत्मा उसमें चर्या कहिये, प्रवर्तना सो ब्रह्मचर्य है। इस प्रकार कर्मों को रोकने के लिये दश प्रकार के धर्मों का अनुभवन करना चाहिये।
~ स्वभाव बोध मार्तंड जी
मूल दस्तावेज़ (PDF): 3074.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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