उत्तम ब्रह्मचर्य — जैन स्वाध्याय सामग्री | Uttam Brahmacharya

उत्तम ब्रह्मचर्य

उत्तम ब्रह्मचर्य

निदेशक - डॉ.बी.सी. जैन

परिभाषा

ब्रह्म अर्थात् निज शुद्धात्मा में चरना, रमना ही ब्रह्मचर्य है।
आत्मलीनता पूर्वक पंचेन्द्रिय के विषयों का त्याग ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।

अब्रह्म किसे कहते हैं?

शुद्धात्मा की अरुचि पूर्वक पंचेन्द्रिय विषयों में लीनता ही अब्रह्म है।

स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण- ये पांच इन्द्रियाँ हैं।

जीव कुशील क्यों करता है?

  1. पाँच इंद्रियों की आधीनता/गुलामी के कारण।
  2. सही समय पर उचित शिक्षा व मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण।

कुशील के नुकसान

  1. कुशील करने वाला व्यक्ति परिवार, समाज, देश हर जगह निंदा व दंड का पात्र बनता है।
  2. कुशील के कारण बड़े-बड़े राजा-महाराजा या धनपतियों के भी धन, यश, वैभव के नष्ट होने में देर नहीं लगती है।

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

शील-बाड़ नौ राखो, ब्रह्मा-भाव अंतर लखो।
करि दोनों अभिलाख, करहु सफल नर-भव सदा।।
उत्तम ब्रह्मचर्य मन मानो, माता-बहिन-सुता पहियानो।
सहें बान- वर्षा बहु सूरे, टिकें न नैन-बान लखि कूरे।।
कूरे तिया के अशुचि तन में, काम-रोगी रति करें।
बहु मृतक सड़हिं मसान-माहीं, काग ज्यों चोंचें भरें।।
संसार में विष-बेल नारी, तजि गये जोगीश्वरा।
‘द्यानत’ धरम दस पैड़ि चढ़ि के, शिव-महल में पग धरा।।

द्यानतराय जी द्वारा रचित दशलक्षण धर्म पूजन

सरल अर्थ

शील की रक्षा नौ बाड़ों को लगाकर करनी चाहिए (व्यवहार ब्रह्मचर्य) और अंतर में आत्मचिंतन करना चाहिए (निश्चय ब्रह्मचर्य)। निश्चय एवं व्यवहार ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के इच्छुक होकर मनुष्य जन्म सार्थक करना चाहिए। मन में ब्रह्मचर्य धारण कर माता, बहिन, पुत्री की पहचान करना चाहिए। वीरों के द्वारा होने वाली बाणों की वर्षा को यह जीव सहन कर लेता है, परंतु कुशील स्त्रियों के विकारी नेत्र रूपी बाण को सहन नहीं कर पाता। ऐसे काम रूपी रोग से पीड़ित स्त्री के अपवित्र शरीर में उसीप्रकार रति (प्रेम) करता है; जिसप्रकार श्मशान भूमि में सड़े हुए मृतक शरीर को कौआ प्रेमपूर्वक चोंच भरकर खाता है।

सर्वत्र नन्दतु संसार में नारी को विष- बेल के समान कहा गया है, जिसका सभी मुनिराजों ने त्याग कर दिया है। यहाँ कवि घांतरायजी कहते हैं कि ये दश धर्म रूपी सीढ़ियाँ चढ़कर जीव मोक्ष रूपी महल में प्रवेश हो जाता है।
(स्त्रियों को विष-बेल कहने का अभिप्राय स्त्रियों के प्रति काम की इच्छा रखना है, बहिन अथवा माता के प्रति राग रखना नहीं है।)

उदाहरण

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म में प्रसिद्ध
सेठ सुदर्शन

कुशील के कारण दुर्गति को प्राप्त
यमदंड कोतवाल

उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

ब्रह्म रूप आतम है अपना।
शील विरुद्ध नहीं आचरना।।
इन्द्रिय विषयों से प्रीति छोड़ो।
विपरीत शील से नाता तोड़ो।।
कुशील पाप से दुख नहीं पाओ।
सुदर्शन, अनंतमती बन जाओ।। - समकित शास्त्रो

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कहानी

गुरुकुल के स्नातकों की मनोवैज्ञानिक परीक्षा करने के लिए गुरु ने शिष्यों से कहा- प्रत्येक छात्र आधे मुहूर्त तक इस पहाड़ की तरफ देखता रहे और वहाँ जिसको जो सुंदर वस्तु दिखे, वह मुझे बताना। सबने उस ओर देखा। समय पूर्ण होने पर किसी ने पत्थर, किसी ने कोई पेड़, किसी ने लताओं आदि की सुंदरता का वर्णन किया। अंत में एक छात्र ने बताया कि मुझे सबसे सुंदर अपना ज्ञान ही दिखा, जो सबको जान सकता है। यदि ज्ञान न हो तो दुनिया की कितनी भी सुन्दर वस्तु की क्या कीमत!


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3024.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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